सुधारों का शिकार

[ लीजिये प्रस्तुत है श्री अन्नपूर्णानन्द वर्मा कृत बहुप्रतीक्षित कहानी जो लाला मल्लूमल की सुधार-गाथा के क्रम में पहली है। ]

आजकल मैं सुधारा जा रहा हूँ। मेरे दिल और दिमाग को वह सुधारों के झाँवाँ से रगड़-रगड़ कर साफ़ कर रही है। जिस प्रकार अड़ियल टट्टू की पीठ पर कोड़े बरसते हैं उसी प्रकार मेरे सिर पर सुधारों के ओले बरस रहे हैं। उसे यह कौन समझाये कि बिगड़े दूध को मथने से मक्खन नहीं निकलता।

एक रोज़ उसने अचानक मुझसे कहा–‘प्यारे! मैं आपको सुधारना चाहती हूँ।’

उस वक्त दोपहर के बारह बजे थे। मैं खाना खाकर लेटा हुआ पान कचर रहा था और झपकी लेने की तैयारी कर रहा था। इस बात नें मेरे हृदय में हलका-सा तहलका पैदा कर दिया। मेरे कान खड़े हो गये और मैं सहम कर उठ बैठा। मैनें पूछा–‘क्या कहा, फिर तो कहना?’
‘मैं आपको सुधारना चाहती हूँ।’
‘मुझे?’
‘हाँ, आपको।’
‘सुधारना चाहती हो?’
‘हाँ, सुधारना चाहती हूँ।’
‘भला ऐसी कौन सी बुराइयाँ मेरे में हैं?’
‘उनकी संख्या एकाई-दहाई में न हो सकेगी, नहीं तो गिना देती। अभी देखिये, आप अपनी पीठ जनेऊ से खुजला रहे हैं। जनेऊ इसीलिये है?’
‘नहीं जनेऊ तो कुंजी बाँधने और दँतखोदनी लटकाने के लिये है।’
‘कितनी बार सिखाया आपको कि जम्हाई आये तो मुँह के आगे हाथ कर लेना चाहिये पर ऐसा आप कभी नहीं करते।’
‘यह बतलाओ कि परमात्मा ने लाखों गह्वर और गुफ़ायेँ बनायीं हैं पर किसको-किसको उन्होनें ढाँकने की कोशिश की है?’
‘हँसी न समझिये, मैं इस समय seriously बातें कर रही हूँ।’
‘अच्छा लाओ, एक गिलास पानी दो, मेरा गला सूख रहा है।’
‘आपने अच्छा याद दिलाया। कई बार सोचा था कि कहूँ पर भूल जाती हूँ। आप पानी पीते हैं तो ऐसा जान पड़ता है कि पास में कहीं पुरवट चल रहा है।’
‘पुरवट?’
‘हाँ, पुरवट! पानी पीते समय आपके गले से घटर-घट-घट-घट का शब्द क्यूँ होता है?’
‘घट-घट-व्यापी जानें, मैं क्या जानूँ!’
‘ख़ैर जाने दीजिये। लेकिन खाते वक्त आप कम-से-कम एक बात का ख़याल तो ज़रूर ही रखा करिये कि भात शब्द गँवारू है। ‘थोड़ा भात दो’ न कह कर ‘थोड़ा चावल दो’ कहना चाहिये।’
‘अच्छी बात है, अब से भात को चावल पुकारूँगा। इसी प्रकार रोटी को आटा कहा करूँ तो कोई हर्ज़ तो नहीं है?’
‘मज़ाक न करिये। अभी दो शब्द आपकी शिखा या चुन्दी के संबन्ध में कहने हैं।’
‘ज़रूर कहो। दो शब्द क्यूँ कहती हो, पूरी कविता कह डालो। कविता या लेख को मेरी चुन्दी से अच्छा विषय कौन मिलेगा!’
‘आपकी चुन्दी ज़रूरत से ज़्यादा मोटी है।’
‘मेरे मित्र पं. बिलवासी मिश्र नें इसकी तुलना भैंसिया जोंक से दी है।’
‘और लंबी भी ज़्यादा है।’
‘मेरे मित्र लाला झाऊलाल इसे पगहा पुकारते हैं।’
‘इसे छोटी करा दीजिये।’
‘मैं तो इसे जड़ से उखाड़ देता पर क्या करूँ, अपने पिताजी की यादगार है, इसी से छोड़े देता हूँ।’
‘आपकी शिखा पिताजी की यादगार है?’
‘हाँ, तुम जानती हो कि मेरे पिताजी बड़े ग़रीब थे। मरते समय वे मेरे बदन पर दो हाथ की लुँगी और सर पर एक हाथ की चुन्दी–यही दो चीज़ छोड़ गये थे।’
‘ख़ैर जाने दीजिये, मत छोटी कराइये। पर यह बताइये कि महादेवजी के दर्शन से लौटते समय आप उसमें बेलपत्र क्यों बाँध लेते हैं?’
‘साहित्यिक दृष्टि से देखो तो समझ जाओगी। चुन्दी कहाँ उगती है? खोपड़ी पर। खोपड़ी क्या है? एक प्रकार का बेल है। बेल-सी खोपड़ी पर चुन्दी– और चुन्दी में बेलपत्र! फल के साथ पत्ते का होना कैसा स्वाभाविक है।’
‘आपने शिखासूत्र तो धारण किया है पर कभी संध्योपासना तो करते नहीं।
‘संध्योपासना के लिये चौथेपन का इंतज़ार कर रहा हूँ।’
‘अधिक नहीं तो सुबह ईश्वर का नाम ले लिया करिये और रात में सोते वक्त अपने गुनाहों की माफ़ी उससे माँग लिया करिये।’
‘सोते वक्त अपने गुनाहों को याद करूँ कि रात भर अच्छी नींद भी न आये। तुम भी अच्छी शिक्षा देती हो!’

यह मेरे जीवन के एक दिन के सुधारों का आभासमात्र है। मैं जिधर देखता था उधर ही सुधार के दैत्य को मुँह फैलाये खड़ा पाता था। मुझे गढ़-छील कर आदमी बनाना ही उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य हो गया था। अनाड़ी, फूहड़ और अघोरी तो मैं कभी का साबित हो चुका था। सोलहो आने पशु साबित होने में थोड़ी ही क़सर रह गयी थी।

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Published in: on अगस्त 27, 2006 at 9:20 अपराह्न  Comments (11)  

गोरी का पति गोरिल्ला

[ अन्नपूर्णा नंद जी के कहानियों के एक मुख्य पात्र ‘लाला जी’ की आखिर शादी हो ही गयी। हाँलाकि लड़की-दिखाई से ले कर एक रूपसी कन्या से विवाह तक की कथा तीन-चार भागों मे बँटी है पर वे भाग फिर कभी बाँटूँगी। फिलहाल सोचती हूँ कि शादी के बाद हर पति को छील-छाल, गढ़-तराश के इन्सान बनाने की जो उठापटक पत्नियोँ को करनी पड़ती है उसका विवरण प्रस्तुत किया जाय। इसी क्रम में इस बार लाला जी की पत्नी का एक छोटा सा परिचय प्रस्तुत है। आगे आयेगी — लाला जी की सुधार-गाथा]

    अकेले ब्रह्मा में इतनी बुद्धि कहाँ! त्रिदेवों ने मिल कर उसकी रचना की होगी। सौन्दर्य की एक नयी सीमा उसने का़यम कर दी है। छटाक-भर वजन, बुलबुल की चहक, प्यारी आँखे और चाँद सा मुखड़ा! मैनं उसे देखा और देखते ही आदमी से लट्टू हो गया। जैसा मेरा घर बसा ईश्वर करे सबका बसे।

    पाँच मिनट के अंदर वह दो बार मेरी ओर देख के हँसी और दोनों बार मैनें एक-एक चीज़ उसके हवाले कर दी–पहली बार अपना हृदय और दूसरी बार अपने सेफ़बकस की कुंजी। उसमे भी प्रसन्न होकर मुझे तुरन्त अपने प्रधान अर्दली के पद पर नियुक्त कर दिया।

    आज दिन में तीन बार वह मुझे चौक भेज चुकी थी–सुबह हाथी-दाँत की कंघी लाने, दोपहर में कमीज़ सिलवाने और इस वक्त एक पेटेंट इत्र ख़रीदने। मैं मुँह लटकाये चौक से लौटा, क्योंकि जो इत्र उसने माँगा था वह लाख तलाश करने पर भी नहीं मिला।

    उसने पूछा–‘कहिये,ले आये।’
    ‘अजी, सारा चौक छान डाला, कहीं नहीं मिल रहा है!’
    ‘इतने बड़े शहर में ओटो-दिलबहार नहीं मिल रहा है!’

    ‘ओटो-दिलबहार? राम-राम!! मैं तो ओटो-सिरकपार का नाम पूछता फिरता था। अब इस तरह की कोई चीज़ लाने को कहोगी तो पर्चे पर नाम लिख लिया करूँगा!’

    ‘देखती हूँ कि आपकी स्मरणशक्ति लोप होती जा रही है।’

    ‘नहीं यह बात तो नहीं है। कहो तो आँखें मूँदकर बता दूँ कि तुम्हारे बायें गाल पर कितने तिल हैं।’

    ‘मैं एक बात पूछ सकती हूँ?’

    ‘एक नहीं, सौ बातें पूछो लेकिन पहले समीप बैठा लो।’
    ‘आप अँग्रेज़ी कुछ जानते हैं?’
    ‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं।’
    ‘कहाँ तक?’

    ‘अधिक नहीं जानता। केवल ‘डैमफ़ूल’ तक मैनें अंग्रेज़ी पढ़ी है। मैनें निश्चय कर लिया है कि अपने बच्चों को मैं डैमफ़ूल पुकारूँगा गो मेरे पिता जी मुझे सूअर-गधा पुकारते थे।’

    ‘हूँ! अच्छा हिन्दी तो आपने काफ़ी पढ़ी होगी?’

    ‘इसमें क्या शक़। सिंहासन बत्तीसी, बैताल पचीसी, किस्सा तोता मैना आदि मैनें सब पढ़े हैं। योगवशिष्ठ और किस्सा-साढ़े-तीन-यार तो मैनें एक जिल्द में बँधवा कर रख छोड़ा है। हिन्दी काव्य में भी मेरी अच्छी घुसपैठ है; बिहारी के बिरहे, केशो के कँहरवे, कहाँ तक गिनाऊँ! साहित्य सेवा भी मैनें कम नहीं की है; सच पूछो तो साहित्य सेवा करते-करते मुझे दाढ़ी-मूँछ निकल आयी है।’

    ‘जब हिन्दी-अँग्रेज़ी का यह हाल है तो संस्कृत के बारे में तो पूछना ही व्यर्थ है।’

    ‘नहीं, ऐसा मत सोचो। संसकृत में भी मैनें मनुस्मृति आदि व्याकरण की अनेक पुस्तकें पढ़ी हैं।’
    ‘कुछ समझ नहीं आता कि आपकी इन बातों पर रोऊँ या हँसूँ!
    ‘मुझे तुम दोनो दशा में सुंदर लगती हो।’

    ‘जब आप चार पढ़े-लिखे आदमियों के बीच में बैठते होंगे तो वे आपको क्या समझते होंगे?’
    ‘वे मुझे बेवकूफ़ समझते हैं मैं उन्हें बेवकूफ़ समझता हूँ।’
    ‘आखिर इस अविद्या की दशा में आपका कैसे काम चलेगा?’

    ‘काम क्या चलना है? ईश्वर करे मेरे स्वर्गीय चचाजी कल्पवृक्ष की छाँह में बैठ कर कामधेनु का दूध पियें। वे मुझे आजीवन मसनद तोड़ने के लिये स्वतंत्र कर गये हैं।’ [चाचा जी ने कोई संतान न होने के कारण अपनी अकूत संपत्ति लाला जी के नाम कर दी थी। यह किस्सा फिर कभी बताऊँगी–निधि]

    मेरी बातों पर उसे हँसी आ गयी। यदि शरद् ऋतु की चाँदनी रात में आपने कुंद कली को खिलते देखा होगा तो उसकी मुसकान की सुंदरता और सरसता का कुछ अनुमान आप कर सकेंगे। हँसी क्या थी सुधा का स्रोत था। ओठों के लाल पटल को हटाकर कुन्दन-से दाँत चमकने लगे।

    मैं आँखो द्वारा इस रूप-मदिरा को पीने लगा। अकसर ऐसा ही होता है कि जब मैं उसकी ओर देखने लगता हूँ तब राजा निमि मेरी पलकों की ड्योढ़ीदारी से अवकाश ग्र्हण कर भाग खड़े होते हैं। इस समय भी ऐसा ही हुआ! पीठ पर लटकती हुई उसकी चोटी मेरे हृदय पर नागफाँस का काम कर रही थी। उसके अंग-अंग में सौन्दर्य की छटा थी।

    सब बातों में वह मुझसे बढ़ कर है। जिसने अमा और पूर्णिमा एक साथ न देखी हो वह मुझे और उसे एक साथ देख ले। वह विदुषी है और मैं गँवार। वह सुंदरी है और मैं? क्या कहूँ!! जो कुछ कसर थी वह शीतला देवी ने बचपन ही में चेहरे पर मसूर की दालमोंठ छिड़क कर पूरी कर दी। आश्चर्य है कि इतने पर भी वह मुझे प्यार करती है–शायद उसी तरह जैसे कमल को कीचड़ प्यारा है।

  अपने हृदय पर उसका आधिपत्य मैनें बिला किसी चीं-चपड़ के स्वीकार कर लिया था। उसकी रीझ और खीझ के अनुसार मैं कभी लोटन कबूतर और कभी भींगी बिलली बना रहता था। मेरे हृदय की डोर अपने हाथ में करके वह पतंग की तरह मुझे उड़ाया करती–कभी ढील देती थी और कभी खीँच लेती थी।

    खेद है कि मैं कवि नहीं हूँ–यदि कवि होता तो उसके रूपलावण्य की प्रशंसा में कोटियों कवितायें लिख डालता, छपा डालता, और कोई न खरीदता तो मुफ़्त बाँट डालता। तब भी पं. बिलवासी मिश्र की मदद से मैनें कुछ लिखा है, सुनिये–

                   छलकि  छवापै  बजैं छागल छमाछम जो
                          सोनछरी – सी   वह  डोलैरी  मंद   कदम।
                   काकुल  संवारे  हेरि व्याकुल करत मैन
                          आनन निहारे चारु चंद्रमा को होत भ्रम॥
                   गात की गोराई पै सुवरन की खान वारौं
                          अधर  सुधारस  पै  वारौं   कोटि  चमचम।
                   रूप-मद छाके   बाँके नैनन बला के  जाके
                         ऐसी तिरिया के–हाँ! पिता के हैं दमाद हम॥

— अन्नपूर्णानंद वर्मा

Published in: on अगस्त 24, 2006 at 12:55 अपराह्न  Comments (19)  

पं. बिलवासी मिश्र

[यूँ तो हिन्दी साहित्य में कुल नौ रस माने गये हैं  और प्रत्येक रस का एक विशिष्ट स्थान है। पर मुझसे पूछें तो मेरी दृष्टि मे हास्यरस सर्वोपरि है। जो पढ़े सो हँसे, फिर पढे, मुँह की माँसेपेशियों की कसरत हो, ज्ञान बढे़, ख़ून बढ़े। और क्या चाहिये। अब हास्य-साहित्य मैनें बहुत तो पढ़ा नहीं पर जो पढ़ा उनमें श्री अन्नपूर्णानंद वर्मा विशेष प्रिय हैं। कहने को वे मेरे बड़े नाना होते हैं… नाना जी के छोटे ताऊ जी। पर उनसे मिलने का सौभाग्य विधाता ने मुझे नहीं दिया। २१ सितंबर, १८९५ में जन्मे श्री अन्नपूर्णानंद जी तीन भाइयों में बीच के थे। वर्ष १९६४ में जब उनका निधन हुआ तब वे अपने बड़े भाई सम्पूर्णानंद जी जो कि उस समय राजस्थान के राज्यपाल थे, के साथ जयपुर में रहते थे। जीवन में आये उतार-चढा़व के कारण स्वभाव से अति-गंभीर नाना जी की कलम से हास्यरस का ऐसा वेग फूटता था, ये बात मुझे चकित कर जाती है। उन्होनें बहुत तो नहीं लिखा पर जो भी लिखा, पठनीय है। इसलिये ये श्रंखला शुरू कर रही हूँ जिससे आप तक भी उनकी रचनायें पहुँच पायें। इस बीच उनके जीवन के बारे में जो भी थोड़ा बहुत जानती हूँ वह भी थोड़ा-थोड़ा कर आप तक पहुँचाती रहूँगी।]

 जम्बू नामक द्वीप के भारतवर्ष नामक खण्ड में- अवध के ऊपर और तराई के नीचे-हिंदुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है जिसका नाम है बहराइच। यहाँ गाज़ीमियाँ नाम के एक सिद्ध महापुरुष हो गये हैं जिनके दर्शन-पूजन का बड़ा माहात्म्य माना जाता है। हर साल हज़ारों हिन्दू आ कर यहाँ परमार्थ-चिन्तन का लाभ  उठाते हैं। एक अर्थशास्त्री ने पता लगाया है कि जितना फूल यहाँ गाज़ीमियाँ की दरग़ाह में प्रतिवर्ष हिन्दू स्त्रियाँ चढ़ाती हैं उन्हें बटोर कर यदि शहद निकाला जाय तो इतना शहद तैयार हो सकता है कि हिन्दू महासभा उसे अपने प्रस्तावों में लगाकर सदियों तक आनन्द्पूर्वक चाट सकती है।
  
 यहीं बहराइच में मेरी शादी तय हो रही थी और देन-लेन की चर्चा छिड़ गयी थी। लड़की के पिता के पस अकूत धन था। अभी तक इतना तय हो पाया था कि शादी में मुझे १ बीबी, २ इलाके, ३ मोटर, ४ मकान, ५ घोड़े, ६० हज़ार नक़द और ७० हज़ार के ज़ेवर मिलेंगे।

    यह सब बहुत ठीक था, सिर्फ़ एक बात गड़बड़ थी। किसी मत्स्य-भोजी से पूछिये कि उसके प्रिय खाद्य में काँटों का प्राचुर्य क्यों है। इस संसार मे मिसरी में फाँस वाली बात हर जगह पायी जाती है। मुझे उड़ती हुई खबर लगी कि लड़की रूप-रँग में त्रिजटा की सगी-सगोतिन है।

    मैंने तो समझा था सोने की चिड़िया हाथ लगी पर इस समाचार ने तो मेरी सारी आशाओं पर पानी फेर दिया। इस बात का पूरा विश्वास कर लेने से पहले अब यह ज़रूरी हो गया कि इसकी काफ़ी छानबीन की जाय। अपने किसी ख़ास आदमी को भेज कर इसका अनुसन्धान कराना उचित जान पड़ा। मैनें इस सम्बन्ध में अपने मित्र पं. बिलवासी मिश्र से मदद लेने का निश्चय किया।

    लड़कपन में बिलवासी जी से मेरा धौल-धप्पड़ का रिश्ता रहा और अब वे मेरे ख़ास दोस्तों में से एक हैं। मेरी तरह वे भी अपने घर में पड़े-पड़े सिर्फ़ भोजन और डासन से काम रखते हैं। भेद इतना है कि वे एक लेखक और कवि हैं और मैं एक भला आदमी। उन्होने अपनी लेखनी के बूते पर साहित्य-वन-विहङ्ग और साहित्यानन्द-सन्दोह आदि की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। ये लाखों में एक आदमी हैं। जिस समय इनका पूरा परिचय संसार को प्राप्त हो जायेगा उस समय लोग गली-गली इनकी जय बोला करेंगे। कुछ काम इनके ऐसे हैं जिन्हें अगर इतिहास की अमर सामग्री कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। उदाहरण के लिये ये लालटेन की बत्ती अपने अस्तुरे से काटते हैं। कोबरा पालिश और झाड़ू की सीँक से इन्होने दवात और क़लम का काम लिया है। ठाकुर जी की आरती इन्होनें कई बार मोमबत्ती से की है। पान में सुपारी नहीं रहती तो छुहारे का बीज काट कर डाल लेते हैं।

    मैं दोपहर के समय इनके मकान पर पहुँचा। वे खाना खा चुके थे। और मुँह में पान भर कर बाहर बैठक में लेटे हुए जुगाली कर रहे थे।
    मैनें कहा–‘नमस्कार बिलवासी जी!’
    उन्होनें उत्तर दिया–‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    ‘कुशल समाचार कहिये।’
    ‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    ‘इस समय आप क्या कर रहे हैं? आपसे एक राय करनी है।’
    ‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    मैं झल्ला गया; मैनें कहा–‘आप की जान मे सिवा ऊँ के और भी कोई ऐसा शब्द है जिससे आप मेरा उत्तर दे सकें? आपको जानना चाहिये कि मैं पशुओं की बोली नहीं समझता।’

    वे थोडी़ देर मेरी ओर इस प्रकार देखते रहे जैसे मुझे वे कोई बरसाती कीड़ा समझते हों जो व्यर्थ उनके कानों के पस भनभन कर रहा था। फिर पान घोंट कर उन्होने अपना मुँह खाली किया और बोले–‘लाला-जी! आप किसी भले आदमी से ऐसी आशा क्यों करते हैं कि जब वह भोजन के उपरांत मुँह में पान भर के लेटा हुआ पेट पर हाथ फेर रहा है उस समय वह आपकी बातों का उत्तर सिवाय ऊँ के अन्य किसी प्रकार से देगा।’
   ‘खैर जाने दीजिये। मैनें समझा था कि आप की जीभ ऐंठ गयी है। मैं इस वक्त इसलिये आया कि मुझे आपसे एक ज़रूरी काम है।’
   ‘काम के नाम से मैं घबराता हूँ। कोई राय देनी हो तो लेटे-लेटे दे सकता हूँ।’
   ‘मैं चाहता हूँ कि आप मेरी भावी पत्नी को देख कर उसकी सूरत-शकल के बारे में अपनी राय दें।’
   ‘बुला लाइये उन्हें। वे आप की बीबी होने वाली हैं — इसलिये उनके साथ सहानुभूति भी प्रकट करूँगा और साथ ही अपनी राय भी ज़ाहिर कर दूँगा। कहाँ हैं — क्या बाहर खड़ी हैं?’
   ‘आप भी पूरे अहमक हैं। वह बहराइच में रहती हैं, वहीं जाकर आपको किसी प्रकार उन्हें देख कर आना है।’
 
    पाँचवें दिन मुझे दो पत्र मिले, एक बिलवासी जी का, दूसरा लड़की के पिता का। बिलवासी जी का पत्र मैं ज्यों का त्यों उतारे देता हूँ। उन्होनें लड़की के संबन्ध मे केवल इतना लिखा था जो मेरे ख़याल से बहुत काफ़ी था —
                       तावा-सी तमाल-सी  तमाखू-सी तिलकुट-सी
                                पावस अमावस की   रैन अन्धकार-सी।
                       कागा-सी करइत-सी   काजल-सी कालिका-सी
                               कोइल-सी  कोयला-सी  खासी कोलतार-सी॥
                                                                     – बिलवासी

लड़की के पिता का पत्र पढ़ के मैं दंग रह गया। उसमें लिखा था — ‘आज एक ब्राह्मण देवता कहीं से घूमते-फिरते मेरे यहाँ आ गये थे। वे सामुद्रिक शास्त्र के अद्वितीय विद्वान जान पड़ते थे। उन्होनें अपना नाम बिलवासी मिश्र बताया था। उन्होनें हम सबका हाथ देखा। मेरी लड़की का हाथ देख कर उन्होंने बतलाया कि इसकी शादी जिसके साथ तय हो रही है वह महालम्पट और दुराचारी है और छः महीने के अन्दर उसकी मृत्यु अवश्य हो जायगी, या तो चुल्लूभर पानी में या कालेपानी में। ईश्वर को अनेकों धन्यवाद है कि आप के बारे में ये बातें पहले मालूम हो गयीं। मैं अपनी लड़की को आग में नहीं झोंक सकता। आपके साथ उसके विवाह की जो बात चल रही थी उसे अब भूल जाइये।’

Published in: on अगस्त 22, 2006 at 7:14 अपराह्न  Comments (7)