आरक्षण – divide and rule???

आज 'हिन्दुस्तान टाइम्स' के सम्पादकीय प्रष्ठ पर छपे एक लेख का छोटा सा अंश उध्र्त कर रही हूँ :-

"A hundred and fifty years ago, when the british government tried to give education to Shudras(OBCs) and Atishudras(SCs), there was violent opposition to that move. The british government was forced to withdraw its move to prvide education to the shudras even in elementary schools. Jyoti Rao Phule, after managing to provide education for himself, educated his wife Savitri Bai. When both of them started educating Shudras, Atishudras and women they faced violent opposition from the elite class. The phule family could not cope with the pressure against them and Jyoti Rao and Savitri were forced to leave their home. Jyoti Rao was forced to make his school his abode. Then Dhondi ba, Pune's most notorious criminal was hired to kill the Phule family. Dhondi ba himself was a Kumhar, a shudra from the potter class. Coming face to face with Dhondi Ba, Phule wanted to know why he was killing him. Dhondi Ba was aware that people who hired him were against Phule's mission to educate Shudras, Atishudras and Women. This awareness turned into realization and he fell at Phule's feet to ultimately become his student and a guard of the Phule Couple.

When at last the british government took small steps to extend elementary education to the children of untouchables, there was violence and protests. The Indian Education(Hunter) Commission of 1882 gives instances of such violence in Madras Presidency, the Central Provinces and the Bombay Presidency. The administration was in collusion with theh preparators of this violence as it was manned entirely by people from one of the few communities that had a monopoly over jobs and education. These elements did not want the so-called lower castes to get educated and break the monpoly. The manner in which reservations to OBCs in higher educational institutions of the central government is being opposed proves that even after 150 years, the mindset of Indian elite has not changed. They are not ready to accept any logic or see any reason in reservations. Simply put, they are suffering – whether they know or not – from mindset thaht 'Shudras' are not fit for higher education and that they should not be given opportunity"    

 इसे पढ़ने के बाद समझ नहीं आया कि इस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ. एक पल रोष का अनुभव हुआ पर उसका स्थान शीघ्र ही दया ने ले लिया. दया, लेखक की बुद्धि पर. मैं बता दूँ कि लेखक एक प्रतिष्ठित दल के 'अध्यक्ष' हैं तथा पूर्व केन्द्र मन्त्री भी रह चुके हैं. मैं स्वीकार करती हूँ कि पुराने समय मे निचली जाति तथा जनजातियों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यव्हार होता था. इसी के चलते देश ने एक हिन्सा का दौर देखा जैसा कि लेखक ने कहा. पर मैं माननीय लेखक जी से यह पूछना चाहूँगी कि क्या आज के समाज में उन्हे कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता. आज सभी जातियों को समान अधिकार प्राप्त हैं, चाहे शिक्षा हो या रोज़गार. बल्कि सत्य तो यह् है कि इन समुदायों को बेहतर अधिकार दिये गये हैं. अब चाहे वह शिक्षा शुल्क मे छूट हो, रोज़गार का अवसर हो या फिर कि कोई छात्रव्रत्ति हो. आज अल्प समुदाय के लोग वरिष्ठ पदों पर् हैं, शिक्षित हैं तथा आर्थिक रूप से भी कमज़ोर नहीं हैं. तब यह् आरक्षण क्युं ? य़दि इस आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति होती तब भी समझ आता कि जिन लोगों को शिक्षा के उतने अच्छे अवसर नहीं मिले जितने धनाढ्य वर्ग को मिलते हैं उन्हे प्राथमिकता दी जानी चहिये. मगर हमारे देश के नेता अपना वोट बैंक भरने और अपना उल्लू सीधा करने के लिये आज की युवा पीढी़ को जाति के आधार पर बान्ट रहे हैं, उनमें फूट डाल रहे हैं. योग्यता का तो जैसे कोई मूल्य रहा ही नहीं. जाति हर चीज़ का आधार है. नेता जी ने दुहाई दी कि १५० साल् पहले बडी़ हिन्सा हुई जब पिछ्ड़ी जातियों को ऊपर उठाने के प्रयास हुआ. और आज क्या हो रहा है यह उन्हे दिखाई नही देता. कल बात पिछ्ड़ी जातियों की थी, आज सामान्य वर्ग की है. मुद्दा वहीं का वहीं. पर नेता जी समझें क्युं, पहली बात यहां उनकी अपनी जाति कि चर्चा हो रही है और मुख्य बात यह कि उन्हे वोट वहीं से मिलने हैं. अपना घर भरो भैया देश की काहे सोचो. सब बातें सुन तो ऐसा प्रतीत होता है मानो सामन्य वर्ग के लोग तो विपन्न होते ही नहीं, उन्हे हर तरह् कि सुविधा है, और हर अल्प समुदाय का परिवार सामाज से तिरस्क्रत्, अपनी जिजीविषा के लिये जूझ रहा है.

सुनने मे आया कि मध्य प्रदेश मे एक पिछ्ड़ी जाति के छात्र को 'इंजीनियरिंग' मे दाखिला मिल गया. अब बूझिये कि प्रतियोगी परीक्षा मे कितने अंक मिले थे इस छात्र को — सिर्फ़ १. अब इसके चलते एक योग्य छात्र को दाखिला इसलिये नही. मिला क्युँकि वह् सामन्य वर्ग का छात्र था. और ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं. नेता जी ज़रा बतायें कि भेद भाव किसके साथ किया जा रहा है. अगर ये कहा जाये कि जाति कि जगह योग्यता सूचि को किसी सन्स्थान में दाखिले का अधार माना जाये तो यह एक वर्ग विशेष के साथ अन्याय हो गया?? इससे ये साबित हुआ कि सामान्य या कहें कि 'elite' वर्ग की मानसिकता सन्कीर्ण है ?? नेता जी की बात का अर्थ तो ये निकला कि वर्ग विशेष योग्यता सूचि के आधार पर दाखिला पाने योग्य नहीं है इसलिये एक वैकल्पिक रास्ता होना चहिये. मेरी या फिर आरक्षण का विरोध कर रहे लोगों का किसी जाति विशेष से कोई बैर नहीं है. बहुत से छात्र ऐसे हैं जो इन समुदायों से सम्बन्ध रखते हैं, किन्तु योग्यता सूचि मे अपनी मेहनत व लगन से स्थान पाते हैं. ऐसे छात्रों का स्वागत है. किन्तु सिर्फ़ जाति के आधार पर अयोग्य छात्रों का भी दाखिला क्या उचित है ?? आयोग्य छात्र यदि इस प्रकार मिली 'डिग्री' ले अगर उच्च पदों पर आसीन हो भी जायें तो क्या वह अपने पद के साथ न्याय कर पायेंगे ?? या फिर इन सब बातों से, देश की तरक्की से, नेता जी का लेना देना ही नहीं है. यदि ऐसे में योग्य छात्र कुंठित हो विदेश का रुख करते हैं तो यही नेता जी 'Brain Drain' को देश के तरक्की ना कर पाने का कारण बता देन्गे. क्या जतिवाद के दानव की जकड़ से भारत कभी आज़ाद नहीं होगा? हम कब सीखेंगे अपने अतीत की गलतियों से शिक्षा लेना ? कब समझेंगे कि भारत कि तरक्की एक वर्ग की नहीं, हर समुदाय की तरक्की मे है. मेरा मानना है कि गाँव गाँव स्कूल खुलने से, देश के प्रमुख सन्स्थानों मे सीटों के बढा़ये जाने से, आर्थिक रूप से विपन्न परिवारों (चाहे वह किसी भी जाति के हों) के सदस्यों को नि:शुल्क शिक्षा देने से शायद इस समस्या का एक हद तक निदान सम्भव हो. किन्तु आरक्षण इसका हल न था, न होगा. आज बात OBCs की है, कल मुस्लिम, ईसाई, पार्सी समुदाय या स्त्री वर्ग की होगी. फिर ? कहाँ तक आरक्षण करेंगे नेता जी???

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Published in: on मई 22, 2006 at 3:27 अपराह्न  Comments (19)  

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19 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. Nidhi Didi
    Sadar Charan Sparsh. Hum aapke vicharoon se purii tarah sehmat hain.
    Oor Aashaa karte hain ki aap aage bhi isshi tarah blog likh karr apne vicharoon ko sahi dishaa deti rahengi.

    Aapka Pyaraa Sundarr GoluMolu Bhai
    Paresh (Tatya Tope Jindabad)

  2. आइये यहाँ चर्चा करते हैं:
    http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?id=65

  3. हिन्दी ब्लॉग जगत् में आपका हार्दिक स्वागत् है। उम्मीद है आप ऐसे ही निरन्तर हिन्दी में लेखन करते रहेंगे।

  4. Hey dost..

    bahut sahe kaha.

  5. हिन्दी चिट्ठाजगत पर आपका स्वागत हैं. अच्छा लिखा हैं.

  6. आप सभी का आपकी टिप्पणियों के लिये हार्दिक धन्यवाद ..

  7. स्वागत है, हिन्दी चिट्ठाजगत में.विचार अच्छे लिखे हैं.

  8. Bhashan dena aasan hota hai, doosri ki galtiyon pe gaali dena aur bhi aasan hota hai. Itna hi junoon hai to aage badho, badlao lao. Khud ko mauka do desh ke liye kuch karne ka. Aaj hum me se shayad hi koi Sarkaari naukri paana chahta hai. Shayad hi koi Civil Services mein jaana chahta hai. Politics mein ja kar desh mein sudhaar karna to door ki baat, politics ke naam se itna aakrosh hai ki sirf naam sun ke gussa ho jaate hai. Khoon to hum sabhi ki rago mein daud raha hai. Bas unke bahaav ki disha shayad galat ho chali hai. Shayad “Bhagat Singh” ne humko ek baar Ekk Khoon ke katre ka asli mahatva samjhaya tha. Par shayad hum woh bhi bhool gaye hai.
    Maana aaj ka yug Gandhi ko nahi maanta, par unhone ne bhi yahi kaha hai ke “Agar parivartan laana hai samaaj mein to pehle khud mein parivartan lao”. Shayad Gandhi ji ki Goor waali kahani to aap sabhi ne suni hi hogi.
    Main sirf itna kehna chahunga ke aham pe kaboo pao aur khud mein parivartan lao.
    Aaarakhshan ke virrudh to main bhi hu, aur maine medical chatro ka saath bhi diya tha dono rally mein. Inqalab Zindabad ka naara lagaya tha. Par shayad is prashna ka uttar puri tarah se mere paas bhi nahi hai ke kis prakar is Aarakhshan ki samasya ka samadhaan nikala jaaye. Shayad kuch aisa ho ke desh ke liye main kuch kar sako. Path brashta to main bhi hu. Bas sahi path milne ka intazaar hai.

    Dhanyawaad,
    Ankur

    P.S.:- Waise aap ka blog kaafi achcha laga padh ke. Ek baar to khoon mein ubaal bhi mehsoos kiya.

  9. nidhi
    aapaki soch bhauthi sankuchiot hii. leval uchi jati ki hone ki katan aap aarakshan ki virodh me ho aaisa lagata hai. main bhi khule vargase hu. lekin ham donoki soch me bhahut aantar hai.
    mera manana hai ki aapani desh me aagar shoshan jatike aanusar hai to aarakshan bhi eishi hesabse hona chahiye.
    gunvatta ? / merrit ki bat brahaminism hai.

  10. राष्‍ट्र में पुन:, वैचारिक क्रान्ति की नहीं, वास्‍तविक सामाजिक क्रान्ति की आवश्‍यकता है। माननीय निधि जी के विचारों से पूर्णतया सहमत होते हुए मैं अपने शहर की एक घटना का वर्णन कर रहा हूँ। आज से ग्‍यारह वर्ष पहले एक युवक का आरक्षण के आधार पर (व़ह भी ॠणात्‍मक अंक प्राप्‍त करने पर) शासकीय मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की शिक्षा के लिए चयन हो गया (दुर्भाग्‍यवश)। अब चूँकि उस युवक का बौद्धि‍क‍ स्‍तर किसी चिकिस्‍तक का कंपाउण्‍डर बनने के लायक भी नहीं था, उस युवक ने चार वर्षीय पाठ्यक्रम को पूरा करने में अपनी लगन, मेहनत और सहनशीलता का परिचय देते हुए पूरे दस वर्ष च‍िकित्‍सक बनने के प्रयास में लगाए। यह उसका दुर्भाग्‍य (?) था कि ग्‍यारहवें वर्ष उसे न्‍यायालय की शरण में जाना पड़ा, यह कहते हुए कि उसे जानबूझकर उत्‍तीर्ण नहीं किया जाता है। न्‍यायालय में प्रकरण की जॉंच में यह स्‍पष्‍ट हो गया कि जब छात्र कॉपी में लिखेगा ही नहीं, तो वह उत्‍तीर्ण होने के स्‍वप्‍न कैसे देख सकता है।

    सिर्फ़ एक इसी प्रकरण से अब आप सोचें कि ऐसे अयोग्‍य जन को आरक्षण सुविधा देना कितना खतरनाक साबित हो सकता है। अगर वह युवक मुन्‍नाभाई की स्‍टाईल में डॉक्‍टर बन जाता तो ? और भी आगे सोचिए, अगर आप बीमार पड़ने की अवस्‍था में ऐसे ही किसी चिकित्‍सक के पास इलाज कराने पहुँचते। बेहतर होता कि उस युवक को प्राथमिक कक्षा से ही नि:शुल्‍क पुस्‍तकें, कपड़े आदि ईमानदारी से मुहैया कराए जाते, तो शायद वह युवक कम से कम कम्‍पाऊन्‍डर तो बनने की प्रवेश परीक्षा में मेरिट में आ सकता था। यही नहीं, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति में में कोई क्रीमीलेयर वर्ग की श्रेणी न होने से किसी कलेक्‍टर, एसडीएम यानि वर्ग एक अधिकारी के पाल्‍य भी आरक्षण सुविधा का लुत्‍फ उठाते हैं। यह तो अन्‍याय है। आप ज्रबरन ही किसी को जम्‍प कराकर किसी संवैधानिक पद पर बिठाऍंगे तो क्‍या वास्‍तविक तरक्‍की मिल पाना संभव है ? बौद्धिक विकास एक सतत् प्रक्रिया का फल है, यदि विकास कराना ही है तो बौद्धिक विकास हो, ऐसा प्रयास करें।

    अंत में यही कहना चाहूँगा, आरक्षण से विकास तो कतई नहीं हो सकता।

  11. hum ne apne sahar se Arakshan ke khilaaf ek awaz uthai hai kripya contact karen…..

  12. Arakshan jatigat nahi hona chahiye , is se us dayre me Aane wali jatiyo ka bhi nuksaan hai…is ka labh ‘Creamy layer’ jaise log hi paa rahe hain , aaj bhi majdoor ka beta majdoor hi banta hai. ! Arakshan ho lekin Arthik aadhar pe ho jis se har gareeb iska labh paa sake ! Dhanywaad 9044884424

  13. It’s perfect time to make some plans for the future and it’s time
    to be happy. I have read this post and if I could I want to suggest you some interesting things or tips.
    Perhaps you could write next articles referring to this article.
    I want to read even more things about it!

  14. You are really Against Cast Based reservation so Join AVP(Aarakshan Virodhi Party) call at 9911052562

  15. Dear sir and mam i want to join your AVP please cont me 9873584257 anil jha delhi

  16. अभी तो बस झांकी है ..राजपुतो ,ब्राह्मणो का आना बाकी है ..देश हित मे एक ही उपाय
    आरक्षण बंद करो

  17. ap sab ke vichar ka ek hi point of view he agar badlao lana he to hum sab ko ek hona hoga but i know aj kal sab selfish he koi age nahi ayega n only for someone’s reply i wnt to tell that ap open caste se he ya fir aarakshit is system se dono ka sirf or sirf loss ho raha he n plz dnt blame 2 anyone
    EVERYONE WANTS CHANGE BUT IN ACTUAL NOBODY
    pehle khud se shuruat karna sirf bate he karta koi nahi har koi corrupted he basssss or kuch nahi …….

  18. Arakshan ek bimari Ki tarh hai Jo logo ko kamzor banati hai jassa abhi kucch log ्obc््् ् may Ana chaite hai

  19. it,s very helpful ..to us


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