मेरे दिन कुछ यूँ बीते…

आज बहुत दिनों बाद जब पुनः लिखने बैठी हूँ तो सोचा सबसे पहले वह लिखूँ जो गये दिनों मे लिखने का मन तो किया किंतु शब्दों ने साथ नहीं दिया. बीते तीन महीने मेरे लिये एक परीक्षा की तरह बीते हैं. मुझे लगा जैसे मैं १९९९ को पुन: जी रही हूँ. एक के बाद एक परेशानी और बिखरता हुआ मनोबल. इस सब के बीच लिख पाने की क्षमता मुझमें थी नहीं. मैं कुछ दु:खद लिखना नहीं चाहती थी पर अब लगता है कि उस दु:ख, निराशा और आक्रोश का बह जाना ही अच्छा है. और फिर अंत भला तो सब भला. इसलिये जो जैसा है या था- लिख रही हूँ.

९९ में जब पापा का देहांत हुआ तो सब इतना अकस्मात हुआ कि कुछ सोचने या समझने का समय ही नहीं मिला. १० मिनट और सब खत्म. और उन १० मिनटों में मैनें क्या महसूस किया था यह मैं आज तक नहीं समझ पाती. २८ दिन बाद नानी भी चली गयीं, अचानक. मैं जैसे किसी और लोक में थी. कुछ प्रतिक्रिया नहीं, कोई दर्द नहीं, दु:ख नहीं. दिमाग़ इतना सुन्न था कि समझ ही नहीं आया हो क्या रहा है. और शायद यही अच्छा था. नाना जी के जाने के लिये मानसिक रूप से मैं कहीं तैयार थी, किंतु मृत्यु को इतने निकट से देखूँगी यह नहीं जानती थी. दशहरे वाले दिन जब हम कानपुर पहुँचे तो नाना अस्पताल में थे. डॉक्टरों को कोई उम्मीद नहीं थी. उनके अंग काम करना बंद कर रहे थे और आंशिक पक्षाघात हो चुका था. मैं शायद इसके लिये तैयार नहीं थी. नाना सारी रात पानी माँगते रहे, छटपटाते रहे और मैं असहाय खड़ी थी. मैं इसके लिये तैयार नहीं थी. ‘मर्सी किलिंग’ – मैं हमेशा जिसकी पक्षधर रही हूँ, पहली बार जाना कि यह उतना आसान नहीं जितना मुझे प्रतीत होता था. आपमें बहुत साहस होना चाहिये जो आप इतना बड़ा कदम उठा सकें. यह साहस किसी में नहीं था. मैनें पहली बार उस छटपटाहट को महसूस किया जिसमें आप यह नहीं जानते कि आप ईश्वर से अपने प्रिय का जीवन माँगे या मृत्यु. ४ दिन के पीड़ादायक संघर्ष के बाद नाना अंतत: चले गये और मैनें पहली बार इतने निकट से प्राणों को मुक्त होते देखा….एक एक कर अंगो का फ़ड़क कर शिथिल होना….मानो दिये की लौ बुझने से पहले एक आखिरी बार तेज़ हो रही हो. महसूस कर सकती थी सब. मैं इस सब के लिये तैयार नहीं थी.

यह सब जैसे कम था. रही बची कसर पूरी करने के लिये हमारे कर्मकांड और समाज होते ही हैं. झूठा ढोंग…दिखावा और झूठी सहानुभूति. लोग मृत्यु जैसी घटना को भी एक व्यवसायिक रूप दे देते हैं. जो चला गया उसके गुण दोषों का विश्लेषण होगा, एक ही कहानी इतनी बार इतनी तरह से सुनायी जायेगी मानो किसी फ़िल्म की कहानी हो. और जो सुनायेगा वह नायक बन जायेगा…भले ही जीते जी उसने दिवंगत की खैर भी न ली हो कभी. मैं चीखना चाहती थी…भगा देना चाहती थी ऐसे लोगों को या खुद भाग जाना चाहती थी इस सब से दूर, पर कुछ संभव नहीं था. दबा आक्रोश कब अवसाद बन गया पता नहीं चला. अजीब अजीब सपने, हर पल आशंकाओं से ग्रस्त…अजीब अनुभव…..

इन सब से निकल पाती कि उससे पहले ही अमित (मेरे पति) का स्वास्थ्य अचानक तेज़ी से गिरने लगा. वैसे तो मार्च में हुए ऑपरेशन के बाद से थोड़ा बहुत कुछ लगा ही था पर डॉक्टर कह रहे थे कि सब धीरे धीरे ठीक हो जायेगा…लेकिन लगा कि कुछ गंभीर है जो छुपा हुआ है. इधर अमित अपने सामान्य कार्य करने में असमर्थ हो रहे थे उधर बीमारियों के सभी टेस्ट ‘नेगेटिव’. बीमारी का कोई पता नहीं. एक के बाद एक महँगे और बडे़ टेस्ट से भी कुछ पता नहीं लग पा रह था. दो महीने तक पता ही नहीं लगा कि समस्या है क्या…. अचानक लिवर की जाँच के लिये किये गये कैट-स्कैन से पता चला कि रीढ़ की हड्डी में गलाव है. हम लोगों ने दूर दूर तक यह तो कल्पना भी नहीं की थी. डॉक्टर कह चुके थे कि अमित को बहुत सावधान रहना होगा और तीन महीने तक बेड-रेस्ट…अन्यथा कुछ भी हो सकता है. साथ ही पूरा मामला सर्जन से न्यूरो-सर्जन के हाथ में चला गया. मैं पूरी तरह निराश हो चुकी थी. ईश्वर के सिवा कोई रास्ता नहीं दिख रहा था. अंतत: मैंने सब उनके हाथ में छोड़ दिया और प्रार्थना की शक्ति को शायद पहली बार देखा. हाल में यहाँ जब हम कुछ एडवांस टेस्ट की रिपोर्ट ले कर न्यूरो-सर्जन से मिले तो उन्होंने कहा मरीज़ को बुलाइये. अमित ने कहा कि मैं ही तो हूँ. डॉक्टर हतप्रभ थे कि अमित अपने पैरों पर खड़े हैं, चल-फिर रहे हैं. यह देख उन्होंने ऑपरेशन की संभावनाओं को नकार दिया. थोडे़ दिन के लिये बेड-रेस्ट कहा और ये भी कि लंबे समय तक सावधान रहना होगा किंतु दवाओं से ही सब ठीक हो जायेगा यह हमारे लिये खुशी की बात थी. अमित की सेहत में सुधार हो रहा है. वह अपने काम खुद कर पा रहे हैं. उनके चेहरे पर हँसी लौट आयी है और मेरे मन में शांति.

कहते हैं हर बात का एक धनात्मक पहलू होता है. यह कठिन समय न आता तो मैं जान भी नहीं पाती कि मेरे मित्र मुझे ईश्वर का आशीर्वाद हैं. यहाँ इस कठिन घड़ी में उन्होंने मुझे इतना प्यार और सहयोग दिया है कि मुझे परिवार की कमी महसूस नहीं हुई. कभी लगा नहीं कि इतने बड़े शहर में हम अकेले हैं. अँकुर, दीप्ति, आलोक और नवीन…मैं इन्हें धन्यवाद तो नहीं कहूँगी क्यूँकि यह शब्द प्रति आभार प्रकट करने के लिये बहुत छोटा है पर बस इतना कहना चाहूँगी कि इन सबके बिना मेरा इस कठिन समय को पार करना लगभग असंभव था. अँकुर को तो मैं शायद तीन या चार महीने पहले मिली हूँ….बल्कि मिली तो दो महीने पहले पर हाँ चार महीने से जानती हूँ. इतने छोटे अरसे में बने संबंध में इतना प्यार, विश्वास और अपनापन हो सकता है यक़ीं नहीं होता. ईश्वर नें मानों जीवन में छोटे भाई की कमी को पूरा कर दिया है . नवीन…..पुने में नौकरी करता है. दो महीने पहले जब मेरी उससे बात हुई तो उसे लगा की शायद मैं बहुत परेशान हूँ. इस माह वह हृषिकेश गया सिर्फ़ इसलिये क्यूँकि उसे विश्वास है कि वहाँ एक मंदिर में अगर किसी के नाम से पूजा कराओ तो उसके सब रोग ठीक होते हैं. अभी दो दिन पहले उस से बात हुई तब उसने बताया कि उसने अमित के नाम से पूजा करायी है. और मुझसे इसलिये नहीं पूछा कि मैं पहले ही परेशान हूँ और फिर पता नहीं मेरा इस सब में विश्वास हो या न हो. भावातिरेक से मैं नि:शब्द रह गयी. अपने इन मित्रों के अतिरिक्त मैं उन सभी लोगों और चिट्ठा-परिवार की भी आभारी हूँ जो इस कठिन घड़ी में मेरा मनोबल बढ़ाते रहे. मुझे नहीं पता था कि अनजाने में बने कुछ रिश्तों कि डोर इतनी मज़बूत है. बहुत अच्छा लगा जान कर. शायद भगवान बताना चाहते थे कि ज़िंदगी अब भी ख़ूबसूरत है. अब फिलहाल तो नये साल का बेसब्री से इंतज़ार है क्यूँकि- ‘एक बरहमन ने कहा है कि वो साल अच्छा है’. उम्मीद है कि नया साल आप सब के जीवन में भी खुशियों की ढेरों सौगा़त ले के आयेगा. आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें. ……चलिये फिर अगले साल मिलते हैं 🙂 .

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Published in: on दिसम्बर 28, 2006 at 10:00 पूर्वाह्न  Comments (27)  

बिलेटड हैप्पी टीचर्ज़ डे :)

यूँ तो शिक्षक दिवस आया और चला गया। हमने मन ही मन अपने शिक्षकों को याद किया। पर लिखा कुछ नहीं। ‘फिर कभी’ वाला मूड हम पर हावी था। और ऐसे में हम मलूका दास जी के श्री चरणों में गिर अकर्मण्यता को प्राप्त हो जाते हैं। स्वयं को समझाया कि क्या लिखें, कितना लिखें….और ख़ुद को तसल्ली दे ली कि ठीक ही है, मन में याद कर लिया, लिखना क्या! पर अभी गत सप्ताहांत पर किसी कार्यवश अपने विश्वविद्यालय जाना हुआ। अब ऐसे तो जीवन को आकार देने में स्कूल के शिक्षकों का भी कम योगदान नहीं रहा, किन्तु विश्वविद्यालय में जो अध्यापक मिले उनकी अमिट छाप आजीवन मन पर अंकित रहेगी। खै़र विश्वविद्यालय जा कर सभी शिक्षकों से भेंट हुई। सोया विद्यार्थी जाग उठा और हमें लगा कि हम भी बतायें कि कैसे थे हमारे ‘वह गुरू’ जिनसे मैनें मात्र शिक्षा नहीं अपितु जीने का सलीका़ भी पाया है।

मैनें स्नातक तथा परास्नातक दोनों ही ‘दयालबाग़ विश्व्विद्यालय, आगरा’ से किया। यह आगरा का सर्वाधिक अनुशासित कॉलेज हुआ करता था बल्कि शायद आज भी है। प्रोफ़ेसर वी. जी. दास भौतिकी के विभागाध्यक्ष हो कर नये नये आये थे। गोरा रंग, ऊँचा कद, दुबला-पतला शरीर और चेहरे पर चिरस्थायी हँसी। स्नातक में बस इतना पता था कि वह अब नये विभागाध्यक्ष हैं और साइकिल से आते हैं। यह साइकिल से आने वाली बात हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण थी। जब अधिकांश अध्यापक कार से या फिर कम से कम स्कूटर, मोपेड से आते थे तब विभागाध्यक्ष का साइकिल से आना हमें उनके ‘स्टेटस’ के अनुकूल नहीं लगता था। हमारी कोई भी कक्षा वह नहीं लेते थे अत: एक अध्यापक के तौर पर उन्हें जानने का मौका हमें नहीं मिला था। यद्यपि यह पता था कि वह ‘इलेक्ट्रॉनिक्स’ के क्षेत्र से संबद्ध हैं। एक बार की बात– हमारी ‘क्वांटम मेकैनिक्स’ की कक्षा चल रही थी। कुछ विषय उबाऊ और कुछ पढ़ाने वाले अध्यापक उदासीन…कुल मिला कर कुछे बच्चे खिड़कियों से बाहर झाँक रहे थे, पीछे की बेंच वाले पर्ची-पर्ची खेल रहे थे और अगली कतार के लोग सर हिलाते हुए समझने का अभिनय कर रहे थे। कक्षा की अवधि समाप्त होने की घंटी से पहले अध्यापक की पढ़ाने की इच्छा बोल गयी और वह अपनी किताब उठा बाहर निकल गये। और जैसा कि नींद से जागे बालक करते हैं ठीक वैसे छात्र लगे शोर मचाने। यह शोर जा पहुँचा बाहर से ग़ुज़रते दास सर के कानों तक और उसके बाद सर सीधे कक्षा में। बोले-
‘आप लोगों की क्लास छूट गयी?’
‘जी सर।’
‘क्यूँ? अभी तो २० मिनट बाकी हैं।’
‘सर ने छोड़ दिया आज जल्दी।’
‘ह्म्म्म क्या पढ़ रहे थे आप लोग….’
‘क्वांटम मेकैनिक्स की क्लास थी सर।’
‘तो आज का लेक्चर कौन समझाएगा मुझे….।’
इस अप्रत्याशित प्रश्न से हम सभी अवाक थे। वैसे भी समझ कुछ आया नहीं था। सारे छात्रों को बगलें झाँकते देख सर ने स्वयं वह क्लास दुबारा ली। और जब आगे चलकर भी जब सर ने हमारी कक्षायें ली तब भी बोर्ड पर पिछली क्लास के लेक्चर को देख अक्सर सवाल पूछ बैठते थे। और अगर जवाब नहीं मिला तो फिर उस विषय पर लेक्चर मिलना तय होता था। प्रत्येक विषय पर उनका समान अधिकार हतप्रभ करने वाला था।

सर हमेशा समय की महत्ता पर बल देते थे। एक बार शिक्षक दिवस मनाने के लिये सभी बच्चों ने २०-२० रुपये इकट्ठे करने का सोचा। किसी तरह इस बात की भनक सर को लग गयी। और उस दिन हम सभी को बहुत झाड़ पड़ी। उनका कहना था कि माँ-बाप की मेहनत की कमाई को व्यर्थ खर्च करना उचित नहीं है। इस बात पर हम सबने निर्णय लिया कि हाथों से बना के कार्ड दिये जायें। अन्तत: जब कार्ड बन के तैयार हुए और हमने सभी अध्यापकों को दिये तो सभी ने तारीफ़ करी। दास सर ने भी कहा-
वाह। बड़े सुन्दर कार्ड हैं,  पर हाथ के बने कार्ड कहाँ मिले?
हम सब खुश हो गये सुन के। फ़ूल के बोले – ‘सर हम सब ने बनाये हैं’।
‘अच्छा, कितना समय लगा?’
‘सर दो घंटे’
‘बेटा इतने में तो कम से कम दस न्यूमेरिकल हल कर लेते तुम लोग।’ सर हँसते हुये बोले।
फिर सब के उतरे चेहरे देख सर ने गंभीर हो आगे कहा-‘ बेटा, मेरी बात को समझो। तुम लोगों ने बहुत मेहनत करी। पर तुम लोग जो सम्मान हम सबको देते हो वही काफ़ी है।  और रही बात उपहार की तो एक शिक्षक के लिये सबसे बड़ा उपहार यही है कि उसके छात्र एक सफ़ल और ज़िम्मेदार नागरिक बनें। इस समय तुम्हारा ध्यान सिर्फ़ पढ़ाई पर होना चाहिये।’ यह बात हम लोगों के दिल को छू गयी। और हमने मन ही मन उनके आदर्शों को अपनाने का निश्चय किया। पर ऐसा नहीं कि सर ने सिर्फ़ पढ़ाई पर ज़ोर दिया हो। जब ‘सांस्कृतिक सप्ताह’ मनाया जाता तो वह हमें सभी प्रतियोगितायों में बढ़-चढ़ के हिस्सा लेने को कहते।

अपने कार्य के प्रति उनके जैसी लगन और समर्पण मैनें कहीं नहीं देखा। सुबह सबसे पहले विभाग में पहुँच जाना, देर शाम तक काम करते रहना। कभी बीमारी की वजह से किसी छात्र की पढ़ाई का हर्ज़ा हो जाता तो सर स्वयं समय निकाल कर उसे अलग से पढ़ाते। विद्यार्थियों की हर प्रकार से मदद के लिये मैनें उन्हें हमेशा तत्पर देखा। एक दिन काम की वजह से मैं उनसे मिलने गयी। उस समय वह अपने कमरे में नहीं थे। उनकी मेज पर एक आकर्षक किताब रखी थी-माइक्रोप्रोसेसर से संबंधित, एकदम नयी। किताब हमारे पाठ्यक्रम से संबंधित नहीं थी। हम अभी निचले स्तर के प्रोसेसर्ज़ के बारे में पढ़ रहे थे जबकि यह किताब अन्य विकसित प्रोसेसर से संबंधित थी।  किंतु मैं अपनी उत्सुकता रोक न सकी और किताब के पन्ने पलट कर देखने लगी।  यह वैसे भी मेरा प्रिय विषय था । इस बीच सर कब आये मुझे पता भी नहीं चला। मुझे किताब देखते हुए देख सर ने कहा- ‘यह मैनें कल ही मंगवाई है, यहाँ मिलती नहीं। बहुत अच्छी किताब है। तुम्हारे पाठ्यक्रम में नहीं है पर क्या तुम पढ़ना चाहोगी?’ मेरे यह पूछने पर कि उन्हें यह किताब कब तक वापस चाहिये होगी वह बोले-‘बेटा इस तुम ही रख लो। मैं और मँगा लूँगा। और भी बच्चों से कहना अगर उन्हें किसी तरह की किताब चाहिये तो मुझे बतायें मैं खरीद के दूँगा। बस तुम लोग खूब पढ़ो।’ और यह सिर्फ़ कहने की बात नहीं थी। कितनी ही किताबें जिनका मूल्य छात्र वहन नहीं कर सकते थे, उन्होंने अपने पैसों से खरीद के दीं।

मुझे याद आता है जब मैनें उनसे पूछा था कि आई.आई.टी. और नोएडा में मिली नौकरी में से क्या चुनूँ तो उन्होनें कहा था कि वह चाहेंगे कि अभी मैं और पढ़ाई करूँ, कम से कम एम.टेक. तो करूँ ही। पर ‘पियर प्रेशर’ नाम का कल्पित भूत था या शीघ्रातिशीघ्र आत्मनिर्भर होने की लालसा, मैनें उनकी सलाह पर अमल नहीं किया। और जब आज मुड़ के देखती हूँ तो पाती हूँ कि मैं कितनी ग़लत थी। शायद मैनें उस समय अपनी क्षमताओं और उनकी दूरदर्शिता का सही आँकलन नहीं किया था।

सर अब ‘निदेशक’ हो गये हैं। पर अभी जब मैं कॉलेज गयी तो वह अपनी अति-व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर हमसे मिले। औरों को चाहे मिलने की लिये कितनी मेहनत करनी पड़ती हो पर वह विद्यार्थियों के लिये हमेशा उपलब्ध रहे हैं। छ: साल बाद भी उन्हें मुझे पहचानने में क्षण नहीं लगा। वैसे ही हँसमुख, वैसे ही ऊर्जावान, सर बिल्कुल नहीं बदले। पति के बारे में पूछा। जब सुना कि उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं तो पूछ बैठे कि तुम लोग एक्सर्साइज़ करते हो? मैनें कहा कि सुबह ७-७:३० बजे दफ़्तर जाना होता है तो नहीं हो पाती। इस बात पर बोले-बेटा मेरी घड़ी में ढाई बजे का अलार्म लगा होता है, पर आलस……क्या करूँ तीन बजे से पहले उठ ही नहीं पाता। लेकिन फिर जो उठता हूँ तो थकता नहीं। सुबह खेतों में जा के पाटे चलाता हूँ और अभी कहो तो रेस लगा लूँ। कसरत बहुत ज़रूरी है बेटा। अच्छा बुलाओ लड़के को, डाँट लगाऊँ, कुछ भला काम करूँ आज’। फिर अमित को बुला व्यक्तिगत तौर पर फ़ायदे-नुकसान बताये। 

उनकी इस आत्मीयता से हृदय मानों भीग गया। चलते चलते पूछा-क्या कर रही हो तुम आजकल। मैं जानती हूँ मेरे पास इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं था। कम से कम उस हिसाब से संतोषजनक तो बिल्कुल नहीं जिस हिसाब से उन्हें मुझसे अपेक्षायें थीं। किंतु फिर भी जो भी मेरी छोटी-छोटी उपलब्धियाँ हैं उन्हें सर ने सराहा। कहा कोई मदद चाहिये हो तो उनसे कभी भी संपर्क करूँ। उनसे मिलने के बाद मैं एक नयी ऊर्जा, नये उत्साह से सराबोर हूँ। अपने लक्ष्य को पाने की एक लगन है अब। सोचती हूँ तो पाती हूँ कि  प्रोफ़ेसर दास बिल्कुल उस दीप की तरह हैं जो स्वयं जल कर औरों का पथ प्रकाशित करता है। ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि उन्हें लंबी आयु दे और मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं उनकी अपेक्षाओं पर खरी उतर पाऊँ।

Published in: on सितम्बर 14, 2006 at 8:36 अपराह्न  Comments (18)  

हम बोले…बम बम भोले!

पिछले कुछ दिन से सोच रहे हैं कि लिखें पर लिख ही नही पाये ।  जिसके घर का चूल्हा तीन दिन से न जला हो वो लिखे भी तो कैसे !  तो हम बस दाल- रोटी की याद में किनारे पड़े रहे । सारी मनोकामनाओं को दरकिनार कर प्रभु से रोज़ यही कहा  कि  खीरा, टमाटर और ब्रैड कब तक खाँऊ !! च्यास इतनी लगी है कि क्या कहूँ । बाहर का खाना खा खा के पेट कल्ला रहा है । अब तो दया करो नाथ! आज तो गैस का सिलेंडर भेज ही दो दीनदयाल । प्रभु ने भी आज जा के सुध ली ।  गैस वाला आ गया । बोला २९३ रुपये हुए । हमने खुशी-खुशी ५०० का पत्ता थमाया । कहा ३ रुपये खुले देते हैं । पर ई का ! उसने ३ सौ सौ के नोट थमा दिये । “आप ९३ रुपये खुले दे दो” । अब हम इतने खुले पैसे कहाँ से लायें । पिछली बार भी ऐसा हुआ था । बंदे के पास खुले नही थे । अन्ततः हमने ६ रुपये अधिक दे के गैस ली थी । हमें लगा हो ना हो हमें मूर्ख बनाया जा रहा है । हमने कहा भाई देखो शायद हो एक १० का नोट । इतने खुले पैसे तो हैं नहीं मेरे पास । पर नहीं …रूखा सा जवाब मिला…सब खुले खतम । अब या तो हम खुले ढूँढे या फिर ७ रुपये अधिक दें । हमने भी सोचा ..बेटा लाओ आज तुम्हें ही ठीक करें  । अन्दर जा के अपना रेज़गारी का डब्बा निकाला ।  ५ के छः सिक्के, २-२  के इक्कीस, १ का एक और बीस का नोट निकाल हाथ में धर दिया । भैया जी की सूरत देखने लायक थी । “हमारे पास तो यही हैं, बड़ा ढूँढ कर निकाले” कहकर हमने विजयी मुस्कान के साथ धम्म से दरवाज़ा बंद कर लिया । मन में सोचा “हाँ नहीं तो, सबको उल्लू समझते हैं । मै क्यूँ दूँ चवन्नी भी ज़्यादा” । फिर गिलास भर कर चाय बनायी….जिससे कि पिछले दिनों चाय न मिलने से हुई से हुयी विटामिनों की कमी की पूर्ति हो जाये । अब लिखास दूर करने के लिये लिखने बैठे हैं ।

इस सप्ताहांत हम झाँसी के दौरे पर थे । झाँसी मतलब ससुराल । कुछ ज़रूरी काम था और नाग पंचमी का उत्सव भी । हमारे ससुराल मे इस दिन बड़ी ज़ोर शोर से पूजा होती है । असल में पापा ने एक मंदिर बनवा रखा है घर के बाहर । और समय के साथ इसकी मान्यता भी बढ़ती जा रही है । इसलिये लगभग हर तीज-त्यौहार पर मेले का सा नज़ारा हो जाता है ।  शादी को तीन साल हो गये पर कभी किसी ऐसे मौके पर जाना ही नहीं हो पाता था । इस बार मौका लग गया । शनिवार का सारा दिन अमित के काम में निकल गया । रात को थक कर कूलर के ऐन सामने जो धराशायी हुए तो सुबह जल के छीटों से ही आँख खुली । मम्मी पूजा करके सुबह सुबह घर भर में पूजा का जल छिड़कती हैं । हाय राम आठ बज गये – हम धक्क रह गये । पर मम्मी ने सर पर हाथ फेर कर कहा “रात में बहुत थक गयी थी इसलिये नहीं जगाया । चाय पी लो और १० बजे तक तैयार हो जाना” । जान में जान आयी । तब तक पापा की आवाज़ आयी “मोटी॓ऽऽऽऽ…जग गयी क्या” । “पाऽऽऽऽपा..हो जाऊँगी फिर से पतली…मैने एक्सर्साइज़ भी शुरू कर दी है” मैने मुँह लटका के पापा को समझाना शुरू किया । “अरे बेटी…हम तो ऐसे ही चिढ़ा रहे थे । ऐसी ही रहो । पतली हुई तो बाज़ूबंद ज़ब्त” पापा ने लाड़ से कहा । मेरे देवर की सगाई पर होने वाली देवरानी बाजूबंद पहनी थी…असली कि नकली पता नहीं । पर पापा को धुन लग गयी कि बड़ी बिटिया (बहू) के पास भी होना चहिये एक । अगले ही दिन एक सोने का बाजूबंद आ गया । अब जब पतले होने की बात करो उसी के ज़ब्त होने की धमकी देते हैं हमारे श्वसुर । अब उन्हें क्या कहूँ कि बाज़ूबंद कलाईबंद हुआ जा रहा है ।

बाहर सुबह ५ बजे से ‘ऊँ नमः शिवाय’ की धुन बैठ गयी थी । ढोल मँजीरों के साथ ‘ऊँ नमः शिवाय’ का जाप बड़ा मधुर सुनाई देता था । मंदिर सज गया था । इस बार शिव जी का अभिषेक मुझे और अमित को करना था । हम दोनों ही नहा धो के मंदिर पहुँच गये । मंदिर में इतनी चहल पहल तो मैनें पहली बार देखी । मंदिर के परिसर में रहने वाले खरगोश, कबूतर, बत्तखें, मछलियाँ और एक बँदरिया सभी मानो उत्सव मना रहे थे । पेड़ॊं पर झूले पड़े थे जिसके आस पास बच्चों का हुजूम था । रंग बिरंगी कंपट बेचने वाली, आइसक्रीम वाला और गुब्बारे वाला मंदिर के बाहर डेरा डाले थे ।  हम मंत्र मुग्ध से भक्तिमय वातावरण मे खोये ही हुए थे कि मंदिर में एक भयंकर आदमी के अभिवादन से हमारी तंद्रा टूटी । चक्क काला रंग, चेहरे पर बहुत से धब्बे, ऊँचा कद और लाल आँखे । हमने सोचा – ये कौन ? “बहू जी आपको साहब बुला रहे हैं “, व्यक्ति ने कहा । पापा बुला रहे थे । अमित भी पीछे पीछे आये । “पापा इसे भी दिखाइये ना… ” अमित ने पापा से कहा । अब तक कुछ भी हमारी समझ नहीं आया था । “लाओ लाखन, बहू को नाग देवता के दर्शन करा दो” पापा ने उस आदमी से कहा । “ओह ! तो ये एक सपेरे हैं । और अमित ने शायद कल ही देख लिया नाग ” मैने सोचा । घर में पापा को सर्प वगैरह के काटे का इलाज आता है और उस इलाके में अक्सर साँप निकलते ही रहते हैं । मंदिर मे भी साँप होते हैं कभी कभी । इसलिये वहाँ नाग-अजगर मानो बड़ी बात है नहीं । इन्हें और भाई-बहनों को इसी वजह से डर भी नहीं लगता । कहो तो गले में डाल लें । पर भैया हमने तो नाग का ‘न’ भी नहीं देखा कभी । तो दर्शन के नाम से ही झुरझुरी हो आयी । पिटारा खुला । एक नाग और एक छोटी सी नागिन (जैसा कि सपेरे ने बताया ) ।

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नागिन जितनी शांत , नाग उतना ही आक्रामक । उसकी साँस की आवाज़ और फ़ुँकार से मेरी तो कँपकँपी छूट रही थी । इतने में एक अजगर भी सपेरे ने निकाला और ज़मीन पर छोड़ दिया ।

 ajagar.jpg

अब कँपकँपी घिग्घी में बदल गयी थी । अमित और पापा लगे समझाने – बेटा कुछ नहीं कहेगा वो तुम्हें । खैर उसने कहा भी नहीं । नहीं तो हम चाय ना सुड़क रहे होते । वह सर्र गया मंदिर के चबूतरे पर और जहाँ जगह मिली वहीं एक शाखा से गाँठ लगा के बैठ गया । हमने चट्ट-चट्ट दो चार फोटो खीँच लिये । फिर कैमेरा अमित को थमा पूजा की तैयारी करने निकल पड़े । मम्मी ने कहा था १०८ बेलपत्र पर सीता-राम लिखना है । सो जुट गये काम में । पीले चंदन से हरे पत्तों पे लिखा सीता-राम कितना सुंदर दीख पड़ता था । संयोगवश मैनें भी पीली-हरी साड़ी पहनी थी ( जिसके बारे में अमित कहते हैं कि उसे पहन कर मैं ब्राज़ील का झंडा लगती हूँ ) । अमित की दीदी ने आ कर खिंचाई की – यार निधि, तुम तो पत्तों की एकदम मैचिंग लग रही हो  । पहली बार पता लगा कि जितना सरल सोचा था उतना आसान नहीं था यह काम । घंटा लग गया लिखने में ।

अब तक जनता आ कर नाग पूजन आरंभ कर चुकी थी । वही नाग इतना शांत बैठा था कि क्या कहूँ । अब पापा ने हम दोनों को बुलाया पूजन के लिये । कहा – टीका लगाओ । हाय राम…नमस्कार से काम नहीं चलेगा क्या !! इतने लोगों के सामने रिरियाऊँ भी तो कैसे !! कुल मिला के हमारी नज़रों मे अपनी स्थिति दयनीय थी :(। पापा ने नाग देव को हाथों से पकड़ रखा था । अमित ने टीका लगाया । हमने भी राम-राम करते हुये टीका लगा दिया । देव हिले भी नहीं । जाने उनका क्रोध कहाँ चला गया था । हाथ जोड़ प्रार्थना की । अब नागिन की पूजा की बारी । वह तो सर्र-पर्र भाग रही थी । जैसे जैसे वह हिले वैसे वैसे हम । कुल मिला कर दोनो नगीना टाइप युगल नृत्य कर रहे थे । अन्तत: पापा ने उसे भी पकड़ा तो हमने पूजा की । इसके बाद भोले बाबा के अभिषेक की बारी । जल, दुग्ध, घृत, शहद, दही, शक्कर व पंचामृत से बाबा को स्नान कराया । उसके बाद ‘ऊँ नमः शिवाय’ के जाप के साथ पीतल के बने गो-मुख से जलाभिषेक और फिर मंत्रोच्चार के साथ बेलपत्र अर्पित किये । भोग लगा, हवन हुआ व फिर आरती । उसके बाद भंडारा था । धीरे धीरे शाम भी हो चली थी । साँध्यकालीन आरती बहुत ही मोहक रही । ढोलक, हारमोनियम, मँजीरे, घंटे और शंखनाद के स्वरों के साथ भक्तो के एक विशाल समूह ने जब गाना प्रारंभ किया तो मन हुआ कि यह कभी खत्म ही ना हो । क्या बच्चे, क्या बूढे़, सभी आँख मूँदे प्रार्थना में लीन । पंडित जी कब आरती का थाल ले सामने आ खड़े हुए, मुझे भान ही नहीं हुआ । फिर पापा ने सर्प विसर्जन किया । सर्प विसर्जन यानि सभी सर्पों को मुक्त करना । उसके बाद हम लोगों (दीदी (ननद), उनके बच्चे इत्यादि)  ने झूले हथियाये ।  बड़े दिनों के

 बाद झूला झूला । आत्मा प्रसन्न हो गयी । थोड़ी देर में सासु माँ भी काम निपटा आ गयीं थीं । मुझे देख कर बोलीं “अरे तुम तो बिल्कुल भी ऊँचा नहीं झूल पा रही, लाओ हम झुलायें” । ” हाँ निधि, मम्मी बहुत बढिया झुलाती हैं ” दीदी (ननद) बोलीं । हम थोड़ा हिचकिचाये, सासु माँ हमें झूला झुलायें….ठीक होगा क्या । पर मम्मी ने एक ना सुनी । दीदी और मम्मी ने खूब झुलाया ।

 

बड़ा मज़ा आया । जहाँ तन हल्की बारिश की नन्हीं बूँदो से भीग रहा था वहीं मन स्नेह से । फिर हम सबने पोज़ बना बना फोटो भी खिँचा डाले झूलों पर । इस बार घर के पेड़ से नीँबू, करौंदे भी तोड़े । पिछली बार जामुन और उससे पहले अमिया तोड़ने का आनंद लिया था । सच्ची, अपने हाथ से फ़ल तोड़ कर खाने में बड़ा सुख मिलता है । खैर, रात को ट्रेन थी वापसी की । सामान बटोरा और सारी चहल-पहल छोड़ वापस हो लिये । यहाँ यूँ तो हर तरह के संसाधन उपलब्ध हैं – ऊँची इमारतें, विशाल शॉपिंग मॉल्स, चौड़ी सड़कें, बड़ी गाड़ियाँ । नहीं है तो छोटे शहरों सी आत्मीयता, नहीं है हर छोटे-बड़े उत्सव पर मिल जुल कर संस्कृति को जीवंत करने की क्षमता । कब त्योहार आये और कब चले गये पता ही नहीं चलता । न सावन के झूले हैं, न फागुन के गीत, न पतंग, न लकड़ी और मिट्टी के रंग बिरंगे खिलौने, न मेला, न खेत ना आँगन । सोचती हूँ असली भारत इन बड़े शहरों में बसता ही कहाँ  है । लगता है मानो जीवन की आपाधापी में हम जीवन के आनंद और अर्थ को ही छोड़ आये…कहीं दूर, बहुत पीछे …अपने छोटे शहरों और गावों मे ।

Published in: on अगस्त 2, 2006 at 4:20 अपराह्न  Comments (7)  

मैने जो लिखा था….

यूँ तो लिखने की शुरुआत कविता से ही की थी । पर लगता है कि कविता लिखी नहीं जाती बल्कि अपने आप को लिखाती है । जब भाव ह्रुदय मे नहीं समाते तो पन्नों पे बिखर जाते हैं । अब ऐसा कोई भाव नहीं जिसके अतिरेक को मैं रोक न पाँऊ, तभी मैं अब कविता नहीं लिख पाती शायद । मैनें अपनी सारी कवितायें या ग़ज़लें भावातिरेक मे लिखीं, अब चाहे वह हर्ष रहा हो या शोक । बहुत दिनों तक मैने उन्हें बाँटा भी नहीं । अब जब समय की धूल ने वो यादें धुँधला दी हैं तो साहस हुआ है कि मैं किसी के सामने रख सकूँ………….मैने जो लिखा था …।

१० अगस्त ९९

हम नहीं वक्त जो चुपचाप गुज़र जायेंगे,
जब तेरी राह से निकलेंगे, ठहर जायेंगे ।

कभी तो पास कोई आके मुझसे दो बात करे,
ग़र जो तन्हा रहे तो यूँ ही बिखर जायेंगे ।

आँधियों न बुझाओ उसकी यादों के चराग़,
हम इतने स्याह अँधेरों मे किधर जायेंगे।

दर्द जो ढल के अश्क़ मे न गिरे आँखो से,
बनेंगे हर्फ़ औ काग़ज़ पे उतर जायेंगे ।

२१ नवम्बर ९९, पिता जी के आकस्मिक अकाल निधन के बाद २८ दिन के अन्तराल पर माँ समान नानी का भी स्वर्गवास……

क़दम क़दम पे बिखेरा है आशियाँ मेरा,
कब तलक ले वो जाने यूँ इम्तिहाँ मेरा ।

जो था अज़ीज़ मुझे, जो था करीब मेरे,
दूर होता रहा हर एक मेहरबाँ मेरा।

जिसके आगे मैं तन्हा सफ़र ना कर पाँऊ,
बस उसी मोड़ पे खोया है निगहबाँ मेरा।

करीबियों की दहशत अभी है दिल मे मेरे,
हुआ है ख़ौफ़े जुदाई अभी जवाँ मेरा ।

अपनी सबसे अंतरंग सहेली के लिये जो काफ़ी दूर थी और अपने पत्र में  उसने देर से और अनियमित पत्र व्यवहार के लिये खेद प्रकट किया था …….

कौन कहता है मुझसे दूर है तू,
कौन कहता है ख़त तेरे नहीं मिलते मुझको,
कभी हवा, कभी आँसू, कभी ख़ुश्बू बनकर
तेरे पैग़ाम मुझे रोज़ मिला करते हैं,
चलते-चलते यूँ ही सूनी सूनी राहों पर,
कभी-कभी तो तुझसे बात भी हो जाती है,
मेहरबाँ हो मेरी किस्मत ज़रा ज़्यादा जिस दिन,
ख्वाब मे तुझसे मुलाका़त भी हो जाती है ।

२००० अक्तूबर, आकशवाणी, आगरा, मे मुशायरे के संचालक के रूप मे इन पक्तियों को कार्यक्रम के आग़ाज़ के लिये लिखा…….ये काव्यात्मक गद्य मे लिखी, काफ़ी लम्बी स्क्रिप्ट का शुरूआती अन्श है ।

ना जागीरों की ख़्वाहिश हो, ना ताजमहल का अरमाँ हो,
बस उनका दिल घर मेरा हो, फिर लाख ठिकाने क्या करिये…

दिल से निकलेगी एक ग़ज़ल तो सीधे दिल तक जायेगी,
जब हाले दिल ही कहना हो तो लाख़ फ़साने क्या करिये ।

शेष फिर……

Published in: on जुलाई 5, 2006 at 1:06 अपराह्न  Comments (8)  

बचपन बीत गया..

गतांक से आगे…

पिछली कड़ी पर की गयी एक टिप्पणी में अमित ने पूछा कि मैने भूत के किस्से सुने हैं कि नहीं । भूत की कहानियाँ नहीं सुनायीं मुझे किसी ने । भूत से जुड़ा सिर्फ़ एक वाक़या याद है । मुझे बचपन मे चप्पल पहनने से सख़्त नफ़रत थी । नाना ने बहुत समझाया पर मैं वही ढाक के तीन पात जैसी । तर्क ये प्रस्तुत किया कि मैं भूल जाती हूँ । नाना ने तुरन्त एक काग़ज़ पर लिख कर टाँग दिया 'चप्पल पहनो' । अब याद ना रहने का बहाना भी छिन गया । मैनें युक्ति निकाली । पर्ची दीवार से नोच के फेंक दी । कह दिया हवा से उड़ गयी । अब जब जब नाना ने पर्ची टाँगी, मैने ऐसी हवायें चलायीं । तब ये समझ ही नहीं थी कि टेप से चिपकी पर्ची को हवा क्या उडा़येगी । मैं ये सोच के खुश रहती कि नाना को यही सच लग रहा है । नाना को लगा कि घी सीधी उँगली से निकलने वाला नहीं । और ऐसे जन्मा 'लँगडा़ भूत' । सफ़ेद चादर ओढ़ के मेरे ६ फ़ुट ३ इन्च के नाना जी जब लहराते हुए कहते "माँऽऽऽऽऽय लँगड़ाऽऽऽऽऽऽ भूऽऽऽऽऽऽत हूँ"  तो सच मेरी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती । और नाना इस द्वन्द मे जीत गये । लँगड़ा भूत पैर काट के ना ले जाये इस डर से मैं बिना चप्पल ज़मीन पे पावँ ही ना रखती । तो बस इतना ही जाना मैनें भूतों के बारे में ।

मम्मी – पापा के पास ज़िन्दगी सिलसिलेवार चले जा रही थी । स्कूल से घर और घर से स्कूल बस यही काम था । आस पास दोस्त थे नहीं । शाम ढले बाबा घर आ कर पूछ्ते "गणित लगाया?" । मैं इसी सवाल से बची बची घूमती । फिर भी जब तब बाबा पकड़ के बिठा लेते "लघुत्तम-मह्त्तम के सवाल हल करो" , " बीज गणित, रेखा गणित लगाओ" । बाबा गणित और भूगोल के अध्यापक थे । दोनों विषय मेरी रुचि से पूर्णतः परे । पर जी मसोस के सब करना पड़ता । बाबा के घर आने से सिर्फ़ एक खुशी मिलती । उनकी बड़ी साइकिल घर जो आ जाती । छोटे भाई बहन धक्का लगाते । बड़ी दीदी शान से कैंची डाल के साइकिल चलातीं । जिस दिन पहली बार उस साइकिल कि गद्दी पर फ़तह पायी…सच मानिये वैसा सुख फिर नही मिला । चलाने को आज कार भी चला लेती हूँ पर वो मज़ा नहीं पाया ।

ऐसे ही एक सामान्य दिन पर ज़िन्दगी का चौथा सबक मेरा इन्तज़ार कर रहा था । स्कूल से घर के बीच एक बाज़ार पड़ता था । मैं और मेरी एक सहेली रोज़ की तरह घर लौट रहे थे । वहीं बाज़ार मे एक १० का नोट पडा़ मिला । चवन्नी – अठन्नी के ज़माने में १० का नोट तो कल्पना से परे की बात थी । हम दोनो की तो बाँछे खिल गयीँ । उस समय कोका कोला ३-४ रुपये की रही होगी..दोनो ने ठन्डे और समोसे का भोग लगाया । बाकी बचा एकाध रुपया मेरा हुआ । आखिर खज़ाना मुझे मिला था । घर आ कर गौरव गाथा सुनाने को मन उतावला हुआ जा रहा था । "मम्मी आज मुझे १० का नोट पड़ा मिला …मैने.." । "उठाया तो नहीं ना तुमने??" मम्मी ने प्रतिप्रष्न किया । पूछने के लह्ज़े से साफ़ था कि मुझसे क्या उत्तर आपेक्षित है । मैने डर के मारे कह भी दिया "हाँ मम्मी नहीं उठाया" । मम्मी ने आगे कहा " ठीक किया बेटा, पता नहीं किसका गिरा हो । बेचारा अगर ज़रूरतमन्द हुआ तो अपना पैसा ढूँढता होगा । ऐसा पैसा उठाना फलता नहीं है" । मैने कहा "मम्मी कोई ज़रूरी है कि उसका पैसा उसे मिले, मैने नहीं उठाया , कोई और उठा लेगा" । मम्मी बोली "हो सकता है । पर अगर कोई कुएं मे गिरे तो क्या तुम भी गिरोगी । जो पैसा मेहनत से ना मिला हो, किसी और का हो, उसे लेना नैतिक नहीं है । और अगर सब लोग ऐसे सोचेगें   तो सोचो उस आदमी का पैसा उसे ही मिलेगा ना" । अब बात ठीक जान पड़ी । मन सोचता रहा कि कहीं वो किसी गरीब के पैसे तो नहीं थे । अब क्या होगा ? खैर मन ही मन निश्चय किया कि आगे से ऐसा नहीं होगा । ये बात आज के परिपेक्ष्य मे सही हो या न हो, भले ही कुछ लोग इसे मूर्खता कहें, लक्ष्मी का अपमान कहें, पर मैं अपने निर्णय पर का़यम हूँ ।

जीवन एक नये मोड़ पर खड़ा था । विज्ञान मे रुचि और नये नये प्रयोगों के प्रति उत्सुकता चरम पर थी । स्वभाव में पता नहीं कैसे एक हठ्धर्मिता ने घर कर लिया था । जो मन मे ठान लिया वो करना है । कोई करने मे मदद करे तो बढ़िया न करे तो और भी बढि़या । ऐसे मे ही एक पुस्तक हाथ लग गयी 'विज्ञान के १०१ प्रयोग', डायमंड प्रकाशन की किताब थी शायद । विद्युत-चुम्बक, मोमबत्ती का सी-सॉ झूला, स्टीमर, रँगीन पौधा…और भी पता नही क्या क्या । इनमे से इलैक्ट्रोमैगनेट का प्रयोग बहुत ही रोमाँचक रहा । घर मे सारे साधन पापा और चाचा की बदौलत पहले ही उपलब्ध थे । हमने सोचा चुम्बक बना के घर वालों को चकित कर दें । अब निर्देशानुसार बना ली गयी चुम्बक । पर ये क्या..कील तो दूर उसने पिन को भी हिलाने से मना कर दिया । अब ये समझ आया नहीं कि हमने तार कम लपेटा है…सोचा कि शायद सेल से बात नहीं बनेगी । सीधे बिजली का कनेक्शन चहिये । सो फ़टाक से लपेटे हुए तार के दोनो सिरे प्लग मे ठूँस दिये और ये क्या.. 'भटाक…' की आवाज़ और बत्ती गुल । फ़्यूज़ उड़ने के विषय मे जानकारी थी नहीं इसलिये लगा कि हो गयी कोई बड़ी बात । खैर डाँट लगी उसके बाद । वो भी इसलिये कि इस प्रक्रिया मे झटका लगने की पूरी सम्भावना थी । पर हम सुधरने वाली आत्मा कहाँ । उसके बाद भी हमने अपना अभियान जारी रखा । झालर का 'एक' बल्ब सीधे प्लग से लगा के देखा गया । एक लाइव तार से प्लग के दोनों छिद्रों को जोड़ के भी देखा । सभी प्रयोगों का एक ही निष्कर्ष :- घर का फ़्यूज़ मेरे बिजली का कोई भी काम करते ही उड़ जाता है 😦   । एक लड़के और एक लड़की -दोनो के स्वभाव के मिश्रण का एक उम्दा उदाहरण ये था कि पापा की सोल्डरिंग आयरन का प्रयोग कर के मैने अपनी गुडि़या के लँहगे पर बड़े सितारे बनाये । बाबा के 'maginfying lense' से सूरज की किरणें केन्द्रित कर मेरी गुड़िया के घर का चूल्हा जलता और पापा के खज़ाने से चुराये 'resistors' और 'capacitors' से गुड़िया के गहने बनते।

इन सब के बीच बचपन से निकल कब किशोरावस्था मे कदम रख दिया पता ही नहीं चला । मेरे लेख और कहानियाँ कब शेरो-शायरी मे तब्दील हो गये मुझे याद नहीं पड़ता । मेरा दायरा और सिमट गया था । नाम को एक सहेली और बस किताबें । हाँ गर्मियों की छुट्टियाँ ज़रूर मज़े से कटतीं । नाना के घर जा कर दिन भर वी. सी. आर. पर फ़िल्में देखना और रात मे छत पर अकेले मे रेडियो लिये पडे़ रहना । ये उस सब का ही असर था जो मैने शेर लिखने शुरू कर दिये थे । हर शेर, हर नज़्म ऐसी कि लगे नया नया दिल टूटा है । बस तुक बैठना चहिये । पिता जी के हाथ हमारी डायरी लग गयी एक दिन । मेरे हर शेर पर पेट पकड़ पकड़ के हँसे । पूछा ये दिल कब टूटा जो ये सब लिखा है? हमने भी दार्शनिकों सरीखा जवाब दिया "अगर म्रुत्यु पे लिखना हो तो क्या खुद मर के देखा जाता है" । तब तो कुछ नहीं कहा पापा ने पर शायद बाद मे बड़ा लोटपोट हुए होगे हँसी के मारे । उस समय लगता था कि एक मियाँ गा़लिब हुए और एक हम होंगे । आज अपना लिखा पढ़ती हूँ तो लगता है कि किसी थर्ड क्लास की पिक्चर के डायलॉग पढ़ रही हूँ । एकदम वाहियात …बेतुका। अगर हँसने ( या अपने सर के बाल नोचने) का जी करे तो ये नमूना पढ़ लीजिये –

तू जहाँ हो वो वीराना मेरी मह्फ़िल है,
तू ही राहे मुका़म, तू ही मेरी मन्ज़िल है ।

हैराँ हूँ मेरे दिल को तू क्यूँ नहीं समझा,
तू ही तो दिल कि ज़बाँ, तू खुद मेरा दिल है ।

और एक नमूना देखिये :

तू मुझको मिल ना सके तो सब्र है मुझको
जो मिल गया तो डर होगा तेरे खो जाने का ।
 
दोनो पक्तियाँ परस्पर विरोधी हैं । खैर भगवान का शुक्र है कि   जल्द ही ये भूत उतर गया और ऐसी और रचनाओं का जन्म नहीं हुआ । उसके बाद तो जो लिखा हिन्दी के इम्तिहान मे लिखा । उस समय हिन्दी के पर्चे मे जिसने जितने 'quotations' डाल दिये उसे उतने अधिक अंक मिले समझो । अब कहाँ तक याद रखते, तो परीक्षा मे तत्कालिक रूप से चार लाइन की कविता लिख दी जाती । हरे पेन से लिखते "किसी कवि ने ठीक ही कहा है…" आगे काले पेन से कविता लिख दी जाती । अब कविता का विषय सुनिश्चित होता था,  इसलिये ठीक ठाक लिख लेते थे । बाद में कभी अध्यापिका तारीफ़ करती तो मन ही मन खुशी से फूले नहीं समाते…बस हमेशा एक बात कह्तीं पर वह..कि लेखक का नाम डाला करो । अब उन्हे क्या कहते । इस सब के चलते हमने अपने को मिर्ज़ा गालिब के कूँचे से निकाल सुमित्रा नन्दन पन्त, निराला, प्रसाद, नीरज, महादेवी वर्मा..इनकी कतार मे शामिल कर लिया था । रोज़ अध्यापिका का दिमाग चाटते कि हमें विषय दीजिये हम उस पर लिखेंगे….। बस यूँ समझिये कि उस रफ़्तार से हमारी पुस्तक छपने में कोई खास देरी न थी ।…

क्रमश:

Published in: on जून 15, 2006 at 12:34 अपराह्न  Comments (7)  

बचपन – भाग २ , सबक सँख्या ३

पिछले अंक से आगे…

अपनी पिछली पोस्ट पढ़ कर लगा कि सात सालों के अनुभव को दो किस्सों मे समेट देना न्यायसंगत नहीं है । इसलिये वापस जा रही हूँ नाना – नानी के पास ।

अब जब पलट के देखती हूँ तो लगता है कि बड़ा मीठा युग देखा मैने भी । पता नहीं जगह छोटी थी या सच मे तब ज़माना इतना पुराना था । मेरा मतलब ???? अभी पता लगेगा भाई…रुकिये तो । मैनें स्कूल मे दाखिला लिया सन् १९८३ में । तब ये प्लेग्रुप जैसा झमेला तो होता नहीं था । और स्कूल था हिन्दी माध्यम  सो नर्सरी, फिर के.जी., फिर सीधे कक्षा १ । नर्सरी मे, ऐलुमिनियम की छोटी से बकसिया मे एक तख्ती, सरकन्डे की कलम और खड़िया का घोल लिये पहुँच जाते थे स्कूल । अरे ! सच मानिये (ये इसलिये कहा कि मुझे कोई अन्दाज़ा नहीं कि उस समय आप सब में से जिन लोगों ने पढना शुरू किया, क्या उन्हे भी लिखने के लिये पेन्सिल न मिली होगी ) । और कभी किसी विद्यार्थी के हाथ ब्लेड लग जाया करता तो मजे ही आ जाते । लिखते कम, कलम की छिलाई ज़्यादा होती । जब मौका हाथ लगता स्कूल के पीछे आम के पेड़ से बौर या छोटी अमिया तोड़ने की उठा-पटक में लगे रहते ।

 घर आ कर शाम को जब खेलने जाने का समय होता, तो पूरी मन्डली परिसर मे बने नाना जी के दफ़्तर के तालाब के किनारे इकट्ठी होती । कुछ नाम याद हैं अभी भी – सोनी, गुड़िया, धन्नो (असली नाम तो याद नहीं पर घर का नाम यही था), नवीन, माला, मिनी, गुड्डन दीदी, विवेक भैया , सीता, रीता और गीता  । आखिर के तीन नामों को पढ़ के आपने ज़रूर सोचा होगा कि ये क्या बहनें थी ? हाँ जी , यह बहनें थी । हर बहन माता – पिता की लड़के की बुझी हुई आस । मुझे याद नहीं कि  उनके कोई भाई हुआ कि नहीं  । अच्छा हो कि हो ही गया हो नहीं तो हुई होंगी नीता, मीता…। तालाब के किनारे बैठ बादलों के हनुमान जी, रथ, धनुष, फूल न जाने क्या क्या बनाते । अमलताश के फूलों के बीच की डन्डी से राजाओं का युद्ध होता ।  कच्चे हरे फालसे बटोरते …याद नहीं कि खाते भी थे क्या ।

मनोरन्जन के साधन भी हम बच्चों के जैसे मासूम थे । टी.वी., ट्राँज़िस्टर इतने प्रचिलित जो नहीं हुए थे ।  नानी नत्थू बाबा की छोटी लड़की को बुलवा लेतीं । नाम था लल्ला, मेरी हमउम्र या शायद एकाध साल बड़ी रही होगी । फिर लल्ला देवी देशज गानों पर ठुमक ठुमक के नाचती थीं । कुछ गानों की पहली लाइनें याद हैं — बन्सी वाले ने टेर लयी, अकेली राधा पनिया भरन को गयी, इक्के वाले ने अठन्नी जादा ले लयी लाँगुरिया, पढ़ी लिखी अंग्रेज़ी मेरी कदर बिगड़ गयी मम्मी जी । मेरे लिये तो वो जीवन की पहली सरोज खान से कम नहीं है । कैसेट तो जीवन मे बड़ी बाद मे आयी । पहले तो नानी गाती और हम इन्ही गानों पर लल्ला देवी की कॉपी करते । सिनेमा देखना हो तो या तो वी.सी.आर. और एक टी.वी. लगा कर बनाये एक कमरे के हॉल मे देखो या फिर पास के बडे़ शहर जाओ । और तो कुछ याद नहीं सिनेमा से जुडा़, बस कुत्ते वाली पिक्चर याद है । बडे़ चाव से देखी थी मैने । लोग जैकी श्रॉफ़ को छोड़ के कुत्ता देखने जाते थे । बडा़ चर्चा हुआ था कुत्ते के अभिनय का । अरे, 'तेरी मेहरबानियाँ' याद है ना ??? फिर एक दिन घर मे टी.वी. भी आ गया । दादा दादी की कहानियाँ, विक्रम वेताल का समय ना हो तो दूरदर्शन पर बारिश देख के खुश हो जाते। नहीं समझे ? अरे जब रिले ना आये तब की स्क्रीन देखी है ना….वही ।

रात में जब सोने जाते तो नानी बड़े प्यार से थपकती हुई गातीं 'तुझे सूरज कहूँ या चन्दा, तुझे फूल कहूँ या तारा….' । सच मानिये ये गीत आज भी गूँजता है कानों में । क्यूँ, इसका कारण फिर कभी बताउँगी । ख़ैर, समय बीत रहा था और माँ के घराने की ओर से मिलने वाले गुणों की नीँव पड़ चुकी थी ।  जाने का वक्त पास था और मैं यह समझ ही नहीं पा रही थी कि मम्मी और नानी दोनो एक साथ क्युँ नहीं मिल सकते मुझे । इस दुविधा का तो कोई हल था नहीं । तो अन्तत: जैसे मैने बताया था – मैं आगरा आ गयी मम्मी के पास ।

यहाँ का माहौल नानी के घर से बिल्कुल अलग । किताबों मे किसी को रुचि न थी । घर की स्त्रियाँ घरेलू कामों मे लगी रहतीं और पुरुष काम पर चले जाते । हाँ एक चीज़ यत्र तत्र बिखरी पडी़ दिखती थी – इलेक्टरॉनिक्स के सामान । बड़ा अजीब लगा शुरू में । मम्मी पूरे घर का काम करने मे लगी रह्तीं तो लगता कि क्या यहाँ नत्थू बाबा नहीं होते ! थोडा़ वक्त लगा पर घर मे छोटे भाई बहनों के साथ मैं जल्दी ही रम गयी । शहर के एक मिशनरी स्कूल मे दाखिला करा दिया गया । पर यहाँ न वैसे दोस्त मिले ना वातावरण । मैं कब अन्तर्मुखी होती गयी पता ही न चला । अपनी किताबों के पीछे ही गोल रहती हमेशा । हाँ कभी कभी उल्टी सीधी कोशिश करती कि घर मे साख जमा सकूँ । बचपन से एकाधिपत्य रहा था नाना के घर । यहाँ — पटर पटर बोलने वाली छोटी बहन के चलते मेरा सिक्का जमने का नाम ही न लेता था । इससे जुडा़ एक किस्सा कहती हूँ । उस समय शायद मैगी कम्पनी नयी नयी आयी होगी । सन् ८६-८७ की बात है । तो कम्पनी ने अपने प्रचार के तहत स्कूलों में मैगी बाँटे । किया ये गया कि हर स्कूल में जा सभी बच्चों को एक-एक मैगी का पैकेट दिया गया । एक छोटी सी सामन्य ज्ञान प्रतियोगिता भी रखी गयी । जिस बच्चे ने सही जवाब दिया उसे तीन पैकेट मिले । अब इस बात को घर आ कर, हेर-फेर कर मैने कुछ यूँ सुनाया – "मम्मी आज स्कूल मे मैगी वाले आये थे । उन्होने सबसे जी.के. के सवाल किये, जिसने जवाब दिया उसे एक पैकेट मैगी मिला ।" एक सुना हुआ सवाल भी बता दिया। माँ निहाल हो गयीं । कैसी होनहार लड़की दी है भगवान ने । शाम को पिता जी जब दफ़्तर से लौटे तो वह भी बड़े खुश हुए । और हम तो प्लान की सफ़लता पर खुश थे ही । अगले दिन पिता जी के एक मित्र घर आये । पिता जी ने मेरे सामने उन्हे किस्सा बताया । सुन के वह बडी़ देर तक मुस्कुराते रहे । पिता जी के बचपन के मित्र थे । और हुआ यूँ था कि उनकी पत्नी भी एक स्कूल मे अध्यापिका थीं । और जैसे कि मैगी का यह अभियान सभी स्कूलों के लिये था, उन्हे इस प्रचार का पता था । दफ़्तर मे उन्होने इसका पिता जी से ऐसे ही ज़िक्र किया और पिता जी असलियत जान गये । शाम को जो मेरे सामने जो ये सब  बातें दुहरायी गयीं वह मुझे अपने किये  का बोध कराने कि लिये थीं । मम्मी बडी़ मायूस हुई । मुझे समझाया कि ऐसे झूठ नहीं बोलते । उनके सिखाने का असर था या उस समय हुई शर्मिन्दगी का, पता नहीं । पर ज़िन्दगी का तीसरा सबक ये लिया कि कभी शेखी़ न बघारो । और दूसरे के किये काम का श्रेय खुद लूटने की कोशिश बिल्कुल ही न करो ।

इस कड़ी के अगले अंक मे आपको अपने कुछ और अनुभवों और विज्ञान के प्रयोगों के बारे में बताऊँगी । घर मे बिजली का फ़्यूज़ कैसे उडा़यें, इस विषय पर भी आसान जानकारी दी जायेगी…..क्रमश:

Published in: on मई 25, 2006 at 10:42 पूर्वाह्न  Comments (10)  

बचपन में जो सीखा…

यूँ तो मैं उन लोगों मे से हूँ जिनके लिये बीता हुआ समय हमेशा आज से बेहतर होता है, यानि जो आज है वह भी खू़बसूरत हो जायेगा…कल ।  कम से कम अब तक तो ऐसा ही लगता आया है । आगे की कौन जाने । इस बीते हुए कल से बहुत ही मधुर स्मृतियाँ जुडी़ हैं मेरी, लेकिन सबसे मधुर हैं यादें बचपन की । भोला बचपन , प्यारा बचपन और थोड़ा थोडा़ बुद्धू  बचपन ।

पिता जी दिल्ली मे कार्यरत थे जब मेरा जन्म हुआ । दिल्ली मे रहते कुछ एकाध साल ही हुए होंगे । दमे की बीमारी यूँ तो उन्हे बचपन से थी पर अब जाने दिल्ली की आबो-हवा उन्हे रास नहीं आयी या फिर पता नहीँ क्या हुआ, उनकी बीमारी ने अचानक ज़ोर पकड़ लिया । बाकी का परिवार आगरा मे था, इसलिये छुट्टी ले पिता जी आगरा आ गये । वापस तो जाना ही था, सो एक महीने के बाद वापस दिल्ली भी आ गये । ये सिलसिला जो शुरू हुआ तो थमने का नाम ही न लेता था । मैं तीन साल की होने को आयी तो माँ को पढाई की चिन्ता सताने लगी । पिता जी की तबियत की वजह से जब तब आगरा जाना पड़ता । ऐसे मे कहाँ के स्कूल मे डालेँ, माँ इसी पसोपेश मे रहती । अन्तत: उन्होने मुझे मेरे नाना – नानी के पास छोड़ देने का निर्णय लिया । मुझे याद नहीं कि उस उम्र मे माँ से दूर होने पर मैने कैसे प्रतिक्रिया की थी । और जब से होश सम्भाला, नानी की ममतामयी गोद ही याद आती है ।

कहते हैं कि जैसे इन्सान को सूद, मूल से प्यारा होता है, वैसे ही नाती-पोतों को लोग अपने बच्चों से भी ज़्यादा प्यार करते हैं । नाना – नानी ने बड़े लाड़ से पाला । बचपन मे खुद को किसी राजकुमारी से कम नहीं समझा मैने । नाना जी उस समय वर्ग – १ के अफ़सर थे । बड़ा सा सरकारी बँगला जिसके चारों ओर या कहें गोलाई मे दूर तक फ़ैले खेत । मुझे नहीँ याद कि वो खेत किसके थे पर थे बँगले के ही परिसर मे, एक नीली जीप थी, एक नत्थू बाबा थे, एक काशीराम था । उस पर साहब की नातिन समझो मुहल्ले कि नातिन । इतना सब होने पर भी नानी ने अनुशासन  में ढील कभी न होने दी । सुबह सुबह तो भाई स्कूल का समय होता था । दोपहर मे एक अर्दली खाना ले कर (चार डब्बों वाला स्टील का टिफ़िन) स्कूल आता था…हाथ से खिला के जाता था । क्या ही दिन थे । आज भी याद है कि स्कूल मे आगे मिट्टी के ढेर में, मैं और मेरे साथी तारे ढूँढा करते थे । और ये तारे गिरा करते थे पुष्पा मैडम की साड़ी से । एक अबोध होड़ लगी रहती थी इसी बात पर ।

कैसा होता है ना….कितनी छोटी सी बात भी याद रह जाती है कभी । तब के ज़माने मे गणतन्त्र दिवस और स्वाधीनता दिवस तो त्योहार होते थे । उन दिनों उपस्थिति तो अनिवार्य होती पर युनिफ़ार्म की छुट्टी होती । गुलाबी लहँगा पहन छमर छमर पहुँच जाते थे स्कूल । लौटते में रास्ते में खडे़ ताँगो में जुते घोड़ों के सर पर लगी कलँगी से चिड़ियों के रंग बिरंगे पँख नोच कर कॉपी-किताबों में छुपाते । क्यूँ ?? अरे विद्या होती थी ना वो । अब घर आ के क्या करें । भाई-बहन हों तो खेल-कूद के, लड़-झगड़ के वक्त निकाल लो । पर यहाँ नाना जी चले जाते थे दफ़्तर और नानी अचार, आम पापड़, लड्डू, मठरी और न जाने किस किस काम मे लगीँ रह्ती । गृहस्थी का मतलब मुझे क्या पता था । नाना जी ने बढ़िया हल निकाला । मुझे जोड़ दिया किताबों से । नाना जी खुद एक लेखक भी रहे हैं । स्वर्गीय श्री सम्पूर्णानन्द वर्मा जी के समय में, जो कि नाना जी के ताऊ जी थे, घर से दो किताबें निकलती थीं । शेर-बच्चा और तितली । नाना जी बनारस के पैतृक घर से वह किताबें ले आये और मेरी पढ़ने की आदत का जन्म हुआ । फ़िर लोटपोट, चंपक, टिंकल….और भी जाने क्या – क्या । और ये आदत आज भी जस की तस है । और जब किताबों से फ़ुर्सत मिलती तो नाना जी के साथ दूसरा खेल – नाना एक पन्क्ति देते और अगली पन्क्ति मुझे बनानी होती । तो ऐसे आदत पड़ी लिखने की ।

किताबी कीड़ा होने की वजह से और अपने आसपास वातावरण मे भारी विविधता होने से जिज्ञासा और कौतूहल मेरे स्वभाव मे रच बस गया । कुछ भी काम हो, खुद कर के देखना है । इससे जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा याद आता है – एक मोटे चूहे ने घर मे भारी उपद्रव मचा रखा था । नानी की शिकायत पर नाना ने लगायी चूहेदानी और महाशय अगले ही दिन पकडे़ गये । नाना ने सोचा लाओ थोड़ी देर लॉन मे रखे देते हैं फिर फ़िकँवा देंगे जब नौकर आ जाये । मेरे मन मे तो औत्सुक्य की सीमा न थी । चूहेदानी मे मोटा चूहा । क्या ही मज़ा आयेगा देखने में । शायद ४-५ साल की रही हूँगी तब । नाना ने सख्त हिदायत दी कि चूहेदानी को हाथ न लगाऊँ । भैया, आ गये बाहर मूषक राजा के दर्शन को । देखा तो बेचारे की पूँछ चूहेदानी के दरवाज़े मे फ़ँसी हुई थी । और वह हरसम्भव कोशिश कर रहा था कि पूँछ निकल जाये । देख कर बाल-सुलभ मन को बड़ा कष्ट पहुँचा । हमने सोचा लाओ दरवाज़ा थोडा़ खोल दें, चूहा पूँछ अन्दर कर लेगा फिर उसको दर्द नहीँ होगा । और नाना को पता ही नही चलेगा, ये काम तो फ़ट से हो जायेगा । और फिर आव देखा न ताव, दरवाज़ा चट से खोल दिया । दुष्ट चूहा, पूँछ अन्दर करने की बजाय पूरा का पूरा बाहर आ गया और नाली के रस्ते रसोई मे ये जा कि वो जा ।  नाना जी से झूठ बोल कर जान बचायी । सबक मिला – नेकी का फल हमेशा मीठा नहीं होता ।

एक वाकया और स्कूल के दिनों का । कक्षा १ मे रही हूँगी तब । कान मे तिनका डालने की बुरी आदत लगी । एक दिन छुट्टी के समय कान मे तिनका डाले कक्षा के दरवाज़े पे खडी थी । छुट्टी की घन्टी बजी और जनता दौडती हुई निकली । एक लड़का था – प्रशान्त । नाम आज तक नहीं भूली । तो हुआ यूँ कि  बेचारे से गलती से धक्का लगा और तिनके ने कान मे कर दिया घाव | ख़ून बहने लगा । दर्द तो भूल गयी क्युँकि चिन्ता इस बात की थी कि बेटा गलती तुम्हारी थी तो अब डाँट भी तुम्हे ही पड़ने वाली है । मुझे लगा कि सहानुभूति कैसे बटोरूँ । तो किया क्या- मैडम, प्रशान्त हाथ मे लकडी़ ले कर भाग रहा था जो मेरे लग गयी । पता नहीँ अध्यापिकाओं ने इस बेकार बात पर कैसे विश्वास किया पर बेचारे की बड़ी डाँट पडी़ । उसकी एक ना सुनी गयी । भई खून मेरे निकला तो बात भी मेरी मानी गयी । उस समय तो बड़ी खुशी हुई कि झूठ चल गया । पर अगले दिन उस लड़के का सामना करने की हिम्मत नहीँ हुई । थी तो छोटी पर ये समझ थी कि मैने गलत किया । मन ही मन खराब सा लगता रहा । आखिर नानी को बता ही दिया कि मैने डर के मारे झूठ कहा था । नानी से उस दिन दूसरा मुख्य सबक मिला – अपनी गलती स्वीकार करने की हिम्मत रखो । कोशिश करो कि गलती हो ही ना, और अगर हो जाये तो उसे मानो । अपनी गलती से सीख लो और फिर वह गलती कभी मत दुहराओ । अपना दोष दूसरों पर मढ़ने से हममें सुधार की सम्भावनायें खत्म हो जाती हैं । नानी ने यह गूढ़ बात उस समय बडे़ सुलभ ढँग से कही जो मैने आज भी दामन मे बाँध रखी है । ऐसे हँसते-खेलते-सीखते समय कब उड़ गया पता ही न चला । तब तक इतनी समझ भी आ गयी थी कि मम्मी को कोई परेशानी है जो मुझे साथ नहीं ले जातीं । इसलिये मम्मी के पास जाने जैसी भी कोई ज़िद न करती थी ।

करीब सात साल का होने पर जब नानी को लगा कि पिता जी अब स्वस्थ है, साथ ही उनका आगरा स्थानान्तरण भी हो चुका है, तो उन्होने मुझे मम्मी-पापा को सौँपने का निर्णय किया ।  अब तक मन मे मम्मी के पास जाने कि चाह थी । सब दोस्त मम्मी-पापा के साथ रह्ते थे ना । पर जब जाने का समय आया तो नाना- नानी को ना छोड़ा जाय । पर आना तो था ही इसलिये रोती धोती , मम्मी-पापा और छोटी बहन के पास आ गयी ………………………क्रमश:

Published in: on मई 24, 2006 at 10:22 अपराह्न  Comments (12)