हम बोले…बम बम भोले!

पिछले कुछ दिन से सोच रहे हैं कि लिखें पर लिख ही नही पाये ।  जिसके घर का चूल्हा तीन दिन से न जला हो वो लिखे भी तो कैसे !  तो हम बस दाल- रोटी की याद में किनारे पड़े रहे । सारी मनोकामनाओं को दरकिनार कर प्रभु से रोज़ यही कहा  कि  खीरा, टमाटर और ब्रैड कब तक खाँऊ !! च्यास इतनी लगी है कि क्या कहूँ । बाहर का खाना खा खा के पेट कल्ला रहा है । अब तो दया करो नाथ! आज तो गैस का सिलेंडर भेज ही दो दीनदयाल । प्रभु ने भी आज जा के सुध ली ।  गैस वाला आ गया । बोला २९३ रुपये हुए । हमने खुशी-खुशी ५०० का पत्ता थमाया । कहा ३ रुपये खुले देते हैं । पर ई का ! उसने ३ सौ सौ के नोट थमा दिये । “आप ९३ रुपये खुले दे दो” । अब हम इतने खुले पैसे कहाँ से लायें । पिछली बार भी ऐसा हुआ था । बंदे के पास खुले नही थे । अन्ततः हमने ६ रुपये अधिक दे के गैस ली थी । हमें लगा हो ना हो हमें मूर्ख बनाया जा रहा है । हमने कहा भाई देखो शायद हो एक १० का नोट । इतने खुले पैसे तो हैं नहीं मेरे पास । पर नहीं …रूखा सा जवाब मिला…सब खुले खतम । अब या तो हम खुले ढूँढे या फिर ७ रुपये अधिक दें । हमने भी सोचा ..बेटा लाओ आज तुम्हें ही ठीक करें  । अन्दर जा के अपना रेज़गारी का डब्बा निकाला ।  ५ के छः सिक्के, २-२  के इक्कीस, १ का एक और बीस का नोट निकाल हाथ में धर दिया । भैया जी की सूरत देखने लायक थी । “हमारे पास तो यही हैं, बड़ा ढूँढ कर निकाले” कहकर हमने विजयी मुस्कान के साथ धम्म से दरवाज़ा बंद कर लिया । मन में सोचा “हाँ नहीं तो, सबको उल्लू समझते हैं । मै क्यूँ दूँ चवन्नी भी ज़्यादा” । फिर गिलास भर कर चाय बनायी….जिससे कि पिछले दिनों चाय न मिलने से हुई से हुयी विटामिनों की कमी की पूर्ति हो जाये । अब लिखास दूर करने के लिये लिखने बैठे हैं ।

इस सप्ताहांत हम झाँसी के दौरे पर थे । झाँसी मतलब ससुराल । कुछ ज़रूरी काम था और नाग पंचमी का उत्सव भी । हमारे ससुराल मे इस दिन बड़ी ज़ोर शोर से पूजा होती है । असल में पापा ने एक मंदिर बनवा रखा है घर के बाहर । और समय के साथ इसकी मान्यता भी बढ़ती जा रही है । इसलिये लगभग हर तीज-त्यौहार पर मेले का सा नज़ारा हो जाता है ।  शादी को तीन साल हो गये पर कभी किसी ऐसे मौके पर जाना ही नहीं हो पाता था । इस बार मौका लग गया । शनिवार का सारा दिन अमित के काम में निकल गया । रात को थक कर कूलर के ऐन सामने जो धराशायी हुए तो सुबह जल के छीटों से ही आँख खुली । मम्मी पूजा करके सुबह सुबह घर भर में पूजा का जल छिड़कती हैं । हाय राम आठ बज गये – हम धक्क रह गये । पर मम्मी ने सर पर हाथ फेर कर कहा “रात में बहुत थक गयी थी इसलिये नहीं जगाया । चाय पी लो और १० बजे तक तैयार हो जाना” । जान में जान आयी । तब तक पापा की आवाज़ आयी “मोटी॓ऽऽऽऽ…जग गयी क्या” । “पाऽऽऽऽपा..हो जाऊँगी फिर से पतली…मैने एक्सर्साइज़ भी शुरू कर दी है” मैने मुँह लटका के पापा को समझाना शुरू किया । “अरे बेटी…हम तो ऐसे ही चिढ़ा रहे थे । ऐसी ही रहो । पतली हुई तो बाज़ूबंद ज़ब्त” पापा ने लाड़ से कहा । मेरे देवर की सगाई पर होने वाली देवरानी बाजूबंद पहनी थी…असली कि नकली पता नहीं । पर पापा को धुन लग गयी कि बड़ी बिटिया (बहू) के पास भी होना चहिये एक । अगले ही दिन एक सोने का बाजूबंद आ गया । अब जब पतले होने की बात करो उसी के ज़ब्त होने की धमकी देते हैं हमारे श्वसुर । अब उन्हें क्या कहूँ कि बाज़ूबंद कलाईबंद हुआ जा रहा है ।

बाहर सुबह ५ बजे से ‘ऊँ नमः शिवाय’ की धुन बैठ गयी थी । ढोल मँजीरों के साथ ‘ऊँ नमः शिवाय’ का जाप बड़ा मधुर सुनाई देता था । मंदिर सज गया था । इस बार शिव जी का अभिषेक मुझे और अमित को करना था । हम दोनों ही नहा धो के मंदिर पहुँच गये । मंदिर में इतनी चहल पहल तो मैनें पहली बार देखी । मंदिर के परिसर में रहने वाले खरगोश, कबूतर, बत्तखें, मछलियाँ और एक बँदरिया सभी मानो उत्सव मना रहे थे । पेड़ॊं पर झूले पड़े थे जिसके आस पास बच्चों का हुजूम था । रंग बिरंगी कंपट बेचने वाली, आइसक्रीम वाला और गुब्बारे वाला मंदिर के बाहर डेरा डाले थे ।  हम मंत्र मुग्ध से भक्तिमय वातावरण मे खोये ही हुए थे कि मंदिर में एक भयंकर आदमी के अभिवादन से हमारी तंद्रा टूटी । चक्क काला रंग, चेहरे पर बहुत से धब्बे, ऊँचा कद और लाल आँखे । हमने सोचा – ये कौन ? “बहू जी आपको साहब बुला रहे हैं “, व्यक्ति ने कहा । पापा बुला रहे थे । अमित भी पीछे पीछे आये । “पापा इसे भी दिखाइये ना… ” अमित ने पापा से कहा । अब तक कुछ भी हमारी समझ नहीं आया था । “लाओ लाखन, बहू को नाग देवता के दर्शन करा दो” पापा ने उस आदमी से कहा । “ओह ! तो ये एक सपेरे हैं । और अमित ने शायद कल ही देख लिया नाग ” मैने सोचा । घर में पापा को सर्प वगैरह के काटे का इलाज आता है और उस इलाके में अक्सर साँप निकलते ही रहते हैं । मंदिर मे भी साँप होते हैं कभी कभी । इसलिये वहाँ नाग-अजगर मानो बड़ी बात है नहीं । इन्हें और भाई-बहनों को इसी वजह से डर भी नहीं लगता । कहो तो गले में डाल लें । पर भैया हमने तो नाग का ‘न’ भी नहीं देखा कभी । तो दर्शन के नाम से ही झुरझुरी हो आयी । पिटारा खुला । एक नाग और एक छोटी सी नागिन (जैसा कि सपेरे ने बताया ) ।

 snakes.jpg                         

नागिन जितनी शांत , नाग उतना ही आक्रामक । उसकी साँस की आवाज़ और फ़ुँकार से मेरी तो कँपकँपी छूट रही थी । इतने में एक अजगर भी सपेरे ने निकाला और ज़मीन पर छोड़ दिया ।

 ajagar.jpg

अब कँपकँपी घिग्घी में बदल गयी थी । अमित और पापा लगे समझाने – बेटा कुछ नहीं कहेगा वो तुम्हें । खैर उसने कहा भी नहीं । नहीं तो हम चाय ना सुड़क रहे होते । वह सर्र गया मंदिर के चबूतरे पर और जहाँ जगह मिली वहीं एक शाखा से गाँठ लगा के बैठ गया । हमने चट्ट-चट्ट दो चार फोटो खीँच लिये । फिर कैमेरा अमित को थमा पूजा की तैयारी करने निकल पड़े । मम्मी ने कहा था १०८ बेलपत्र पर सीता-राम लिखना है । सो जुट गये काम में । पीले चंदन से हरे पत्तों पे लिखा सीता-राम कितना सुंदर दीख पड़ता था । संयोगवश मैनें भी पीली-हरी साड़ी पहनी थी ( जिसके बारे में अमित कहते हैं कि उसे पहन कर मैं ब्राज़ील का झंडा लगती हूँ ) । अमित की दीदी ने आ कर खिंचाई की – यार निधि, तुम तो पत्तों की एकदम मैचिंग लग रही हो  । पहली बार पता लगा कि जितना सरल सोचा था उतना आसान नहीं था यह काम । घंटा लग गया लिखने में ।

अब तक जनता आ कर नाग पूजन आरंभ कर चुकी थी । वही नाग इतना शांत बैठा था कि क्या कहूँ । अब पापा ने हम दोनों को बुलाया पूजन के लिये । कहा – टीका लगाओ । हाय राम…नमस्कार से काम नहीं चलेगा क्या !! इतने लोगों के सामने रिरियाऊँ भी तो कैसे !! कुल मिला के हमारी नज़रों मे अपनी स्थिति दयनीय थी :(। पापा ने नाग देव को हाथों से पकड़ रखा था । अमित ने टीका लगाया । हमने भी राम-राम करते हुये टीका लगा दिया । देव हिले भी नहीं । जाने उनका क्रोध कहाँ चला गया था । हाथ जोड़ प्रार्थना की । अब नागिन की पूजा की बारी । वह तो सर्र-पर्र भाग रही थी । जैसे जैसे वह हिले वैसे वैसे हम । कुल मिला कर दोनो नगीना टाइप युगल नृत्य कर रहे थे । अन्तत: पापा ने उसे भी पकड़ा तो हमने पूजा की । इसके बाद भोले बाबा के अभिषेक की बारी । जल, दुग्ध, घृत, शहद, दही, शक्कर व पंचामृत से बाबा को स्नान कराया । उसके बाद ‘ऊँ नमः शिवाय’ के जाप के साथ पीतल के बने गो-मुख से जलाभिषेक और फिर मंत्रोच्चार के साथ बेलपत्र अर्पित किये । भोग लगा, हवन हुआ व फिर आरती । उसके बाद भंडारा था । धीरे धीरे शाम भी हो चली थी । साँध्यकालीन आरती बहुत ही मोहक रही । ढोलक, हारमोनियम, मँजीरे, घंटे और शंखनाद के स्वरों के साथ भक्तो के एक विशाल समूह ने जब गाना प्रारंभ किया तो मन हुआ कि यह कभी खत्म ही ना हो । क्या बच्चे, क्या बूढे़, सभी आँख मूँदे प्रार्थना में लीन । पंडित जी कब आरती का थाल ले सामने आ खड़े हुए, मुझे भान ही नहीं हुआ । फिर पापा ने सर्प विसर्जन किया । सर्प विसर्जन यानि सभी सर्पों को मुक्त करना । उसके बाद हम लोगों (दीदी (ननद), उनके बच्चे इत्यादि)  ने झूले हथियाये ।  बड़े दिनों के

 बाद झूला झूला । आत्मा प्रसन्न हो गयी । थोड़ी देर में सासु माँ भी काम निपटा आ गयीं थीं । मुझे देख कर बोलीं “अरे तुम तो बिल्कुल भी ऊँचा नहीं झूल पा रही, लाओ हम झुलायें” । ” हाँ निधि, मम्मी बहुत बढिया झुलाती हैं ” दीदी (ननद) बोलीं । हम थोड़ा हिचकिचाये, सासु माँ हमें झूला झुलायें….ठीक होगा क्या । पर मम्मी ने एक ना सुनी । दीदी और मम्मी ने खूब झुलाया ।

 

बड़ा मज़ा आया । जहाँ तन हल्की बारिश की नन्हीं बूँदो से भीग रहा था वहीं मन स्नेह से । फिर हम सबने पोज़ बना बना फोटो भी खिँचा डाले झूलों पर । इस बार घर के पेड़ से नीँबू, करौंदे भी तोड़े । पिछली बार जामुन और उससे पहले अमिया तोड़ने का आनंद लिया था । सच्ची, अपने हाथ से फ़ल तोड़ कर खाने में बड़ा सुख मिलता है । खैर, रात को ट्रेन थी वापसी की । सामान बटोरा और सारी चहल-पहल छोड़ वापस हो लिये । यहाँ यूँ तो हर तरह के संसाधन उपलब्ध हैं – ऊँची इमारतें, विशाल शॉपिंग मॉल्स, चौड़ी सड़कें, बड़ी गाड़ियाँ । नहीं है तो छोटे शहरों सी आत्मीयता, नहीं है हर छोटे-बड़े उत्सव पर मिल जुल कर संस्कृति को जीवंत करने की क्षमता । कब त्योहार आये और कब चले गये पता ही नहीं चलता । न सावन के झूले हैं, न फागुन के गीत, न पतंग, न लकड़ी और मिट्टी के रंग बिरंगे खिलौने, न मेला, न खेत ना आँगन । सोचती हूँ असली भारत इन बड़े शहरों में बसता ही कहाँ  है । लगता है मानो जीवन की आपाधापी में हम जीवन के आनंद और अर्थ को ही छोड़ आये…कहीं दूर, बहुत पीछे …अपने छोटे शहरों और गावों मे ।

Advertisements
Published in: on अगस्त 2, 2006 at 4:20 अपराह्न  Comments (7)  

The URI to TrackBack this entry is: https://abhivyakta.wordpress.com/2006/08/02/%e0%a4%b9%e0%a4%ae-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%ac%e0%a4%ae-%e0%a4%ac%e0%a4%ae-%e0%a4%ad%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%87/trackback/

RSS feed for comments on this post.

7 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. निधि जी
    लेखन निखरता जा रहा है, वैसे मैं कामना करता हुँ कि हर लड़की तो आपके जैसे सास, ससुर ननंद और पति मिले। इतने अच्छे लोग अब भी है, यह आपसे ही जाना।
    गैस वाली बाट हमारे साथ भी लागू हुई है पिछले चार दिनों से अंट शंत और कभी रिश्तेदारों के यहाँ खाना पड़ रहा है।
    गाँव की याद दिला दी निधि, वो सावन के झुल हम भी छोटे थे तब बहुत झुले थे।

  2. ब्राजील का झंडा और सरल आवर्तगति का प्रमाण देते झूले की चट-पट खींची फोटो भी दिखे तब कुछ और मजा आये।

  3. हांजी, बीना तस्वीरो के कैसे मान ले की नागपूजा साक्षात रूप से हुयी थी ?
    मेरे घर मे नाग देवता की तस्वीर की ही पूजा होती है 🙂

  4. निधीबेन, एकाध फोटु रख देती नाग देवता की तो धर्म ध्यान कर लेते. 🙂

    यहाँ साँप वाँप मदारी दिखते नहीं.

    वैसे आपने सही कहा, हमारे महानगरों की संस्कृति अब पाश्चात्य धरातल पर जा रही है और कहीं ना कहीं कुछ छूट गया लगता है. वो परम्पराएँ, रिवाज सब गाँवो और छोटे शहरों में सिमट रहे हैं.

    क्या करें वो भी एक जीवन है, यह भी. बस लगे रहो!!

  5. सभी का टिप्पणियों के लिये धन्यवाद । जनता की माँग पर चित्र और एक छोटा वीडियो पोस्ट कर दिया है 🙂

  6. निधि जी,
    विडियो का लिंक कहाँ है?

  7. निधि जीः बहुत दिनों बाद लिखा बहुत अच्छा लिखा – शेर करने के लिए धन्यवाद


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: