आशिक़ आवारा….

कुछ दिनों पहले फुरसतिया जी ने अपने चिट्ठे पर लखनऊ मार्ग पर घटी एक घटना का विवरण प्रस्तुत किया था । एक नारी ने अपनी सैंडल से एक हमदर्द की बड़ी उड़ैया करी । हमें पढ़ के असीम आनंद का अनुभव हुआ । घटना के पीछे का सही कारण ना फुरसतिया जी को पता था न हमें है । परंतु अनुमान लगाया जा सकता है । सामान्यत: कोई भी नारी बिना वजह अपना वक्त और सैंडल ज़ाया नहीं करती । हो न हो पीड़ित महोदय के सर पर आशिक़ी का भूत सवार हुआ होगा । वैसे तो ९५% पुरुषों का यह उद्देश्य होता है कि जीवन में कभी न कभी, एक न एक बाला तो प्रेमिका के रूप में मिले ही । बाकी के ५% खालीपीली के आशीष जी जैसे होते हैं, सन्यासी प्रवृत्ति के । परंतु ९५% में ही पुरुषों का एक विशिष्ट वर्ग ऐसा भी है जिसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य ही है कन्याओं के आगे पीछे घूमना । तू नहीं और सही, और नहीं और सही…यही इनके जीवन का मूलमंत्र है । जीवन के किसी दौर में अगर कम से कम एक गर्लफ़्रेंड न हो तो ज़िंदगी व्यर्थ प्रतीत होती है ।अब इस बात पर एक कथा याद आती है । कहानी में एक छोटी सी नायिका है और एक है साइड हीरो । बाकी और भी पात्र हैं अहम भूमिकाओं में, पर उनका परिचय कथा के साथ ही दे देंगे ।

बात उन दिनों की है जब नायिका इंटर में थी । नायिका गुर्दे की पथरी की समस्या से पीड़ित । उसके पैतृक घर से स्कूल करीब ४-५ किलोमीटर दूर था । अक्सर दर्द के कारण बेचारी स्कूल से रोती कलपती घर पहुँचती । अब इतनी दूर दर्द में साइकिल चलाना ठीक नहीं था । अतः कोई और हल ना सूझने पर उसके मम्मी-पापा ने स्कूल के पास ही एक किराये के मकान में रहने का निर्णय ले लिया । यह घर खुली और अच्छी जगह पर था । रहने वाले लोग भी अच्छे और पढ़े लिखे थे । नायिका की थी एक छोटी बहन । यहाँ बहन को तो कई हमउम्र दोस्त मिल गये पर नायिका के साथ का कोई भी न था । वैसे भी १४-१५ वर्ष की आयु ऐसी होती है जिसमें ना आप बच्चों में घुल-मिल सकते हैं न बड़ों में । शाम को बहन अपने नये दोस्तों के साथ खेल में लग जाती और हमारी नायिका जी मसोस के भौतिकी की ‘कुमार-मित्तल’ में सर दिये बैठे रहती । ऐसे में एंट्री हुई हमारे साइड हीरो की । हीरो यानि पड़ोसन का भतीजा, पड़ोसन के भाई के साथ समीप के ही दूसरे मुहल्ले में रहता था । उम्र नायिका से २ साल अधिक, शिक्षा के मामले में एक कक्षा पीछे । ग्यारहँवी कक्षा उत्तीर्ण करने के लिये बेचारा दो साल से अथक परिश्रम कर रहा था । आते ही हमारे हीरो ने छोटे बच्चों पर धाक जमा ली । सारे बच्चे भैया-भैया करते आगे पीछे घूमने लगे । शाम को भैया आते, बच्चों की मंडली जुटती, तरह तरह के खेल होते । नायिका बेचारी को कोई पूछता ही नहीं । एक दिन साइड हीरो ने नायिका की छोटी बहन से कहा – “जाओ दीदी को भी बुला लो, बेचारी पढ़ती रहती है, साथ में खेलते हैं ” । बहन आई फुदकते हुए – “दीदी तुम भी चलो” । नायिका ने माँ को देखा । हमारे समाज की अच्छी नायिकाएं खेलने भी माँ से पूछ के जाती हैं । माँ ने भी तरस खा के कहा “जाओ” । नायिका खुश – बहुत बोर हो लिये, हम भी खेलेंगे अब ।

जल्दी ही मुहल्ले की एकाध साल बड़ी दीदी भी आ मिलीं । मजे आ गये । शाम को सब मिल के खूब धूम मचाते । इस बीच आया दशहरा । दशहरे पर चंदा माँग बड़ा सा रावण बनाने का सोचा गया । बाल मंडली जुट गयी काम में । देर रात तक प्रोजेक्ट रावण पर काम चलता । इन सब के बीच दशहरा धूम धाम से मना । यह पर्व पूरी बाल-मंडली की मित्रता को प्रगाढ़ कर गया । अब कभी कभी दीदी, नायिका और हीरो अलग बैठ बतियाते और खेल सिर्फ़ देखते । एक दूसरे की पसंद-नापसंद, रुचियाँ जानते जैसे कि सभी दोस्तों में होता है । दीदी चित्रकारी में अच्छी थीं, नायिका लिखती, चित्र भी बनाती । हीरो ने कहा हम भी लिखते हैं । सबने कहा – पढ़ाओ । अगले दिन कॉपी हाज़िर । दीदी ने पढ़ा –

आम तो खाते हो अमरूद भी खाया करो,
जयपुर में रहते हो, दिल्ली भी आया करो ।

ऐसे बहुत से नमूने । कुछ चोरी के कुछ बेहूदा । मैं सेंसर की कैंची चलाये दे रही हूँ यहाँ । खैर, नायिका और दीदी ने मिल कर अकेले में हॉ-हॉ करी । बात आयी-गयी हो गयी । एक दिन दीदी शाम की सभा से नदारद थीं । हीरो ग़मगीन थे। नायिका ने ना चाहते हुए भी मित्र होने के नाते पूछ लिया कि भाई क्या हुआ …हीरो की दर्द भरी दास्तान सुनिये –
“मैं एक लड़की को बहुत चाहता था । एकदम परवीन बॉबी लगती थी वो”
“अच्छा !”
“आज उसकी बड़ी याद आ रही है”
“क्यूँ क्या हो गया उसे”
“बस मत पूछिये । मैं जो नवदुर्गा के व्रत रखता हूँ ना, उसी ने कहा था”
“अच्छा !”
“मुझे उससे मिले एक महीना ही हुआ था, घर के पास ही रहती थी वो । एक बार मंदिर में मिली तो पूछा तुम नौदुर्गे के नौ दिन व्रत नहीं रखते । तो मैने कहा कि नहीं । बोली- रखा करो”
“हूँ..”
“मैने कहा रखूँगा अगर तुम रोज़ शाम पहला निवाला अपने हाथ से खिलाओ । तो वो बोली – वादा”
नायिका को अंदर तक गिजगिजाहट हो आयी । ग्यारहँवी पास करने के लाले हैं और फ़िल्मी हीरो बनने चले हैं , उसने मन ही मन सोचा ।
“फिर एक दिन मैं उसके लिये सोने की चेन लाया । मैने कहा दूँगा नहीं पहनाऊँगा । मैं चेन पहना ही रहा था कि उसके पापा ने देख लिया और फिर उसे दूसरे शहर भेज दिया ।….बस…”
नायिका को समझ नहीं आया कि क्या प्रतिक्रिया दे ।
“खैर,…मैं भी क्या बातें बता रहा हूँ । आप परेशान मत होइये । आप हँसती हैं तो बहुत अच्छी लगती हैं ।
नायिका बेचारी कुढ़ गयी । अगले दिन नायिका और दीदी ने निर्णय लिया कि भई बंदे के लक्षण ठीक नहीं, थोड़ा दूर रहना ही ठीक है । पर मौसम की तरह कुछ लोग भी चिपचिपे होते हैं । एक दिन दीदी ने नायिका को बुलाया ।
“तुमने अपनी कार पर अपना नाम लिखा धूल में ”
“हाँ शायद , मेरी आदत है” नायिका बोली ।
“हूँ….उसके आगे दिल और तीर का निशान बना था और आगे हीरो का नाम लिखा था ”
नयिका सन्न ।
“मैने मिटा दिया । वो तो छुटकी ने देखा था और मुझे बताया । अगर किसी बड़े को पता चलता तो गड़बड़ हो जाती । आगे से ध्यान रखना ”
“दीदी किसने किया होगा ?”
“और कौन! वैसे कह नहीं सकते”
अब तो नायिका बिल्कुल कट ली हीरो मियाँ से । अक्ल आ गयी के बेटा ‘कुमार-मित्तल’ ही भले हैं, उन्हीं मे मगज लगाओ । हीरो ने बड़ी कोशिश की बात करे, पूछा क्या हो गया । नायिका ने बात टालने में ही भलाई समझी । हीरो ने पैँतरा दिखाया…”आप नहीं बतायेंगी तो मैं अपन हाथ बबूल के पेड़ में मार लूँगा” । नायिका को भी चिढ़ हो आयी…”अच्छी ज़बर्दस्ती है ” । जाओ मार लो, हाथ क्या सर मार लो जा के, जी में सोचा । लड़के ने मुक्का मार दिया बबूल के तने में । पर हमारी नायिका कोई दूसरी परवीन बॉबी तो थी नहीं जो असर होता ।
अब आयी दीवाली । हीरो ने नायिका के घर के आगे उसी बबूल के पेड़ के नीचे पटाखे की दुकान लगा ली जहाँ पटखे बिकने की उम्मीद ना के बराबर थी । पर उससे क्या । सारा दिन वहाँ डटे रहने का इससे बढ़िया तरीका और क्या था । पटाखा एक ना बिका । दिवाली के दिन सब पटाखे नायिका को उपहार स्वरूप दे दिये । हमारी नायिका ने टका सा जवाब टिकाया – मैं पटाखे नहीं चलाती । आप डरती हैं ? हाँ – पिण्ड छुड़ाने की गरज़ से नायिका ने कहा । “ये लीजिये, यह बम मैं अपने महुँ से पकड़ता हूँ…आप आग लगाइये” । “ये क्या ड्रामा है अब? मुझे पटाखे चलाना पसंद नहीं है बस “। “अब एक फुलझड़ी तो चलाइये कम से कम” । सब के सामने तमाशा खड़ा करने से अच्छा है कि एक फुलझड़ी चलाओ और फूट लो ..नायिका ने सोचा ।
खैर…इसके कुछ ही दिन बाद पड़ोसन के भाई के घर में रामायण हुई । नायिका की माँ ने कहा कि उन्हे काम है तो नयिका जा के प्रसाद ले आये । नायिका ने बड़ा टाला पर बात नहीं बनी । जी मसोस के जाना पड़ा वहाँ । सब मगन हो रामायण गा रहे थे । हीरो ने धीरे से दो कार्ड नायिका की ओर बढा़ये । इलू-इलू-दिल-कबूतर वाले । नायिका के क्रोध की सीमा न थी । पर जैसे कि मैने पहले ही कहा था कि नायिका शौर्यवान तो थी नहीं सो इतना ही कह पायी कि मुझे भद्दे मज़ाक पसंद नहीं ।
यह मज़ाक नहीं, मुझे जवाब चहिये , हीरो ने फ़रमाया ।
तो ठीक है, ‘नहीं’ मेरा जवाब है ।
जवाब का कारण ?
पीं-पीं ….नायिका के पिता जी दरवाज़े पे स्कूटर लिये उसे लेने आ गये थे । नायिका की जान में जान आयी ।
उस दिन के बाद से स्कूल से घर और घर से स्कूल रोज़ मियाँ मजनूँ ने उसका पीछा किया । एक महीना हो गया । अंततः नायिका को लगा कि बात माता-पिता तक पहुँचनी ही चाहिये सो बात बता दी गयी । पहले पड़ोसन फिर लड़के के माँ – बाप, सभी ने लड़के के किये के लिये माफ़ी माँगी । नायिका को तसल्ली हुई कि चलो अब तो पिंड छूटा । पर कहाँ । अगले दिन महाशय फिर रास्तेमें पाये गये ।
“आपको किसी से दबने की ज़रूरत नहीं । अपनी बुआ को तो मैं सँभाल लूँगा । आप बस हाँ कर दीजिए ”
“मुझे किसी से कोई मतलब नहीं है । अपनी पढा़ई से मतलब है । आप भी दिमाग पढ़ाई में लगायें वही ठीक है” ।
“नहीं आप डर के मारे ना कह रही हैं ” ।
” उफ़्फ़्फ़ हद है । मैं डर नहीं रही । मैने हमेशा आपको भाई माना है । इसलिये बकवास कर मेरा और अपना समय बर्बाद मत करिये” । नायिका ने झूठ कहा । उसने कभी उसे भाई नहीं माना । लेकिन क्या भाई या फिर प्रेमी यही दो संबध संभव है ? दोस्ती अपने आप में एक पवित्र बंधन नहीं है क्या ? उसके इन प्रश्नों का जवाब फिलहाल तो किसी के पास नहीं था । जो भी हो इस जवाब ने काम कर दिया । नायिका को मुक्ति मिली । हीरो ने काफ़ी दिन तक गाना गाया “मैने उसके शहर को छोड़ा..उसकी गली में दिल को तोड़ा”, फिर वह भी नयी तलाश मे निकल लिये ।

आज की नायिकायें बदल गयी हैं । चप्पल के सहारे ऐसे मजनुँओं से खुद ही निपट लेती हैं । जब भी किसी नारी की ऐसी शौर्यगाथा सुनती हूँ, मन प्रसन्न हो जाता है । हाँलाकि मैं हिंसा की पक्षधर नहीं हूँ पर कुछ भी सहन करने की एक हद होती है । जब सहनशक्ति जवाब दे दे तो ऐसे रास्ते अपनाने में भी बुराई नहीं । हाँ अपनी सुरक्षा का ध्यान अवश्य रखना चहिये । बेचारी नायिका बड़ी परेशान हुई थी उस समय । सोचती हूँ क्या ही अच्छा होता कि हमारी नायिका भी इतनी हिम्मती होती…..

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Published in: on जुलाई 25, 2006 at 8:46 अपराह्न  Comments (9)  

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9 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. “नारी की शौर्यगाथा” अच्छा किस्सा है !
    ये सच है कि ऐसे मजनूओ की तादाद अच्छी खासी होती है! लेकिन यह भी एक सच है आज लडकीयों मे भी एक अच्छा खासा हिस्सा है जिन्हे लैला बनना अच्छा लगता है। उन्हे एक आनंद आता है , जब कोई उसे घूरे, फब्तीयां कसे !
    सन्यासीजी का अनुभव है कि आप यदि किसी खूबसूरत कन्या को बिना घूरे निकल जाओ, दूसरे दिन से आपको अकडू, घंमंडी की पदवी मिल जायेगी 🙂
    पू ल देशपांडे के अनुसार “खूबसूरत कन्या के पास से गुजरकर उस पर ध्यान ना देना भगवान का अपमान होता है। खूबसूरती भगवान का देन है, खूबसूरती की तरफ ध्यान ना देना भगवान की कृती पर ध्यान ना देना होता है।”
    वैसे हम तो नास्तिक हैं इसलिये पू ल देशपांडे के गुरूमंत्र पर ज्यादा ध्यान नही दिया लेकिन मजनूओ के मेरे पास भी काफी किस्से है, जो गलती से मेरे दोस्त थे। गलती इसलिये कि मेरा एक अनोखा रिकार्ड रहा है। किसी भी दोस्त का प्रेम किस्सा जो एकतरफा हो या दोतरफा, यदि मुझे पता चल गया तो वह कुछ ही दिनो मे टूट जाता है। इसमे से एक किस्सा मजनू की आत्महत्या का भी है ।
    *********************************************
    वैसे सन्यासी जी ऐसे ही सन्यासी नही बने है, उनकी अनकही प्रेमगाथा यहां पढे । 🙂

  2. पहले तो समझ नहीं आया कि वे हीरों हैं या साईड हीरो, और जब एक ही हो तो, हीरो ही हुआ पर पूरा पढ़ने के बाद समझ में आया कि क्यों उन्हे आप साईड हीरो की पदवी दे रहीं हैं. हालाँकि बाद में कथा जहाँ पहुँची, उसके हिसाब से तो उन्हें साईड हीरो नहीं, छोटा मोटा चरित्र कहना चाहिए.

  3. निधि जी
    उस महिला ने पिटाई चप्पलों से की और आपने तो अपने लेख के पहले पैरे में अपने शब्दों से मजनूओं की अच्छी खासी पिटाई कर दी है।
    भई हमारा नाम भी लिख देना उस 5% वाले लोगों में, जिनका उद्देश्य वह सब नहीं होता जिसका उल्लेख आपने अपने लेख में किया है।

  4. 1.उड़ैया करी ।(ठेठ कनपुरिया अंदाज़)
    2.सामान्यत: कोई भी नारी बिना वजह अपना वक्त और सैंडल ज़ाया नहीं करती ।
    3.मौसम की तरह कुछ लोग भी चिपचिपे होते हैं ।
    पढ़कर मन खुश हो गया। वाह-वाह टाइप प्रतिक्रिया ग्रहण करें।
    कुछ चीजों की सार्थकता वैसा ही होने में ही होती है जैसे वे हुईं। अगर नायिका शौर्यवान होती तो आम की जगह अमरूद खाने की बात पर ही ‘उड़ैया’ कर देती। फिर ये कथा आगे कैसे बढ़ती!

  5. A Nice story indeed. Some of the observations are really good ones.

  6. इस तरह की घटनायें पहले ज्यादा होती थी, अब भी होती हैं। पर इससे जुड़े कई पक्ष हैं। ९५ प्रतिशत मजनूँ आखिर मजनूँ क्यों बनते हैं? शुरूआत हमारा रूढ़िवादी समाज करता है जो सेक्स शिक्षा को हव्वा बना देता है। इन ९५ मजनुओं की उस सामाजिक शिक्षा की नींव भुरभुरी मिट्टी पर टिकी है जिस समाज में नारी या तो माँ या बहन हो सकती है या पत्नी। मतलब यह कि किसी न किसी साँचे में ढली। उसका अलग वजूद कहाँ देखा इन नामसझों ने। तभी तो स्वामी की भाषा में “यह मजनूँ पान की दुकान पर सींकिया ढाँचो में ,बगल से पसीना चुआते इन दिवास्वपनों मे खोये रहते हैं कि बाप के पैसों से खरीदी बाईक की पिछली सीट पर पान की दुकान में चिपके पोस्टर से उछल कर करीना आके बैठ जायेगी। ” अब न करीना आती है न मोहल्ले की रश्मि तो वैलेंटाईन डे पर इन मजनुओं को बजरंगियो के हाथों सांस्कृतिक पहरेदार बनना कतई आश्चर्यचकित नही करता। क्योंकि इन ९५ प्रतिशत मजनुओं का रोल माडल है टीवी पर खुलेआम राखी साँवत को कुत्तई अँदाज में डपटता नशेबाज मिक्का जिसका कहना है “भारत की जनता मेरी शुक्रगुजार है क्योंकि मेरी बदतमीजी ने तुम्हें सलवार पहनना सिखा दिया”।

  7. कहानी तो मज़ेदार है…
    ‘कुमार-मित्तल ही भले हैं’ – नायिका के ‘पढ़ाकू’ स्वभाव का सटीक वर्णन! आप तो रोज़ लिखा कीजिये, फ़ुरसतिया की तरह!

  8. ही ही.. शानदार है, मेरे गाँव मे तो ऐसी कहानियाँ लगभग हर महीने सुनने को मिल जाती थी… अक्सर देखा है नायिकायें, जहाँ पढने मे रमी होती हैं, या फ़िर सामाजिक कारणो के कारण किनारा करती है पर नायक… हेहे same category.

    पर अब मन्जर शायद बहुत हद तक बदल गया है, कलकत्ता गये तो वहाँ देखा नायक नायिका को कोई दिक्कत नही, गलबहियाँ डाले चल रहे हैं, आईसक्रीम खा रहे हैं, मेरे लिये ऐसे अनुभव बहुत मुश्किल रहे… तब बाहर निकलना, पढाई करना.. हाँ पर एक चीज अच्छी लगी कि, फ़िर वहाँ सरफ़िरे नायको की कमी रही, इसलिये कोई दिक्कत नही आई।

    फ़िर वहाँ से कोटा आना हुआ, यहाँ लगभग अपने गाँव वाली स्थिती है पर थोडी बद्तर, नायक तो वैसे ही पर नायिकायें भी बदल गयी हैं, मतलब कुछेक किस्से तो रोंगटे खडे कर देने वाले हैं…. अब क्या कहना और क्या सुनना… मौसम ही बेईमान है।

  9. “मैने कहा रखूँगा अगर तुम रोज़ शाम पहला निवाला अपने हाथ से खिलाओ । तो वो बोली – वादा”
    नायिका को अंदर तक गिजगिजाहट हो आयी । ग्यारहँवी पास करने के लाले हैं और फ़िल्मी हीरो बनने चले हैं , उसने मन ही मन सोचा ।
    कमाल का लिखतीं हैं आप. लेकिन अफ़सोस कि लम्बे समय से आपने कोई नई पोस्ट नहीं डाली. आज चिट्ठा चर्चा में आपका लिंक मिला, आभारी हूं अनूप जी की.


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