पं. बिलवासी मिश्र

[यूँ तो हिन्दी साहित्य में कुल नौ रस माने गये हैं  और प्रत्येक रस का एक विशिष्ट स्थान है। पर मुझसे पूछें तो मेरी दृष्टि मे हास्यरस सर्वोपरि है। जो पढ़े सो हँसे, फिर पढे, मुँह की माँसेपेशियों की कसरत हो, ज्ञान बढे़, ख़ून बढ़े। और क्या चाहिये। अब हास्य-साहित्य मैनें बहुत तो पढ़ा नहीं पर जो पढ़ा उनमें श्री अन्नपूर्णानंद वर्मा विशेष प्रिय हैं। कहने को वे मेरे बड़े नाना होते हैं… नाना जी के छोटे ताऊ जी। पर उनसे मिलने का सौभाग्य विधाता ने मुझे नहीं दिया। २१ सितंबर, १८९५ में जन्मे श्री अन्नपूर्णानंद जी तीन भाइयों में बीच के थे। वर्ष १९६४ में जब उनका निधन हुआ तब वे अपने बड़े भाई सम्पूर्णानंद जी जो कि उस समय राजस्थान के राज्यपाल थे, के साथ जयपुर में रहते थे। जीवन में आये उतार-चढा़व के कारण स्वभाव से अति-गंभीर नाना जी की कलम से हास्यरस का ऐसा वेग फूटता था, ये बात मुझे चकित कर जाती है। उन्होनें बहुत तो नहीं लिखा पर जो भी लिखा, पठनीय है। इसलिये ये श्रंखला शुरू कर रही हूँ जिससे आप तक भी उनकी रचनायें पहुँच पायें। इस बीच उनके जीवन के बारे में जो भी थोड़ा बहुत जानती हूँ वह भी थोड़ा-थोड़ा कर आप तक पहुँचाती रहूँगी।]

 जम्बू नामक द्वीप के भारतवर्ष नामक खण्ड में- अवध के ऊपर और तराई के नीचे-हिंदुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है जिसका नाम है बहराइच। यहाँ गाज़ीमियाँ नाम के एक सिद्ध महापुरुष हो गये हैं जिनके दर्शन-पूजन का बड़ा माहात्म्य माना जाता है। हर साल हज़ारों हिन्दू आ कर यहाँ परमार्थ-चिन्तन का लाभ  उठाते हैं। एक अर्थशास्त्री ने पता लगाया है कि जितना फूल यहाँ गाज़ीमियाँ की दरग़ाह में प्रतिवर्ष हिन्दू स्त्रियाँ चढ़ाती हैं उन्हें बटोर कर यदि शहद निकाला जाय तो इतना शहद तैयार हो सकता है कि हिन्दू महासभा उसे अपने प्रस्तावों में लगाकर सदियों तक आनन्द्पूर्वक चाट सकती है।
  
 यहीं बहराइच में मेरी शादी तय हो रही थी और देन-लेन की चर्चा छिड़ गयी थी। लड़की के पिता के पस अकूत धन था। अभी तक इतना तय हो पाया था कि शादी में मुझे १ बीबी, २ इलाके, ३ मोटर, ४ मकान, ५ घोड़े, ६० हज़ार नक़द और ७० हज़ार के ज़ेवर मिलेंगे।

    यह सब बहुत ठीक था, सिर्फ़ एक बात गड़बड़ थी। किसी मत्स्य-भोजी से पूछिये कि उसके प्रिय खाद्य में काँटों का प्राचुर्य क्यों है। इस संसार मे मिसरी में फाँस वाली बात हर जगह पायी जाती है। मुझे उड़ती हुई खबर लगी कि लड़की रूप-रँग में त्रिजटा की सगी-सगोतिन है।

    मैंने तो समझा था सोने की चिड़िया हाथ लगी पर इस समाचार ने तो मेरी सारी आशाओं पर पानी फेर दिया। इस बात का पूरा विश्वास कर लेने से पहले अब यह ज़रूरी हो गया कि इसकी काफ़ी छानबीन की जाय। अपने किसी ख़ास आदमी को भेज कर इसका अनुसन्धान कराना उचित जान पड़ा। मैनें इस सम्बन्ध में अपने मित्र पं. बिलवासी मिश्र से मदद लेने का निश्चय किया।

    लड़कपन में बिलवासी जी से मेरा धौल-धप्पड़ का रिश्ता रहा और अब वे मेरे ख़ास दोस्तों में से एक हैं। मेरी तरह वे भी अपने घर में पड़े-पड़े सिर्फ़ भोजन और डासन से काम रखते हैं। भेद इतना है कि वे एक लेखक और कवि हैं और मैं एक भला आदमी। उन्होने अपनी लेखनी के बूते पर साहित्य-वन-विहङ्ग और साहित्यानन्द-सन्दोह आदि की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। ये लाखों में एक आदमी हैं। जिस समय इनका पूरा परिचय संसार को प्राप्त हो जायेगा उस समय लोग गली-गली इनकी जय बोला करेंगे। कुछ काम इनके ऐसे हैं जिन्हें अगर इतिहास की अमर सामग्री कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। उदाहरण के लिये ये लालटेन की बत्ती अपने अस्तुरे से काटते हैं। कोबरा पालिश और झाड़ू की सीँक से इन्होने दवात और क़लम का काम लिया है। ठाकुर जी की आरती इन्होनें कई बार मोमबत्ती से की है। पान में सुपारी नहीं रहती तो छुहारे का बीज काट कर डाल लेते हैं।

    मैं दोपहर के समय इनके मकान पर पहुँचा। वे खाना खा चुके थे। और मुँह में पान भर कर बाहर बैठक में लेटे हुए जुगाली कर रहे थे।
    मैनें कहा–‘नमस्कार बिलवासी जी!’
    उन्होनें उत्तर दिया–‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    ‘कुशल समाचार कहिये।’
    ‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    ‘इस समय आप क्या कर रहे हैं? आपसे एक राय करनी है।’
    ‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    मैं झल्ला गया; मैनें कहा–‘आप की जान मे सिवा ऊँ के और भी कोई ऐसा शब्द है जिससे आप मेरा उत्तर दे सकें? आपको जानना चाहिये कि मैं पशुओं की बोली नहीं समझता।’

    वे थोडी़ देर मेरी ओर इस प्रकार देखते रहे जैसे मुझे वे कोई बरसाती कीड़ा समझते हों जो व्यर्थ उनके कानों के पस भनभन कर रहा था। फिर पान घोंट कर उन्होने अपना मुँह खाली किया और बोले–‘लाला-जी! आप किसी भले आदमी से ऐसी आशा क्यों करते हैं कि जब वह भोजन के उपरांत मुँह में पान भर के लेटा हुआ पेट पर हाथ फेर रहा है उस समय वह आपकी बातों का उत्तर सिवाय ऊँ के अन्य किसी प्रकार से देगा।’
   ‘खैर जाने दीजिये। मैनें समझा था कि आप की जीभ ऐंठ गयी है। मैं इस वक्त इसलिये आया कि मुझे आपसे एक ज़रूरी काम है।’
   ‘काम के नाम से मैं घबराता हूँ। कोई राय देनी हो तो लेटे-लेटे दे सकता हूँ।’
   ‘मैं चाहता हूँ कि आप मेरी भावी पत्नी को देख कर उसकी सूरत-शकल के बारे में अपनी राय दें।’
   ‘बुला लाइये उन्हें। वे आप की बीबी होने वाली हैं — इसलिये उनके साथ सहानुभूति भी प्रकट करूँगा और साथ ही अपनी राय भी ज़ाहिर कर दूँगा। कहाँ हैं — क्या बाहर खड़ी हैं?’
   ‘आप भी पूरे अहमक हैं। वह बहराइच में रहती हैं, वहीं जाकर आपको किसी प्रकार उन्हें देख कर आना है।’
 
    पाँचवें दिन मुझे दो पत्र मिले, एक बिलवासी जी का, दूसरा लड़की के पिता का। बिलवासी जी का पत्र मैं ज्यों का त्यों उतारे देता हूँ। उन्होनें लड़की के संबन्ध मे केवल इतना लिखा था जो मेरे ख़याल से बहुत काफ़ी था —
                       तावा-सी तमाल-सी  तमाखू-सी तिलकुट-सी
                                पावस अमावस की   रैन अन्धकार-सी।
                       कागा-सी करइत-सी   काजल-सी कालिका-सी
                               कोइल-सी  कोयला-सी  खासी कोलतार-सी॥
                                                                     – बिलवासी

लड़की के पिता का पत्र पढ़ के मैं दंग रह गया। उसमें लिखा था — ‘आज एक ब्राह्मण देवता कहीं से घूमते-फिरते मेरे यहाँ आ गये थे। वे सामुद्रिक शास्त्र के अद्वितीय विद्वान जान पड़ते थे। उन्होनें अपना नाम बिलवासी मिश्र बताया था। उन्होनें हम सबका हाथ देखा। मेरी लड़की का हाथ देख कर उन्होंने बतलाया कि इसकी शादी जिसके साथ तय हो रही है वह महालम्पट और दुराचारी है और छः महीने के अन्दर उसकी मृत्यु अवश्य हो जायगी, या तो चुल्लूभर पानी में या कालेपानी में। ईश्वर को अनेकों धन्यवाद है कि आप के बारे में ये बातें पहले मालूम हो गयीं। मैं अपनी लड़की को आग में नहीं झोंक सकता। आपके साथ उसके विवाह की जो बात चल रही थी उसे अब भूल जाइये।’

Published in: on अगस्त 22, 2006 at 7:14 अपराह्न  Comments (7)  

कानपुर मेरी जान…दूसरा व अंतिम भाग!

गतांक से आगे…

मामा जी के दिशा-निर्देशानुसार जस तस रामादेवी चौक पर पहुँचे। उसके बाद लखनऊ की ओर मुड़ लिये। हमने सोचा अब आया टू बाई टू का हाईवे। पर कहाँ – टूटी-फूटी सड़क….उस पर भी डिवाइडर का अभाव। अब तो हम छोटे बच्चों से हुलस गये। हर सौ मीटर पर एक ही प्रश्न- “कब आयेगा हाइवे?”। अमित भी बड़े लोगों और नेताओं की तरह “बस आता ही होगा” कहते रहे। यह प्रश्नोत्तरी चल ही रही थी कि सामने  विपरीत दिशा से मोटरसाइकिलों और उनके पीछे ताँगो का जत्था आता दिखा। शोर मचाते, रूमाल हिलाते वे लोग हमारी दिशा में दौड़े आते थे। हमें लगा हो न हो आगे कोई संकट है …उसी की चेतावनी होगी यह। पर थोड़ी ही दूर पर दूसरी तरफ़ की सड़क पर भी कुछ ताँगे सरपट दौड़ते दिख गये। यीएह…येह..अउर ज्जोर के…। अब समझे …शायद ताँगा दौड़ थी। रजनीकांत की पिक्चरों सरीखी। थोड़ी देर पहले जिस बात पर हम कुड़कुड़ कर रहे थे अब उसी मे मज़ा आया, रोमांच का अनुभव हुआ। खैर वह टू बाई टू रोड कहाँ आई हमें पता नहीं चला । बकौल अमित सीटबेल्ट से बँधे हम सारे रस्ते अपनी खोपड़ी से वृत्त बनाते रहे और उन्हें ये इतना मज़ेदार लगा कि हमें जगाया ही नहीं। हमने तय किया कि लौटते में हम जागते रहेंगे। लखनऊ से निकलते ही करीब २५-३० किलोमीटर का रस्ता वाक़ई बढिया है, वापसी के समय हमने यह निष्कर्ष निकाला।

अगले दिन सोचा था कि नाना के साथ वक्त बिताया जायेगा। पर नाना ने तीन चार जगहों की लिस्ट बना दी थी- “यहाँ यहाँ जा के मिलना ही है”। पस्त हालत और खस्ता हो गयी इस बात पर। सुबह आठ से दोपहर तीन और फिर रात २ से सुबह ६ बजे तक बत्ती गोल रहती है इसलिये देर तक सोना भी संभव नहीं था, उठ कर कपड़े जो इस्तरी करने थे। इसलिये हमने बिना देर किये ‘हिट’ को इत्र की तरह अपने ऊपर छिड़का और पड़ गये। रात को तीन बजे बगल में सोती बहन ने जगाया –
“क्यूँ तुम्हे मच्छर काट रहे हैं?”
“हूँ”
“तो फिर सो कैसे रही हो?”
मुझे लगा मच्छरों के काटने से उसका दिमाग खराब हो गया है। अंधेरे में उसे घूर के भी लाभ ना होता। इसलिये बिना अपना आपा खोये सोना ही उचित समझा। अगले दिन लगभग कानपुर के हर छोर के दौरे के लिये जाना था।

बहुत सी जगह शादी के बाद पहली बार जाना हो रहा था। इसलिये हम टिप-टॉप तैयार हो गये। बीच रास्ते में एक चौक पर ज़बरदस्ती एक ट्रक वाले ने ट्रक ठूँस दिया। नतीजा- जाम, हार्न की चीख पुकार। आधे घन्टे में गाड़ी टस से मस न हुई। ट्रैफ़िक पुलिस सड़क के किनारे सुरती-तँबाखू मीसती रही। हमारा क्रीम-पाउडर, आधे घन्टे की मेहनत, बह चली। कपड़े ऐसे हो गये जैसे नानी के झाड़न वाली संदूक से निकाले हों। हम झल्ला रहे थे, बहन को परिहास सूझ रहा था। अंततः हमने उसे डपटते हुए कहा
“तुम्हारा मुँह बंद नहीं हुआ तुरंत तो किसी ट्रक के आगे फेंक दूँगी अब”
“हाँ इस आगे वाले ट्रक के आगे फेंक दो, ये ना कभी चलेगा न मैं मरूँगी”
उसने जले पर नमक छिड़का। लौटते में नवीन मार्केट होते हुए आना था। सड़क पर एक ही ओर से आती गाडि़यों का हुजूम। बिल्कुल वनवे का बोध होता था। ये बात और थी कि यह वनवे नहीं था। कुछ लोग बीच सड़क पर गाड़ी रोक शॉपिंग पर गयी अपनी बीबियों की राह देख रहे थे, उसी की परिणीति थी बस। खैर जैसे तैसे कानपुर भ्रमण हुआ। रात में मामा के यहाँ आकर थोड़ा सुकून मिला।  मामा ने कहा था बड़े नाना के पुस्तकालय को वह दान देने के सोच रहे हैं सो अगर मुझे कुछ चाहिये तो पहले ही ले लूँ। अंधा क्या चाहे दो आँखे। बस हम टूट पड़े…। तब तक ढेर लगाते रहे जब तक कि मम्मी, बहन और अमित ने आँखो से ये ऐलान न कर दिया कि बस इससे अधिक हम नहीं ढोने वाले। चार लोग अधिक से अधिक जितना उठा सकें उतना इंतज़ाम करके ही हमने दम लिया। अब जो लायी हूँ उसे आपके साथ शीघ्र ही बाँटूगी।

अगला दिन नाना के साथ और उन्हें डॉक्टर को दिखाने इत्यादि में निकल गया। १५ अगस्त का दिन।  सुबह सुबह झंडारोहण भी किया। बीमार होने के बावजूद नाना ने एक नया झंडा लाकर के रखा था। खैर अब वापस आना था। दिल में रह रह के खटका होता था। क्या विडंबना है कि जिस दिन हम स्वतंत्र हुए आज उसी दिन अपने देश में कहीं आते जाते भय लगता है। खैर ‘जाको राखे साइंया मार सके ना कोय’ का जाप करते हुए हम घर से निकल लिये। वापसी की गाड़ी प्लेटफ़ॉर्म ४ से थी। गाड़ी आने के ठीक तीन मिनट पहले घोषणा हुई कि गाड़ी अब ७ नंबर के प्लेटफ़ॉर्म से जायेगी। नाना जी के अनुसार यह तो वहाँ होता ही रहता है, यह कोई नयी घटना नहीं थी। वापसी का सफ़र भी रोचक रहा जिसके बारे में फिर कभी लिखूँगी।

गतांक पर हुई टिप्पणियों का धन्यवाद पर लगा कि लोग डर गये मेरे विवरण से। डराना मेरा उद्देश्य नहीं था। कानपुर के बारे में भी सकारात्मक बातें होंगी अवश्य जिनके बारे में फ़ुरसतिया जी बेहतर बता सकते हैं। 🙂  मैं कानपुर वासियों के बारे में कुछ नहीं कहती क्युँकि उनसे ऐसी कोई बातचीत ही न हुई। बात मैनें हँसी हँसी मे कही पर कानपुर, विशेषत: पनकी से मेरा अत्यधिक भावनात्मक लगाव रहा है, इसलिये नगर में इतनी अव्यवस्था देख के कहीं न कहीं दुख हुआ। शायद नागरिकों से अधिक नगर प्रशासन का दोष है यह। यदि नियम कानून कड़ाई से लागू किये जायें तो उनका पालन भी अवश्य होता है। चलिये यह बात फिर कभी करेंगे…अगली प्रविष्टियों में प्रयास रहेगा कि कुछ साहित्यिक रचनायें आप लोगों के समक्ष रख सकूँ जिनका भंडार मैं बटोर के लौटी हूँ।

Published in: on अगस्त 20, 2006 at 10:58 पूर्वाह्न  Comments (4)  

ये है कानपुर मेरी जान!

बड़े सालों बाद कानपुर दौरे का योग बना। विगत कुछ दिनों से नाना जी का स्वास्थ्य चिंताजनक था। इसलिये आनन-फ़ानन में कार्यक्रम बन गया। शनिवार, रविवार, और मंगलवार की छुट्टी थी। पतिदेव ने सोमवार की छुट्टी ले  ली और हम चल पड़े कानपुर। आगरा से मम्मी और छोटी बहन भी साथ हो लिये।

शनिवार सुबह-सुबह जोधपुर-हावड़ा में अपनी अपनी सीटों पर चारों जन सवार हो गये। कुछ वर्ष पूर्व यह कानपुर जाने वाली बढ़िया ट्रेनों में शुमार थी । अब भी ऐसा ही होगा ऐसा हमें भ्रम था। पर यह क्या…डेढ़ घंटे मे गाड़ी खाली टूँडला तक सरकी। बल्कि सही सही कहूँ तो टूँडला के आउटर पर ही खड़ी हो गयी। ‘अब और नहीं चला जाता रे!’ की सी मुद्रा में। कुछ यात्री ट्रेन से निकल सुबह की सैर पर चल पड़े और लौटते में पास के पेड़ों से दातुन-शातुन का बंदोबस्त भी कर लाये। हमें ट्रेन से उतरना सुहाता नहीं सो खिड़की से ही पास के पोखर में पड़े गुटखे के रैपर गिन डाले। पता है कि यह बड़ा फ़ालतू काम था पर समय नष्ट करने का और कोई साधन था ही नहीं। बाकी के तीन सहयात्री सोने के मह्त्वपूर्ण काम को अंजाम दे रहे थे। खैर, आखिरकार ट्रेन चली, थोड़ी दूर पर फिर रुकी, फिर चली। धूप खिड़की पर पसर गयी थी सो वह बंद करनी पड़ी। ट्रेन की धक्कम-पेल से ऊब कर हमने सहयात्रियों का अनुसरण करने का निश्चय किया। अपनी सीट तानी और लंब-लेट हो गये। और क्या गजब की टाइमिंग–सीधे पनकी से थोड़ा पहले ही आँख खुली। ट्रेन २ घंटा लेट थी। वैसे भारतीय रेल के समयानुसार इस विलंब नहीं माना जा सकता।

कानपुर सेंट्रल पर उतरना बड़ी मशक्कत का कार्य है। लोग आपातकालीन खिड़कियों तक से घुसना शुरू कर देते हैं । शरीर, जूता-चप्पल, सामान और जेब को संभाल कर गाड़ी में से उतरना अपने आप में एक कला है। हम सब कलाकार आखिरकार बाहर पँहुच ही गये। बाहर निकल कर ऑटोरिक्शा किया गया। नानाजी का ड्राइवर हम लोगों को पहचानता नहीं सो मम्मी ने उसे आने से मना कर दिया था। वैसे भी, देखा-भाला शहर…चिंता की कोई बात थी ही नहीं। भैया कानपुर में सबको क्या सम्मान दिया जाता है…दादा रे! हम तो दंग रह गये। क्या रिक्शा, क्या साइकिल और क्या ट्रक। सबको समान अधिकार। कोई बाँई-दाँई लेन का चक्कर नहीं। साइकिल सवार को भी बीच सड़क पर चलने का सर्वाधिकार प्राप्त है। बल्कि जिसे जहाँ जगह मिले या जहाँ मन आये वहाँ चलाओ गाड़ी। सब अपना ही है। फ़िकर कैसी। हमारा ऑटो चालक बड़ी कुशलता से दायें-बायें सर्प के समान चाल से गाड़ी चला रहा था। हमारे होश उड़े हुये थे। जो ग़ुलामी में जीता हो उसे ऐसी आज़ादी की आदत कहाँ। यहाँ तो सीट-बेल्ट, लेन ड्राइविंग, गति सीमा, प्रदूषण नियंत्रण, ट्रैफ़िक सिग़्नल जैसे कम से कम सौ पचड़े हैं। एक हियाँ देखो…। घर पहुँच कर हम सबको एक दूसरे के धुएं से बिगड़े चेहरे पहचानने में ही दो मिनट लग गये।

घर के भीतर पहुँच नाना जी से मिले। देख कर जी पता नहीं कैसा हो गया। हृष्ट-पुष्ट नाना कैसे हड्डी हड्डी हो गये हैं। बुढा़पे ने शरीर से अधिक उनका मन तोड़ दिया है। बस चले तो साथ ले आऊँ उन्हें पर जिस घर को अपने खून-पसीने से सीँचा, अपने हाथों से सँवारा, जिस घर में रहते उन्हें ३० बरस से ऊपर हो गये वह घर ऐसे कहाँ छूटता है उनसे। उनकी इस इच्छा को समझते हैं हम सभी…इसलिये एक कशमकश में घिरे रहते हैं, असहाय और बाध्य। खैर….हमसे मिल कर नाना जी को और उनसे मिल कर हमें बहुत ही अच्छा लगा। फ़ुरसतिया जी से भी बात हुई। शाम को मामा-मामी भी आ रहे थे सो उनके घर जाना संभव ही ना था, अतः हमारा आमंत्रण स्वीकार कर वह सपत्नीक एवं स-छोटेसुपुत्र हमसे मिलने आये। सभी को उनसे मिल कर काफ़ी खु़शी हुई, नाना जी को भी। इतने सारे लोग थे बात करने को इसलिये चर्चा का विषय सामान्य ही रहा।  मम्मी ने बिल्कुल भारतीय माँ के अनुकूल व्यवहार करते हुए हमारे बचपन के दो चार अनकट किस्से सुना डाले जिन्हें अपनी पिछली पोस्टों मे हमने जानबूझ के शामिल नहीं किया था। ब्लॉगिंग और हिन्दी साहित्य पर कोई विशेष चर्चा न हो सकी। उम्मीद करती हूँ कि अगली बार जब भी हम मिलें उनसे दो चार गुरूमंत्र मिल जायें।

अगले दिन लखनऊ जाना था। फ़ुरसतिया जी की एक पोस्ट में पढ़ा था कि २ बाई २ का बढ़िया हाईवे है। अब हाईवे के नाम पर हमने आगरा-दिल्ली के हाईवे का चित्र संजो रखा है। सोचा इसी का भाई-बंधु होगा यह कानपुर-लखनऊ मार्ग।

क्रमश:

Published in: on अगस्त 18, 2006 at 10:23 अपराह्न  Comments (17)  

हम बोले…बम बम भोले!

पिछले कुछ दिन से सोच रहे हैं कि लिखें पर लिख ही नही पाये ।  जिसके घर का चूल्हा तीन दिन से न जला हो वो लिखे भी तो कैसे !  तो हम बस दाल- रोटी की याद में किनारे पड़े रहे । सारी मनोकामनाओं को दरकिनार कर प्रभु से रोज़ यही कहा  कि  खीरा, टमाटर और ब्रैड कब तक खाँऊ !! च्यास इतनी लगी है कि क्या कहूँ । बाहर का खाना खा खा के पेट कल्ला रहा है । अब तो दया करो नाथ! आज तो गैस का सिलेंडर भेज ही दो दीनदयाल । प्रभु ने भी आज जा के सुध ली ।  गैस वाला आ गया । बोला २९३ रुपये हुए । हमने खुशी-खुशी ५०० का पत्ता थमाया । कहा ३ रुपये खुले देते हैं । पर ई का ! उसने ३ सौ सौ के नोट थमा दिये । “आप ९३ रुपये खुले दे दो” । अब हम इतने खुले पैसे कहाँ से लायें । पिछली बार भी ऐसा हुआ था । बंदे के पास खुले नही थे । अन्ततः हमने ६ रुपये अधिक दे के गैस ली थी । हमें लगा हो ना हो हमें मूर्ख बनाया जा रहा है । हमने कहा भाई देखो शायद हो एक १० का नोट । इतने खुले पैसे तो हैं नहीं मेरे पास । पर नहीं …रूखा सा जवाब मिला…सब खुले खतम । अब या तो हम खुले ढूँढे या फिर ७ रुपये अधिक दें । हमने भी सोचा ..बेटा लाओ आज तुम्हें ही ठीक करें  । अन्दर जा के अपना रेज़गारी का डब्बा निकाला ।  ५ के छः सिक्के, २-२  के इक्कीस, १ का एक और बीस का नोट निकाल हाथ में धर दिया । भैया जी की सूरत देखने लायक थी । “हमारे पास तो यही हैं, बड़ा ढूँढ कर निकाले” कहकर हमने विजयी मुस्कान के साथ धम्म से दरवाज़ा बंद कर लिया । मन में सोचा “हाँ नहीं तो, सबको उल्लू समझते हैं । मै क्यूँ दूँ चवन्नी भी ज़्यादा” । फिर गिलास भर कर चाय बनायी….जिससे कि पिछले दिनों चाय न मिलने से हुई से हुयी विटामिनों की कमी की पूर्ति हो जाये । अब लिखास दूर करने के लिये लिखने बैठे हैं ।

इस सप्ताहांत हम झाँसी के दौरे पर थे । झाँसी मतलब ससुराल । कुछ ज़रूरी काम था और नाग पंचमी का उत्सव भी । हमारे ससुराल मे इस दिन बड़ी ज़ोर शोर से पूजा होती है । असल में पापा ने एक मंदिर बनवा रखा है घर के बाहर । और समय के साथ इसकी मान्यता भी बढ़ती जा रही है । इसलिये लगभग हर तीज-त्यौहार पर मेले का सा नज़ारा हो जाता है ।  शादी को तीन साल हो गये पर कभी किसी ऐसे मौके पर जाना ही नहीं हो पाता था । इस बार मौका लग गया । शनिवार का सारा दिन अमित के काम में निकल गया । रात को थक कर कूलर के ऐन सामने जो धराशायी हुए तो सुबह जल के छीटों से ही आँख खुली । मम्मी पूजा करके सुबह सुबह घर भर में पूजा का जल छिड़कती हैं । हाय राम आठ बज गये – हम धक्क रह गये । पर मम्मी ने सर पर हाथ फेर कर कहा “रात में बहुत थक गयी थी इसलिये नहीं जगाया । चाय पी लो और १० बजे तक तैयार हो जाना” । जान में जान आयी । तब तक पापा की आवाज़ आयी “मोटी॓ऽऽऽऽ…जग गयी क्या” । “पाऽऽऽऽपा..हो जाऊँगी फिर से पतली…मैने एक्सर्साइज़ भी शुरू कर दी है” मैने मुँह लटका के पापा को समझाना शुरू किया । “अरे बेटी…हम तो ऐसे ही चिढ़ा रहे थे । ऐसी ही रहो । पतली हुई तो बाज़ूबंद ज़ब्त” पापा ने लाड़ से कहा । मेरे देवर की सगाई पर होने वाली देवरानी बाजूबंद पहनी थी…असली कि नकली पता नहीं । पर पापा को धुन लग गयी कि बड़ी बिटिया (बहू) के पास भी होना चहिये एक । अगले ही दिन एक सोने का बाजूबंद आ गया । अब जब पतले होने की बात करो उसी के ज़ब्त होने की धमकी देते हैं हमारे श्वसुर । अब उन्हें क्या कहूँ कि बाज़ूबंद कलाईबंद हुआ जा रहा है ।

बाहर सुबह ५ बजे से ‘ऊँ नमः शिवाय’ की धुन बैठ गयी थी । ढोल मँजीरों के साथ ‘ऊँ नमः शिवाय’ का जाप बड़ा मधुर सुनाई देता था । मंदिर सज गया था । इस बार शिव जी का अभिषेक मुझे और अमित को करना था । हम दोनों ही नहा धो के मंदिर पहुँच गये । मंदिर में इतनी चहल पहल तो मैनें पहली बार देखी । मंदिर के परिसर में रहने वाले खरगोश, कबूतर, बत्तखें, मछलियाँ और एक बँदरिया सभी मानो उत्सव मना रहे थे । पेड़ॊं पर झूले पड़े थे जिसके आस पास बच्चों का हुजूम था । रंग बिरंगी कंपट बेचने वाली, आइसक्रीम वाला और गुब्बारे वाला मंदिर के बाहर डेरा डाले थे ।  हम मंत्र मुग्ध से भक्तिमय वातावरण मे खोये ही हुए थे कि मंदिर में एक भयंकर आदमी के अभिवादन से हमारी तंद्रा टूटी । चक्क काला रंग, चेहरे पर बहुत से धब्बे, ऊँचा कद और लाल आँखे । हमने सोचा – ये कौन ? “बहू जी आपको साहब बुला रहे हैं “, व्यक्ति ने कहा । पापा बुला रहे थे । अमित भी पीछे पीछे आये । “पापा इसे भी दिखाइये ना… ” अमित ने पापा से कहा । अब तक कुछ भी हमारी समझ नहीं आया था । “लाओ लाखन, बहू को नाग देवता के दर्शन करा दो” पापा ने उस आदमी से कहा । “ओह ! तो ये एक सपेरे हैं । और अमित ने शायद कल ही देख लिया नाग ” मैने सोचा । घर में पापा को सर्प वगैरह के काटे का इलाज आता है और उस इलाके में अक्सर साँप निकलते ही रहते हैं । मंदिर मे भी साँप होते हैं कभी कभी । इसलिये वहाँ नाग-अजगर मानो बड़ी बात है नहीं । इन्हें और भाई-बहनों को इसी वजह से डर भी नहीं लगता । कहो तो गले में डाल लें । पर भैया हमने तो नाग का ‘न’ भी नहीं देखा कभी । तो दर्शन के नाम से ही झुरझुरी हो आयी । पिटारा खुला । एक नाग और एक छोटी सी नागिन (जैसा कि सपेरे ने बताया ) ।

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नागिन जितनी शांत , नाग उतना ही आक्रामक । उसकी साँस की आवाज़ और फ़ुँकार से मेरी तो कँपकँपी छूट रही थी । इतने में एक अजगर भी सपेरे ने निकाला और ज़मीन पर छोड़ दिया ।

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अब कँपकँपी घिग्घी में बदल गयी थी । अमित और पापा लगे समझाने – बेटा कुछ नहीं कहेगा वो तुम्हें । खैर उसने कहा भी नहीं । नहीं तो हम चाय ना सुड़क रहे होते । वह सर्र गया मंदिर के चबूतरे पर और जहाँ जगह मिली वहीं एक शाखा से गाँठ लगा के बैठ गया । हमने चट्ट-चट्ट दो चार फोटो खीँच लिये । फिर कैमेरा अमित को थमा पूजा की तैयारी करने निकल पड़े । मम्मी ने कहा था १०८ बेलपत्र पर सीता-राम लिखना है । सो जुट गये काम में । पीले चंदन से हरे पत्तों पे लिखा सीता-राम कितना सुंदर दीख पड़ता था । संयोगवश मैनें भी पीली-हरी साड़ी पहनी थी ( जिसके बारे में अमित कहते हैं कि उसे पहन कर मैं ब्राज़ील का झंडा लगती हूँ ) । अमित की दीदी ने आ कर खिंचाई की – यार निधि, तुम तो पत्तों की एकदम मैचिंग लग रही हो  । पहली बार पता लगा कि जितना सरल सोचा था उतना आसान नहीं था यह काम । घंटा लग गया लिखने में ।

अब तक जनता आ कर नाग पूजन आरंभ कर चुकी थी । वही नाग इतना शांत बैठा था कि क्या कहूँ । अब पापा ने हम दोनों को बुलाया पूजन के लिये । कहा – टीका लगाओ । हाय राम…नमस्कार से काम नहीं चलेगा क्या !! इतने लोगों के सामने रिरियाऊँ भी तो कैसे !! कुल मिला के हमारी नज़रों मे अपनी स्थिति दयनीय थी :(। पापा ने नाग देव को हाथों से पकड़ रखा था । अमित ने टीका लगाया । हमने भी राम-राम करते हुये टीका लगा दिया । देव हिले भी नहीं । जाने उनका क्रोध कहाँ चला गया था । हाथ जोड़ प्रार्थना की । अब नागिन की पूजा की बारी । वह तो सर्र-पर्र भाग रही थी । जैसे जैसे वह हिले वैसे वैसे हम । कुल मिला कर दोनो नगीना टाइप युगल नृत्य कर रहे थे । अन्तत: पापा ने उसे भी पकड़ा तो हमने पूजा की । इसके बाद भोले बाबा के अभिषेक की बारी । जल, दुग्ध, घृत, शहद, दही, शक्कर व पंचामृत से बाबा को स्नान कराया । उसके बाद ‘ऊँ नमः शिवाय’ के जाप के साथ पीतल के बने गो-मुख से जलाभिषेक और फिर मंत्रोच्चार के साथ बेलपत्र अर्पित किये । भोग लगा, हवन हुआ व फिर आरती । उसके बाद भंडारा था । धीरे धीरे शाम भी हो चली थी । साँध्यकालीन आरती बहुत ही मोहक रही । ढोलक, हारमोनियम, मँजीरे, घंटे और शंखनाद के स्वरों के साथ भक्तो के एक विशाल समूह ने जब गाना प्रारंभ किया तो मन हुआ कि यह कभी खत्म ही ना हो । क्या बच्चे, क्या बूढे़, सभी आँख मूँदे प्रार्थना में लीन । पंडित जी कब आरती का थाल ले सामने आ खड़े हुए, मुझे भान ही नहीं हुआ । फिर पापा ने सर्प विसर्जन किया । सर्प विसर्जन यानि सभी सर्पों को मुक्त करना । उसके बाद हम लोगों (दीदी (ननद), उनके बच्चे इत्यादि)  ने झूले हथियाये ।  बड़े दिनों के

 बाद झूला झूला । आत्मा प्रसन्न हो गयी । थोड़ी देर में सासु माँ भी काम निपटा आ गयीं थीं । मुझे देख कर बोलीं “अरे तुम तो बिल्कुल भी ऊँचा नहीं झूल पा रही, लाओ हम झुलायें” । ” हाँ निधि, मम्मी बहुत बढिया झुलाती हैं ” दीदी (ननद) बोलीं । हम थोड़ा हिचकिचाये, सासु माँ हमें झूला झुलायें….ठीक होगा क्या । पर मम्मी ने एक ना सुनी । दीदी और मम्मी ने खूब झुलाया ।

 

बड़ा मज़ा आया । जहाँ तन हल्की बारिश की नन्हीं बूँदो से भीग रहा था वहीं मन स्नेह से । फिर हम सबने पोज़ बना बना फोटो भी खिँचा डाले झूलों पर । इस बार घर के पेड़ से नीँबू, करौंदे भी तोड़े । पिछली बार जामुन और उससे पहले अमिया तोड़ने का आनंद लिया था । सच्ची, अपने हाथ से फ़ल तोड़ कर खाने में बड़ा सुख मिलता है । खैर, रात को ट्रेन थी वापसी की । सामान बटोरा और सारी चहल-पहल छोड़ वापस हो लिये । यहाँ यूँ तो हर तरह के संसाधन उपलब्ध हैं – ऊँची इमारतें, विशाल शॉपिंग मॉल्स, चौड़ी सड़कें, बड़ी गाड़ियाँ । नहीं है तो छोटे शहरों सी आत्मीयता, नहीं है हर छोटे-बड़े उत्सव पर मिल जुल कर संस्कृति को जीवंत करने की क्षमता । कब त्योहार आये और कब चले गये पता ही नहीं चलता । न सावन के झूले हैं, न फागुन के गीत, न पतंग, न लकड़ी और मिट्टी के रंग बिरंगे खिलौने, न मेला, न खेत ना आँगन । सोचती हूँ असली भारत इन बड़े शहरों में बसता ही कहाँ  है । लगता है मानो जीवन की आपाधापी में हम जीवन के आनंद और अर्थ को ही छोड़ आये…कहीं दूर, बहुत पीछे …अपने छोटे शहरों और गावों मे ।

Published in: on अगस्त 2, 2006 at 4:20 अपराह्न  Comments (7)  

आशिक़ आवारा….

कुछ दिनों पहले फुरसतिया जी ने अपने चिट्ठे पर लखनऊ मार्ग पर घटी एक घटना का विवरण प्रस्तुत किया था । एक नारी ने अपनी सैंडल से एक हमदर्द की बड़ी उड़ैया करी । हमें पढ़ के असीम आनंद का अनुभव हुआ । घटना के पीछे का सही कारण ना फुरसतिया जी को पता था न हमें है । परंतु अनुमान लगाया जा सकता है । सामान्यत: कोई भी नारी बिना वजह अपना वक्त और सैंडल ज़ाया नहीं करती । हो न हो पीड़ित महोदय के सर पर आशिक़ी का भूत सवार हुआ होगा । वैसे तो ९५% पुरुषों का यह उद्देश्य होता है कि जीवन में कभी न कभी, एक न एक बाला तो प्रेमिका के रूप में मिले ही । बाकी के ५% खालीपीली के आशीष जी जैसे होते हैं, सन्यासी प्रवृत्ति के । परंतु ९५% में ही पुरुषों का एक विशिष्ट वर्ग ऐसा भी है जिसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य ही है कन्याओं के आगे पीछे घूमना । तू नहीं और सही, और नहीं और सही…यही इनके जीवन का मूलमंत्र है । जीवन के किसी दौर में अगर कम से कम एक गर्लफ़्रेंड न हो तो ज़िंदगी व्यर्थ प्रतीत होती है ।अब इस बात पर एक कथा याद आती है । कहानी में एक छोटी सी नायिका है और एक है साइड हीरो । बाकी और भी पात्र हैं अहम भूमिकाओं में, पर उनका परिचय कथा के साथ ही दे देंगे ।

बात उन दिनों की है जब नायिका इंटर में थी । नायिका गुर्दे की पथरी की समस्या से पीड़ित । उसके पैतृक घर से स्कूल करीब ४-५ किलोमीटर दूर था । अक्सर दर्द के कारण बेचारी स्कूल से रोती कलपती घर पहुँचती । अब इतनी दूर दर्द में साइकिल चलाना ठीक नहीं था । अतः कोई और हल ना सूझने पर उसके मम्मी-पापा ने स्कूल के पास ही एक किराये के मकान में रहने का निर्णय ले लिया । यह घर खुली और अच्छी जगह पर था । रहने वाले लोग भी अच्छे और पढ़े लिखे थे । नायिका की थी एक छोटी बहन । यहाँ बहन को तो कई हमउम्र दोस्त मिल गये पर नायिका के साथ का कोई भी न था । वैसे भी १४-१५ वर्ष की आयु ऐसी होती है जिसमें ना आप बच्चों में घुल-मिल सकते हैं न बड़ों में । शाम को बहन अपने नये दोस्तों के साथ खेल में लग जाती और हमारी नायिका जी मसोस के भौतिकी की ‘कुमार-मित्तल’ में सर दिये बैठे रहती । ऐसे में एंट्री हुई हमारे साइड हीरो की । हीरो यानि पड़ोसन का भतीजा, पड़ोसन के भाई के साथ समीप के ही दूसरे मुहल्ले में रहता था । उम्र नायिका से २ साल अधिक, शिक्षा के मामले में एक कक्षा पीछे । ग्यारहँवी कक्षा उत्तीर्ण करने के लिये बेचारा दो साल से अथक परिश्रम कर रहा था । आते ही हमारे हीरो ने छोटे बच्चों पर धाक जमा ली । सारे बच्चे भैया-भैया करते आगे पीछे घूमने लगे । शाम को भैया आते, बच्चों की मंडली जुटती, तरह तरह के खेल होते । नायिका बेचारी को कोई पूछता ही नहीं । एक दिन साइड हीरो ने नायिका की छोटी बहन से कहा – “जाओ दीदी को भी बुला लो, बेचारी पढ़ती रहती है, साथ में खेलते हैं ” । बहन आई फुदकते हुए – “दीदी तुम भी चलो” । नायिका ने माँ को देखा । हमारे समाज की अच्छी नायिकाएं खेलने भी माँ से पूछ के जाती हैं । माँ ने भी तरस खा के कहा “जाओ” । नायिका खुश – बहुत बोर हो लिये, हम भी खेलेंगे अब ।

जल्दी ही मुहल्ले की एकाध साल बड़ी दीदी भी आ मिलीं । मजे आ गये । शाम को सब मिल के खूब धूम मचाते । इस बीच आया दशहरा । दशहरे पर चंदा माँग बड़ा सा रावण बनाने का सोचा गया । बाल मंडली जुट गयी काम में । देर रात तक प्रोजेक्ट रावण पर काम चलता । इन सब के बीच दशहरा धूम धाम से मना । यह पर्व पूरी बाल-मंडली की मित्रता को प्रगाढ़ कर गया । अब कभी कभी दीदी, नायिका और हीरो अलग बैठ बतियाते और खेल सिर्फ़ देखते । एक दूसरे की पसंद-नापसंद, रुचियाँ जानते जैसे कि सभी दोस्तों में होता है । दीदी चित्रकारी में अच्छी थीं, नायिका लिखती, चित्र भी बनाती । हीरो ने कहा हम भी लिखते हैं । सबने कहा – पढ़ाओ । अगले दिन कॉपी हाज़िर । दीदी ने पढ़ा –

आम तो खाते हो अमरूद भी खाया करो,
जयपुर में रहते हो, दिल्ली भी आया करो ।

ऐसे बहुत से नमूने । कुछ चोरी के कुछ बेहूदा । मैं सेंसर की कैंची चलाये दे रही हूँ यहाँ । खैर, नायिका और दीदी ने मिल कर अकेले में हॉ-हॉ करी । बात आयी-गयी हो गयी । एक दिन दीदी शाम की सभा से नदारद थीं । हीरो ग़मगीन थे। नायिका ने ना चाहते हुए भी मित्र होने के नाते पूछ लिया कि भाई क्या हुआ …हीरो की दर्द भरी दास्तान सुनिये –
“मैं एक लड़की को बहुत चाहता था । एकदम परवीन बॉबी लगती थी वो”
“अच्छा !”
“आज उसकी बड़ी याद आ रही है”
“क्यूँ क्या हो गया उसे”
“बस मत पूछिये । मैं जो नवदुर्गा के व्रत रखता हूँ ना, उसी ने कहा था”
“अच्छा !”
“मुझे उससे मिले एक महीना ही हुआ था, घर के पास ही रहती थी वो । एक बार मंदिर में मिली तो पूछा तुम नौदुर्गे के नौ दिन व्रत नहीं रखते । तो मैने कहा कि नहीं । बोली- रखा करो”
“हूँ..”
“मैने कहा रखूँगा अगर तुम रोज़ शाम पहला निवाला अपने हाथ से खिलाओ । तो वो बोली – वादा”
नायिका को अंदर तक गिजगिजाहट हो आयी । ग्यारहँवी पास करने के लाले हैं और फ़िल्मी हीरो बनने चले हैं , उसने मन ही मन सोचा ।
“फिर एक दिन मैं उसके लिये सोने की चेन लाया । मैने कहा दूँगा नहीं पहनाऊँगा । मैं चेन पहना ही रहा था कि उसके पापा ने देख लिया और फिर उसे दूसरे शहर भेज दिया ।….बस…”
नायिका को समझ नहीं आया कि क्या प्रतिक्रिया दे ।
“खैर,…मैं भी क्या बातें बता रहा हूँ । आप परेशान मत होइये । आप हँसती हैं तो बहुत अच्छी लगती हैं ।
नायिका बेचारी कुढ़ गयी । अगले दिन नायिका और दीदी ने निर्णय लिया कि भई बंदे के लक्षण ठीक नहीं, थोड़ा दूर रहना ही ठीक है । पर मौसम की तरह कुछ लोग भी चिपचिपे होते हैं । एक दिन दीदी ने नायिका को बुलाया ।
“तुमने अपनी कार पर अपना नाम लिखा धूल में ”
“हाँ शायद , मेरी आदत है” नायिका बोली ।
“हूँ….उसके आगे दिल और तीर का निशान बना था और आगे हीरो का नाम लिखा था ”
नयिका सन्न ।
“मैने मिटा दिया । वो तो छुटकी ने देखा था और मुझे बताया । अगर किसी बड़े को पता चलता तो गड़बड़ हो जाती । आगे से ध्यान रखना ”
“दीदी किसने किया होगा ?”
“और कौन! वैसे कह नहीं सकते”
अब तो नायिका बिल्कुल कट ली हीरो मियाँ से । अक्ल आ गयी के बेटा ‘कुमार-मित्तल’ ही भले हैं, उन्हीं मे मगज लगाओ । हीरो ने बड़ी कोशिश की बात करे, पूछा क्या हो गया । नायिका ने बात टालने में ही भलाई समझी । हीरो ने पैँतरा दिखाया…”आप नहीं बतायेंगी तो मैं अपन हाथ बबूल के पेड़ में मार लूँगा” । नायिका को भी चिढ़ हो आयी…”अच्छी ज़बर्दस्ती है ” । जाओ मार लो, हाथ क्या सर मार लो जा के, जी में सोचा । लड़के ने मुक्का मार दिया बबूल के तने में । पर हमारी नायिका कोई दूसरी परवीन बॉबी तो थी नहीं जो असर होता ।
अब आयी दीवाली । हीरो ने नायिका के घर के आगे उसी बबूल के पेड़ के नीचे पटाखे की दुकान लगा ली जहाँ पटखे बिकने की उम्मीद ना के बराबर थी । पर उससे क्या । सारा दिन वहाँ डटे रहने का इससे बढ़िया तरीका और क्या था । पटाखा एक ना बिका । दिवाली के दिन सब पटाखे नायिका को उपहार स्वरूप दे दिये । हमारी नायिका ने टका सा जवाब टिकाया – मैं पटाखे नहीं चलाती । आप डरती हैं ? हाँ – पिण्ड छुड़ाने की गरज़ से नायिका ने कहा । “ये लीजिये, यह बम मैं अपने महुँ से पकड़ता हूँ…आप आग लगाइये” । “ये क्या ड्रामा है अब? मुझे पटाखे चलाना पसंद नहीं है बस “। “अब एक फुलझड़ी तो चलाइये कम से कम” । सब के सामने तमाशा खड़ा करने से अच्छा है कि एक फुलझड़ी चलाओ और फूट लो ..नायिका ने सोचा ।
खैर…इसके कुछ ही दिन बाद पड़ोसन के भाई के घर में रामायण हुई । नायिका की माँ ने कहा कि उन्हे काम है तो नयिका जा के प्रसाद ले आये । नायिका ने बड़ा टाला पर बात नहीं बनी । जी मसोस के जाना पड़ा वहाँ । सब मगन हो रामायण गा रहे थे । हीरो ने धीरे से दो कार्ड नायिका की ओर बढा़ये । इलू-इलू-दिल-कबूतर वाले । नायिका के क्रोध की सीमा न थी । पर जैसे कि मैने पहले ही कहा था कि नायिका शौर्यवान तो थी नहीं सो इतना ही कह पायी कि मुझे भद्दे मज़ाक पसंद नहीं ।
यह मज़ाक नहीं, मुझे जवाब चहिये , हीरो ने फ़रमाया ।
तो ठीक है, ‘नहीं’ मेरा जवाब है ।
जवाब का कारण ?
पीं-पीं ….नायिका के पिता जी दरवाज़े पे स्कूटर लिये उसे लेने आ गये थे । नायिका की जान में जान आयी ।
उस दिन के बाद से स्कूल से घर और घर से स्कूल रोज़ मियाँ मजनूँ ने उसका पीछा किया । एक महीना हो गया । अंततः नायिका को लगा कि बात माता-पिता तक पहुँचनी ही चाहिये सो बात बता दी गयी । पहले पड़ोसन फिर लड़के के माँ – बाप, सभी ने लड़के के किये के लिये माफ़ी माँगी । नायिका को तसल्ली हुई कि चलो अब तो पिंड छूटा । पर कहाँ । अगले दिन महाशय फिर रास्तेमें पाये गये ।
“आपको किसी से दबने की ज़रूरत नहीं । अपनी बुआ को तो मैं सँभाल लूँगा । आप बस हाँ कर दीजिए ”
“मुझे किसी से कोई मतलब नहीं है । अपनी पढा़ई से मतलब है । आप भी दिमाग पढ़ाई में लगायें वही ठीक है” ।
“नहीं आप डर के मारे ना कह रही हैं ” ।
” उफ़्फ़्फ़ हद है । मैं डर नहीं रही । मैने हमेशा आपको भाई माना है । इसलिये बकवास कर मेरा और अपना समय बर्बाद मत करिये” । नायिका ने झूठ कहा । उसने कभी उसे भाई नहीं माना । लेकिन क्या भाई या फिर प्रेमी यही दो संबध संभव है ? दोस्ती अपने आप में एक पवित्र बंधन नहीं है क्या ? उसके इन प्रश्नों का जवाब फिलहाल तो किसी के पास नहीं था । जो भी हो इस जवाब ने काम कर दिया । नायिका को मुक्ति मिली । हीरो ने काफ़ी दिन तक गाना गाया “मैने उसके शहर को छोड़ा..उसकी गली में दिल को तोड़ा”, फिर वह भी नयी तलाश मे निकल लिये ।

आज की नायिकायें बदल गयी हैं । चप्पल के सहारे ऐसे मजनुँओं से खुद ही निपट लेती हैं । जब भी किसी नारी की ऐसी शौर्यगाथा सुनती हूँ, मन प्रसन्न हो जाता है । हाँलाकि मैं हिंसा की पक्षधर नहीं हूँ पर कुछ भी सहन करने की एक हद होती है । जब सहनशक्ति जवाब दे दे तो ऐसे रास्ते अपनाने में भी बुराई नहीं । हाँ अपनी सुरक्षा का ध्यान अवश्य रखना चहिये । बेचारी नायिका बड़ी परेशान हुई थी उस समय । सोचती हूँ क्या ही अच्छा होता कि हमारी नायिका भी इतनी हिम्मती होती…..

Published in: on जुलाई 25, 2006 at 8:46 अपराह्न  Comments (9)  

तुम जो मिल गये हो….

तुम जो मिल गये हो, तो ये लगता है, कि जहाँ मिल गया…एक भटके हुए राही को, कारवाँ मिल गया । नहीं जी, यहाँ कोई प्रेम कहानी नहीं कही जा रही । पर फिर भी मन में यही गीत हिलोरें ले रहा है । बात चल रही है अन्तर्जाल-जगत के मेरे प्राणप्रिय देव की । जीवन की अधिकांश समस्यायें इनकी सहायता से हल हो जाती हैं । ये बात और है कि अब तक के जीवन के शुरुआती तीन चौथाई हिस्से में हमारा साथ नहीं रहा लेकिन अब बिना इनके  जीवन  अधूरा लगे है हमें तो । जावा के कोड से ले कर बैंगन के भर्ते तक जिस जिस के बारे में जानकारी चाही, देव ने हमें ला के दी । सचमुच अद्भुत है प्रभु की लीला । तो इसी बात पे बोलिये – श्री गूगल देव की – जय । 🙂

अब गूगल के सामान्य प्रयोग से कौन परिचित नहीं है । लेकिन आज जब हम समय नष्ट करने के लिये अन्तर्जाल पर ‘ऐं वैं’ ही विचर रहे थे, हमें इनके कुछ और मनोरंजक प्रयोगों की जानकारी प्राप्त हुई जिसका श्रेय जाता है ‘गूगल के ५५ मनोरंजक प्रयोग’ नामक पुस्तक को । ऐसा सोच कर कि  प्रभु के भक्त तो करोड़ों की संख्या में होंगे और उनमे से ५०% हमारी तरह अनभिज्ञ भी, हम इस ज्ञान का प्रसार करने चले आये । आइये नज़र डालें …(इस पोस्ट में अंग्रेज़ी का प्रयोग भाषा को सरल बनाये रखने के लिये कर रही हूँ ।)

१. यदि आप धरती पर किसी स्थान पर एक गड्ढा खोदना शुरू करें तो वह विश्व के दूसरे छोर पर कहाँ जा के निकलेगा यह जानने के लिये यहाँ जायें । हमने तो पूरा भारत खोद डाला, पर ज़मीन न मिलनी थी न मिली, हर बार पानी (प्रशान्त महासागर) में ही निकले।

२. खुदाई करने के बाद आइये बनायें अपना सपनों का घर । गूगल स्केच-अप से आप त्रिआयामी घर डिज़ाइन कर सकते हैं । और अपने बनाये मॉडल को गूगल-अर्थ पर भी डाल सकते हैं । पूरी जानकारी के लिये यहाँ  जायें

३. गूगल और जादू : गूगल के सथ एक-दो जादू भी किये जा सकते हैं । देखिये कैसे…:)

  •   गूगल जाने आपके दोस्त के मन की बात : अपने दोस्त (मानिये जॉन) से पूछें कि वह गूगल पर किसकी तसवीर खोजना चाहता है और जॉन आपसे कहता है कि वह “Tajmahal” की तसवीर देखना चाहेगा । अब आप गूगल के टैक्स्टबार में लिखें “what is it that john thinks of” (बिना ” ” के) । और जैसे ही आप ‘enter’ दबायें गूगल आपको ताजमहल की तसवीर खोज के दे दे । हुआ ना जादू । अब ये किया कैसे जाये…तो सबसे पहले  इस नकली गूगल साइट पर जायें । एक बार इस साइट पर पहुँचने के बाद अपने browser के address bar मे ‘www.google.com’ टाइप कर दें बस इस बार ‘enter’ ना दबायें । इस से किसी को शक़ नहीं होगा कि साइट नकली है । अब टैक्स्टबार मे सबसे पहले / टाइप करें । जब आप यह स्लैश टाइप करेंगे तो यह टैक्स्टबार मे ‘w’ टाइप होगा । इसके आगे आप चाहे जो लिखें वह अपने आप ‘what is it that…” में परिवर्तित होता जायेगा । पर असलियत में आपने Tajmahal टाइप किया होगा । ध्यान देने की बात यह है कि आप जितने लैटर टाइप करेंगे उपरोक्त वाक्य के उतने ही लैटर टाइप होते जायेंगे ।  इसके बाद एक और / टाइप करें । अब जो भी आप लिखेंगे वह देखा जा सकेगा । इसलिये आप अपने मित्र का या अपना नाम लिख सकते हैं । अब जब आप ‘enter’ दबायेंगे गूगल आपको /  / के बीच लिखे शब्द की तसवीरें ढूँढ के दे देगा । यदि आपने ठीक से अभ्यास करके ये जादू किया है तो देखने वाला अवश्य अचंभित रह जायेगा । हाँ एक बात जो मैनें इसका प्रयोग करके जानी वह ये कि एक बार जादू करने के पश्चात आप पुनः जादू तभी कर सकते हैं जब आपने पेज रिफ़्रेश किया हो । और रिफ़्रेश करने से साइट का असली नाम address bar में आ जाता है, इसलिये दुबारा जादू की बात चतुराई से टाल दीजिये ।
  • और अब ‘google’ को ‘g  gle’ बनायें । इस करामात में आप गूगल के दोनो ‘o’ अपनी उँगलियों से ढक देते हैं । जब आप उँगली हटाते हैं तो  ‘o’ गायब हैं । आप पुनः उँगली रखते हैं और ये क्या ..’o’ वापस अपनी जगह पर हैं । यहाँ भी आपको एक नकली साइट  खोलनी है । और address bar में ऊपर वाली ट्रिक की तरह ही परिवर्तन कर दें । अब जब आप ‘o’ को ढकें, धीरे से अपने माउस से एक क्लिक कर दें । क्लिक के ५ सेकंड के भीतर ‘o’ गायब हो जायेंगे । इसी प्रकार जब वापस लाना हो तो यही प्रक्रिया दोहरायें । वापस आने में भी ५ सेकंड लगते हैं ।

इसके अतिरिक्त आप गूगल को कैलकुलेटर, किसी किताब का संपूर्ण  टैक्स्ट ढूँढने, मुद्रा परिवर्तन की जानकारी, परिभाषाओं की जानकारी, सवालों के सीधे जवाब जानने और अनुवाद आदि के लिये प्रयोग कर सकते हैं । इसकी विस्तृत जानकारी यहाँ से प्राप्त करें । इसके अलावा भी कुछ मज़ेदार बातें जानी मैने, जिनके बारे में फिर लिखूँगी । अंत में चलते चलते दो बातें और बता दूँ , एक काम की और एक फालतू (जब ज्ञान बाँट ही रही हूँ तो थोड़ा और सही) …

१. अपने याहू मैसेन्जर पर mama_pendse को add कर लीजिये । यह एक रोबोट है …या कहिये कि एक इन्टैलिजेन्ट कोड है । यह आपको ना सिर्फ़ ढेरों जानकारियाँ देता है अपितु आप से बात भी कर सकता है । मेरे लिये यह सदाबहार शब्द्कोष भी है ।

२. अब फालतू बात : इस साइट को देखिये । किसी वेबसाइट पर मन की भड़ास निकालने का उत्तम साधन । आप किसी भी साइट पे अंडे फेँकिये, टमाटर मारिये, कीड़े छोड़ दीजिये, बंदूक या आरी चलाइये या फिर जी में आये तो फूल बरसाइये । और यह सिर्फ़ झलक है । और भी विविध साधन उपलब्ध हैं, आप आइए तो सही । वैसे  ‘scribbling baby’ खास तौर पर देखने लायक है । पर खबरदार! जो किसी  ने इसका उपयोग मेरे चिट्ठे पर किया….

Published in: on जुलाई 20, 2006 at 8:49 अपराह्न  Comments (8)  

अरे, सब लोग हमें बधाई दो रे!

तीन दिन हम अपने इस प्रिय चिट्ठाजगत से दूर रहे । इस बीच अपने चिटठे पर की गयी टिप्पणियों को देखने की भी फुर्सत नहीं मिली ।  हम अपने नये खिलौने के साथ इतना व्यस्त थे कि आभास ही नही हुआ कब तीन दिन ग़ुज़र गये। इससे पहले कि अटकलों का दौर शुरू हो, हम ही बताये देते हैं कि खबर क्या है । नाथ ने हमें एक सिन्थेसाइज़र तोहफ़े में दिया है । वैसे बजाने के नाम पर हम सिर्फ़ ताली बजा पाते हैं और फ़िलहाल हमारे हाथ मे सिन्थेसाइज़र ऐसा दीख पड़ता है जैसे बन्दर के हाथ में उस्तरा ।

पर हमारे पति निहायत आशावान जीव हैं । आशावान होने के साथ शार्तिया चतुर भी हैं । जो चीज़ खुद को भाये, भेंट के रूप में हमें थमा देते हैं । या फिर ऐसे समझ लीजिये कि हमारा तोहफ़ा वह होता है जिसका पूरा इस्तेमाल श्रीमान जी भी कर सकें । “ये लो तुम्हारा गिफ़्ट” । हो गया एक पंथ दो काज ।  एक दिन सुबह से गाना गाया जा रहा था कि तुम्हारे लिये एक सरप्राइज़ है । अब ये चोरी से क्या ले आये हैं, कोई अँगूठी, या कोई साड़ी या फिर तैलचित्र बनाने का सामान…या…। ऐसे क़यास लगाते, मन ही मन खुश होते, शाम हो गयी । अब कोई सरप्राइज़ की बात करे अपनी पत्नी से तो ऐसी जिज्ञासा होना स्वाभाविक है । शाम को एक डब्बा पेश कर दिया हमारे सामने । हमने खोला …ली-कूपर की पुरुषों की सैंडल का जोड़ा हमें मुँह चिढ़ा रहा था । “तुम्हारे बिना अपने लिये कभी कुछ नहीं खरीदता ना! आज अकेले खरीदा…डेढ़ हज़ार की चप्पल । कैसी लगी? है ना सरप्राइज़?” । हमने सर धुन लिया । देवर हँसी के मारे लोट-पोट हो गये ।  तबसे अगर बता के मेरे लिए भले ही अपने मतलब की चीज़ ले आयें, मुझे शिकायत नहीं होती । सरप्राइज़ से तो अच्छा ही है । कम से कम मैं दिमाग़ को तकलीफ़ तो नहीं देती अटकलें लगाने की । डिजिटल कैमरा हो चाहे म्यूज़िक सिस्टम यहाँ तक कि कार भी इसी श्रेणी की भेंट है । और अब ये की-बोर्ड उसी श्रेणी का अगला हिस्सा है ।

संगीत से बड़ा प्रेम है स्वामी को । खुद तबला, ड्रम, ढोलक, नाल, काँगो-बाँगो जैसे वाद्य-यंत्र कुशलता से बजा लेते हैं । पर घर में कोई की-बोर्ड बजाने वाला प्राणी नहीं है तो उन्होंने हमें धर पकड़ा । सीखो अब । इस शनिवार विचार बना कि चलो आज तो की-बोर्ड खरीद ही लिया जाये । हमने चलने से पहले ही एलान कर दिया था कि मँहगे यंत्र में पैसे फँसाने का कोई मतलब नहीं । हमारा कोई भरोसा नहीं । अच्छा लगा तो ठीक पर अगर मन नहीं लगा तो फिर साक्षात ब्रह्मा जी भी हमें सीखने पर मजबूर नहीं कर सकते । बात अन्ततः यामाहा के सबसे सस्ते मॉडल पे तय हुई । जय गूगल देव की । खोज बीन के दो चार दुकानों के पते निकाले । उनसे बात की । हमने खुद को समझा लिया था कि बेटा ५-७ हज़ार का तो फटका पड़ा समझो । मार्केटिंग किसे कहते हैं उसका साक्षात नमूना अब देखा । एक दुकान से तीन बार फ़ोन आ चुका था । महोदय पढ़े-लिखे और संगीत की समझ रखने वाले जान पड़ते थे तो हम दोनों उन्हीं की दुकान पे चल पड़े । ‘हौज़खास विलेज’ में जब तक उनकी दुकान पर पहुँचें उनका फिर फ़ोन आ गया । “कहाँ हैं आप लोग, रस्ता तो आराम से मिल गया ना आपको”, “जी बस पहुँच गये, गाड़ी पार्क कर रहे हैं”, “जी अच्छा, पार्किंग के दाँयी ओर मैं नीली टी-शर्ट में खड़ा हूँ” । हम दोनों ने ही सोचा कि ये पहले इन्सान मिले जो स्वागत में बाहर ही आ खड़े हुये हैं । दुकान सामने ही दिख रही थी और दुकान से कुछ दूर पर नीली टी-शर्ट में एक सज्जन भी । मुस्कुरा के उन्होने स्वागत किया और अंदर की ओर चल पड़े । उनकी दुकान भीतर की ओर थी । अब हम समझे काहे बाहर खड़े थे । नहीं तो हम तो सीधे सामने की दुकान मे घुस लिये होते ।

दुकान मे जा बातचीत शुरू हुई ।
“आप आई-टी में हैं? ” सज्जन ने पूछा । आजकल वैसे भी हर तीसरा युवक इसी उद्यम में लगा हुआ है सो ये तुक्का प्रायः सही ही बैठता है।
“हाँ” ।
“कहाँ ?”
“ह्यूविट असोसिएट्स । ”
“किस डोमेन में काम है आपका ?” उन सज्जन का सामान्य ज्ञान काफ़ी विस्तृत प्रतीत हो रहा था मुझे, अपितु ये कहूँ कि था । उनसे १५ मिनट की बात में यह बात स्पष्ट हो गयी थी ।
“जी मैं अब डेवलपमेन्ट नहीं करता । मेरी टीम करती है । मैं प्रोजेक्ट लीडर हूँ ।”
“ओह, अच्छा अच्छा । तो आपको अपने लिये चहिये था की-बोर्ड ।”
“नहीं, मेरी वाइफ़ के लिये ।”
“असल में मुझे फ़ोन पे लगा था कि शायद किसी बच्चे के लिये लेना हो । आप लोअर मॉडल चाह रहे थे ना इसलिये। वैसे आप भी वर्क करती हैं?” सज्जन अब मुझसे मुख़ातिब थे ।
“जी करती थी । फ़िलहाल छोड़ दिया”
“ओह फिर तो आपके पास काफ़ी समय होता होगा घर पे । मैं कहूँगा आप लोग यामाहा, पी.एस.आर-२९५ ही लें । १४,००० का है मैं आपको १२,५०० में दे दूँगा” ।
“देखिये मुझे बजाना बिल्कुल नहीं आता और मुझे अभी ये भी पता नहीं कि मैं बजा भी पाऊँगी या नहीं । इसलिये हम लोअर मॉडल ही चाह रहे थे ।”
“अरे की-बोर्ड का सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि आप इसका वॉल्युम कन्ट्रोल कर सकते हैं । हारमोनियम हमेशा पूरे सुर में बजता है और पड़ोसी आपको दिन रात कोसते हैं । इसलिये सीखने के लिये भी ये बढ़िया है । अब देखिये ये खराब होने वाली चीज़ तो है नहीं । सालों ऐसी ही रहेगी । फिर इसके फ़ीचर्स भी बहुत हैं । और ये चीज़ें आप रोज़ तो अपग्रेड करते नहीं । आप लोग टेक्निकल हैं , यूटिलाइज़ कर सकते हैं । इसमें यू.एस.बी कनेक्टिविटी भी है । आप कम्प्यूटर से कनेक्ट कर सकते हैं ।………और ”

और भी बहुत कुछ । मैंने अमित कि ओर देखा । डोले हुए से मेरी ओर देख रहे थे । हमारे मुँह पर असमंजस मिश्रित आंशिक सहमति देख उन्होंने झट स्वीकृति कि मोहर लगा दी । हमारा खिलौना पैक हो गया, कवर के पैसे अलग लगे । ५०० के  २६ नोट एक झटके में हवा ।

घर आ के हमने पहली बार किसी की-बोर्ड को छू के देखा । दोनों हाथ उस पर ऐसे रखे जैसे यान्नी ने भी न रखे होंगे । बड़ा मज़ा आया । रात हो चुकी थी । थोड़ी  देर अमित ने अपने ज्ञान का प्रदर्शन किया बाकी समय हमने ‘टिंग-टुंग झम-झम झायँ-झाँय’ की । फिर सो गये । सुबह देखा तो मानसून दस्तक दे चुका था । झमाझम पानी बरस रहा था ।  तन और मन दोनो को ठन्ड्क मिली । नहीं तो कुछ दिनों से ऐसा लग रहा था कि भगवान हमें भूनने के पश्चात भाप में पका रहे हों ।  अब १५-२० दिनों की भारी उमस के बाद जा के भगवान मेहरबान हुए थे । हमें शक़ हुआ कि कहीं हम अनजाने में ‘मेघ मल्हार’ तो नहीं बजा गये ।

अब बात आयी सीखने की । आस पास कोई सिखाने वाला है नहीं, ये पहले ही पता किया जा चुका है सो अन्तर्जाल की शरण ली गयी ।  एक बढ़िया साइट  मिली । एक ही दिन में सरगम, फिर अलंकार और उसके बाद राग ‘यमन कल्याण’ पर जा पहुँचे । सोचा अमित को तो झटका ही लग जायेगा । रात को जब सुनाने बैठे तो सब गड्डम-गड्ड । मुँह लटक गया कि ये लो शुरुआत ही बुरी । पर पतिदेव ने फिर भी हौसला बढ़ाया । समझाया कि धीरज से काम लेने से ही सफलता हाथ लगेगी । फिर अभ्यास से क्या नही सीखा जा सकता । बात समझ आ गयी । सो पिछले दो दिन एक ही चीज़ दुहराते रहे । अब जा के ठीक- ठीक हाथ बैठा है । एक दो मित्र हैं जो इस कला के अच्छे जानकार हैं सो वह भी मदद करने को तैयार हैं । पतिदेव खुश हैं । हमें भी धुन लग गयी है । आप सब का आशीर्वाद और शुभकामनायें साथ रहीं तो आशा है  कि सीख भी जायेंगे ।

तो बस फ़िलहाल हमारी गाड़ी चल पड़ी है ।  आप सब दुआ कीजिये कि कहीं थोड़ी दूर जा के रुक न जाये ।

Published in: on जुलाई 14, 2006 at 2:50 पूर्वाह्न  Comments (25)  

क्षमा !!

मेरे ब्लॉग पर कमेन्ट्स का पेज ही नहीं आ रहा था । इसलिये टेस्टिंग के दौरान एक ही पोस्ट को बार बार पोस्ट करना पड़ा । उसके लिये सबसे क्षमाप्रार्थी हूँ ।

अमित गुप्ता जी की मदद से सम्स्या हल हो गयी है ।

Published in: on जुलाई 7, 2006 at 1:51 अपराह्न  Comments (4)  

ऐं वैं ही पुरुष बेचारे– मेरा शादी का विश्लेषण

बडे़ सारे ब्लॉग देखे जहाँ ‘शादी’ शब्द की विवेचना की गयी है । पर सभी विचार हमें पुरुष प्रधान लगे । सोचा क्यूँ न अपना पक्ष भी आप बुद्धीजीवियों के आगे रखूँ । वैसे यह विश्लेषण कम और अनुभव अधिक है ।

मेरी शादी हुए सुखद तीन साल बीत चुके है । ये ‘सुखद’ मैने औसतन कहा । मेरा प्रेम-विवाह हुआ था । कथा थोड़ी मज़ेदार है ये भी । मेरे साथ स्नातक में दो लड़के पढ़ते थे । सामान्य मित्रता थी हमारे बीच । हाय-हैलो वाली समझ लीजिये बस । जब हम सब परास्नातक में आये तो उनके बडे़ भाई ने भी हमारे कॉलेज मे दाखिला ले लिया । हम लड़कियों के समूह को जब पता चला तो हमने आपस मे इस बारे मे ऐसे चर्चा की मानो देश की अर्थव्यवस्था के बारे मे बात चल रही हो । “बड़ा भाई ??? ” , “अच्छा !! एम. बी. ए. कर के आया है”, “ओ-हो!!”, “नौकरी भी कर रहा था??”, “छोड़ दी….??”, “पागल है क्या थोडा़ ?? ” (हम लोगों के लिये तो नौकरी पाना बैकुंठ धाम को पाने जैसा था) , “…पर हैंडसम है “…। कुछ समय बाद मामला ठन्डे बस्ते में चला गया । सिवाय एक लड़की के, जो कि भैया जी पे मर मिटी थी, सबने इस विषय मे रुचि लेना बन्द कर दिया । बाकी सबने ‘दोस्त का भाई अपना भाई की तर्ज ‘ पर उन्हे भैया कि पदवी दे दी थी, हालाँकि ये हम सखाओं के बीच की बात थी । उनसे कोई बात-चीत तो होती न थी । वह गणित के छात्र थे और हम भौतिकी के ।

एम.एस.सी. के आखिरी सेमेस्टर में उन्हें हमारे साथ प्रोजेक्ट दिया गया  । उन्हें  हमारे अध्यापक पहले से जानते थे और उनकी रुचि हमारे प्रोजेक्ट में देख ये मौका उन्हे दिया गया था । हमारे अध्यापक का ये भी मानना था कि उनके अनुभव से हमारा प्रोजेक्ट और भी बेह्तर बनेगा । कम्प्यूटर वैसे भी हम सभी का विषय था । और तब मुझे उन्हें एक इन्सान के तौर पर जानने का मौका मिला । अब भाग्य का लेखा कहिये या जो भी, जान पहचान कब दोस्ती और दोस्ती कब प्रेम मे परिवर्तित हुई पता ही न चला । एक दिन अचानक हमारे सामने प्रेम प्रस्ताव भी प्रस्तुत हो गया । हालाँकि हमने लड़कियों के अनुकूल व्यवहार करते हुए दो तीन महीने ना-नुकुर करी पर फिर हार मान ली । इस बीच हम दोनो को ही एक ही कम्पनी से नौकरी का प्रस्ताव आ चुका था । हमने आई. आई. टी. कानपुर  के कम्प्यूटर विभाग के  ‘रिसर्च असोसिएट’ के पद के प्रस्ताव को ठुकरा कर इस कम्पनी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया । प्रेम जो न कराये सो कम है 😦 । दोनों पक्षों के माता-पिता जी को शीघ्र ही पता चल गया । उन्हें हमारी शादी से कोई ऐतराज़ न था सो ख़ुशी ख़ुशी फ़रमान जारी हो गया । पर हमारे ज्योतिष शास्त्र की मेहरबानी से पूरे तीन साल बाद हमारी शादी हुई ।

अब आप सोचेंगे कि शादी के बारे मे बात शुरू हुई थी, ये प्रेम कहानी सुनाने की क्या आवश्यकता थी!!!! तो भाई हीरो-हिरोइन का बैकग्राउन्ड जानना ज़रूरी होता है ना । बस स्टोरी का मेन एंगल अब शुरू होता है । शादी से पहले माँ ने समझाया..”तुम अमित को ‘तू’ कहना छोड़ दो, अब तुम्हारी शादी होने वाली है” । अब इस बारे मे हमने कभी सोचा ही नहीं । दोस्त थे तो दोस्त के जैसे बात करने की आदत भी थी । जैसे तैसे मैं ‘तुम’ और फिर ‘आप’ पर आ पायी । बड़ा विचित्र लगा । पर भैया नारी जीवन है, क्या करें । आदेश का पालन तो करना ही होता है । और ये तो सिर्फ़ शुरुआत थी ।

ससुराल पहुँचे तो देवरों ने भाभी कहने से इनकार कर दिया । उन्हें भैया कहना हमें हजम नहीं हो रहा था । पर करना था सो करना था….शुरू तो बड़ों के सामने भैया-भाभी कहने के नाटक से किया पर बाद मे आदत पड़ गयी । रिश्ते की एक सास ने समझाया पति  का नाम भी नहीं लेते इससे पति की उम्र कम हो जाती है । अब ‘ए जी, सुनिये जी’ तो मेरे लिये कल्पना से परे था । आगे कहा, माँग मे सिँदूर अन्त तक भरना चहिये, इससे पति कि उम्र लंबी होती है । पति कि उम्र का पैमाना तो मानो अब मेरे हाथों मे आ गया था। और भी ऐसे बड़े सारे नियम । हाँलाकि मेरी अपनी सासु माँ बड़े खुले विचारों की हैं इसलिये कुछ दकियानूसी नियमों से मुझे उन्होने मुक्त कर दिया था । फिर भी सब नया नया प्रतीत होता था । खुद को शीशे मे देख के लगता था कि किसी और को देख रहे हैं । इस नये रूप से दिक्कत भी बड़ी होती थी कभी कभी । हाथ मे पड़े सोने के कड़े साड़ी से उलझते, बिछिया, पायल जब तब पैर में चुभ जाती या फिर इधर उधर गिर जाती, एकाध हार तो हर समय पहने रहना पड़ता था जो मेरे बचे खुचे बालों मे फँसता रहता । आप ही कहिये, किसी पुरुष को भी ये सब करना पड़ता है क्या ? खै़र शादी के दो-चार दिन बाद घर वाले हम लोगों को पास में ही घुमाने ले गये । घर वाले मतलब भाई बहन । उस समय छुट्टी मिली नहीं थी तो हमारा तो कोई घूमने फिरने का कार्यक्रम था नहीं ।  अब बाग़-बगी़चे मे पहुँच दीदी-जीजा जी ने प्लान बनाया कि हमें अकेले छोड़ दिया जाये । पर क्यूँ ?  घरवालों के बीच अच्छा लग रहा था । ऐसे भी  तीन साल में एक दूसरे के व्यक्तित्व के बारे में सब कुछ जान ही चुके थे तो अकेले क्या बात करते । पर फिर भी हमें भेजा गया । कुछ दूर गुलाब की क्यारियों के बीच एक पेड़ की छाँव मे बैठ हमारी बातें शुरू हुयीं । “सुनो….मम्मी ने दो कनस्तर दिये हैं । एक चावल का हो जायेगा एक आटे का । बाकी दाल, चीनी वगैरह के डब्बे लेने होंगे ” ।”गैस कनेक्शन लिया क्या तुमने??” ….”नहीं, अब ले लेंगे । काम से टाइम ही नहीं मिला”…..”सामान कब तक पहुँचेगा?”..। दूर बैठे दीदी-जीजा जी खुश हो रहे थे जैसे सोच रहे हों ‘बेकार ही संकोच कर रहे थे दोनो, अब देखो कैसे बतिया रहे हैं’ । खैर ससुराल में लाड़-प्यार के बीच सारा वक्त मज़े से बीत गया ।

अब लौट के नौएडा आना था और इनको आते ही काम पर वापस लौटना था । बस एक दिन का वक्त था बीच में । अपने घर मे शादी के बाद पहली बार पाँव रखने की अनुभूति ही और होती है । सोचा अब तसल्ली से भविष्य की कुछ बातें करेंगे । घर पहुँचे तो देवर, जो हमारे साथ ही रहते थे, दफ़्तर जा चुके थे । दोपहर में ज़मीन पर बैठी मैं जीवन के इस नये अध्याय के बारे मे सोच ही रही थी कि तभी पतिदेव का पदार्पण हुआ । मेरा हाथ पकड़ फ़िल्मी अन्दाज़ से बोले…..”तो क्या बना रही हो डिनर में मेरे भाईयों के लिये” । ये तो असंभावित प्रश्न था । अब चाहे जान पहचान पुरानी हो गयी थी पर दुल्हन तो मैं नयी ही थी न । जी मे आया कह दूँ “तुम्हारा सर” । अरे आज मैं पहली बार  इस घर मे आयी थी । पिक्चरों में तो ऐसे नहीं होता । पर मम्मी का दोस्त और पति वाला भाषण याद आ गया ।  समझ नहीं आया कि खीजूँ अपने पति की इस सादगी पर या हँसू ।  पतिदेव ने शायद चेहरे के भाव भाँप लिये…फ़ट से लीपापोती की…मैं तो मज़ाक कर रहा था ।

अगले दिन से हमने गृहस्थी की बागडोर सँभाल ली । अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे ही चुके थे । माँ और सासू माँ के दिये उपदेशों – निर्देशों को जब तब पल्लू से खोल देख लेती । सासू माँ ने समझाया था कि बेटा पति जब लौट के घर आये तो ठीक से बनी-सँवरी मिलना । शादी से पहले इन सब बातों की महत्ता ही नहीं थी । जैसे चाहो रहो । पर अब बात और थी । हमने भी देखा था पिक्चर मे हिरोइन कैसे बनी ठनी रहती है । ‘रेखा’ के रूप को आदर्श मान शाम होते ही हमने बढ़िया साड़ी पहनी । हाथ मे एक एक दर्जन के भाव से मैचिंग चूड़ियाँ डालीं । बालों की जूड़ी बना ( जूड़ा हमारे बालों का बनता ही नहीं है ) माँग मे पूरे ढाई तोले सिंदूर भर लिया । बाकी के सौन्दर्य प्रसाधनों और अनावश्यक गहनों से सख्त परहेज़ ना होता तो उन्हे भी आज़मा लेते ।पर इतना ही काफ़ी था । शीशे मे खुद को कम से कम १० बार निहारा फिर निहाल हो गये । दरवाज़े की घन्टी बजी । सुन के वैसा अनुभव हुआ जैसा कॉलेज मे परिणाम निकलने के दिन होता है । आँखे नीची किये दरवाज़ा खोला । “आँटी वो क्रिकेट कि बॉल आपकी बालकनी में आ गयी है शायद”, सामने मकान मालिक कि १५-१६ वर्षीय लड़की खड़ी थी । २३ वर्ष की उम्र मे मुझे हृदयाघात होते होते बचा । लगा मानो कन्या ने क्रिकेट का बल्ला ही घुमा के धर दिया हो कानों पर । हमने कहा कुछ नहीं बस बॉल ला के दे दी | आँटी…आँटी…कानों पर अब भी हथौड़े बज रहे थे । लगा प्रयोग मे कहीँ गड़बड़ हो गयी । कमरे में आ कर दस बार फिर आइना देखा । नहीं, ऐसी तो कोई गड़बड़ न थी । एक-दो एंगल बदल के देखा…”मोटी भी नहीं हूँ मैं तो” 😐 । हाँ षोडषी नहीँ लग रही थी पर…. आँटी  ? शादी से पहले जब लॉज में रहते थे तब तो ऐसे नहीं कहा किसी ने । सिर्फ़ दो महीने में नयी पदवी ? शादी की इस सौगात पे जी कुढ़ गया ।

शुरू के ४-५ महीने पँख लगा के उड़ गये । मकान को घर बनाने मे मेरा सारा वक्त मज़े से कट गया । उसके बाद सोचा कि चलो पुनः नौकरी कर लें । सभी को लग रहा था कि मैं पढा़-लिखा बरबाद कर रही हूँ । सो नौकरी कर के भी देखी । किन्तु १२ घन्टे की प्राइवेट कम्पनी की नौकरी और साथ मे घर का पूरा काम…शरीर के उर्जे-पुर्जे धीरे धीरे हड़ताल पर जाने लगे । पतिदेव कितनी भी मदद करायें, घर की मुख्य ज़िम्मेदारी तो पत्नी के कँधो पर ही होती है । अन्तत: एक बार फिर से नौकरी छोड़नी पड़ी ।…बस तबसे घर की गाड़ी खीँच रहे हैं । एक बार और नौकरी की असफल कोशिश की । मित्रगण अब मेरी नौकरी की बात सुनते ही हँसने लगते हैँ । उन्हे लगता है कि मैं अधिकतम इस्तीफ़ों का रेकॉर्ड बना सकती हूँ । वैसे मुझे कुछ भी करने की स्वतन्त्रता है…बस करने का समय नहीं है ।

पतिदेव का शादी से पहले वाला रूप तो याद ही नहीं आता । कहने का अर्थ ये नहीं कि मुझे कोई शिकायत है….पतिदेव बहुत ही प्रेम करने वाले, शान्त, सहयोगी और समझदार हैं । हर कम करने से पहले पूछते हैं क्युँकि उनके अनुसार पति लोग ‘बेचारे’ होते हैं और बिना पूछे कुछ नहीं करते । उदाहरण के तौर पर… “फूल लोगी क्या?” , “सब्जी जल रही थी अभी रसोई मे गया तो, गैस बंद कर दूँ क्या?” । कहीं बाहर जाने पर या फिर अपनी या मेरी माँ के आगे कुछ भी (खासतौर से मीठा) खाने से पहले मेरा मुँह ऐसे देखते हैँ जैसे डराये-धमकाये हुए बच्चे अपनी माँ को देखते हैं । एक और बड़ी खास आदत ये कि माँए जो भी बना के खिलायें वो मैने कभी बनाया ही नहीं होता भले ही दो दिन पहले वही व्यन्जन मैने बना के खिलाया हो । इतने मासूम और भुलक्कड़ बन जाते हैं कि क्या कहूँ । ये सब मुझे चिढा़ने के लिये ।  मेरा मानना है कि सब पति ऐसे ही होते हैं । शादी से पहले एक बार मैने ऐसे ही पं. विश्व मोहन भट्ट की एक कैसेट के प्रति रुझान ज़ाहिर कर दिया था । दिल्ली के हर बाज़ार की ख़ाक छानी गयी और कैसेट ढूँढ के ही दम लिया । पर अब ज़रा बाज़ार चलने को कह भर दूँ । चेहरे के भावों से लगता है कि आसमान टूट पड़ा हो । इतने सब के बाद भी पति ही बेचारा रहता है ।

खै़र, अब तो मेरे विचारों मे काफ़ी परिपक्वता आ गयी है । शुरू मे शायद बचपना रहा हो सोच में । ससुराल में सास-श्वसुर, माँ-बाप सरीखा प्रेम देते हैं । कोई अनावश्यक बन्धन नहीँ रखा उन्होने कभी, चाहे पहनावा हो या रहन सहन । मेरी भी यही कोशिश होती है कि हमेशा बहू की मर्यादा का पालन करूँ सो जो भी थोडे़ बहुत नियम हैं उनका पालन करने में सुख का ही अनुभव होता है । हाँ ‘इनके’ साथ खट्टी-मीठी नोंक झोंक हर रोज़ लगी रहती है । पर शादी के तीन साल में अब हर बात की अभ्यस्त हो गयी हूँ सिवाय एक चीज़ के….आँटी..आँटी । अब साड़ी की जगह अधिकतर सूट पहनती हूँ,  सिन्दूर की  मात्रा चुटकी भर कर दी है, बिन्दी छोटी हो गयी है, चूड़ी सिर्फ़ दो या तीन रह गयीं हैं और पायल तथा अन्य गहने जो होली, दीवाली और करवाचौथ पर काम आते हैं उन्हे पहले ही लॉकर में सहेज के रख दिया है । इस रूप में मैं अपने को सुरक्षित महसूस करती हूँ ।  अभी सब्ज़ी लेने निकली हूँ । पीछे खड़ा सब्ज़ी बेचने वाला युवक बुला रहा है “आँटी धनिया-पुदीना ले लो”, “सब्ज़ी देखो एकदम ताज़ी है” । सब्ज़ी अच्छी है …सस्ती भी है । पर. उफ़्फ़, अब भी….आँटी ??? कल से ३ की जगह ५ किलोमीटर चला करूँगी, शायद वज़न बढ़ गया एक-दो किलो । या फिर स्वीकार कर लूँ इसे भी ?? नहीं अभी नहीं !!!  आगे से एक और आवाज़ आ रही है…”आइये मैडम..” । मैं उस आवाज़ की ओर चल पड़ी हूँ ।

Published in: on जुलाई 7, 2006 at 1:46 अपराह्न  Comments (14)  

आप सब बुद्धीजीवियों से ये उम्मीद ना थी…!

अभी हाल फिलहाल अपने इस ब्लॉग जगत मे एक नये शब्द से परिचय हुआ – ‘टी. आर. पी’ । अनूप जी हों कि पंकज जी या फिर नाहर जी, सभी टी.आर.पी की बात कर रहे हैं । पढ़ के तुरंत कॉम्प्लेक्स हो आया । ग़ौर किया तो लगा कि अपनी टी.आर.पी तो यहाँ उतनी है जितनी टी.वी. पर दूरदर्शन की । ह्म्म्म्म्म….ऐसे कैसे चलेगा ?

अभी आये हुए जुमा जुमा दो महीने हुए हैं सो सन्यास की धमकी का किसी पे कोई फ़रक नहीं पड़ेगा । नाहर भाई जैसी अटेन्शन हमें मिलने से रही । जो थोड़ी बहुत साख है वो भी चली जायेगी सो अलग । महिला वर्ग के अन्तर्गत आरक्षण की माँग रख दूँ क्या ? नारियों को प्रोत्साहित करने के लिये उनके ब्लॉग की टी.आर.पी ३०% बढा़ के आँकी जायगी । पर नहीं इससे तो डॉक्टरों के बाद पुरुष ब्लॉगरों की भूख हड़ताल का खतरा हो सकता है । फिर क्या करूँ ? पिछली पोस्ट मे नाहर जी और अनूप जी ने कहा था कि जल्दी जल्दी लिखा करूँ । इससे टी. आर. पी. बढ़ेगी क्या?? हैं?? पर लिखूँ किस पर ? विषयों का सख्त अकाल पड़ा है मेरे पास । खेलों का ज्ञान तो गेंद की तरह गोल है । सामजिक विषय पे लिखने के लिये जो जोश चहिये वो आ ही नहीं रहा । खबरें आजकल सिर्फ़ मुँह बिचकाने को प्रेरित कर रही हैं । यात्रा वृत्तांत  लिखती प्रत्यक्षा जी की तरह पर क्या करूँ घूमने गये हुए तो पूरा साल भर होने को आ रहा है । फिर बची ज्ञान की बात जो कोई पढ़ता नहीं । दिमाग खर्च होता है सो अलग । फिर ?? टी.आर.पी बढा़ने का कोई हथकन्डा भी नहीं सूझ रहा था । सोचा लाओ टी.वी. देखूँ । वहाँ लोगों को दिन भर चालें चलने के सिवा कोई काम नहीं होता । शायद कोई फ़ार्मूला हाथ लग जाये ।

टी.वी चालू किया….स्टार पर ‘क्यूँकि सास भी ….’ चल रहा था । सुना था कि ‘बा’ जीवित हैं…आज देख भी लिया । कल्पना ने उड़ान भरी — पर-पर-परददिया सास बनना कैसा लगता होगा ! ये बा तो ‘रामदेव बाबा’ को भी फ़ेल कर गयीं । इतनी लम्बी उमर तो उनके योग भी नहीं दे सकते । हाय बा, आपके चरण कहाँ है….नहीं नहीं केकता कपूर के चरण कहाँ हैं (केकता शब्द मैने संजय जी की परिचर्चा मे की गयी एक पोस्ट से उड़ाया है । इससे पहले कि वह कॉपीराइट का दावा करें मैने सोचा श्रेय का झुनझुना उन्हें पकड़ा दूँ । वैसे इस हिसाब से केकता अपने बैनर का नाम ‘काला जी कम्यूनिकेशन’ क्यूँ नहीं कर देतीं । साथ ही ‘तुषार’ को ‘कुषार’ नाम दे दें, शायद उसकी भी गाड़ी चल पड़े) । कहानी समझ आ नहीं रही थी क्यूँकि ‘क्यूँकि….’ देखे महीने बीत चुके हैं तो बेहतर समझा कि कुछ और देखा जाय ।

‘कसौटी..’ पर आये । प्रेरणा को देख के जी किलस गया । हमें लोग अभी से आँटी कहते हैं ।  इन्हें देखो…दादी बन के भी जस की तस । अनुराग बासु को देख के और मज़ा आया । पहले प्रेरणा, फिर कोमोलिका, फिर प्रेरणा, फिर ऑपर्णा, फिर से प्रेरणा और अब ये नयी सम्पदा । ऐसी किस्मत… सारा पुरुष समाज हाय-हाय करता होगा देख के ।

दो धारावाहिकों मे ही दिमाग साँय-साँय करने लगा था तो ‘कहानी घर-घर की’, ‘के स्ट्रीट..’ आदि देखने की हिम्मत ही नहीं पड़ी । ये ‘स्टार प्लस’ अपने बूते का नहीं । तो रुख किया ‘ज़ी’ की तरफ़ । सुना है यहाँ हर सीरियल में राज़ खुलने वाले हैं । ‘कसम्ह (??) से’ आने वाला था । यहाँ भी ‘केकता’ । हिरोइन अपनी ननद को आँटी कहती है । और उसके बेटे से अपनी बहन की शादी भी करा रही है । इस प्रकार वह अपने ही भतीजे की साली हुई । या फिर अपनी बहन की सास? पूरे धारावाहिक मे रिश्तो के इसी चक्रव्यूह में घिरी रही । कोई राज़ नहीं खुला ।

फिर आया ‘सात फ़ेरे..’ । यहाँ कोई कितना भी दुखी हो पहनावा देख के लगता है मानो बारात मे शामिल होने जा रहा है । दामाद फाँसी की कगा़र पर है । माँ अपनी ‘लाडो’ के ग़म से मरी जा रही है । पर मैचिंग बिन्दी और गहने पहनने की फ़ुर्सत तब भी है । और तो और ये चेहरे पीले कर क्लोज़-अप दिखाने का नया फ़ैशन चल पड़ा है । १५ लोगों के घर मे तीन तीन बार हर चेहरा देखो…गये १५ मिनट इसी में । अब और झेला नहीं जा रहा । यहाँ अपनी जान को कम क्लेश होते हैं जो जनता ये सब देखती है ? समाचार देखना ही ठीक रहेगा, मैं सोचती हूँ । न्यूज़ चैनल पर आ रहे कार्यक्रम के होस्ट को देख के ही डर जाती हूँ । पिता ने ढाई साल के बच्चे को जला दिया, माँ ने अपने बच्चों को कुल्हाड़ी से काट दिया… । पहले ये सब देख के मन दुखी हो जाता था, अब ऊब होती है । दिमाग थक के झपकी ले रहा है…कि ज़ोर की आवाज़ आती है…”चैन से सोना है तो अब जाग जाओ” । लो भैया जग गये । इन सब के बीच यहाँ आने का असली मक़सद तो मैं भूल ही गयी थी ।  टी. आर. पी. के हिसाब से पहले और दूसरे नम्बर पर आने वाले चैनल झेल लिये ।  दिल-दिमाग दहाड़ें मार के रो रहे हैं कि  कल जो तीन नयी मैग़्ज़ीन आयी उन्हे क्यूँ नहीं पढा़ बजाय ये देखने के । अब और कुछ देखने का साहस नहीं बचा है । वैसे भी आइडिया मिल गया है..।

विषय या कहिये पोस्ट का हैडर रोचक रखूँ । जनता को विषय पढ़ के लगना चहिये कि कुछ धमाकेदार या  कॉन्ट्रोवर्शियल है यहाँ । कन्टेन्ट जाय भाड़ में । विषय का कन्टेन्ट से कुछ लेना देना होना भी ज़रूरी नहीं । यही सोच के इस पोस्ट का विषय ये रखा । बाकी ऐसा कुछ है नहीं । केकता कपूर के सभी धारावाहिकों का यही सार है । जैसे कुछ दर्शक भटक के उनके सीरियल देखते हैं मुझे विश्वास है कि कुछ पाठक भी भटक आयेंगे मेरे ब्लॉग पर । बाकी एक काम और कर सकते हैं । जब इन धारावाहिक निर्माताओं को आगे की कहानी नहीं सूझती तो ‘पब्लिक पोल’ करा लेते हैं । मैं भी ट्राई करती हूँ । चलिये आप ही बताइये कुछ—कैसे बढ़ाऊँ टी.आर.पी. ?

Published in: on जुलाई 7, 2006 at 1:39 अपराह्न  Comments (16)