बचपन बीत गया..

गतांक से आगे…

पिछली कड़ी पर की गयी एक टिप्पणी में अमित ने पूछा कि मैने भूत के किस्से सुने हैं कि नहीं । भूत की कहानियाँ नहीं सुनायीं मुझे किसी ने । भूत से जुड़ा सिर्फ़ एक वाक़या याद है । मुझे बचपन मे चप्पल पहनने से सख़्त नफ़रत थी । नाना ने बहुत समझाया पर मैं वही ढाक के तीन पात जैसी । तर्क ये प्रस्तुत किया कि मैं भूल जाती हूँ । नाना ने तुरन्त एक काग़ज़ पर लिख कर टाँग दिया 'चप्पल पहनो' । अब याद ना रहने का बहाना भी छिन गया । मैनें युक्ति निकाली । पर्ची दीवार से नोच के फेंक दी । कह दिया हवा से उड़ गयी । अब जब जब नाना ने पर्ची टाँगी, मैने ऐसी हवायें चलायीं । तब ये समझ ही नहीं थी कि टेप से चिपकी पर्ची को हवा क्या उडा़येगी । मैं ये सोच के खुश रहती कि नाना को यही सच लग रहा है । नाना को लगा कि घी सीधी उँगली से निकलने वाला नहीं । और ऐसे जन्मा 'लँगडा़ भूत' । सफ़ेद चादर ओढ़ के मेरे ६ फ़ुट ३ इन्च के नाना जी जब लहराते हुए कहते "माँऽऽऽऽऽय लँगड़ाऽऽऽऽऽऽ भूऽऽऽऽऽऽत हूँ"  तो सच मेरी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती । और नाना इस द्वन्द मे जीत गये । लँगड़ा भूत पैर काट के ना ले जाये इस डर से मैं बिना चप्पल ज़मीन पे पावँ ही ना रखती । तो बस इतना ही जाना मैनें भूतों के बारे में ।

मम्मी – पापा के पास ज़िन्दगी सिलसिलेवार चले जा रही थी । स्कूल से घर और घर से स्कूल बस यही काम था । आस पास दोस्त थे नहीं । शाम ढले बाबा घर आ कर पूछ्ते "गणित लगाया?" । मैं इसी सवाल से बची बची घूमती । फिर भी जब तब बाबा पकड़ के बिठा लेते "लघुत्तम-मह्त्तम के सवाल हल करो" , " बीज गणित, रेखा गणित लगाओ" । बाबा गणित और भूगोल के अध्यापक थे । दोनों विषय मेरी रुचि से पूर्णतः परे । पर जी मसोस के सब करना पड़ता । बाबा के घर आने से सिर्फ़ एक खुशी मिलती । उनकी बड़ी साइकिल घर जो आ जाती । छोटे भाई बहन धक्का लगाते । बड़ी दीदी शान से कैंची डाल के साइकिल चलातीं । जिस दिन पहली बार उस साइकिल कि गद्दी पर फ़तह पायी…सच मानिये वैसा सुख फिर नही मिला । चलाने को आज कार भी चला लेती हूँ पर वो मज़ा नहीं पाया ।

ऐसे ही एक सामान्य दिन पर ज़िन्दगी का चौथा सबक मेरा इन्तज़ार कर रहा था । स्कूल से घर के बीच एक बाज़ार पड़ता था । मैं और मेरी एक सहेली रोज़ की तरह घर लौट रहे थे । वहीं बाज़ार मे एक १० का नोट पडा़ मिला । चवन्नी – अठन्नी के ज़माने में १० का नोट तो कल्पना से परे की बात थी । हम दोनो की तो बाँछे खिल गयीँ । उस समय कोका कोला ३-४ रुपये की रही होगी..दोनो ने ठन्डे और समोसे का भोग लगाया । बाकी बचा एकाध रुपया मेरा हुआ । आखिर खज़ाना मुझे मिला था । घर आ कर गौरव गाथा सुनाने को मन उतावला हुआ जा रहा था । "मम्मी आज मुझे १० का नोट पड़ा मिला …मैने.." । "उठाया तो नहीं ना तुमने??" मम्मी ने प्रतिप्रष्न किया । पूछने के लह्ज़े से साफ़ था कि मुझसे क्या उत्तर आपेक्षित है । मैने डर के मारे कह भी दिया "हाँ मम्मी नहीं उठाया" । मम्मी ने आगे कहा " ठीक किया बेटा, पता नहीं किसका गिरा हो । बेचारा अगर ज़रूरतमन्द हुआ तो अपना पैसा ढूँढता होगा । ऐसा पैसा उठाना फलता नहीं है" । मैने कहा "मम्मी कोई ज़रूरी है कि उसका पैसा उसे मिले, मैने नहीं उठाया , कोई और उठा लेगा" । मम्मी बोली "हो सकता है । पर अगर कोई कुएं मे गिरे तो क्या तुम भी गिरोगी । जो पैसा मेहनत से ना मिला हो, किसी और का हो, उसे लेना नैतिक नहीं है । और अगर सब लोग ऐसे सोचेगें   तो सोचो उस आदमी का पैसा उसे ही मिलेगा ना" । अब बात ठीक जान पड़ी । मन सोचता रहा कि कहीं वो किसी गरीब के पैसे तो नहीं थे । अब क्या होगा ? खैर मन ही मन निश्चय किया कि आगे से ऐसा नहीं होगा । ये बात आज के परिपेक्ष्य मे सही हो या न हो, भले ही कुछ लोग इसे मूर्खता कहें, लक्ष्मी का अपमान कहें, पर मैं अपने निर्णय पर का़यम हूँ ।

जीवन एक नये मोड़ पर खड़ा था । विज्ञान मे रुचि और नये नये प्रयोगों के प्रति उत्सुकता चरम पर थी । स्वभाव में पता नहीं कैसे एक हठ्धर्मिता ने घर कर लिया था । जो मन मे ठान लिया वो करना है । कोई करने मे मदद करे तो बढ़िया न करे तो और भी बढि़या । ऐसे मे ही एक पुस्तक हाथ लग गयी 'विज्ञान के १०१ प्रयोग', डायमंड प्रकाशन की किताब थी शायद । विद्युत-चुम्बक, मोमबत्ती का सी-सॉ झूला, स्टीमर, रँगीन पौधा…और भी पता नही क्या क्या । इनमे से इलैक्ट्रोमैगनेट का प्रयोग बहुत ही रोमाँचक रहा । घर मे सारे साधन पापा और चाचा की बदौलत पहले ही उपलब्ध थे । हमने सोचा चुम्बक बना के घर वालों को चकित कर दें । अब निर्देशानुसार बना ली गयी चुम्बक । पर ये क्या..कील तो दूर उसने पिन को भी हिलाने से मना कर दिया । अब ये समझ आया नहीं कि हमने तार कम लपेटा है…सोचा कि शायद सेल से बात नहीं बनेगी । सीधे बिजली का कनेक्शन चहिये । सो फ़टाक से लपेटे हुए तार के दोनो सिरे प्लग मे ठूँस दिये और ये क्या.. 'भटाक…' की आवाज़ और बत्ती गुल । फ़्यूज़ उड़ने के विषय मे जानकारी थी नहीं इसलिये लगा कि हो गयी कोई बड़ी बात । खैर डाँट लगी उसके बाद । वो भी इसलिये कि इस प्रक्रिया मे झटका लगने की पूरी सम्भावना थी । पर हम सुधरने वाली आत्मा कहाँ । उसके बाद भी हमने अपना अभियान जारी रखा । झालर का 'एक' बल्ब सीधे प्लग से लगा के देखा गया । एक लाइव तार से प्लग के दोनों छिद्रों को जोड़ के भी देखा । सभी प्रयोगों का एक ही निष्कर्ष :- घर का फ़्यूज़ मेरे बिजली का कोई भी काम करते ही उड़ जाता है 😦   । एक लड़के और एक लड़की -दोनो के स्वभाव के मिश्रण का एक उम्दा उदाहरण ये था कि पापा की सोल्डरिंग आयरन का प्रयोग कर के मैने अपनी गुडि़या के लँहगे पर बड़े सितारे बनाये । बाबा के 'maginfying lense' से सूरज की किरणें केन्द्रित कर मेरी गुड़िया के घर का चूल्हा जलता और पापा के खज़ाने से चुराये 'resistors' और 'capacitors' से गुड़िया के गहने बनते।

इन सब के बीच बचपन से निकल कब किशोरावस्था मे कदम रख दिया पता ही नहीं चला । मेरे लेख और कहानियाँ कब शेरो-शायरी मे तब्दील हो गये मुझे याद नहीं पड़ता । मेरा दायरा और सिमट गया था । नाम को एक सहेली और बस किताबें । हाँ गर्मियों की छुट्टियाँ ज़रूर मज़े से कटतीं । नाना के घर जा कर दिन भर वी. सी. आर. पर फ़िल्में देखना और रात मे छत पर अकेले मे रेडियो लिये पडे़ रहना । ये उस सब का ही असर था जो मैने शेर लिखने शुरू कर दिये थे । हर शेर, हर नज़्म ऐसी कि लगे नया नया दिल टूटा है । बस तुक बैठना चहिये । पिता जी के हाथ हमारी डायरी लग गयी एक दिन । मेरे हर शेर पर पेट पकड़ पकड़ के हँसे । पूछा ये दिल कब टूटा जो ये सब लिखा है? हमने भी दार्शनिकों सरीखा जवाब दिया "अगर म्रुत्यु पे लिखना हो तो क्या खुद मर के देखा जाता है" । तब तो कुछ नहीं कहा पापा ने पर शायद बाद मे बड़ा लोटपोट हुए होगे हँसी के मारे । उस समय लगता था कि एक मियाँ गा़लिब हुए और एक हम होंगे । आज अपना लिखा पढ़ती हूँ तो लगता है कि किसी थर्ड क्लास की पिक्चर के डायलॉग पढ़ रही हूँ । एकदम वाहियात …बेतुका। अगर हँसने ( या अपने सर के बाल नोचने) का जी करे तो ये नमूना पढ़ लीजिये –

तू जहाँ हो वो वीराना मेरी मह्फ़िल है,
तू ही राहे मुका़म, तू ही मेरी मन्ज़िल है ।

हैराँ हूँ मेरे दिल को तू क्यूँ नहीं समझा,
तू ही तो दिल कि ज़बाँ, तू खुद मेरा दिल है ।

और एक नमूना देखिये :

तू मुझको मिल ना सके तो सब्र है मुझको
जो मिल गया तो डर होगा तेरे खो जाने का ।
 
दोनो पक्तियाँ परस्पर विरोधी हैं । खैर भगवान का शुक्र है कि   जल्द ही ये भूत उतर गया और ऐसी और रचनाओं का जन्म नहीं हुआ । उसके बाद तो जो लिखा हिन्दी के इम्तिहान मे लिखा । उस समय हिन्दी के पर्चे मे जिसने जितने 'quotations' डाल दिये उसे उतने अधिक अंक मिले समझो । अब कहाँ तक याद रखते, तो परीक्षा मे तत्कालिक रूप से चार लाइन की कविता लिख दी जाती । हरे पेन से लिखते "किसी कवि ने ठीक ही कहा है…" आगे काले पेन से कविता लिख दी जाती । अब कविता का विषय सुनिश्चित होता था,  इसलिये ठीक ठाक लिख लेते थे । बाद में कभी अध्यापिका तारीफ़ करती तो मन ही मन खुशी से फूले नहीं समाते…बस हमेशा एक बात कह्तीं पर वह..कि लेखक का नाम डाला करो । अब उन्हे क्या कहते । इस सब के चलते हमने अपने को मिर्ज़ा गालिब के कूँचे से निकाल सुमित्रा नन्दन पन्त, निराला, प्रसाद, नीरज, महादेवी वर्मा..इनकी कतार मे शामिल कर लिया था । रोज़ अध्यापिका का दिमाग चाटते कि हमें विषय दीजिये हम उस पर लिखेंगे….। बस यूँ समझिये कि उस रफ़्तार से हमारी पुस्तक छपने में कोई खास देरी न थी ।…

क्रमश:

Advertisements
Published in: on जून 15, 2006 at 12:34 अपराह्न  Comments (7)  

The URI to TrackBack this entry is: https://abhivyakta.wordpress.com/2006/06/15/%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%aa%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a4%be/trackback/

RSS feed for comments on this post.

7 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. भई बहुत देर लगा दी निधि जी आपने
    सबक का अगला अंक लिखने में,….. खैर।
    थोड़ा जल्दी लिखा करें,हमे आपका लिखा पढने की बहुत उत्सुकता रहती है क्यों कि इसी बहाने हम भी अपने बचपन की शरारतें याद कर लेते हैं।
    वो साँप का बदला और मछलियों का क्या किस्सा था यह लिखना आप भूल गयीं।

  2. वाह! क्या अंदाज़ हैं लिखने के । बहुत अच्छा लगा।

  3. “अगर म्रुत्यु पे लिखना हो तो क्या खुद मर के देखा जाता है”

    क्या कहने !
    वैसे शेर अच्छे है, आप इन शेरो के साथ हास्य कवी सम्मेलन मे भाग ले सकती है ! 🙂
    ‘विज्ञान के १०१ प्रयोग’ पूस्तक महल की है, अच्छी पूस्तक है। हमने भी इसके कई प्रयोग किये है। मेरे पापा विज्ञान शिक्षक थे, इसलिये फ्युज उडाने का मौका नही दिया। चेतावनी रहती थी, सब कुछ तैयार करने के बाद एक बार दिखा दो, उसके बाद बिजली का स्विच चालु करो !

  4. नाहर जी एक बार फिर धन्यवाद याद दिलाने के लिये कि मैनें क्या नहीं लिखा । अनूप जी आपकी सभी टिप्पणियों के लिये धन्यवाद । और आशीष भाई आपने सही याद दिलाया, पुस्तक महल की ही किताब है । वैसे राम जाने उनके लोगो में उल्लू क्यूँ बना होता था ।

  5. बहुत अच्छे ! विज्ञान और कला का अच्छा जोड. बचपन खासा मज़ेदार रहा होगा ये पता चलता है

  6. सोल्डरिंग करके सितारे बनाने की करतूत कमाल की है. वैसे मैंने तुम्हारी सोल्डरिंग विद्या का नमूना देखा हुआ है, लेकिन तब यह नहीं पता था कि तुम इस कला में इतनी पारंगत हो.

  7. very bad


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: