हम क्या बनाने आये थे और क्या बना बैठे!!!

  
पिछले एक वर्ष में दिल्ली में रहने का अगर कोई सबसे बड़ा फ़ायदा मुझे हुआ है तो वो है महान कलाकारों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होना.  गत वर्ष उस्ताद राहत फ़तेह अली ख़ान, श्री जगजीत सिंह, फ़रीदा ख़ानम, उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, पंडित शिव कुमार शर्मा(संतूर), बिक्रम घोष(तबला), तौफ़ीक़ क़ुरैशी(पर्कशन), पंडित रोनू मौजुमदार(बाँसुरी), अतुल रानिंगा(की-बोर्ड), गुंडेचा बंधु(ठुमरी गायन), शुभेन्द्र राव और सस्किया राव-दे-हास (सितार और सेलो). इसी क्रम में इस सप्ताहांत हमें वडाली बंधु, साबरी बंधु, गाज़ी ख़ान बरना (माँगनेयार – जैसलमेर) और कैलाश खेर तथा उनके ग्रुप कैलासा को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ.

बड़ों के मुख से अक्सर एक उक्ति सुना करते थे कि वृक्ष जितना फल से लदा होता है उतना झुका होता है. ये कलाकार उस उक्ति को अक्षरष: चरितार्थ करते हैं.  इतनी मधुर वाणी, इतना ओज, अपनी कला में इतनी महारत और उसके बाद भी इतना विनम्र स्वभाव. मैं सच कहूँ तो इतनी श्रद्धा मुझे मंदिर में जा कर नहीं आती जितनी मैनें इन लोगों के प्रति महसूस की.  इन्हें देख कर ऐसा प्रतीत होता है मानों भगवान के साक्षात दर्शन कर लियें हों.  शिक्षा-अशिक्षा की सीमाओं से परे इनके विचारों की महानता के आगे बरबस नतमस्तक हो जाने को जी करता है.  इनकी कला और ज्ञान के आगे धर्म, जाति  और देश की सीमाओं के मसले इतने छोटे हो जाते हैं कि क्या कहना. अहसास होता है कि हम हिंदु – मुस्लिम से पहले एक इंसान हैं.

एक ओर हमारे राजनेता हैं जो लोगों को धर्म और प्रांत के आधार पर बाँट कर झगड़े करवा रहे हैं और एक ओर ऐसे महान लोग जिनके लिये ईश्वर एक है, कला ही ईश्वर है. यहाँ सम्मान ज्ञान का होता है धर्म का नहीं.  एक ओर जहाँ छोटे वडाली बंधु ने साबरी जी के चरण स्पर्श किये वहीं ग़ाज़ी खान बरना ने अपने कार्यक्रम का प्रारंभ ‘गणपति वंदना’ से किया. सच मानिये पूरे कार्यक्रम में मेरा सर श्रद्धा से झुका रहा. हाँलाकि मैं कभी भी बहुत धार्मिक नहीं रही हूँ किंतु अब ऐसे लोगों के दर्शन होने के बाद, यह जानने के बाद कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति क्या है तो मैं अपने आपको सभी धर्मों और सीमाओं से बिल्कुल परे पाती हूँ.  और क्या ही अच्छा हो कि हमारी पीढ़ी नेताओं के अतिवादी विचारों का अंधाधुंध अनुसरण करने के बजाय अपना आदर्श ऐसे लोगों को चुनें जो सचमुच अनुसरणीय हैं. वडाली बंधुओं ने अपनी प्रस्तुति के बीच चार लाइनें कही थीं, उन्हीं के साथ और इस आशा के साथ कि हम एकता की महत्ता को समझेंगे, अपनी बात समाप्त करती हूँ –

  “हम क्या बनाने आये थे और क्या बना बैठे
  कहीँ मंदिर, कहीँ मस्जिद, गुरुद्वारे औ गिरिजा बना बैठे,
  अरे, हमसे अच्छी तो परिंदो की ज़ात है,
  कभी मंदिर पे जा बैठे, कभी मस्जिद पे जा बैठे”

Published in: on फ़रवरी 19, 2008 at 6:23 पूर्वाह्न  Comments (11)  

बचाओ!!!!!!!!!!!!!!!

अभी मैं काफ़ी क्रुद्ध हूँ, क्षुब्ध हूँ. आजकल गुस्सा निकालने का कोई रास्ता नहीं सूझता. अमित की लाइफ़ में तो एक तरह से ‘हैप्पी आर्ज़’ चल रहे हैं…चुँकि वह अस्वस्थ हैं तो मेरे कोप का भाजन आजकल वह कतई नहीं बनते. अपने बाल नोचना या दीवार पे सर फोड़ना जैसी पगलैट हरकतें हम अब करते नहीं. तो इसलिये रास्ते के अभाव में लिख रहे हैं. उम्मीद हैं कि आप लोग हमारी तकलीफ़ समझेंगे.

सुबह से तीन फोन आ चुके हैं. फ़लाना-फ़लाना और टमाका-टमाका बैंकों से. हमारा अपना फ़ोन खराब है इसलिये अमित अपना फ़ोन घर छोड़ के जाते हैं. जिससे काम पड़ने पर बात हो सके. ये और बात है कि ऑफ़िस पहुँचने के बाद अमित का फ़ोन मुश्किल से ही आता है पर पीछे से झिलाऊ कॉल्ज़ की कतार लग जाती है. वो भी हम झेल लेते हैं पर आज हद्द हो चुकी है. आज पहली बार जब मैनें फ़ोन उठाया एक लड़की बोली-‘हैलो’….हमने भी कहा-‘हैलो’…लड़की फिर बोली-‘हैलो…दिस इस सिमरन फ़्रॉम — बैंक’. बैंक सुनते ही मेरा मुँह बन गया…फिर भी हमने तहज़ीब के दायरे में रहते हुए कहा-‘हाय सिमरन’. और फिर उधर से एक बेहद इंटैलिजेंट सवाल आया-‘हाय…..एम आई टॉकिंग टु मिस्टर अमित?’. एक तो बैंक की फ़ालतू योजना का फ़ोन उस पर से इतने टाइम-पास लोग. दिमाग को दिन मे धूप सेकने भेज दो फिर लोगों को फ़ोन घुमाते रहो. एक मिल गयी स्क्रिप्ट…उसमे लिखा है कि ऐसा सवाल पूछना है…तो फिर पूछना ही है…कोई लॉजिक भूल के भी न लग जाये कहीं. शाम को भी ऐसे ही एक महान भैया जी से बात हुई… भैया जी एकदम देसी टोन में बोले-‘हैऽऽलो’…हम भी बोले-‘हैलो, हाँ जी भैया कहिये’. ‘हाँ, अमित जी बोल रहे हैं? मैं —बैंक से’. अबकी बार तो रहा नहीं गया..अरे कैसी आवाज़ हो पर आदमी के जैसी तो नहीं ही है….आवाज़ पर दिन में दूसरी बार बट्टा बर्दाश्त नहीं हुआ..बोले -‘नहीं…अमित जी ऑफ़िस में हैं और ९ बजे से पहले नहीं बोल पायेंगे, उनकी पत्नी बोल रही हूँ ..कहिये!’. बेचारे सकपका गये होंगे. पर असल में अति हो चुकी है. सोते-फ़ोन, जगते-फ़ोन, खाते-फ़ोन, नहाते-फ़ोन….और हर बार निरर्थक फ़ोन…

शुरू शुरू में मोबाइल क्या ही बढ़िया चीज़ लगता था और अब…क्या कहूँ. वही हाल है जैसे शुरू शुरू में प्रेमी तो बढ़िया लगते हैं पर जैसे ही पति बने आपकी नाक में दम कर देंगे. मैं यह नहीं कह रही कि मोबाइल कि उपियोगिता नहीं है किंतु समस्या यह है कि दिन भर घंटी बजती ही रहेगी. उस पर फ़ोन की लगतार गिरती दरें…मतलब और फ़ोन. अभी हाल में तो मैनें ‘ओम नमः शिवाय’ की धुन की रिंगटोन लगा दी थी. कुछ और नहीं तो शायद एक माला ही हो जाय. अभी रिलायंस ने पैसे कम क्या किये लोगों के वारे न्यारे हो गये. सुबह सुबह नाश्ता बना रहे हैं…दिमाग़ में चिंता कि अभी क्या क्या काम निपटाने हैं…एक हाथ में बेलन, एक में कलछी…तभी फ़ोन…’और..क्या हो रहा है….अच्छा नाश्ता…क्या बन रहा है?…गोभी के पराँठे…अच्छा गोभी कच्ची डालती हो या भून के…’ अब गर्दन टेढ़ी कर के कंधे और कान के बीच फ़ोन और संभालो…मज़े की बात ये कि पूरी वार्ता में मेरे मुँह से ‘हाँ’, ‘ह्म्म्म’ जैसे शब्द ही निकलेंगे और फिर थोड़ी देर में सामने वाला कहेगा…और बताओ..! दिन में दो बार दूर की मौसी जी का फ़ोन आता है. उनके फ़ोन से किसी भी रिलायंस पर फ़्री कॉल की सुविधा है…क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ, मौसम का हाल, मिस हुए सीरियल की कहानी…और अभी कुछ दिन से जब अमित की तबियत खराब थी तो टेंशन डबल. ‘क्या करें आ नहीं सकते …सोचा फ़ोन पर हाल ले लें’. हर फ़ोन पर पूरी कहानी बताओ…कुछ लोग सुबह हाल पूछते, फिर दोपहर में और फिर शाम को…’अरे! ठीक नहीं हुए…क्यों ठीक नहीं हो रहे!’ …जैसे गोली को अंदर जाते ही घिसी हुई हड्डी की जगह चिपक जाना चाहिये था और अमित को ‘छू’ से ठीक हो जाना था. ये एक फ़ोन न हुआ …जान की आफ़त हो गया. उस पर से ये मोबाइल डेड भी नहीं होते. इसलिये कई बार तो मैं फ़ोन गद्दे की नीचे दबा देती और खुश होती रहती.

आज भी मुझे फ़ालतू कॉल्ज़ से बचने की राह ही नहीं सूझ पाती. और इसी वजह से फ़ोन के प्रति वैराग्य उत्पन्न होता जा रहा है. मेरे फ़ोन को खराब हुए १ महीना हो चुका है. और मैं बेहद खुश हूँ. चाहती हूँ और थोडा़ समय लटका रहे. हाँलाकि मैं नये साल की संध्या पर अपने दोस्तों से बात नहीं कर पाऊँगी….पर फिर भी! अच्छा ही है… इसबार मैं सबको पत्र लिखूँगी…पुराने दिनों की तरह. फिर इंतज़ार करूँगी कि डाकिया बैंक के स्टेटमेंट और फ़ोन के बिल की जगह कभी मेरे लिये कोई चिट्ठी भी ले के आये…जिसे सहेज कर रख सकूँ…बार बार पढ़ सकूँ.

Published in: on दिसम्बर 29, 2006 at 6:14 अपराह्न  Comments (14)  

मेरा भारत और एक छोटा सा प्रश्न

बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं. बस जी नहीं किया. इस बीच बड़ी बड़ी घटनायें हो गयीं भारत में. मैं कुछ लिखने के बजाय बस यह सोचती रह गयी कि क्या हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने इसी भारत का सपना देखा था. अगर नहीं तो कहाँ चूक गये हम.  आज अन्तर्जाल पर ऐसे ही विचरते हुए श्री ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के एक लेख ने ध्यान आकर्षित किया, शीर्षक था–‘भारतीय होने पर गर्व करें’. आज के समय में यदि राजनीति से जुड़े किसी व्यक्ति ने मेरे मानसपटल पर छाप छोड़ी है तो वे हैं हमारे माननीय राष्ट्रपति महोदय. अत्यंत ज्ञानी, विद्वान तथा अनुभवी श्री कलाम अपने ज्ञान, सकारात्मक एवं वैज्ञानिक सोच तथा विनम्र व्यवहार के कारण सदा ही मेरे लिये श्रद्धेय रहे हैं. उनके शब्दों ने मन में हमेशा एक आशा तथा ऊर्जा का संचार किया है. अत: उनके लेखन के प्रति मेरा सहज आकर्षण स्वाभाविक है. मुझे नहीं पता कि इस लेख को कितने लोगों ने पढ़ा है पर इस लेख को पढ़ कर मुझे ये अवश्य लगा कि  हर भारतीय को इसे पढ़ना चाहिये. अत: उनके इस लेख के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ जिन्होंने मुझे न सिर्फ़ अत्यधिक प्रभावित किया अपितु मेरी सोच को एक नयी दिशा दी.

” भारत को लेकर मेरे तीन दृष्टव्य हैं. हमारे इतिहास के तीन हज़ार सालों में दुनिया भर के लोगों ने हम पर आक्रमण किये हैं, हमारी ज़मीनें हथियायी हैं, हमारे दिमाग़ों पर विजय पायी है. सिकंदर के बाद से  ग्रीक, तुर्क, मुसलमान, पुर्तगाली, बर्तानी, फ़्रांसीसी तथा डच सभी आये, हमें लूटा और जो हमारा था वह ले के चले गये. किंतु इसके बाद भी हमने किसी राष्ट्र के साथ ऐसा नहीं किया. हमने कभी किसी पर विजय पाने की कोशिश नहीं की, उनकी ज़मीन, सभ्यता तथा इतिहास पर आधिपत्य स्थापित करने की चेष्टा नहीं की. अपना जीने का ढंग किसी पर नहीं थोपा. क्यों? क्योंकि हम दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं.

इसीलिये भारत को लेकर मेरा पहला दृष्टव्य स्वतंत्रता से संबधित है. मुझे लगता है कि भारत को यह द्रष्टव्य १८५७ में मिला जब स्वतंत्रता की लड़ाई की शुरुआत हुई. हमें अपनी इस स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिये, इसका सम्मान करना चाहिये. यदि हम स्वतंत्र नहीं है तो कोई हमारा सम्मान नहीं करेगा.

भारत को लेकर मेरा दूसरा दृष्टव्य प्रगति को लेकर है. ५० सालों से हम एक विकासशील देश हैं. अब समय आ चुका है कि हमें स्वयं को विकसित देश के रूप में देखना होगा. जी.डी.पी. की दृष्टि से हम विश्व के प्रथम पाँच राष्ट्रों में से हैं. अधिकांश क्षेत्रों में हमारी विकास दर १० % के लगभग है. हमारा गरीबी का स्तर गिरा है. हमारी उपलब्धियाँ विश्व स्तर पर पहचान पा रही हैं. इसके बाद भी हम में आत्म-विश्वास की कमी  है जो हम खुद को एक विकसित, आत्म निर्भर तथा आश्वस्त देश के रूप में नहीं देख पाते. क्या यह उचित है?

मेरा तीसरा द्रष्टव्य है कि भारत को विश्व के सामने खड़ा होना होगा. शक्तिशाली शक्ति का ही सम्मान करते हैं. हमें न सिर्फ़ सैन्य दृष्टि से अपितु आर्थिक दृष्टि से भी सुदृढ़ होना होगा. ये दोनों साथ-साथ चलते हैं.
 

……..

आण्विक ऊर्जा विभाग तथा डी.आर.डी.ओ. की हाल ही में ११ तथा १३ मई को हुए नाभिकीय परीक्षणों में महत्वपूर्ण भागीदारी रही. अपनी टीम के साथ इन परीक्षणों मे भाग लेने तथा विश्व को यह दिखा पाने कि भारत यह कर सकता है एवं अब हम एक विकासशील देश नहीं अपितु विकसित देशों में एक हैं, की खुशी मेरे लिये अतुलनीय है. इससे मुझे भारतीय होने पर बेहद गर्व हुआ. हमने ‘अग्नि’ के पुनरागमन के लिये भी एक अन्य ढाँचा तैयार किया है जिसके लिये हमने एक अत्यंत हलके पदार्थ का विकास किया है. बहुत ही हलका पदार्थ जिसे कार्बन-कार्बन कहते हैं.

एक दिन ‘निज़ाम इन्स्टिट्यूट ऑव़ मेडिकल साइंसज़’ के एक हड्डी रोग विशेषज्ञ मेरी प्रयोगशाला में आये. उन्होंने वह पदार्थ उठाया और पाया कि वह बहुत हल्का था. उसके बाद वह मुझे अपने अस्पताल ले गये, मरीज़ों से मिलवाने के लिये. वहाँ छोटे-छोटे लड़के और लड़कियाँ भारी भारी धात्विक कैलीपर पहने हुए थे. लगभग तीन-तीन किलो वज़न वाले कैलीपर पहन कर ये बच्चे किसी प्रकार अपने पैरों को घसीट रहे थे. डॉक्टर ने मुझसे कहा – ‘मेरे मरीज़ों का कष्ट दूर कर दीजिये’. मात्र तीन हफ़्ते में हमने ३०० ग्राम के वज़न वाले कैलीपर का निर्माण कर लिया. जब हम उन्हें लेकर अस्पताल गये तो बच्चे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पाये. अब वे घिसटने की बजाय आराम से चल सकते थे. उनके माता-पिता के नेत्र हर्षातिरेक से भर आये. इस कार्य से मुझे स्वर्गीय-सुख मिला.

हम अपने देश में अपनी ही क्षमताओं और उपलब्धियों को पहचानने में क्यों हिचकिचाते हैं? हम एक अत्यंत गौरवशाली राष्ट्र हैं. हमारी सफलता की कितनी ही अद्भुत कहानियाँ हैं जिन्हें हम अनदेखा कर देते हैं. क्यों? हम विश्व में गेहूँ के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं. हम चावल के भी दूसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं. दुग्ध-उत्पादन में हम प्रथम स्थान पर हैं. ‘रिमोट सेन्सिंग सैटेलाइट’ के क्षेत्र में भी हम प्रथम हैं.

डॉ. सुदर्शन को देखिये. उन्होंने एक आदिवासी गाँव को स्व-पोषित आत्म-निर्भर इकाई में बदल दिया. ऐसे लाखों उदाहरण हैं किंतु हमारे मीडिया को मुख्यत: बुरी खबरों, असफलताओं तथा आपदाओं की धुन लगी रहती है. एक बार मैं तेल अवीव में था और इज़राइली समाचार पत्र पढ़ रहा था. यह दिन उस दिन के बाद का था जब बहुत से हमले और बमबारी हो के चुकी थी. बहुत से लोग काल का ग्रास बन चुके थे. हमस ने हमला किया था. किंतु समाचार पत्र के पहले पन्ने पर एक ज्यूइश सज्जन का चित्र था जिन्होंने पाँच साल में अपनी बंजर रेगिस्तान ज़मीन को हरे-भरे बाग़ मे बदल दिया. हर इंसान ने उठते ही ऐसी प्रेरणाप्रद तस्वीर देखी. हत्या, बमबारी तथा मृत्यु के भयावह समाचार भीतर के पन्नों में अन्य समाचारों के बीच दफ़्न थे.

भारत में हम सिर्फ़ मृत्यु, बीमारी, आतंकवाद तथा अपराध से संबंधित समाचार ही क्यों पढ़ते हैं? हम क्यों इतने नकारात्मक हैं? एक और प्रश्न- एक राष्ट्र के तौर पर हम विदेशी वस्तुओं से इतना प्रभावित क्यों हैं? हमें विदेशी टी.वी. चाहिये, विदेशी कपड़े चाहिये, विदेशी तकनीक चाहिये. हर आयात की गई वस्तु से इतना लगाव क्यों? क्या हमें इस बात का अहसास है कि आत्म-सम्मान आत्म-निर्भरता के साथ ही आता है. मैं हैदराबाद में एक भाषण दे रहा था जब एक १४ वर्ष की लड़की मेरा ऑटोग्राफ़ लेने आयी. मैनें उससे पूछा उसके जीवन का उद्देश्य क्या है : उसने कहा – ‘मैं विकसित भारत में रहना चाहती हूँ’. मुझे और आपको, उसके लिये, ये विकसित भारत बनाना  ही होगा.”

यह पूरा लेख आप यहाँ  पढ़ सकते हैं. इस लेख यदि हमें कोई प्रेरणा मिली तो उसे हमें हृदय तक सीमित नहीं रखना है, हमें कर्म करना होगा, राष्ट्र-सेवा के मौके ढूँढने होंगे. समय आ गया है कि आज की युवा पीढ़ी परिवर्तन लाने का बीड़ा उठाये. और यह हमारा विश्वास है कि जब हमारे देश कि लाखों-करोड़ों प्रतिभायें हाथ से हाथ मिला आगे बढ़ेंगी तो कोई शक्ति, कोई आपदा हमारे विकास का मार्ग नहीं रोक पायेगी.

इस के साथ आप सब से एक और प्रश्न करना चाहूँगी. एक बात को लेकर दुविधा में हूँ. कई बार अन्तर्जाल पर ऐसा कुछ दिख जाता है जो बहुत प्रेरणाप्रद लगता है. ऐसे में यह सोचती हूँ कि उसे चिट्ठे पर डालूँ य न डालूँ, क्योंकि वह मौलिक नहीं है. वैसे यह निजी सोच हो सकती है पर आप क्या कहते हैं? क्या नवीनता और मौलिकता को वरीयता दूँ या अगर कुछ अच्छा मिले तो सिर्फ़ बाँटने तथा औरों को भी वह दिशा दिखाने के उद्देश्य से यहाँ डालूँ, यह जानते हुए भी कि वह सामग्री और भी कहीं उपलब्ध है. आप अन्तत: क्या ढूँढते हैं किसी चिट्ठे पर?

Published in: on सितम्बर 8, 2006 at 11:41 अपराह्न  Comments (14)  

विश्व कुँवारा मंच द्वारा जारी सम्मन का जवाब

मेरी मुवक्किला ‘निधि देवी’ के पास समय पर कोई वकील उपलब्ध न होने के कारण मैं लाला मल्लूमल speechless-smiley-008.gif अपने आप को उनका वकील घोषित करता हूँ। ये रहे मेरे वक़ालत की शिक्षा के प्रमाण-पत्र…clipart_office_papers_020.gif

मेरी मुवक्किला पर विश्व कुँवारा परिषद के अध्यक्ष speechless-smiley-003.gif ने आरोप लगाया है कि उन्होनें कुँवारों की ‘बेइज़्ज़ती’ ख़राब की।

माई लॉर्ड, मेरी मुवक्किला मासूम है, निर्दोष है। उस पर जो भी आरोप लगाये गये वे निराधार हैं। अब इस किस्से के बारे में क्या कहूँ। हे भगवान! बात का बतंगड़, तिल का ताड़ और राई का पहाड़ सब बना डाला मेरी मुवक्किला की बात का। अब कुँवारा मंच के लोग कहेंगे कैसा तिल? कौन सी राई? क्योंकि ये लोग बात का सिर्फ़ शाब्दिक अर्थ देख पाते हैं। भाव समझने की बूझ विधाता शायद शादी के बाद ही दे इन्हें। ‘इन्सान‘ से लेखिका का मतलब ‘सुघड़ इन्सान‘ से था, पर कौन समझाये। वैसे कहा तो ये भी गया है कि मनुष्य सामाजिक पशु है, तो फिर वादी पक्ष ने इसके लेखक को ढूँढा अब तक कि नहीं? या फिर यह बात सबके लिये कही गयी है इसलिये स्वीकार कर लिया! मजे की बात यह कि ई-छाया जी को छोड़ किसी शादीशुदा पुरुष नें लेखिका का विरोध नहीं किया 🙂 । सबको मज़ा आया पढ़ के। अनूप जी ने तो ‘कैसे कैसे सुधार किये गये’ इसके बारे में लेखिका को अपना व्यक्तिगत अनुभव लिख डालने को भी उकसा डाला। सागर भाई नें कहा है कि ‘हम भी लिखने लगें तो’। जी शौक़ से लिखिये। हमने कब रोका? अपनी मेहनत का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना चाहते हैं, अवश्य करिये। लेखिका नें नहीं कहा कि पत्नियाँ सर्व-गुण-संपन्न होती हैं।

माई लॉर्ड, शादीशुदा पुरुष दफ़्तर से सीधे घर को निकल लेता है, पत्नी और बाल-बच्चों के साथ समय जो बिताना होता है। किंतु कुँवारा मंच के लोग अपने खाली समय को व्यतीत करने के लिये मेरी मुवक्किला जैसे सीधे-सादे लोगों पर ऊल-जुलूल आरोप लगाते रहते हैं। उनसे उलझते रहते हैं…ऊट-पटाँग मुकदमे चलाते हैं। 

लेकिन अब मुद्दे की बात यह है कि मेरी मुवक्किला निधि देवी किसी भी सज़ा को मानने से इनकार करती हैं। हर्जाने के तौर पर प्रस्तावित वैवाहिक विज्ञापनों का स्वागत है। इससे मेरी मुवक्किला को दो फ़ायदे हैं- एक, लड़कियाँ भी चिट्ठा पढ़ने में रुझान दिखायेंगी। हो सकता है कि कुँवारी कन्याओं के माता-पिता, नाते-रिश्तेदार भी चिट्ठे में रुचि लें। टी.आर.पी. बढ़ने की ९९.९९% संभावनाओं के मद्देनज़र यह विकल्प लेखिका के मन को भा गया है। दूसरा फ़ायदा यह कि अगर ऐसे विज्ञापनों के चलते इस कुँवारा परिषद के दो-चार सदस्यों की भी शादी हो जाये तो ‘सुघड़ इन्सानों’ की संख्या में वृद्धि हो जायेगी और लेखिका के क्रांतिकारी विचारों के पीछे लट्ठ ले के घूमने वालों की संख्या में कमी। कुल मिला कर लेखिका की पौ बारह है। अत: ‘शुभस्य शीघ्रम’ की तर्ज पर कुँवारा मंच के सदस्य फटाफट विज्ञापन तैयार करवा लें। 😀

वैसे मैं आखिर में मैं लेखिका की ओर से कहना चाहता हूँ कि नारी जीवन को एक सलीका़ देती है। इस बात के बारे में आप उनसे पूछिये जो शादीशुदा हैं। ऊपर ऊपर कहते होंगे कि जी हम तो फँस गये पर कभी अनुरोध कीजियेगा कि सच सच दिल की बात कहें।

बाकी रहा मैं, जिसकी कहानी सुनाते सुनाते मेरी मुवक्किला इस मुकदमेबाज़ी के पचड़े में पड़ गयी, उसकी आगे की कहानी सुन के आप को खुद अंदाज़ा हो जायेगा की मेरी मुवक्किला कहीं भी दोषी नहीं थी। मेरी मुवक्किला, मेरी कहानी के साथ शीघ्र ही उपस्थित होगी। धन्यवाद।

निर्णय: clipart_office_papers_006.gif ये अदालत निधि देवी को बाइज़्ज़त बरी करती है और कुँवारा मंच के लोगों को आदेश देती है कि एक साल के भीतर-भीतर शादी योग्य सभी सदस्य शादी कर सद्गति को प्राप्त हों, घर-गृहस्थी में दिमाग़ लगावें। cool-smiley-0211.gif aktion033.gif

Published in: on अगस्त 25, 2006 at 9:27 अपराह्न  Comments (6)  

कानपुर मेरी जान…दूसरा व अंतिम भाग!

गतांक से आगे…

मामा जी के दिशा-निर्देशानुसार जस तस रामादेवी चौक पर पहुँचे। उसके बाद लखनऊ की ओर मुड़ लिये। हमने सोचा अब आया टू बाई टू का हाईवे। पर कहाँ – टूटी-फूटी सड़क….उस पर भी डिवाइडर का अभाव। अब तो हम छोटे बच्चों से हुलस गये। हर सौ मीटर पर एक ही प्रश्न- “कब आयेगा हाइवे?”। अमित भी बड़े लोगों और नेताओं की तरह “बस आता ही होगा” कहते रहे। यह प्रश्नोत्तरी चल ही रही थी कि सामने  विपरीत दिशा से मोटरसाइकिलों और उनके पीछे ताँगो का जत्था आता दिखा। शोर मचाते, रूमाल हिलाते वे लोग हमारी दिशा में दौड़े आते थे। हमें लगा हो न हो आगे कोई संकट है …उसी की चेतावनी होगी यह। पर थोड़ी ही दूर पर दूसरी तरफ़ की सड़क पर भी कुछ ताँगे सरपट दौड़ते दिख गये। यीएह…येह..अउर ज्जोर के…। अब समझे …शायद ताँगा दौड़ थी। रजनीकांत की पिक्चरों सरीखी। थोड़ी देर पहले जिस बात पर हम कुड़कुड़ कर रहे थे अब उसी मे मज़ा आया, रोमांच का अनुभव हुआ। खैर वह टू बाई टू रोड कहाँ आई हमें पता नहीं चला । बकौल अमित सीटबेल्ट से बँधे हम सारे रस्ते अपनी खोपड़ी से वृत्त बनाते रहे और उन्हें ये इतना मज़ेदार लगा कि हमें जगाया ही नहीं। हमने तय किया कि लौटते में हम जागते रहेंगे। लखनऊ से निकलते ही करीब २५-३० किलोमीटर का रस्ता वाक़ई बढिया है, वापसी के समय हमने यह निष्कर्ष निकाला।

अगले दिन सोचा था कि नाना के साथ वक्त बिताया जायेगा। पर नाना ने तीन चार जगहों की लिस्ट बना दी थी- “यहाँ यहाँ जा के मिलना ही है”। पस्त हालत और खस्ता हो गयी इस बात पर। सुबह आठ से दोपहर तीन और फिर रात २ से सुबह ६ बजे तक बत्ती गोल रहती है इसलिये देर तक सोना भी संभव नहीं था, उठ कर कपड़े जो इस्तरी करने थे। इसलिये हमने बिना देर किये ‘हिट’ को इत्र की तरह अपने ऊपर छिड़का और पड़ गये। रात को तीन बजे बगल में सोती बहन ने जगाया –
“क्यूँ तुम्हे मच्छर काट रहे हैं?”
“हूँ”
“तो फिर सो कैसे रही हो?”
मुझे लगा मच्छरों के काटने से उसका दिमाग खराब हो गया है। अंधेरे में उसे घूर के भी लाभ ना होता। इसलिये बिना अपना आपा खोये सोना ही उचित समझा। अगले दिन लगभग कानपुर के हर छोर के दौरे के लिये जाना था।

बहुत सी जगह शादी के बाद पहली बार जाना हो रहा था। इसलिये हम टिप-टॉप तैयार हो गये। बीच रास्ते में एक चौक पर ज़बरदस्ती एक ट्रक वाले ने ट्रक ठूँस दिया। नतीजा- जाम, हार्न की चीख पुकार। आधे घन्टे में गाड़ी टस से मस न हुई। ट्रैफ़िक पुलिस सड़क के किनारे सुरती-तँबाखू मीसती रही। हमारा क्रीम-पाउडर, आधे घन्टे की मेहनत, बह चली। कपड़े ऐसे हो गये जैसे नानी के झाड़न वाली संदूक से निकाले हों। हम झल्ला रहे थे, बहन को परिहास सूझ रहा था। अंततः हमने उसे डपटते हुए कहा
“तुम्हारा मुँह बंद नहीं हुआ तुरंत तो किसी ट्रक के आगे फेंक दूँगी अब”
“हाँ इस आगे वाले ट्रक के आगे फेंक दो, ये ना कभी चलेगा न मैं मरूँगी”
उसने जले पर नमक छिड़का। लौटते में नवीन मार्केट होते हुए आना था। सड़क पर एक ही ओर से आती गाडि़यों का हुजूम। बिल्कुल वनवे का बोध होता था। ये बात और थी कि यह वनवे नहीं था। कुछ लोग बीच सड़क पर गाड़ी रोक शॉपिंग पर गयी अपनी बीबियों की राह देख रहे थे, उसी की परिणीति थी बस। खैर जैसे तैसे कानपुर भ्रमण हुआ। रात में मामा के यहाँ आकर थोड़ा सुकून मिला।  मामा ने कहा था बड़े नाना के पुस्तकालय को वह दान देने के सोच रहे हैं सो अगर मुझे कुछ चाहिये तो पहले ही ले लूँ। अंधा क्या चाहे दो आँखे। बस हम टूट पड़े…। तब तक ढेर लगाते रहे जब तक कि मम्मी, बहन और अमित ने आँखो से ये ऐलान न कर दिया कि बस इससे अधिक हम नहीं ढोने वाले। चार लोग अधिक से अधिक जितना उठा सकें उतना इंतज़ाम करके ही हमने दम लिया। अब जो लायी हूँ उसे आपके साथ शीघ्र ही बाँटूगी।

अगला दिन नाना के साथ और उन्हें डॉक्टर को दिखाने इत्यादि में निकल गया। १५ अगस्त का दिन।  सुबह सुबह झंडारोहण भी किया। बीमार होने के बावजूद नाना ने एक नया झंडा लाकर के रखा था। खैर अब वापस आना था। दिल में रह रह के खटका होता था। क्या विडंबना है कि जिस दिन हम स्वतंत्र हुए आज उसी दिन अपने देश में कहीं आते जाते भय लगता है। खैर ‘जाको राखे साइंया मार सके ना कोय’ का जाप करते हुए हम घर से निकल लिये। वापसी की गाड़ी प्लेटफ़ॉर्म ४ से थी। गाड़ी आने के ठीक तीन मिनट पहले घोषणा हुई कि गाड़ी अब ७ नंबर के प्लेटफ़ॉर्म से जायेगी। नाना जी के अनुसार यह तो वहाँ होता ही रहता है, यह कोई नयी घटना नहीं थी। वापसी का सफ़र भी रोचक रहा जिसके बारे में फिर कभी लिखूँगी।

गतांक पर हुई टिप्पणियों का धन्यवाद पर लगा कि लोग डर गये मेरे विवरण से। डराना मेरा उद्देश्य नहीं था। कानपुर के बारे में भी सकारात्मक बातें होंगी अवश्य जिनके बारे में फ़ुरसतिया जी बेहतर बता सकते हैं। 🙂  मैं कानपुर वासियों के बारे में कुछ नहीं कहती क्युँकि उनसे ऐसी कोई बातचीत ही न हुई। बात मैनें हँसी हँसी मे कही पर कानपुर, विशेषत: पनकी से मेरा अत्यधिक भावनात्मक लगाव रहा है, इसलिये नगर में इतनी अव्यवस्था देख के कहीं न कहीं दुख हुआ। शायद नागरिकों से अधिक नगर प्रशासन का दोष है यह। यदि नियम कानून कड़ाई से लागू किये जायें तो उनका पालन भी अवश्य होता है। चलिये यह बात फिर कभी करेंगे…अगली प्रविष्टियों में प्रयास रहेगा कि कुछ साहित्यिक रचनायें आप लोगों के समक्ष रख सकूँ जिनका भंडार मैं बटोर के लौटी हूँ।

Published in: on अगस्त 20, 2006 at 10:58 पूर्वाह्न  Comments (4)  

ये है कानपुर मेरी जान!

बड़े सालों बाद कानपुर दौरे का योग बना। विगत कुछ दिनों से नाना जी का स्वास्थ्य चिंताजनक था। इसलिये आनन-फ़ानन में कार्यक्रम बन गया। शनिवार, रविवार, और मंगलवार की छुट्टी थी। पतिदेव ने सोमवार की छुट्टी ले  ली और हम चल पड़े कानपुर। आगरा से मम्मी और छोटी बहन भी साथ हो लिये।

शनिवार सुबह-सुबह जोधपुर-हावड़ा में अपनी अपनी सीटों पर चारों जन सवार हो गये। कुछ वर्ष पूर्व यह कानपुर जाने वाली बढ़िया ट्रेनों में शुमार थी । अब भी ऐसा ही होगा ऐसा हमें भ्रम था। पर यह क्या…डेढ़ घंटे मे गाड़ी खाली टूँडला तक सरकी। बल्कि सही सही कहूँ तो टूँडला के आउटर पर ही खड़ी हो गयी। ‘अब और नहीं चला जाता रे!’ की सी मुद्रा में। कुछ यात्री ट्रेन से निकल सुबह की सैर पर चल पड़े और लौटते में पास के पेड़ों से दातुन-शातुन का बंदोबस्त भी कर लाये। हमें ट्रेन से उतरना सुहाता नहीं सो खिड़की से ही पास के पोखर में पड़े गुटखे के रैपर गिन डाले। पता है कि यह बड़ा फ़ालतू काम था पर समय नष्ट करने का और कोई साधन था ही नहीं। बाकी के तीन सहयात्री सोने के मह्त्वपूर्ण काम को अंजाम दे रहे थे। खैर, आखिरकार ट्रेन चली, थोड़ी दूर पर फिर रुकी, फिर चली। धूप खिड़की पर पसर गयी थी सो वह बंद करनी पड़ी। ट्रेन की धक्कम-पेल से ऊब कर हमने सहयात्रियों का अनुसरण करने का निश्चय किया। अपनी सीट तानी और लंब-लेट हो गये। और क्या गजब की टाइमिंग–सीधे पनकी से थोड़ा पहले ही आँख खुली। ट्रेन २ घंटा लेट थी। वैसे भारतीय रेल के समयानुसार इस विलंब नहीं माना जा सकता।

कानपुर सेंट्रल पर उतरना बड़ी मशक्कत का कार्य है। लोग आपातकालीन खिड़कियों तक से घुसना शुरू कर देते हैं । शरीर, जूता-चप्पल, सामान और जेब को संभाल कर गाड़ी में से उतरना अपने आप में एक कला है। हम सब कलाकार आखिरकार बाहर पँहुच ही गये। बाहर निकल कर ऑटोरिक्शा किया गया। नानाजी का ड्राइवर हम लोगों को पहचानता नहीं सो मम्मी ने उसे आने से मना कर दिया था। वैसे भी, देखा-भाला शहर…चिंता की कोई बात थी ही नहीं। भैया कानपुर में सबको क्या सम्मान दिया जाता है…दादा रे! हम तो दंग रह गये। क्या रिक्शा, क्या साइकिल और क्या ट्रक। सबको समान अधिकार। कोई बाँई-दाँई लेन का चक्कर नहीं। साइकिल सवार को भी बीच सड़क पर चलने का सर्वाधिकार प्राप्त है। बल्कि जिसे जहाँ जगह मिले या जहाँ मन आये वहाँ चलाओ गाड़ी। सब अपना ही है। फ़िकर कैसी। हमारा ऑटो चालक बड़ी कुशलता से दायें-बायें सर्प के समान चाल से गाड़ी चला रहा था। हमारे होश उड़े हुये थे। जो ग़ुलामी में जीता हो उसे ऐसी आज़ादी की आदत कहाँ। यहाँ तो सीट-बेल्ट, लेन ड्राइविंग, गति सीमा, प्रदूषण नियंत्रण, ट्रैफ़िक सिग़्नल जैसे कम से कम सौ पचड़े हैं। एक हियाँ देखो…। घर पहुँच कर हम सबको एक दूसरे के धुएं से बिगड़े चेहरे पहचानने में ही दो मिनट लग गये।

घर के भीतर पहुँच नाना जी से मिले। देख कर जी पता नहीं कैसा हो गया। हृष्ट-पुष्ट नाना कैसे हड्डी हड्डी हो गये हैं। बुढा़पे ने शरीर से अधिक उनका मन तोड़ दिया है। बस चले तो साथ ले आऊँ उन्हें पर जिस घर को अपने खून-पसीने से सीँचा, अपने हाथों से सँवारा, जिस घर में रहते उन्हें ३० बरस से ऊपर हो गये वह घर ऐसे कहाँ छूटता है उनसे। उनकी इस इच्छा को समझते हैं हम सभी…इसलिये एक कशमकश में घिरे रहते हैं, असहाय और बाध्य। खैर….हमसे मिल कर नाना जी को और उनसे मिल कर हमें बहुत ही अच्छा लगा। फ़ुरसतिया जी से भी बात हुई। शाम को मामा-मामी भी आ रहे थे सो उनके घर जाना संभव ही ना था, अतः हमारा आमंत्रण स्वीकार कर वह सपत्नीक एवं स-छोटेसुपुत्र हमसे मिलने आये। सभी को उनसे मिल कर काफ़ी खु़शी हुई, नाना जी को भी। इतने सारे लोग थे बात करने को इसलिये चर्चा का विषय सामान्य ही रहा।  मम्मी ने बिल्कुल भारतीय माँ के अनुकूल व्यवहार करते हुए हमारे बचपन के दो चार अनकट किस्से सुना डाले जिन्हें अपनी पिछली पोस्टों मे हमने जानबूझ के शामिल नहीं किया था। ब्लॉगिंग और हिन्दी साहित्य पर कोई विशेष चर्चा न हो सकी। उम्मीद करती हूँ कि अगली बार जब भी हम मिलें उनसे दो चार गुरूमंत्र मिल जायें।

अगले दिन लखनऊ जाना था। फ़ुरसतिया जी की एक पोस्ट में पढ़ा था कि २ बाई २ का बढ़िया हाईवे है। अब हाईवे के नाम पर हमने आगरा-दिल्ली के हाईवे का चित्र संजो रखा है। सोचा इसी का भाई-बंधु होगा यह कानपुर-लखनऊ मार्ग।

क्रमश:

Published in: on अगस्त 18, 2006 at 10:23 अपराह्न  Comments (17)  

आरक्षण – divide and rule???

आज 'हिन्दुस्तान टाइम्स' के सम्पादकीय प्रष्ठ पर छपे एक लेख का छोटा सा अंश उध्र्त कर रही हूँ :-

"A hundred and fifty years ago, when the british government tried to give education to Shudras(OBCs) and Atishudras(SCs), there was violent opposition to that move. The british government was forced to withdraw its move to prvide education to the shudras even in elementary schools. Jyoti Rao Phule, after managing to provide education for himself, educated his wife Savitri Bai. When both of them started educating Shudras, Atishudras and women they faced violent opposition from the elite class. The phule family could not cope with the pressure against them and Jyoti Rao and Savitri were forced to leave their home. Jyoti Rao was forced to make his school his abode. Then Dhondi ba, Pune's most notorious criminal was hired to kill the Phule family. Dhondi ba himself was a Kumhar, a shudra from the potter class. Coming face to face with Dhondi Ba, Phule wanted to know why he was killing him. Dhondi Ba was aware that people who hired him were against Phule's mission to educate Shudras, Atishudras and Women. This awareness turned into realization and he fell at Phule's feet to ultimately become his student and a guard of the Phule Couple.

When at last the british government took small steps to extend elementary education to the children of untouchables, there was violence and protests. The Indian Education(Hunter) Commission of 1882 gives instances of such violence in Madras Presidency, the Central Provinces and the Bombay Presidency. The administration was in collusion with theh preparators of this violence as it was manned entirely by people from one of the few communities that had a monopoly over jobs and education. These elements did not want the so-called lower castes to get educated and break the monpoly. The manner in which reservations to OBCs in higher educational institutions of the central government is being opposed proves that even after 150 years, the mindset of Indian elite has not changed. They are not ready to accept any logic or see any reason in reservations. Simply put, they are suffering – whether they know or not – from mindset thaht 'Shudras' are not fit for higher education and that they should not be given opportunity"    

 इसे पढ़ने के बाद समझ नहीं आया कि इस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ. एक पल रोष का अनुभव हुआ पर उसका स्थान शीघ्र ही दया ने ले लिया. दया, लेखक की बुद्धि पर. मैं बता दूँ कि लेखक एक प्रतिष्ठित दल के 'अध्यक्ष' हैं तथा पूर्व केन्द्र मन्त्री भी रह चुके हैं. मैं स्वीकार करती हूँ कि पुराने समय मे निचली जाति तथा जनजातियों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यव्हार होता था. इसी के चलते देश ने एक हिन्सा का दौर देखा जैसा कि लेखक ने कहा. पर मैं माननीय लेखक जी से यह पूछना चाहूँगी कि क्या आज के समाज में उन्हे कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता. आज सभी जातियों को समान अधिकार प्राप्त हैं, चाहे शिक्षा हो या रोज़गार. बल्कि सत्य तो यह् है कि इन समुदायों को बेहतर अधिकार दिये गये हैं. अब चाहे वह शिक्षा शुल्क मे छूट हो, रोज़गार का अवसर हो या फिर कि कोई छात्रव्रत्ति हो. आज अल्प समुदाय के लोग वरिष्ठ पदों पर् हैं, शिक्षित हैं तथा आर्थिक रूप से भी कमज़ोर नहीं हैं. तब यह् आरक्षण क्युं ? य़दि इस आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति होती तब भी समझ आता कि जिन लोगों को शिक्षा के उतने अच्छे अवसर नहीं मिले जितने धनाढ्य वर्ग को मिलते हैं उन्हे प्राथमिकता दी जानी चहिये. मगर हमारे देश के नेता अपना वोट बैंक भरने और अपना उल्लू सीधा करने के लिये आज की युवा पीढी़ को जाति के आधार पर बान्ट रहे हैं, उनमें फूट डाल रहे हैं. योग्यता का तो जैसे कोई मूल्य रहा ही नहीं. जाति हर चीज़ का आधार है. नेता जी ने दुहाई दी कि १५० साल् पहले बडी़ हिन्सा हुई जब पिछ्ड़ी जातियों को ऊपर उठाने के प्रयास हुआ. और आज क्या हो रहा है यह उन्हे दिखाई नही देता. कल बात पिछ्ड़ी जातियों की थी, आज सामान्य वर्ग की है. मुद्दा वहीं का वहीं. पर नेता जी समझें क्युं, पहली बात यहां उनकी अपनी जाति कि चर्चा हो रही है और मुख्य बात यह कि उन्हे वोट वहीं से मिलने हैं. अपना घर भरो भैया देश की काहे सोचो. सब बातें सुन तो ऐसा प्रतीत होता है मानो सामन्य वर्ग के लोग तो विपन्न होते ही नहीं, उन्हे हर तरह् कि सुविधा है, और हर अल्प समुदाय का परिवार सामाज से तिरस्क्रत्, अपनी जिजीविषा के लिये जूझ रहा है.

सुनने मे आया कि मध्य प्रदेश मे एक पिछ्ड़ी जाति के छात्र को 'इंजीनियरिंग' मे दाखिला मिल गया. अब बूझिये कि प्रतियोगी परीक्षा मे कितने अंक मिले थे इस छात्र को — सिर्फ़ १. अब इसके चलते एक योग्य छात्र को दाखिला इसलिये नही. मिला क्युँकि वह् सामन्य वर्ग का छात्र था. और ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं. नेता जी ज़रा बतायें कि भेद भाव किसके साथ किया जा रहा है. अगर ये कहा जाये कि जाति कि जगह योग्यता सूचि को किसी सन्स्थान में दाखिले का अधार माना जाये तो यह एक वर्ग विशेष के साथ अन्याय हो गया?? इससे ये साबित हुआ कि सामान्य या कहें कि 'elite' वर्ग की मानसिकता सन्कीर्ण है ?? नेता जी की बात का अर्थ तो ये निकला कि वर्ग विशेष योग्यता सूचि के आधार पर दाखिला पाने योग्य नहीं है इसलिये एक वैकल्पिक रास्ता होना चहिये. मेरी या फिर आरक्षण का विरोध कर रहे लोगों का किसी जाति विशेष से कोई बैर नहीं है. बहुत से छात्र ऐसे हैं जो इन समुदायों से सम्बन्ध रखते हैं, किन्तु योग्यता सूचि मे अपनी मेहनत व लगन से स्थान पाते हैं. ऐसे छात्रों का स्वागत है. किन्तु सिर्फ़ जाति के आधार पर अयोग्य छात्रों का भी दाखिला क्या उचित है ?? आयोग्य छात्र यदि इस प्रकार मिली 'डिग्री' ले अगर उच्च पदों पर आसीन हो भी जायें तो क्या वह अपने पद के साथ न्याय कर पायेंगे ?? या फिर इन सब बातों से, देश की तरक्की से, नेता जी का लेना देना ही नहीं है. यदि ऐसे में योग्य छात्र कुंठित हो विदेश का रुख करते हैं तो यही नेता जी 'Brain Drain' को देश के तरक्की ना कर पाने का कारण बता देन्गे. क्या जतिवाद के दानव की जकड़ से भारत कभी आज़ाद नहीं होगा? हम कब सीखेंगे अपने अतीत की गलतियों से शिक्षा लेना ? कब समझेंगे कि भारत कि तरक्की एक वर्ग की नहीं, हर समुदाय की तरक्की मे है. मेरा मानना है कि गाँव गाँव स्कूल खुलने से, देश के प्रमुख सन्स्थानों मे सीटों के बढा़ये जाने से, आर्थिक रूप से विपन्न परिवारों (चाहे वह किसी भी जाति के हों) के सदस्यों को नि:शुल्क शिक्षा देने से शायद इस समस्या का एक हद तक निदान सम्भव हो. किन्तु आरक्षण इसका हल न था, न होगा. आज बात OBCs की है, कल मुस्लिम, ईसाई, पार्सी समुदाय या स्त्री वर्ग की होगी. फिर ? कहाँ तक आरक्षण करेंगे नेता जी???

Published in: on मई 22, 2006 at 3:27 अपराह्न  Comments (19)  

‘डा विन्ची कोड’

कल चर्चित पुस्तक 'डा विन्ची कोड' पढी़. यूँ तो इस किताब को आये हुए लगभग ३ साल होने को आये हैं पर चुँकि मुझे उपन्यास पढ़ने का कोई अधिक शौक़ नहीं है इसलिये मैने इसके 'बेस्ट् सेलर' होने के बावजूद इसे पढ़ने की कोई चेष्टा नहीं की थी.  कुछ दिनों पहले जैसे ही 'सोनी पिक्चर्स' की इस उपन्यास पर आधरित तथा रॉन हावर्ड निर्देशित, समान नाम वाली पिक्चर के रिलीज़ होने की घोषणा हुई,  यह् पुस्तक अचानक फिर से चरचा मे आ गयी. और जितनी चर्चा मे यह् आजकल रही उतनी शायद तब भी नहीं रही थी जब इसे प्रकाशित किया गया था. मेरे जिग्यासु मन मे भी उत्सुकता जाग उठी कि  इतना शोर शराबा आखिर है किस बात पर ! अब कौतूहल बड़ी बुरी चीज़ होति है, जब तक शान्त न हो मन उसी कए इर्द गिर्द भटकता रहता है. तो परिणाम ये, की इन्टरनेट से पुस्तक प्राप्त कर के, सारी रात कुर्सी पर बैठे – बैठे  बाँची गयी. गर्दन, कंधे, कमर और आँखों ने 'डैन ब्राउन' को जी भर के कोसा. पर दिमाग को बड़ा सुख मिला. कौतूहल शान्त हुआ.      

   अब कहने को ये उपन्यास 'काल्पनिक' है, किन्तु अधिकान्श् हिस्सा तथ्यों पर् अधारित है. जिन अभ्यासों (Cult and other secret rituals), धार्मिक् सन्स्थानो, दस्तावेज़ों, कला पर आधरित तथ्यों और Architecture का लेखक ने ज़िक्र किया है वह सब वास्तविक है. यानी सिर्फ़ पात्र काल्पनिक हैं. अब प्रश्न यह उठता है कि क्या यह् पुस्तक सच मे एक संप्रदाय के लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती है? मेरे विचार से यह् एक व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है . यह पुस्तक प्रभु यीशु के जीवन को एक दूसरे रूप मे प्रस्तुत करती है. इसके अनुसार प्रभु यीशु ने साधारण  मानवों की तरह् विवाह् किया था तथा उनकी सन्तान भी थी, एक पुत्री. और उसी से उन्का वंश आगे चलता रहा. इसके सबूत 'डा विन्ची' की रहस्यमयी पेन्टिंग्स मे मिलते हैं. लेखक एक अच्छे इतिहासकार हैं और यह उनके लेखन मे साफ़ झलका. पुस्तक पढ़ने के बाद मैने, इन्टरनेट पर खोजा तो पाया की ऐसी किवदन्तियाँ इस पुस्तक के प्रकाशन से बहुत पहले से प्रचलित हैं. यह पुस्तक सिर्फ़ उन्हे प्रकाश मे ले आयी है. पर मुझे समझ ये नहीं आया कि माना कि अगर इस पुस्तक के अनुसार देखा जाये तो बाइबिल का आधार थोडा़ कमज़ोर पड़  जाता है पर यह पुस्तक कहीं भी प्रभु यीशु कि छवि को धूमिल नहीं करती. क्या विवाह करने से और परिवार के होने से उनकी महानता मे कहीं कोई कमी आ जाती है? यदि नहीं तो फिर इतना हो हल्ला क्युं?       

अभी कुछ दिन पहले मैने यह् भी सुना कि विभीषण, श्री राम के भाई हैं. विस्तार ये कि रावण को पता था कि राजा दशरथ कि प्रथम सन्तान उसके विनाश का कारण बनेगी. उसने हल यह निकाला कि कौशल्या और राजा दशरथ क विवाह् हि ना होने दिया जाये. इसलिये उसने राजकुमारी कौशल्या का अपहरण किया और उन्हे धरती मे गाड़ दिया. इधर कौशल्या के गायब हो जाने के बाद उनके पिता ने भारी मन से अपनी दूसरी कन्या सुमित्रा का विवाह राजा से कर दिया. इसी बीच ऋषि वाल्मिकी उस स्थान से गुज़रे जहाँ कौशल्या जी गड़ी हुई थीं. ऋषि को मानव गन्ध आयी और उन्होने शीघ्र ही राजकुमारी को बाहर निकाल लिया. जब कौशल्या मिल गयीं तो उनका विवाह भी राजा दशरथ के साथ् सम्पन्न हुआ. रावण के इरादों पर पानी फिर गया. उसने अब राजा दशरथ की सन्तानोत्पादक शक्ति को निकाल, एक लोटे मे ला अपने घर मे छुपा दिया और घर मे कहा कि इसमे घातक विष है अतः कोई इसे न छुए. एक बार रावण की माता केकसी अपने पति से अत्यधिक रुष्ट हो गयीं और प्राण तजने का विचार बना बैठीं. उन्होने सोचा लाओ ये घातक विष ही पी लूं और उन्होने ऐसा ही किया. और यह विभीषण कि उत्पत्ति का कारण बना. ये बात मुझे बडी़ विचित्र लगी. पहले कभी सुनी भी नहीं थी. पर इस बात ने कहीं भी मेरी धार्मिक भावना को कोई चोट नहीं पहुँचाई. मैने बहुत ढूँढने की कोशिश करी पर इस संबन्ध मे कोई जानकारी नहीं मिली. यह् सब लिखने का पर्याय यह कि हर धर्म को ले कर तरह तरह कि किव्दन्तियाँ प्रचिलित होती हैं. कुछ के वैग्यनिक आधार हैं तो कुछ मनगढ़ंत् प्रतीत होती हैं. जब तक ऐसी कोई किवदन्ती धर्म का अपमान न कर रही हो तब तक इस फ़िज़ूल  के दिखावे भरे हंगामे का क्या अर्थ है???

Published in: on मई 19, 2006 at 3:03 अपराह्न  Comments (11)