कानपुर मेरी जान…दूसरा व अंतिम भाग!

गतांक से आगे…

मामा जी के दिशा-निर्देशानुसार जस तस रामादेवी चौक पर पहुँचे। उसके बाद लखनऊ की ओर मुड़ लिये। हमने सोचा अब आया टू बाई टू का हाईवे। पर कहाँ – टूटी-फूटी सड़क….उस पर भी डिवाइडर का अभाव। अब तो हम छोटे बच्चों से हुलस गये। हर सौ मीटर पर एक ही प्रश्न- “कब आयेगा हाइवे?”। अमित भी बड़े लोगों और नेताओं की तरह “बस आता ही होगा” कहते रहे। यह प्रश्नोत्तरी चल ही रही थी कि सामने  विपरीत दिशा से मोटरसाइकिलों और उनके पीछे ताँगो का जत्था आता दिखा। शोर मचाते, रूमाल हिलाते वे लोग हमारी दिशा में दौड़े आते थे। हमें लगा हो न हो आगे कोई संकट है …उसी की चेतावनी होगी यह। पर थोड़ी ही दूर पर दूसरी तरफ़ की सड़क पर भी कुछ ताँगे सरपट दौड़ते दिख गये। यीएह…येह..अउर ज्जोर के…। अब समझे …शायद ताँगा दौड़ थी। रजनीकांत की पिक्चरों सरीखी। थोड़ी देर पहले जिस बात पर हम कुड़कुड़ कर रहे थे अब उसी मे मज़ा आया, रोमांच का अनुभव हुआ। खैर वह टू बाई टू रोड कहाँ आई हमें पता नहीं चला । बकौल अमित सीटबेल्ट से बँधे हम सारे रस्ते अपनी खोपड़ी से वृत्त बनाते रहे और उन्हें ये इतना मज़ेदार लगा कि हमें जगाया ही नहीं। हमने तय किया कि लौटते में हम जागते रहेंगे। लखनऊ से निकलते ही करीब २५-३० किलोमीटर का रस्ता वाक़ई बढिया है, वापसी के समय हमने यह निष्कर्ष निकाला।

अगले दिन सोचा था कि नाना के साथ वक्त बिताया जायेगा। पर नाना ने तीन चार जगहों की लिस्ट बना दी थी- “यहाँ यहाँ जा के मिलना ही है”। पस्त हालत और खस्ता हो गयी इस बात पर। सुबह आठ से दोपहर तीन और फिर रात २ से सुबह ६ बजे तक बत्ती गोल रहती है इसलिये देर तक सोना भी संभव नहीं था, उठ कर कपड़े जो इस्तरी करने थे। इसलिये हमने बिना देर किये ‘हिट’ को इत्र की तरह अपने ऊपर छिड़का और पड़ गये। रात को तीन बजे बगल में सोती बहन ने जगाया –
“क्यूँ तुम्हे मच्छर काट रहे हैं?”
“हूँ”
“तो फिर सो कैसे रही हो?”
मुझे लगा मच्छरों के काटने से उसका दिमाग खराब हो गया है। अंधेरे में उसे घूर के भी लाभ ना होता। इसलिये बिना अपना आपा खोये सोना ही उचित समझा। अगले दिन लगभग कानपुर के हर छोर के दौरे के लिये जाना था।

बहुत सी जगह शादी के बाद पहली बार जाना हो रहा था। इसलिये हम टिप-टॉप तैयार हो गये। बीच रास्ते में एक चौक पर ज़बरदस्ती एक ट्रक वाले ने ट्रक ठूँस दिया। नतीजा- जाम, हार्न की चीख पुकार। आधे घन्टे में गाड़ी टस से मस न हुई। ट्रैफ़िक पुलिस सड़क के किनारे सुरती-तँबाखू मीसती रही। हमारा क्रीम-पाउडर, आधे घन्टे की मेहनत, बह चली। कपड़े ऐसे हो गये जैसे नानी के झाड़न वाली संदूक से निकाले हों। हम झल्ला रहे थे, बहन को परिहास सूझ रहा था। अंततः हमने उसे डपटते हुए कहा
“तुम्हारा मुँह बंद नहीं हुआ तुरंत तो किसी ट्रक के आगे फेंक दूँगी अब”
“हाँ इस आगे वाले ट्रक के आगे फेंक दो, ये ना कभी चलेगा न मैं मरूँगी”
उसने जले पर नमक छिड़का। लौटते में नवीन मार्केट होते हुए आना था। सड़क पर एक ही ओर से आती गाडि़यों का हुजूम। बिल्कुल वनवे का बोध होता था। ये बात और थी कि यह वनवे नहीं था। कुछ लोग बीच सड़क पर गाड़ी रोक शॉपिंग पर गयी अपनी बीबियों की राह देख रहे थे, उसी की परिणीति थी बस। खैर जैसे तैसे कानपुर भ्रमण हुआ। रात में मामा के यहाँ आकर थोड़ा सुकून मिला।  मामा ने कहा था बड़े नाना के पुस्तकालय को वह दान देने के सोच रहे हैं सो अगर मुझे कुछ चाहिये तो पहले ही ले लूँ। अंधा क्या चाहे दो आँखे। बस हम टूट पड़े…। तब तक ढेर लगाते रहे जब तक कि मम्मी, बहन और अमित ने आँखो से ये ऐलान न कर दिया कि बस इससे अधिक हम नहीं ढोने वाले। चार लोग अधिक से अधिक जितना उठा सकें उतना इंतज़ाम करके ही हमने दम लिया। अब जो लायी हूँ उसे आपके साथ शीघ्र ही बाँटूगी।

अगला दिन नाना के साथ और उन्हें डॉक्टर को दिखाने इत्यादि में निकल गया। १५ अगस्त का दिन।  सुबह सुबह झंडारोहण भी किया। बीमार होने के बावजूद नाना ने एक नया झंडा लाकर के रखा था। खैर अब वापस आना था। दिल में रह रह के खटका होता था। क्या विडंबना है कि जिस दिन हम स्वतंत्र हुए आज उसी दिन अपने देश में कहीं आते जाते भय लगता है। खैर ‘जाको राखे साइंया मार सके ना कोय’ का जाप करते हुए हम घर से निकल लिये। वापसी की गाड़ी प्लेटफ़ॉर्म ४ से थी। गाड़ी आने के ठीक तीन मिनट पहले घोषणा हुई कि गाड़ी अब ७ नंबर के प्लेटफ़ॉर्म से जायेगी। नाना जी के अनुसार यह तो वहाँ होता ही रहता है, यह कोई नयी घटना नहीं थी। वापसी का सफ़र भी रोचक रहा जिसके बारे में फिर कभी लिखूँगी।

गतांक पर हुई टिप्पणियों का धन्यवाद पर लगा कि लोग डर गये मेरे विवरण से। डराना मेरा उद्देश्य नहीं था। कानपुर के बारे में भी सकारात्मक बातें होंगी अवश्य जिनके बारे में फ़ुरसतिया जी बेहतर बता सकते हैं। 🙂  मैं कानपुर वासियों के बारे में कुछ नहीं कहती क्युँकि उनसे ऐसी कोई बातचीत ही न हुई। बात मैनें हँसी हँसी मे कही पर कानपुर, विशेषत: पनकी से मेरा अत्यधिक भावनात्मक लगाव रहा है, इसलिये नगर में इतनी अव्यवस्था देख के कहीं न कहीं दुख हुआ। शायद नागरिकों से अधिक नगर प्रशासन का दोष है यह। यदि नियम कानून कड़ाई से लागू किये जायें तो उनका पालन भी अवश्य होता है। चलिये यह बात फिर कभी करेंगे…अगली प्रविष्टियों में प्रयास रहेगा कि कुछ साहित्यिक रचनायें आप लोगों के समक्ष रख सकूँ जिनका भंडार मैं बटोर के लौटी हूँ।

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Published in: on अगस्त 20, 2006 at 10:58 पूर्वाह्न  Comments (4)  

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4 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. bhadiya ! Intazaar rahega rachnaon ka.

  2. लखनऊ यात्रा कहाँ गई? वापसी यात्रा विवरण का इंतजार है।

  3. Aap ne Kanpur ka jo vivaran kiya hai, usme hasya kam dard jyada bhara hai. par kuch khatte-meethe pal jo aapne kanpur mein bitaye unka vivaran sarahniya hai. hum asha to yahi karte hai ke kanpur ka uddhar ho, waise hum to ye bhi asha karte hai ke banaras ka bhi uddhar ho. par bhagwaan jaane kya hoga aage. chaliye aap ki aisi hi rochak rachnayo ka hum hamesha swagat karte rahenge.

    Dhanyawaad hum jaise hindi bhool chuke rahiyo ko wapas hindi ka paath padhane ke liye…

  4. जब छोटे थे और (इटावा/कानपुर देहात/अब शायद औरैया के एक गांव) कंचौसी में रहते थे तो कभी-कभी कानपुर जाना होता था । अब तो बस वहां से गुज़रना होता है । गये हुए कम से कम दो दशक बीत चुके हैं । जान कर अच्छा लगा कि वहां अभी तक सब कुछ वैसा ही है। इसलिए जाने पर ‘कल्चरल शॉक’से बचा रहूंगा । वही पुराना परिचित अराजक माहौल मिलेगा । बदल जाए तो कानपुर क्या ।

    पुरानी पुस्तकों के नाम से कान खड़े हो गए हैं । बड़ी भाग्यशाली हैं आप । उन पुस्तकों के बारे में जब लिखियेगा तब लिखिएगा । कम से कम एक सूची तो शीघ्र उपलब्ध करवा ही दीजिये ।


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