पं. बिलवासी मिश्र

[यूँ तो हिन्दी साहित्य में कुल नौ रस माने गये हैं  और प्रत्येक रस का एक विशिष्ट स्थान है। पर मुझसे पूछें तो मेरी दृष्टि मे हास्यरस सर्वोपरि है। जो पढ़े सो हँसे, फिर पढे, मुँह की माँसेपेशियों की कसरत हो, ज्ञान बढे़, ख़ून बढ़े। और क्या चाहिये। अब हास्य-साहित्य मैनें बहुत तो पढ़ा नहीं पर जो पढ़ा उनमें श्री अन्नपूर्णानंद वर्मा विशेष प्रिय हैं। कहने को वे मेरे बड़े नाना होते हैं… नाना जी के छोटे ताऊ जी। पर उनसे मिलने का सौभाग्य विधाता ने मुझे नहीं दिया। २१ सितंबर, १८९५ में जन्मे श्री अन्नपूर्णानंद जी तीन भाइयों में बीच के थे। वर्ष १९६४ में जब उनका निधन हुआ तब वे अपने बड़े भाई सम्पूर्णानंद जी जो कि उस समय राजस्थान के राज्यपाल थे, के साथ जयपुर में रहते थे। जीवन में आये उतार-चढा़व के कारण स्वभाव से अति-गंभीर नाना जी की कलम से हास्यरस का ऐसा वेग फूटता था, ये बात मुझे चकित कर जाती है। उन्होनें बहुत तो नहीं लिखा पर जो भी लिखा, पठनीय है। इसलिये ये श्रंखला शुरू कर रही हूँ जिससे आप तक भी उनकी रचनायें पहुँच पायें। इस बीच उनके जीवन के बारे में जो भी थोड़ा बहुत जानती हूँ वह भी थोड़ा-थोड़ा कर आप तक पहुँचाती रहूँगी।]

 जम्बू नामक द्वीप के भारतवर्ष नामक खण्ड में- अवध के ऊपर और तराई के नीचे-हिंदुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है जिसका नाम है बहराइच। यहाँ गाज़ीमियाँ नाम के एक सिद्ध महापुरुष हो गये हैं जिनके दर्शन-पूजन का बड़ा माहात्म्य माना जाता है। हर साल हज़ारों हिन्दू आ कर यहाँ परमार्थ-चिन्तन का लाभ  उठाते हैं। एक अर्थशास्त्री ने पता लगाया है कि जितना फूल यहाँ गाज़ीमियाँ की दरग़ाह में प्रतिवर्ष हिन्दू स्त्रियाँ चढ़ाती हैं उन्हें बटोर कर यदि शहद निकाला जाय तो इतना शहद तैयार हो सकता है कि हिन्दू महासभा उसे अपने प्रस्तावों में लगाकर सदियों तक आनन्द्पूर्वक चाट सकती है।
  
 यहीं बहराइच में मेरी शादी तय हो रही थी और देन-लेन की चर्चा छिड़ गयी थी। लड़की के पिता के पस अकूत धन था। अभी तक इतना तय हो पाया था कि शादी में मुझे १ बीबी, २ इलाके, ३ मोटर, ४ मकान, ५ घोड़े, ६० हज़ार नक़द और ७० हज़ार के ज़ेवर मिलेंगे।

    यह सब बहुत ठीक था, सिर्फ़ एक बात गड़बड़ थी। किसी मत्स्य-भोजी से पूछिये कि उसके प्रिय खाद्य में काँटों का प्राचुर्य क्यों है। इस संसार मे मिसरी में फाँस वाली बात हर जगह पायी जाती है। मुझे उड़ती हुई खबर लगी कि लड़की रूप-रँग में त्रिजटा की सगी-सगोतिन है।

    मैंने तो समझा था सोने की चिड़िया हाथ लगी पर इस समाचार ने तो मेरी सारी आशाओं पर पानी फेर दिया। इस बात का पूरा विश्वास कर लेने से पहले अब यह ज़रूरी हो गया कि इसकी काफ़ी छानबीन की जाय। अपने किसी ख़ास आदमी को भेज कर इसका अनुसन्धान कराना उचित जान पड़ा। मैनें इस सम्बन्ध में अपने मित्र पं. बिलवासी मिश्र से मदद लेने का निश्चय किया।

    लड़कपन में बिलवासी जी से मेरा धौल-धप्पड़ का रिश्ता रहा और अब वे मेरे ख़ास दोस्तों में से एक हैं। मेरी तरह वे भी अपने घर में पड़े-पड़े सिर्फ़ भोजन और डासन से काम रखते हैं। भेद इतना है कि वे एक लेखक और कवि हैं और मैं एक भला आदमी। उन्होने अपनी लेखनी के बूते पर साहित्य-वन-विहङ्ग और साहित्यानन्द-सन्दोह आदि की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। ये लाखों में एक आदमी हैं। जिस समय इनका पूरा परिचय संसार को प्राप्त हो जायेगा उस समय लोग गली-गली इनकी जय बोला करेंगे। कुछ काम इनके ऐसे हैं जिन्हें अगर इतिहास की अमर सामग्री कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। उदाहरण के लिये ये लालटेन की बत्ती अपने अस्तुरे से काटते हैं। कोबरा पालिश और झाड़ू की सीँक से इन्होने दवात और क़लम का काम लिया है। ठाकुर जी की आरती इन्होनें कई बार मोमबत्ती से की है। पान में सुपारी नहीं रहती तो छुहारे का बीज काट कर डाल लेते हैं।

    मैं दोपहर के समय इनके मकान पर पहुँचा। वे खाना खा चुके थे। और मुँह में पान भर कर बाहर बैठक में लेटे हुए जुगाली कर रहे थे।
    मैनें कहा–‘नमस्कार बिलवासी जी!’
    उन्होनें उत्तर दिया–‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    ‘कुशल समाचार कहिये।’
    ‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    ‘इस समय आप क्या कर रहे हैं? आपसे एक राय करनी है।’
    ‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    मैं झल्ला गया; मैनें कहा–‘आप की जान मे सिवा ऊँ के और भी कोई ऐसा शब्द है जिससे आप मेरा उत्तर दे सकें? आपको जानना चाहिये कि मैं पशुओं की बोली नहीं समझता।’

    वे थोडी़ देर मेरी ओर इस प्रकार देखते रहे जैसे मुझे वे कोई बरसाती कीड़ा समझते हों जो व्यर्थ उनके कानों के पस भनभन कर रहा था। फिर पान घोंट कर उन्होने अपना मुँह खाली किया और बोले–‘लाला-जी! आप किसी भले आदमी से ऐसी आशा क्यों करते हैं कि जब वह भोजन के उपरांत मुँह में पान भर के लेटा हुआ पेट पर हाथ फेर रहा है उस समय वह आपकी बातों का उत्तर सिवाय ऊँ के अन्य किसी प्रकार से देगा।’
   ‘खैर जाने दीजिये। मैनें समझा था कि आप की जीभ ऐंठ गयी है। मैं इस वक्त इसलिये आया कि मुझे आपसे एक ज़रूरी काम है।’
   ‘काम के नाम से मैं घबराता हूँ। कोई राय देनी हो तो लेटे-लेटे दे सकता हूँ।’
   ‘मैं चाहता हूँ कि आप मेरी भावी पत्नी को देख कर उसकी सूरत-शकल के बारे में अपनी राय दें।’
   ‘बुला लाइये उन्हें। वे आप की बीबी होने वाली हैं — इसलिये उनके साथ सहानुभूति भी प्रकट करूँगा और साथ ही अपनी राय भी ज़ाहिर कर दूँगा। कहाँ हैं — क्या बाहर खड़ी हैं?’
   ‘आप भी पूरे अहमक हैं। वह बहराइच में रहती हैं, वहीं जाकर आपको किसी प्रकार उन्हें देख कर आना है।’
 
    पाँचवें दिन मुझे दो पत्र मिले, एक बिलवासी जी का, दूसरा लड़की के पिता का। बिलवासी जी का पत्र मैं ज्यों का त्यों उतारे देता हूँ। उन्होनें लड़की के संबन्ध मे केवल इतना लिखा था जो मेरे ख़याल से बहुत काफ़ी था —
                       तावा-सी तमाल-सी  तमाखू-सी तिलकुट-सी
                                पावस अमावस की   रैन अन्धकार-सी।
                       कागा-सी करइत-सी   काजल-सी कालिका-सी
                               कोइल-सी  कोयला-सी  खासी कोलतार-सी॥
                                                                     – बिलवासी

लड़की के पिता का पत्र पढ़ के मैं दंग रह गया। उसमें लिखा था — ‘आज एक ब्राह्मण देवता कहीं से घूमते-फिरते मेरे यहाँ आ गये थे। वे सामुद्रिक शास्त्र के अद्वितीय विद्वान जान पड़ते थे। उन्होनें अपना नाम बिलवासी मिश्र बताया था। उन्होनें हम सबका हाथ देखा। मेरी लड़की का हाथ देख कर उन्होंने बतलाया कि इसकी शादी जिसके साथ तय हो रही है वह महालम्पट और दुराचारी है और छः महीने के अन्दर उसकी मृत्यु अवश्य हो जायगी, या तो चुल्लूभर पानी में या कालेपानी में। ईश्वर को अनेकों धन्यवाद है कि आप के बारे में ये बातें पहले मालूम हो गयीं। मैं अपनी लड़की को आग में नहीं झोंक सकता। आपके साथ उसके विवाह की जो बात चल रही थी उसे अब भूल जाइये।’

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Published in: on अगस्त 22, 2006 at 7:14 अपराह्न  Comments (7)  

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7 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. 1.हिन्दू महासभा उसे अपने प्रस्तावों में लगाकर सदियों तक आनन्द्पूर्वक चाट सकती है।
    2.भेद इतना है कि वे एक लेखक और कवि हैं और मैं एक भला आदमी।
    वाह,पढ़कर आनन्द उठाया। अब यही गुजारिश है कि और लेख भी पोस्ट किये जायें।
    हम उत्सुकता से इंतजार कर रहे हैं।

  2. नीधी जी,
    मुझे पं. बिलवासी मिश्र जी का पता दिजिये, मुझे उनकी सहायता की अत्यंत आवश्यकता है !
    यह मुढ बालक अत्यंत कष्ट मे है, मेरी सारी समस्याओ का निदान पंडित जी कर सकते है ऐसा मेरा विश्वास है।
    सहायता के लिये आभारी रहुंगा।

    क्वांरा प्रजाती का एक दुर्लभ प्राणी

  3. बढ़िया है।

  4. काश पं.बिलवासी मिश्र मेरे जमाने में भी हुए होते और मेरे मित्र होते 🙂

  5. निधि बहन

    आप अब तक कहाँ थीं? ऐसे नायाब अनुभव पढ़कर आनँद आ गया।

  6. बहुत अच्छा लगा पढ़कर…साहित्यिक खजाना यूँ ही बांटा जाये.

  7. Agar main siddhu hota to aap ke dwara likhi gayi rachna ko muhavaro se bhar deta. shudhh hindi mein likha hua ek achcha lekh padhe hue arsa ho chuka tha. Aap ke is lekh ne mujhe apne bachpan ki pustak Gyan Bharti mein ki kahani ki yaad dila di. Hum aap ke shat shat aabhari rahenge. Isi prakaar likhte rahiyega.

    Dhanyawaad,
    Ankur


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