आप सब बुद्धीजीवियों से ये उम्मीद ना थी…!

अभी हाल फिलहाल अपने इस ब्लॉग जगत मे एक नये शब्द से परिचय हुआ – ‘टी. आर. पी’ । अनूप जी हों कि पंकज जी या फिर नाहर जी, सभी टी.आर.पी की बात कर रहे हैं । पढ़ के तुरंत कॉम्प्लेक्स हो आया । ग़ौर किया तो लगा कि अपनी टी.आर.पी तो यहाँ उतनी है जितनी टी.वी. पर दूरदर्शन की । ह्म्म्म्म्म….ऐसे कैसे चलेगा ?

अभी आये हुए जुमा जुमा दो महीने हुए हैं सो सन्यास की धमकी का किसी पे कोई फ़रक नहीं पड़ेगा । नाहर भाई जैसी अटेन्शन हमें मिलने से रही । जो थोड़ी बहुत साख है वो भी चली जायेगी सो अलग । महिला वर्ग के अन्तर्गत आरक्षण की माँग रख दूँ क्या ? नारियों को प्रोत्साहित करने के लिये उनके ब्लॉग की टी.आर.पी ३०% बढा़ के आँकी जायगी । पर नहीं इससे तो डॉक्टरों के बाद पुरुष ब्लॉगरों की भूख हड़ताल का खतरा हो सकता है । फिर क्या करूँ ? पिछली पोस्ट मे नाहर जी और अनूप जी ने कहा था कि जल्दी जल्दी लिखा करूँ । इससे टी. आर. पी. बढ़ेगी क्या?? हैं?? पर लिखूँ किस पर ? विषयों का सख्त अकाल पड़ा है मेरे पास । खेलों का ज्ञान तो गेंद की तरह गोल है । सामजिक विषय पे लिखने के लिये जो जोश चहिये वो आ ही नहीं रहा । खबरें आजकल सिर्फ़ मुँह बिचकाने को प्रेरित कर रही हैं । यात्रा वृत्तांत  लिखती प्रत्यक्षा जी की तरह पर क्या करूँ घूमने गये हुए तो पूरा साल भर होने को आ रहा है । फिर बची ज्ञान की बात जो कोई पढ़ता नहीं । दिमाग खर्च होता है सो अलग । फिर ?? टी.आर.पी बढा़ने का कोई हथकन्डा भी नहीं सूझ रहा था । सोचा लाओ टी.वी. देखूँ । वहाँ लोगों को दिन भर चालें चलने के सिवा कोई काम नहीं होता । शायद कोई फ़ार्मूला हाथ लग जाये ।

टी.वी चालू किया….स्टार पर ‘क्यूँकि सास भी ….’ चल रहा था । सुना था कि ‘बा’ जीवित हैं…आज देख भी लिया । कल्पना ने उड़ान भरी — पर-पर-परददिया सास बनना कैसा लगता होगा ! ये बा तो ‘रामदेव बाबा’ को भी फ़ेल कर गयीं । इतनी लम्बी उमर तो उनके योग भी नहीं दे सकते । हाय बा, आपके चरण कहाँ है….नहीं नहीं केकता कपूर के चरण कहाँ हैं (केकता शब्द मैने संजय जी की परिचर्चा मे की गयी एक पोस्ट से उड़ाया है । इससे पहले कि वह कॉपीराइट का दावा करें मैने सोचा श्रेय का झुनझुना उन्हें पकड़ा दूँ । वैसे इस हिसाब से केकता अपने बैनर का नाम ‘काला जी कम्यूनिकेशन’ क्यूँ नहीं कर देतीं । साथ ही ‘तुषार’ को ‘कुषार’ नाम दे दें, शायद उसकी भी गाड़ी चल पड़े) । कहानी समझ आ नहीं रही थी क्यूँकि ‘क्यूँकि….’ देखे महीने बीत चुके हैं तो बेहतर समझा कि कुछ और देखा जाय ।

‘कसौटी..’ पर आये । प्रेरणा को देख के जी किलस गया । हमें लोग अभी से आँटी कहते हैं ।  इन्हें देखो…दादी बन के भी जस की तस । अनुराग बासु को देख के और मज़ा आया । पहले प्रेरणा, फिर कोमोलिका, फिर प्रेरणा, फिर ऑपर्णा, फिर से प्रेरणा और अब ये नयी सम्पदा । ऐसी किस्मत… सारा पुरुष समाज हाय-हाय करता होगा देख के ।

दो धारावाहिकों मे ही दिमाग साँय-साँय करने लगा था तो ‘कहानी घर-घर की’, ‘के स्ट्रीट..’ आदि देखने की हिम्मत ही नहीं पड़ी । ये ‘स्टार प्लस’ अपने बूते का नहीं । तो रुख किया ‘ज़ी’ की तरफ़ । सुना है यहाँ हर सीरियल में राज़ खुलने वाले हैं । ‘कसम्ह (??) से’ आने वाला था । यहाँ भी ‘केकता’ । हिरोइन अपनी ननद को आँटी कहती है । और उसके बेटे से अपनी बहन की शादी भी करा रही है । इस प्रकार वह अपने ही भतीजे की साली हुई । या फिर अपनी बहन की सास? पूरे धारावाहिक मे रिश्तो के इसी चक्रव्यूह में घिरी रही । कोई राज़ नहीं खुला ।

फिर आया ‘सात फ़ेरे..’ । यहाँ कोई कितना भी दुखी हो पहनावा देख के लगता है मानो बारात मे शामिल होने जा रहा है । दामाद फाँसी की कगा़र पर है । माँ अपनी ‘लाडो’ के ग़म से मरी जा रही है । पर मैचिंग बिन्दी और गहने पहनने की फ़ुर्सत तब भी है । और तो और ये चेहरे पीले कर क्लोज़-अप दिखाने का नया फ़ैशन चल पड़ा है । १५ लोगों के घर मे तीन तीन बार हर चेहरा देखो…गये १५ मिनट इसी में । अब और झेला नहीं जा रहा । यहाँ अपनी जान को कम क्लेश होते हैं जो जनता ये सब देखती है ? समाचार देखना ही ठीक रहेगा, मैं सोचती हूँ । न्यूज़ चैनल पर आ रहे कार्यक्रम के होस्ट को देख के ही डर जाती हूँ । पिता ने ढाई साल के बच्चे को जला दिया, माँ ने अपने बच्चों को कुल्हाड़ी से काट दिया… । पहले ये सब देख के मन दुखी हो जाता था, अब ऊब होती है । दिमाग थक के झपकी ले रहा है…कि ज़ोर की आवाज़ आती है…”चैन से सोना है तो अब जाग जाओ” । लो भैया जग गये । इन सब के बीच यहाँ आने का असली मक़सद तो मैं भूल ही गयी थी ।  टी. आर. पी. के हिसाब से पहले और दूसरे नम्बर पर आने वाले चैनल झेल लिये ।  दिल-दिमाग दहाड़ें मार के रो रहे हैं कि  कल जो तीन नयी मैग़्ज़ीन आयी उन्हे क्यूँ नहीं पढा़ बजाय ये देखने के । अब और कुछ देखने का साहस नहीं बचा है । वैसे भी आइडिया मिल गया है..।

विषय या कहिये पोस्ट का हैडर रोचक रखूँ । जनता को विषय पढ़ के लगना चहिये कि कुछ धमाकेदार या  कॉन्ट्रोवर्शियल है यहाँ । कन्टेन्ट जाय भाड़ में । विषय का कन्टेन्ट से कुछ लेना देना होना भी ज़रूरी नहीं । यही सोच के इस पोस्ट का विषय ये रखा । बाकी ऐसा कुछ है नहीं । केकता कपूर के सभी धारावाहिकों का यही सार है । जैसे कुछ दर्शक भटक के उनके सीरियल देखते हैं मुझे विश्वास है कि कुछ पाठक भी भटक आयेंगे मेरे ब्लॉग पर । बाकी एक काम और कर सकते हैं । जब इन धारावाहिक निर्माताओं को आगे की कहानी नहीं सूझती तो ‘पब्लिक पोल’ करा लेते हैं । मैं भी ट्राई करती हूँ । चलिये आप ही बताइये कुछ—कैसे बढ़ाऊँ टी.आर.पी. ?

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Published in: on जुलाई 7, 2006 at 1:39 अपराह्न  Comments (16)  

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16 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. 🙂

  2. हा हा हा!! बहुत अच्छा लिखा है.

    अभी अभी एक फ़ोकटिया बवाल को सीज़फ़ायर किया है. दूसरा खडा करने का मूड नही है. मैं आगे जो लिख रहा हूं ससम्मान लिख रहा हूं और वो एक मजाक से अधिक नही है –
    हिंदी ब्लाग जगत में महिला ब्लागर्स को अपनी टी.आर.पी रेटिंग की चिंता करनी पडे ये तो असंभव है. लेकिन टी.आर.पी बढाने का कोई भी हथकंडा अगर आजमाने की नौबत आ जाए तो आप कोई टूटी-फ़ूटी रोमान्टिक कविता लिख दें.

    स्वयं को रसिक समझने वाले तमाम “कवि” आपको कविता लेखन सिखाने से लेकर प्रतिकविताएं करते आपकी अटेंशन लेने के लिए हर तरह की बंदर-कूद करते नजर आएंगे.

    ये शर्तिया नुस्खा है – कर के देखिए हमारा भी मनोरंजन हो जाएगा. 🙂

  3. कुछ ही पोस्ट पढी है आपकी। लिखने का इस्टाइल अच्छा है। जारी रखे़। इतने “कम ही” समय मे आप बडे/पुराने ब्लॉगरो के कान काट रही है। वैसे… बाकी लोग कौन सा विषयों पर ही लिखते है 🙂 ।

  4. आप सभी का आपके विचारों के लिये धन्यवाद । ई-स्वामी जी आइडिया तो बढ़िया है पर शादीशुदा होने की वजह से शायद ही मेरे लिये काम करे । दीपक जी विषय वही हैं जो मैने लिखे पर मेरे पास उन विषयों पर न लिखने के कारण बहुत हैं । इसलिये तय किया है कि विषय मिले तो ठीक नहीं तो अब खालीपीली लिखेंगे ।

  5. मैंने जल्दी-जल्दी लिखने के लिये इसलिये कहा है लिखने का अंदाज़ काबिले तारीफ है।

  6. निधीबेन शुं लखो छो!!

    बहुत खूब. टि.आर.पी. बढाने के उपाय सोचता हुँ एक पोस्ट के रूप में लिख दुँ. जन कल्याण के लिए.

    वैसे एक धाँसु आइडिया देता हुँ. हर फ़टे में टांग अडाती रहिए. हो जाएगी बल्ले बल्ले.

  7. निधि जी.
    इस लेख के साथ ही देखो आप के चिठ्ठे भी टी आर पी बढ़ गई है, आप भी सीख ही गई टी आर पी बढ़ाना, बिल्कुल हिन्दी फ़िल्मों के निर्देशक की तरह कि किस विषय पर फ़िल्म बनाई जाय तो हिट होगी।
    आप ने हमें भी युँ ही लपेटे में ले लिया, हमने तो कभीऊ नही कहा टी आर पी के बारे में। खैर…
    सभी समझते थे आप कवियितत्री हैं, परन्तु आप व्यंग्य बहुत अच्छा लिखती है, इस लेख को थोड़ा संपादित कर अभिव्यक्ति को भेज दें वे लोग अवश्य प्रकाशित करेंगे।
    फ़िर कहुंगा थोड़ा जल्दी जल्दी लिखा करें क्यों कि हम आपकी लेखनी के ए सी (फ़ैन से ज्यादा) हो गये हैं।

  8. वैसे दो महीने १२११ का अंक कम नहीं होता, लोगों को तो १००० तक पहुँचने में साल साल लग जाते हैं।

  9. अनूप जी आपने जल्दी लिखने को कहा इसिलिये तो बिना बात के लिखा 🙂 । पंकज जी का आइडिया बढ़िया है । पर बड़ी हिम्मत चहिये इसके लिये भी । खैर वो भी आ ही जायेगी कुछ दिनों में आप लोगों की दुआ से। नाहर जी धन्यवाद आपकी टिप्पणी के लिये । आपको लपेटे में लेने का इरादा नहीं था । पर आप इस ब्लॉग जगत के चर्चित लोगों मे से हैं तो हमने सोचा हमारे इस एपिसोड में आपका छोटा सा आइटम नंबर डाल दें, टी.आर. पी और बढ़ेगी 😀 . बाकी आशा है किसी की भावनाओं को मैने ठेस नहीं पँहुचाई होगी । ऐसा करने का मेरा क़तई इरदा भी नहीं था ।

  10. 🙂

  11. बहुत अच्छा लिखतीं हैं, आनंद आ रहा है। चुटीली रचनाओं के लिए धन्यवाद। आगे पढ़ने को आतुर हैं।

  12. नीधी जी
    मेरी कुछ बीन मांगी सलाह

    १.अपने चिठ्ठे का नाम बदल कर “कुछ चिन्तन” कर दिजीये( एकता आंटी का फार्मुला)
    २.फुरसतीया जी की चिकाई पर हर सप्ताह एक लेख लिख दिजीये (कापीराईट : प्रत्यक्षा जी, मानोशी जी)
    ३.जीतु जी की खिंचाई हर कोई कर जाता है, इसलिये उनकी खिचाई भूल के भी ना करे (कापीराईट : फुरसतिया जी)
    ४. अतुल जी “रोजानामचा” वाले या स्वामी जी से पंगे लेकर देखीये (सागर जी का फारमुला)
    ५. खालीपीली पर टीप्पणी करना ना भूलें (सबसे कारगर उपाय)
    ६. मानोशी जी को अपने चिठ्ठे की कुण्डली दिखायें
    अगर ये सब काम ना करे तो आपको टिप्पणी के लिये आरक्षण मिलना चाहिये! हमारा समर्थन है

  13. धन्यवाद प्रेमेलता जी । बस आप लोगों से ही सीख रही हूँ धीरे धीरे । आशीष भाई सलाह तो हमने माँगी थी सो बिन माँगी कहाँ से हुई । आपकी सलाहें नोट कर लीं मैने ।

  14. ओ भाई खालीपीली वाले चिरकुँवारे श्री श्री १००८ आशीष जी महाराज

    काहे हमको मरखने बकरे की संज्ञा दे रहे हो।

  15. आठ महीने बाद आने वाली यह टिप्पणीइस बात को साबित करती है कि अच्छी और मनोरंजक पोस्टें सदाबहार होती हैं।पाठक सालों बाद भी टिप्पणी करने आ सकते हैं।

    आपके इस पोस्ट पर वाया-वाया पहुँचा, इसलिए एक टिप मेरी भी लीजिए। यह मेरा सिद्ध नुस्खा है अपने चिट्ठे पर जब भी किसी चिट्ठाकार, चिट्ठे या उसकी किसी पोस्ट का जिक्र करें तो साथ में उसका लिंक अवश्य दें।इससे जो बैकलिंक उधर आएगा उसको ट्रेस करते हुए कई लोग आपके पास आएंगे।

  16. […] 8th, 2006 at 3:14 pm (हास्य व्यंग्य) आज निधि जी के चिठ्ठे चिन्तन पर टी आर पी बढ़ाने संबधित लेख पढ़ा। […]


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