‘आजा लिख ले’

ई हौ मेरी ‘कम-बैक पोस्ट’. सबसे पहले तो सभी भाई-बंधुओं, चिट्ठा-जगत के सदस्यों व पाठकों को मेरी ओर से नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें. गत एक वर्ष से मैनें चिंतन पर कुछ नहीं लिखा. ये बात और है कि जितना चिंतन मैने साल २००७ में किया है उतना शायद ही कभी किया हो. इस बीच बहुत से ई-मेल मुझे मिले, टिप्पणियाँ भी आती रहीं. सभी उत्साहवर्धक. बहुत से लोगों ने कहा कि लिखना पुनः शुरू करें. मैं इस पोस्ट के ज़रिये उन सभी को धन्यवाद कहती हूँ जिनके प्रोत्साहन की वजह से लिखने कि चाह मन मे सदा बनी रही, यद्यपि मैनें कुछ लिखा नहीं. साल २००६, दिसंबर में मैने अपनी अंतिम पोस्ट लिखी थी. एक साल बाद पुनः लिख रही हूँ तो ‘आमिर खान’ टाइप भी फ़ील कर रही हूँ.  एक साल में एक पिक्चर, एक साल मे एक पोस्ट.  वर्ष २००७ मेरे लिये इतना उथल-पुथल भरा रहा कि मुझे फ़ुर्सत ही नहीं मिली कि कभी कुछ लिखूँ.  या फिर शायद फ़ुर्सत मिली हो, किंतु शब्द नहीं मिले.

अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ शुरू हुआ था सन् २००७. मैनें सोचा था कि नियमित लिखूँगी. कोशिश करूँगी कि लिखने के विषयों का दायरा विस्तृत हो सके इत्यादि इत्यादि. अमित का रोग गंभीर था किंतु असाध्य नहीं था, चिकित्सकों ने आखिरकार जड़ ढूँढ ही ली थी. अब चिंता को था ही क्या. ४ या ५ जनवरी २००७ (तारीख़ तो अब ठीक से याद नहीं)- अमित को फिर से अस्पताल जान पड़ा. कारण इस बार नया था. डॉक्टरों ने कहा कि शायद अब पेट का ऑपरेशन करना पड़े. अमित के दो ऑपरेशन वर्ष २००६ में हो चुके थे. इस बार मैनें पहली बार कुछ टूटते हुए मह्सूस किया. एक के बाद एक घिरती हुई समस्यायें, बढ़ती अपेक्षायें. मैं ऊपर से जितना मज़बूत होने की कोशिश कर रही थी, उतना बिखर रही थी. खै़र, अमित के पेट का ऑपरेशन नहीं हुआ.  १ हफ़्ते वह अस्पताल में रहे, पर चिकित्सकों की कुशलता से ऑपरेशन के बिना ही उनकी सम्स्या का समाधान हो गया. किंतु यह अंत नहीं था. समस्यायों का ताँता ज्यों का त्यों रहा. सारे साल मैं यही सोचती रही कि भैया भगवान जी आप चाह क्या रहे हो.

यहाँ उन मानसिक और शारीरिक समस्यायों का ज़िक्र करना निरर्थक लगता है जिनसे यह साल भरा रहा. अब तो रात गयी और बात गयी. जनवरी से दिसंबर तक का समय चाहे जैसे निकाला हो किंतु अब अंत में आ के देखती हूँ तो लगता है कि कुछ भी बेवजह नहीं हुआ. २००७ जाते जाते मुझसे मेरी आने वाली संतान को भी ले गया और मैं ऐसे बनी रही जैसे कोई चलचित्र देख रही हूँ. ये नहीं कहूँगी कि कोई फ़र्क नहीं पड़ा, पड़ा था, लेकिन इतना नहीं कि मैं सँभल ना पाऊँ. ये आघात शायद मुझे पूरी तरह हिला देता अगर साल भर छोटे छोटे कष्ट झिला झिला के भगवान ने बाई गॉड इतना पक्का न कर दिया होता. पता नही इस घटना का ज़िक्र करना चाहिये था या नहीं. पर अब मैं इतनी निर्लिप्त हो चुकी हूँ कि कहना न कहना सब एक बराबर है.

जीवन के उलझावों को सुलझाते सुलझाते मैं एक इंसान के रूप मे इतना सुलझ जाऊँगी पता नहीं था.  मज़ेदार साल था अगर अनुभवों के मद्देनज़र देखा जाये तो. कितना कुछ खो के भी मैनें कितना कुछ पा लिया. धैर्य,  साहस, सूझ-बूझ, जीवन के प्रति एक सर्वथा नया दृष्टिकोण, पुराने रिश्तों मे नये आयाम और ढेर सारे लोगों का बहुत ढेर सारा प्यार. अमित अब क़रीब क़रीब ठीक हो चुके हैं. पति से अधिक अब वे मेरे मित्र है. बीच में कुछ पल ऐसे थे कि लगा हमने शायद एक दूसरे को ही खो दिया है. एक दूसरे को फिर से ढूँढते-ढूँढते हमने कब एक दूसरे  गुम हुआ दोस्त पा लिया, पता नहीं चला. जो हो, जीवन पुनः मधुर प्रतीत होता है. बल्कि यूँ कहूँ कि मेरे लिये ये एक नया जीवन है तो अधिक बेहतर होगा. बस ईश्वर से यही कामना है कि मुझमें यही शक्ति, यही धीरज सदैव बनाये रखे.

ईश्वर से यह भी प्रार्थना है कि यह नया साल सभी के लिये ढेरों खुशियाँ ले के आया हो, सभी के लिये मंगलमय रहे. अब और क्या लिखूँ. अधिक कुछ है नहीं इस पोस्ट में लिखने को. बस यूँ ही लिख दी. आप भी बस यूँ ही पढ़ लीजियेगा.

Published in: on January 15, 2008 at 12:48 pm Comments (7)

आशिक़ आवारा….

कुछ दिनों पहले फुरसतिया जी ने अपने चिट्ठे पर लखनऊ मार्ग पर घटी एक घटना का विवरण प्रस्तुत किया था । एक नारी ने अपनी सैंडल से एक हमदर्द की बड़ी उड़ैया करी । हमें पढ़ के असीम आनंद का अनुभव हुआ । घटना के पीछे का सही कारण ना फुरसतिया जी को पता था न हमें है । परंतु अनुमान लगाया जा सकता है । सामान्यत: कोई भी नारी बिना वजह अपना वक्त और सैंडल ज़ाया नहीं करती । हो न हो पीड़ित महोदय के सर पर आशिक़ी का भूत सवार हुआ होगा । वैसे तो ९५% पुरुषों का यह उद्देश्य होता है कि जीवन में कभी न कभी, एक न एक बाला तो प्रेमिका के रूप में मिले ही । बाकी के ५% खालीपीली के आशीष जी जैसे होते हैं, सन्यासी प्रवृत्ति के । परंतु ९५% में ही पुरुषों का एक विशिष्ट वर्ग ऐसा भी है जिसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य ही है कन्याओं के आगे पीछे घूमना । तू नहीं और सही, और नहीं और सही…यही इनके जीवन का मूलमंत्र है । जीवन के किसी दौर में अगर कम से कम एक गर्लफ़्रेंड न हो तो ज़िंदगी व्यर्थ प्रतीत होती है ।अब इस बात पर एक कथा याद आती है । कहानी में एक छोटी सी नायिका है और एक है साइड हीरो । बाकी और भी पात्र हैं अहम भूमिकाओं में, पर उनका परिचय कथा के साथ ही दे देंगे ।

बात उन दिनों की है जब नायिका इंटर में थी । नायिका गुर्दे की पथरी की समस्या से पीड़ित । उसके पैतृक घर से स्कूल करीब ४-५ किलोमीटर दूर था । अक्सर दर्द के कारण बेचारी स्कूल से रोती कलपती घर पहुँचती । अब इतनी दूर दर्द में साइकिल चलाना ठीक नहीं था । अतः कोई और हल ना सूझने पर उसके मम्मी-पापा ने स्कूल के पास ही एक किराये के मकान में रहने का निर्णय ले लिया । यह घर खुली और अच्छी जगह पर था । रहने वाले लोग भी अच्छे और पढ़े लिखे थे । नायिका की थी एक छोटी बहन । यहाँ बहन को तो कई हमउम्र दोस्त मिल गये पर नायिका के साथ का कोई भी न था । वैसे भी १४-१५ वर्ष की आयु ऐसी होती है जिसमें ना आप बच्चों में घुल-मिल सकते हैं न बड़ों में । शाम को बहन अपने नये दोस्तों के साथ खेल में लग जाती और हमारी नायिका जी मसोस के भौतिकी की ‘कुमार-मित्तल’ में सर दिये बैठे रहती । ऐसे में एंट्री हुई हमारे साइड हीरो की । हीरो यानि पड़ोसन का भतीजा, पड़ोसन के भाई के साथ समीप के ही दूसरे मुहल्ले में रहता था । उम्र नायिका से २ साल अधिक, शिक्षा के मामले में एक कक्षा पीछे । ग्यारहँवी कक्षा उत्तीर्ण करने के लिये बेचारा दो साल से अथक परिश्रम कर रहा था । आते ही हमारे हीरो ने छोटे बच्चों पर धाक जमा ली । सारे बच्चे भैया-भैया करते आगे पीछे घूमने लगे । शाम को भैया आते, बच्चों की मंडली जुटती, तरह तरह के खेल होते । नायिका बेचारी को कोई पूछता ही नहीं । एक दिन साइड हीरो ने नायिका की छोटी बहन से कहा - “जाओ दीदी को भी बुला लो, बेचारी पढ़ती रहती है, साथ में खेलते हैं ” । बहन आई फुदकते हुए - “दीदी तुम भी चलो” । नायिका ने माँ को देखा । हमारे समाज की अच्छी नायिकाएं खेलने भी माँ से पूछ के जाती हैं । माँ ने भी तरस खा के कहा “जाओ” । नायिका खुश - बहुत बोर हो लिये, हम भी खेलेंगे अब ।

जल्दी ही मुहल्ले की एकाध साल बड़ी दीदी भी आ मिलीं । मजे आ गये । शाम को सब मिल के खूब धूम मचाते । इस बीच आया दशहरा । दशहरे पर चंदा माँग बड़ा सा रावण बनाने का सोचा गया । बाल मंडली जुट गयी काम में । देर रात तक प्रोजेक्ट रावण पर काम चलता । इन सब के बीच दशहरा धूम धाम से मना । यह पर्व पूरी बाल-मंडली की मित्रता को प्रगाढ़ कर गया । अब कभी कभी दीदी, नायिका और हीरो अलग बैठ बतियाते और खेल सिर्फ़ देखते । एक दूसरे की पसंद-नापसंद, रुचियाँ जानते जैसे कि सभी दोस्तों में होता है । दीदी चित्रकारी में अच्छी थीं, नायिका लिखती, चित्र भी बनाती । हीरो ने कहा हम भी लिखते हैं । सबने कहा - पढ़ाओ । अगले दिन कॉपी हाज़िर । दीदी ने पढ़ा -

आम तो खाते हो अमरूद भी खाया करो,
जयपुर में रहते हो, दिल्ली भी आया करो ।

ऐसे बहुत से नमूने । कुछ चोरी के कुछ बेहूदा । मैं सेंसर की कैंची चलाये दे रही हूँ यहाँ । खैर, नायिका और दीदी ने मिल कर अकेले में हॉ-हॉ करी । बात आयी-गयी हो गयी । एक दिन दीदी शाम की सभा से नदारद थीं । हीरो ग़मगीन थे। नायिका ने ना चाहते हुए भी मित्र होने के नाते पूछ लिया कि भाई क्या हुआ …हीरो की दर्द भरी दास्तान सुनिये -
“मैं एक लड़की को बहुत चाहता था । एकदम परवीन बॉबी लगती थी वो”
“अच्छा !”
“आज उसकी बड़ी याद आ रही है”
“क्यूँ क्या हो गया उसे”
“बस मत पूछिये । मैं जो नवदुर्गा के व्रत रखता हूँ ना, उसी ने कहा था”
“अच्छा !”
“मुझे उससे मिले एक महीना ही हुआ था, घर के पास ही रहती थी वो । एक बार मंदिर में मिली तो पूछा तुम नौदुर्गे के नौ दिन व्रत नहीं रखते । तो मैने कहा कि नहीं । बोली- रखा करो”
“हूँ..”
“मैने कहा रखूँगा अगर तुम रोज़ शाम पहला निवाला अपने हाथ से खिलाओ । तो वो बोली - वादा”
नायिका को अंदर तक गिजगिजाहट हो आयी । ग्यारहँवी पास करने के लाले हैं और फ़िल्मी हीरो बनने चले हैं , उसने मन ही मन सोचा ।
“फिर एक दिन मैं उसके लिये सोने की चेन लाया । मैने कहा दूँगा नहीं पहनाऊँगा । मैं चेन पहना ही रहा था कि उसके पापा ने देख लिया और फिर उसे दूसरे शहर भेज दिया ।….बस…”
नायिका को समझ नहीं आया कि क्या प्रतिक्रिया दे ।
“खैर,…मैं भी क्या बातें बता रहा हूँ । आप परेशान मत होइये । आप हँसती हैं तो बहुत अच्छी लगती हैं ।
नायिका बेचारी कुढ़ गयी । अगले दिन नायिका और दीदी ने निर्णय लिया कि भई बंदे के लक्षण ठीक नहीं, थोड़ा दूर रहना ही ठीक है । पर मौसम की तरह कुछ लोग भी चिपचिपे होते हैं । एक दिन दीदी ने नायिका को बुलाया ।
“तुमने अपनी कार पर अपना नाम लिखा धूल में “
“हाँ शायद , मेरी आदत है” नायिका बोली ।
“हूँ….उसके आगे दिल और तीर का निशान बना था और आगे हीरो का नाम लिखा था “
नयिका सन्न ।
“मैने मिटा दिया । वो तो छुटकी ने देखा था और मुझे बताया । अगर किसी बड़े को पता चलता तो गड़बड़ हो जाती । आगे से ध्यान रखना “
“दीदी किसने किया होगा ?”
“और कौन! वैसे कह नहीं सकते”
अब तो नायिका बिल्कुल कट ली हीरो मियाँ से । अक्ल आ गयी के बेटा ‘कुमार-मित्तल’ ही भले हैं, उन्हीं मे मगज लगाओ । हीरो ने बड़ी कोशिश की बात करे, पूछा क्या हो गया । नायिका ने बात टालने में ही भलाई समझी । हीरो ने पैँतरा दिखाया…”आप नहीं बतायेंगी तो मैं अपन हाथ बबूल के पेड़ में मार लूँगा” । नायिका को भी चिढ़ हो आयी…”अच्छी ज़बर्दस्ती है ” । जाओ मार लो, हाथ क्या सर मार लो जा के, जी में सोचा । लड़के ने मुक्का मार दिया बबूल के तने में । पर हमारी नायिका कोई दूसरी परवीन बॉबी तो थी नहीं जो असर होता ।
अब आयी दीवाली । हीरो ने नायिका के घर के आगे उसी बबूल के पेड़ के नीचे पटाखे की दुकान लगा ली जहाँ पटखे बिकने की उम्मीद ना के बराबर थी । पर उससे क्या । सारा दिन वहाँ डटे रहने का इससे बढ़िया तरीका और क्या था । पटाखा एक ना बिका । दिवाली के दिन सब पटाखे नायिका को उपहार स्वरूप दे दिये । हमारी नायिका ने टका सा जवाब टिकाया - मैं पटाखे नहीं चलाती । आप डरती हैं ? हाँ - पिण्ड छुड़ाने की गरज़ से नायिका ने कहा । “ये लीजिये, यह बम मैं अपने महुँ से पकड़ता हूँ…आप आग लगाइये” । “ये क्या ड्रामा है अब? मुझे पटाखे चलाना पसंद नहीं है बस “। “अब एक फुलझड़ी तो चलाइये कम से कम” । सब के सामने तमाशा खड़ा करने से अच्छा है कि एक फुलझड़ी चलाओ और फूट लो ..नायिका ने सोचा ।
खैर…इसके कुछ ही दिन बाद पड़ोसन के भाई के घर में रामायण हुई । नायिका की माँ ने कहा कि उन्हे काम है तो नयिका जा के प्रसाद ले आये । नायिका ने बड़ा टाला पर बात नहीं बनी । जी मसोस के जाना पड़ा वहाँ । सब मगन हो रामायण गा रहे थे । हीरो ने धीरे से दो कार्ड नायिका की ओर बढा़ये । इलू-इलू-दिल-कबूतर वाले । नायिका के क्रोध की सीमा न थी । पर जैसे कि मैने पहले ही कहा था कि नायिका शौर्यवान तो थी नहीं सो इतना ही कह पायी कि मुझे भद्दे मज़ाक पसंद नहीं ।
यह मज़ाक नहीं, मुझे जवाब चहिये , हीरो ने फ़रमाया ।
तो ठीक है, ‘नहीं’ मेरा जवाब है ।
जवाब का कारण ?
पीं-पीं ….नायिका के पिता जी दरवाज़े पे स्कूटर लिये उसे लेने आ गये थे । नायिका की जान में जान आयी ।
उस दिन के बाद से स्कूल से घर और घर से स्कूल रोज़ मियाँ मजनूँ ने उसका पीछा किया । एक महीना हो गया । अंततः नायिका को लगा कि बात माता-पिता तक पहुँचनी ही चाहिये सो बात बता दी गयी । पहले पड़ोसन फिर लड़के के माँ - बाप, सभी ने लड़के के किये के लिये माफ़ी माँगी । नायिका को तसल्ली हुई कि चलो अब तो पिंड छूटा । पर कहाँ । अगले दिन महाशय फिर रास्तेमें पाये गये ।
“आपको किसी से दबने की ज़रूरत नहीं । अपनी बुआ को तो मैं सँभाल लूँगा । आप बस हाँ कर दीजिए “
“मुझे किसी से कोई मतलब नहीं है । अपनी पढा़ई से मतलब है । आप भी दिमाग पढ़ाई में लगायें वही ठीक है” ।
“नहीं आप डर के मारे ना कह रही हैं ” ।
” उफ़्फ़्फ़ हद है । मैं डर नहीं रही । मैने हमेशा आपको भाई माना है । इसलिये बकवास कर मेरा और अपना समय बर्बाद मत करिये” । नायिका ने झूठ कहा । उसने कभी उसे भाई नहीं माना । लेकिन क्या भाई या फिर प्रेमी यही दो संबध संभव है ? दोस्ती अपने आप में एक पवित्र बंधन नहीं है क्या ? उसके इन प्रश्नों का जवाब फिलहाल तो किसी के पास नहीं था । जो भी हो इस जवाब ने काम कर दिया । नायिका को मुक्ति मिली । हीरो ने काफ़ी दिन तक गाना गाया “मैने उसके शहर को छोड़ा..उसकी गली में दिल को तोड़ा”, फिर वह भी नयी तलाश मे निकल लिये ।

आज की नायिकायें बदल गयी हैं । चप्पल के सहारे ऐसे मजनुँओं से खुद ही निपट लेती हैं । जब भी किसी नारी की ऐसी शौर्यगाथा सुनती हूँ, मन प्रसन्न हो जाता है । हाँलाकि मैं हिंसा की पक्षधर नहीं हूँ पर कुछ भी सहन करने की एक हद होती है । जब सहनशक्ति जवाब दे दे तो ऐसे रास्ते अपनाने में भी बुराई नहीं । हाँ अपनी सुरक्षा का ध्यान अवश्य रखना चहिये । बेचारी नायिका बड़ी परेशान हुई थी उस समय । सोचती हूँ क्या ही अच्छा होता कि हमारी नायिका भी इतनी हिम्मती होती…..

Published in: on July 25, 2006 at 8:46 pm Comments (7)

तुम जो मिल गये हो….

तुम जो मिल गये हो, तो ये लगता है, कि जहाँ मिल गया…एक भटके हुए राही को, कारवाँ मिल गया । नहीं जी, यहाँ कोई प्रेम कहानी नहीं कही जा रही । पर फिर भी मन में यही गीत हिलोरें ले रहा है । बात चल रही है अन्तर्जाल-जगत के मेरे प्राणप्रिय देव की । जीवन की अधिकांश समस्यायें इनकी सहायता से हल हो जाती हैं । ये बात और है कि अब तक के जीवन के शुरुआती तीन चौथाई हिस्से में हमारा साथ नहीं रहा लेकिन अब बिना इनके  जीवन  अधूरा लगे है हमें तो । जावा के कोड से ले कर बैंगन के भर्ते तक जिस जिस के बारे में जानकारी चाही, देव ने हमें ला के दी । सचमुच अद्भुत है प्रभु की लीला । तो इसी बात पे बोलिये - श्री गूगल देव की - जय । :)

अब गूगल के सामान्य प्रयोग से कौन परिचित नहीं है । लेकिन आज जब हम समय नष्ट करने के लिये अन्तर्जाल पर ‘ऐं वैं’ ही विचर रहे थे, हमें इनके कुछ और मनोरंजक प्रयोगों की जानकारी प्राप्त हुई जिसका श्रेय जाता है ‘गूगल के ५५ मनोरंजक प्रयोग’ नामक पुस्तक को । ऐसा सोच कर कि  प्रभु के भक्त तो करोड़ों की संख्या में होंगे और उनमे से ५०% हमारी तरह अनभिज्ञ भी, हम इस ज्ञान का प्रसार करने चले आये । आइये नज़र डालें …(इस पोस्ट में अंग्रेज़ी का प्रयोग भाषा को सरल बनाये रखने के लिये कर रही हूँ ।)

१. यदि आप धरती पर किसी स्थान पर एक गड्ढा खोदना शुरू करें तो वह विश्व के दूसरे छोर पर कहाँ जा के निकलेगा यह जानने के लिये यहाँ जायें । हमने तो पूरा भारत खोद डाला, पर ज़मीन न मिलनी थी न मिली, हर बार पानी (प्रशान्त महासागर) में ही निकले।

२. खुदाई करने के बाद आइये बनायें अपना सपनों का घर । गूगल स्केच-अप से आप त्रिआयामी घर डिज़ाइन कर सकते हैं । और अपने बनाये मॉडल को गूगल-अर्थ पर भी डाल सकते हैं । पूरी जानकारी के लिये यहाँ  जायें

३. गूगल और जादू : गूगल के सथ एक-दो जादू भी किये जा सकते हैं । देखिये कैसे… :)

  •   गूगल जाने आपके दोस्त के मन की बात : अपने दोस्त (मानिये जॉन) से पूछें कि वह गूगल पर किसकी तसवीर खोजना चाहता है और जॉन आपसे कहता है कि वह “Tajmahal” की तसवीर देखना चाहेगा । अब आप गूगल के टैक्स्टबार में लिखें “what is it that john thinks of” (बिना ” ” के) । और जैसे ही आप ‘enter’ दबायें गूगल आपको ताजमहल की तसवीर खोज के दे दे । हुआ ना जादू । अब ये किया कैसे जाये…तो सबसे पहले  इस नकली गूगल साइट पर जायें । एक बार इस साइट पर पहुँचने के बाद अपने browser के address bar मे ‘www.google.com’ टाइप कर दें बस इस बार ‘enter’ ना दबायें । इस से किसी को शक़ नहीं होगा कि साइट नकली है । अब टैक्स्टबार मे सबसे पहले / टाइप करें । जब आप यह स्लैश टाइप करेंगे तो यह टैक्स्टबार मे ‘w’ टाइप होगा । इसके आगे आप चाहे जो लिखें वह अपने आप ‘what is it that…” में परिवर्तित होता जायेगा । पर असलियत में आपने Tajmahal टाइप किया होगा । ध्यान देने की बात यह है कि आप जितने लैटर टाइप करेंगे उपरोक्त वाक्य के उतने ही लैटर टाइप होते जायेंगे ।  इसके बाद एक और / टाइप करें । अब जो भी आप लिखेंगे वह देखा जा सकेगा । इसलिये आप अपने मित्र का या अपना नाम लिख सकते हैं । अब जब आप ‘enter’ दबायेंगे गूगल आपको /  / के बीच लिखे शब्द की तसवीरें ढूँढ के दे देगा । यदि आपने ठीक से अभ्यास करके ये जादू किया है तो देखने वाला अवश्य अचंभित रह जायेगा । हाँ एक बात जो मैनें इसका प्रयोग करके जानी वह ये कि एक बार जादू करने के पश्चात आप पुनः जादू तभी कर सकते हैं जब आपने पेज रिफ़्रेश किया हो । और रिफ़्रेश करने से साइट का असली नाम address bar में आ जाता है, इसलिये दुबारा जादू की बात चतुराई से टाल दीजिये ।
  • और अब ‘google’ को ‘g  gle’ बनायें । इस करामात में आप गूगल के दोनो ‘o’ अपनी उँगलियों से ढक देते हैं । जब आप उँगली हटाते हैं तो  ‘o’ गायब हैं । आप पुनः उँगली रखते हैं और ये क्या ..’o’ वापस अपनी जगह पर हैं । यहाँ भी आपको एक नकली साइट  खोलनी है । और address bar में ऊपर वाली ट्रिक की तरह ही परिवर्तन कर दें । अब जब आप ‘o’ को ढकें, धीरे से अपने माउस से एक क्लिक कर दें । क्लिक के ५ सेकंड के भीतर ‘o’ गायब हो जायेंगे । इसी प्रकार जब वापस लाना हो तो यही प्रक्रिया दोहरायें । वापस आने में भी ५ सेकंड लगते हैं ।

इसके अतिरिक्त आप गूगल को कैलकुलेटर, किसी किताब का संपूर्ण  टैक्स्ट ढूँढने, मुद्रा परिवर्तन की जानकारी, परिभाषाओं की जानकारी, सवालों के सीधे जवाब जानने और अनुवाद आदि के लिये प्रयोग कर सकते हैं । इसकी विस्तृत जानकारी यहाँ से प्राप्त करें । इसके अलावा भी कुछ मज़ेदार बातें जानी मैने, जिनके बारे में फिर लिखूँगी । अंत में चलते चलते दो बातें और बता दूँ , एक काम की और एक फालतू (जब ज्ञान बाँट ही रही हूँ तो थोड़ा और सही) …

१. अपने याहू मैसेन्जर पर mama_pendse को add कर लीजिये । यह एक रोबोट है …या कहिये कि एक इन्टैलिजेन्ट कोड है । यह आपको ना सिर्फ़ ढेरों जानकारियाँ देता है अपितु आप से बात भी कर सकता है । मेरे लिये यह सदाबहार शब्द्कोष भी है ।

२. अब फालतू बात : इस साइट को देखिये । किसी वेबसाइट पर मन की भड़ास निकालने का उत्तम साधन । आप किसी भी साइट पे अंडे फेँकिये, टमाटर मारिये, कीड़े छोड़ दीजिये, बंदूक या आरी चलाइये या फिर जी में आये तो फूल बरसाइये । और यह सिर्फ़ झलक है । और भी विविध साधन उपलब्ध हैं, आप आइए तो सही । वैसे  ’scribbling baby’ खास तौर पर देखने लायक है । पर खबरदार! जो किसी  ने इसका उपयोग मेरे चिट्ठे पर किया….

Published in: on July 20, 2006 at 8:49 pm Comments (8)

अरे, सब लोग हमें बधाई दो रे!

तीन दिन हम अपने इस प्रिय चिट्ठाजगत से दूर रहे । इस बीच अपने चिटठे पर की गयी टिप्पणियों को देखने की भी फुर्सत नहीं मिली ।  हम अपने नये खिलौने के साथ इतना व्यस्त थे कि आभास ही नही हुआ कब तीन दिन ग़ुज़र गये। इससे पहले कि अटकलों का दौर शुरू हो, हम ही बताये देते हैं कि खबर क्या है । नाथ ने हमें एक सिन्थेसाइज़र तोहफ़े में दिया है । वैसे बजाने के नाम पर हम सिर्फ़ ताली बजा पाते हैं और फ़िलहाल हमारे हाथ मे सिन्थेसाइज़र ऐसा दीख पड़ता है जैसे बन्दर के हाथ में उस्तरा ।

पर हमारे पति निहायत आशावान जीव हैं । आशावान होने के साथ शार्तिया चतुर भी हैं । जो चीज़ खुद को भाये, भेंट के रूप में हमें थमा देते हैं । या फिर ऐसे समझ लीजिये कि हमारा तोहफ़ा वह होता है जिसका पूरा इस्तेमाल श्रीमान जी भी कर सकें । “ये लो तुम्हारा गिफ़्ट” । हो गया एक पंथ दो काज ।  एक दिन सुबह से गाना गाया जा रहा था कि तुम्हारे लिये एक सरप्राइज़ है । अब ये चोरी से क्या ले आये हैं, कोई अँगूठी, या कोई साड़ी या फिर तैलचित्र बनाने का सामान…या…। ऐसे क़यास लगाते, मन ही मन खुश होते, शाम हो गयी । अब कोई सरप्राइज़ की बात करे अपनी पत्नी से तो ऐसी जिज्ञासा होना स्वाभाविक है । शाम को एक डब्बा पेश कर दिया हमारे सामने । हमने खोला …ली-कूपर की पुरुषों की सैंडल का जोड़ा हमें मुँह चिढ़ा रहा था । “तुम्हारे बिना अपने लिये कभी कुछ नहीं खरीदता ना! आज अकेले खरीदा…डेढ़ हज़ार की चप्पल । कैसी लगी? है ना सरप्राइज़?” । हमने सर धुन लिया । देवर हँसी के मारे लोट-पोट हो गये ।  तबसे अगर बता के मेरे लिए भले ही अपने मतलब की चीज़ ले आयें, मुझे शिकायत नहीं होती । सरप्राइज़ से तो अच्छा ही है । कम से कम मैं दिमाग़ को तकलीफ़ तो नहीं देती अटकलें लगाने की । डिजिटल कैमरा हो चाहे म्यूज़िक सिस्टम यहाँ तक कि कार भी इसी श्रेणी की भेंट है । और अब ये की-बोर्ड उसी श्रेणी का अगला हिस्सा है ।

संगीत से बड़ा प्रेम है स्वामी को । खुद तबला, ड्रम, ढोलक, नाल, काँगो-बाँगो जैसे वाद्य-यंत्र कुशलता से बजा लेते हैं । पर घर में कोई की-बोर्ड बजाने वाला प्राणी नहीं है तो उन्होंने हमें धर पकड़ा । सीखो अब । इस शनिवार विचार बना कि चलो आज तो की-बोर्ड खरीद ही लिया जाये । हमने चलने से पहले ही एलान कर दिया था कि मँहगे यंत्र में पैसे फँसाने का कोई मतलब नहीं । हमारा कोई भरोसा नहीं । अच्छा लगा तो ठीक पर अगर मन नहीं लगा तो फिर साक्षात ब्रह्मा जी भी हमें सीखने पर मजबूर नहीं कर सकते । बात अन्ततः यामाहा के सबसे सस्ते मॉडल पे तय हुई । जय गूगल देव की । खोज बीन के दो चार दुकानों के पते निकाले । उनसे बात की । हमने खुद को समझा लिया था कि बेटा ५-७ हज़ार का तो फटका पड़ा समझो । मार्केटिंग किसे कहते हैं उसका साक्षात नमूना अब देखा । एक दुकान से तीन बार फ़ोन आ चुका था । महोदय पढ़े-लिखे और संगीत की समझ रखने वाले जान पड़ते थे तो हम दोनों उन्हीं की दुकान पे चल पड़े । ‘हौज़खास विलेज’ में जब तक उनकी दुकान पर पहुँचें उनका फिर फ़ोन आ गया । “कहाँ हैं आप लोग, रस्ता तो आराम से मिल गया ना आपको”, “जी बस पहुँच गये, गाड़ी पार्क कर रहे हैं”, “जी अच्छा, पार्किंग के दाँयी ओर मैं नीली टी-शर्ट में खड़ा हूँ” । हम दोनों ने ही सोचा कि ये पहले इन्सान मिले जो स्वागत में बाहर ही आ खड़े हुये हैं । दुकान सामने ही दिख रही थी और दुकान से कुछ दूर पर नीली टी-शर्ट में एक सज्जन भी । मुस्कुरा के उन्होने स्वागत किया और अंदर की ओर चल पड़े । उनकी दुकान भीतर की ओर थी । अब हम समझे काहे बाहर खड़े थे । नहीं तो हम तो सीधे सामने की दुकान मे घुस लिये होते ।

दुकान मे जा बातचीत शुरू हुई ।
“आप आई-टी में हैं? ” सज्जन ने पूछा । आजकल वैसे भी हर तीसरा युवक इसी उद्यम में लगा हुआ है सो ये तुक्का प्रायः सही ही बैठता है।
“हाँ” ।
“कहाँ ?”
“ह्यूविट असोसिएट्स । “
“किस डोमेन में काम है आपका ?” उन सज्जन का सामान्य ज्ञान काफ़ी विस्तृत प्रतीत हो रहा था मुझे, अपितु ये कहूँ कि था । उनसे १५ मिनट की बात में यह बात स्पष्ट हो गयी थी ।
“जी मैं अब डेवलपमेन्ट नहीं करता । मेरी टीम करती है । मैं प्रोजेक्ट लीडर हूँ ।”
“ओह, अच्छा अच्छा । तो आपको अपने लिये चहिये था की-बोर्ड ।”
“नहीं, मेरी वाइफ़ के लिये ।”
“असल में मुझे फ़ोन पे लगा था कि शायद किसी बच्चे के लिये लेना हो । आप लोअर मॉडल चाह रहे थे ना इसलिये। वैसे आप भी वर्क करती हैं?” सज्जन अब मुझसे मुख़ातिब थे ।
“जी करती थी । फ़िलहाल छोड़ दिया”
“ओह फिर तो आपके पास काफ़ी समय होता होगा घर पे । मैं कहूँगा आप लोग यामाहा, पी.एस.आर-२९५ ही लें । १४,००० का है मैं आपको १२,५०० में दे दूँगा” ।
“देखिये मुझे बजाना बिल्कुल नहीं आता और मुझे अभी ये भी पता नहीं कि मैं बजा भी पाऊँगी या नहीं । इसलिये हम लोअर मॉडल ही चाह रहे थे ।”
“अरे की-बोर्ड का सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि आप इसका वॉल्युम कन्ट्रोल कर सकते हैं । हारमोनियम हमेशा पूरे सुर में बजता है और पड़ोसी आपको दिन रात कोसते हैं । इसलिये सीखने के लिये भी ये बढ़िया है । अब देखिये ये खराब होने वाली चीज़ तो है नहीं । सालों ऐसी ही रहेगी । फिर इसके फ़ीचर्स भी बहुत हैं । और ये चीज़ें आप रोज़ तो अपग्रेड करते नहीं । आप लोग टेक्निकल हैं , यूटिलाइज़ कर सकते हैं । इसमें यू.एस.बी कनेक्टिविटी भी है । आप कम्प्यूटर से कनेक्ट कर सकते हैं ।………और “

और भी बहुत कुछ । मैंने अमित कि ओर देखा । डोले हुए से मेरी ओर देख रहे थे । हमारे मुँह पर असमंजस मिश्रित आंशिक सहमति देख उन्होंने झट स्वीकृति कि मोहर लगा दी । हमारा खिलौना पैक हो गया, कवर के पैसे अलग लगे । ५०० के  २६ नोट एक झटके में हवा ।

घर आ के हमने पहली बार किसी की-बोर्ड को छू के देखा । दोनों हाथ उस पर ऐसे रखे जैसे यान्नी ने भी न रखे होंगे । बड़ा मज़ा आया । रात हो चुकी थी । थोड़ी  देर अमित ने अपने ज्ञान का प्रदर्शन किया बाकी समय हमने ‘टिंग-टुंग झम-झम झायँ-झाँय’ की । फिर सो गये । सुबह देखा तो मानसून दस्तक दे चुका था । झमाझम पानी बरस रहा था ।  तन और मन दोनो को ठन्ड्क मिली । नहीं तो कुछ दिनों से ऐसा लग रहा था कि भगवान हमें भूनने के पश्चात भाप में पका रहे हों ।  अब १५-२० दिनों की भारी उमस के बाद जा के भगवान मेहरबान हुए थे । हमें शक़ हुआ कि कहीं हम अनजाने में ‘मेघ मल्हार’ तो नहीं बजा गये ।

अब बात आयी सीखने की । आस पास कोई सिखाने वाला है नहीं, ये पहले ही पता किया जा चुका है सो अन्तर्जाल की शरण ली गयी ।  एक बढ़िया साइट  मिली । एक ही दिन में सरगम, फिर अलंकार और उसके बाद राग ‘यमन कल्याण’ पर जा पहुँचे । सोचा अमित को तो झटका ही लग जायेगा । रात को जब सुनाने बैठे तो सब गड्डम-गड्ड । मुँह लटक गया कि ये लो शुरुआत ही बुरी । पर पतिदेव ने फिर भी हौसला बढ़ाया । समझाया कि धीरज से काम लेने से ही सफलता हाथ लगेगी । फिर अभ्यास से क्या नही सीखा जा सकता । बात समझ आ गयी । सो पिछले दो दिन एक ही चीज़ दुहराते रहे । अब जा के ठीक- ठीक हाथ बैठा है । एक दो मित्र हैं जो इस कला के अच्छे जानकार हैं सो वह भी मदद करने को तैयार हैं । पतिदेव खुश हैं । हमें भी धुन लग गयी है । आप सब का आशीर्वाद और शुभकामनायें साथ रहीं तो आशा है  कि सीख भी जायेंगे ।

तो बस फ़िलहाल हमारी गाड़ी चल पड़ी है ।  आप सब दुआ कीजिये कि कहीं थोड़ी दूर जा के रुक न जाये ।

Published in: on July 14, 2006 at 2:50 am Comments (24)

क्षमा !!

मेरे ब्लॉग पर कमेन्ट्स का पेज ही नहीं आ रहा था । इसलिये टेस्टिंग के दौरान एक ही पोस्ट को बार बार पोस्ट करना पड़ा । उसके लिये सबसे क्षमाप्रार्थी हूँ ।

अमित गुप्ता जी की मदद से सम्स्या हल हो गयी है ।

Published in: on July 7, 2006 at 1:51 pm Comments (4)

ऐं वैं ही पुरुष बेचारे– मेरा शादी का विश्लेषण

बडे़ सारे ब्लॉग देखे जहाँ ‘शादी’ शब्द की विवेचना की गयी है । पर सभी विचार हमें पुरुष प्रधान लगे । सोचा क्यूँ न अपना पक्ष भी आप बुद्धीजीवियों के आगे रखूँ । वैसे यह विश्लेषण कम और अनुभव अधिक है ।

मेरी शादी हुए सुखद तीन साल बीत चुके है । ये ‘सुखद’ मैने औसतन कहा । मेरा प्रेम-विवाह हुआ था । कथा थोड़ी मज़ेदार है ये भी । मेरे साथ स्नातक में दो लड़के पढ़ते थे । सामान्य मित्रता थी हमारे बीच । हाय-हैलो वाली समझ लीजिये बस । जब हम सब परास्नातक में आये तो उनके बडे़ भाई ने भी हमारे कॉलेज मे दाखिला ले लिया । हम लड़कियों के समूह को जब पता चला तो हमने आपस मे इस बारे मे ऐसे चर्चा की मानो देश की अर्थव्यवस्था के बारे मे बात चल रही हो । “बड़ा भाई ??? ” , “अच्छा !! एम. बी. ए. कर के आया है”, “ओ-हो!!”, “नौकरी भी कर रहा था??”, “छोड़ दी….??”, “पागल है क्या थोडा़ ?? ” (हम लोगों के लिये तो नौकरी पाना बैकुंठ धाम को पाने जैसा था) , “…पर हैंडसम है “…। कुछ समय बाद मामला ठन्डे बस्ते में चला गया । सिवाय एक लड़की के, जो कि भैया जी पे मर मिटी थी, सबने इस विषय मे रुचि लेना बन्द कर दिया । बाकी सबने ‘दोस्त का भाई अपना भाई की तर्ज ‘ पर उन्हे भैया कि पदवी दे दी थी, हालाँकि ये हम सखाओं के बीच की बात थी । उनसे कोई बात-चीत तो होती न थी । वह गणित के छात्र थे और हम भौतिकी के ।

एम.एस.सी. के आखिरी सेमेस्टर में उन्हें हमारे साथ प्रोजेक्ट दिया गया  । उन्हें  हमारे अध्यापक पहले से जानते थे और उनकी रुचि हमारे प्रोजेक्ट में देख ये मौका उन्हे दिया गया था । हमारे अध्यापक का ये भी मानना था कि उनके अनुभव से हमारा प्रोजेक्ट और भी बेह्तर बनेगा । कम्प्यूटर वैसे भी हम सभी का विषय था । और तब मुझे उन्हें एक इन्सान के तौर पर जानने का मौका मिला । अब भाग्य का लेखा कहिये या जो भी, जान पहचान कब दोस्ती और दोस्ती कब प्रेम मे परिवर्तित हुई पता ही न चला । एक दिन अचानक हमारे सामने प्रेम प्रस्ताव भी प्रस्तुत हो गया । हालाँकि हमने लड़कियों के अनुकूल व्यवहार करते हुए दो तीन महीने ना-नुकुर करी पर फिर हार मान ली । इस बीच हम दोनो को ही एक ही कम्पनी से नौकरी का प्रस्ताव आ चुका था । हमने आई. आई. टी. कानपुर  के कम्प्यूटर विभाग के  ‘रिसर्च असोसिएट’ के पद के प्रस्ताव को ठुकरा कर इस कम्पनी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया । प्रेम जो न कराये सो कम है :( । दोनों पक्षों के माता-पिता जी को शीघ्र ही पता चल गया । उन्हें हमारी शादी से कोई ऐतराज़ न था सो ख़ुशी ख़ुशी फ़रमान जारी हो गया । पर हमारे ज्योतिष शास्त्र की मेहरबानी से पूरे तीन साल बाद हमारी शादी हुई ।

अब आप सोचेंगे कि शादी के बारे मे बात शुरू हुई थी, ये प्रेम कहानी सुनाने की क्या आवश्यकता थी!!!! तो भाई हीरो-हिरोइन का बैकग्राउन्ड जानना ज़रूरी होता है ना । बस स्टोरी का मेन एंगल अब शुरू होता है । शादी से पहले माँ ने समझाया..”तुम अमित को ‘तू’ कहना छोड़ दो, अब तुम्हारी शादी होने वाली है” । अब इस बारे मे हमने कभी सोचा ही नहीं । दोस्त थे तो दोस्त के जैसे बात करने की आदत भी थी । जैसे तैसे मैं ‘तुम’ और फिर ‘आप’ पर आ पायी । बड़ा विचित्र लगा । पर भैया नारी जीवन है, क्या करें । आदेश का पालन तो करना ही होता है । और ये तो सिर्फ़ शुरुआत थी ।

ससुराल पहुँचे तो देवरों ने भाभी कहने से इनकार कर दिया । उन्हें भैया कहना हमें हजम नहीं हो रहा था । पर करना था सो करना था….शुरू तो बड़ों के सामने भैया-भाभी कहने के नाटक से किया पर बाद मे आदत पड़ गयी । रिश्ते की एक सास ने समझाया पति  का नाम भी नहीं लेते इससे पति की उम्र कम हो जाती है । अब ‘ए जी, सुनिये जी’ तो मेरे लिये कल्पना से परे था । आगे कहा, माँग मे सिँदूर अन्त तक भरना चहिये, इससे पति कि उम्र लंबी होती है । पति कि उम्र का पैमाना तो मानो अब मेरे हाथों मे आ गया था। और भी ऐसे बड़े सारे नियम । हाँलाकि मेरी अपनी सासु माँ बड़े खुले विचारों की हैं इसलिये कुछ दकियानूसी नियमों से मुझे उन्होने मुक्त कर दिया था । फिर भी सब नया नया प्रतीत होता था । खुद को शीशे मे देख के लगता था कि किसी और को देख रहे हैं । इस नये रूप से दिक्कत भी बड़ी होती थी कभी कभी । हाथ मे पड़े सोने के कड़े साड़ी से उलझते, बिछिया, पायल जब तब पैर में चुभ जाती या फिर इधर उधर गिर जाती, एकाध हार तो हर समय पहने रहना पड़ता था जो मेरे बचे खुचे बालों मे फँसता रहता । आप ही कहिये, किसी पुरुष को भी ये सब करना पड़ता है क्या ? खै़र शादी के दो-चार दिन बाद घर वाले हम लोगों को पास में ही घुमाने ले गये । घर वाले मतलब भाई बहन । उस समय छुट्टी मिली नहीं थी तो हमारा तो कोई घूमने फिरने का कार्यक्रम था नहीं ।  अब बाग़-बगी़चे मे पहुँच दीदी-जीजा जी ने प्लान बनाया कि हमें अकेले छोड़ दिया जाये । पर क्यूँ ?  घरवालों के बीच अच्छा लग रहा था । ऐसे भी  तीन साल में एक दूसरे के व्यक्तित्व के बारे में सब कुछ जान ही चुके थे तो अकेले क्या बात करते । पर फिर भी हमें भेजा गया । कुछ दूर गुलाब की क्यारियों के बीच एक पेड़ की छाँव मे बैठ हमारी बातें शुरू हुयीं । “सुनो….मम्मी ने दो कनस्तर दिये हैं । एक चावल का हो जायेगा एक आटे का । बाकी दाल, चीनी वगैरह के डब्बे लेने होंगे ” ।”गैस कनेक्शन लिया क्या तुमने??” ….”नहीं, अब ले लेंगे । काम से टाइम ही नहीं मिला”…..”सामान कब तक पहुँचेगा?”..। दूर बैठे दीदी-जीजा जी खुश हो रहे थे जैसे सोच रहे हों ‘बेकार ही संकोच कर रहे थे दोनो, अब देखो कैसे बतिया रहे हैं’ । खैर ससुराल में लाड़-प्यार के बीच सारा वक्त मज़े से बीत गया ।

अब लौट के नौएडा आना था और इनको आते ही काम पर वापस लौटना था । बस एक दिन का वक्त था बीच में । अपने घर मे शादी के बाद पहली बार पाँव रखने की अनुभूति ही और होती है । सोचा अब तसल्ली से भविष्य की कुछ बातें करेंगे । घर पहुँचे तो देवर, जो हमारे साथ ही रहते थे, दफ़्तर जा चुके थे । दोपहर में ज़मीन पर बैठी मैं जीवन के इस नये अध्याय के बारे मे सोच ही रही थी कि तभी पतिदेव का पदार्पण हुआ । मेरा हाथ पकड़ फ़िल्मी अन्दाज़ से बोले…..”तो क्या बना रही हो डिनर में मेरे भाईयों के लिये” । ये तो असंभावित प्रश्न था । अब चाहे जान पहचान पुरानी हो गयी थी पर दुल्हन तो मैं नयी ही थी न । जी मे आया कह दूँ “तुम्हारा सर” । अरे आज मैं पहली बार  इस घर मे आयी थी । पिक्चरों में तो ऐसे नहीं होता । पर मम्मी का दोस्त और पति वाला भाषण याद आ गया ।  समझ नहीं आया कि खीजूँ अपने पति की इस सादगी पर या हँसू ।  पतिदेव ने शायद चेहरे के भाव भाँप लिये…फ़ट से लीपापोती की…मैं तो मज़ाक कर रहा था ।

अगले दिन से हमने गृहस्थी की बागडोर सँभाल ली । अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे ही चुके थे । माँ और सासू माँ के दिये उपदेशों - निर्देशों को जब तब पल्लू से खोल देख लेती । सासू माँ ने समझाया था कि बेटा पति जब लौट के घर आये तो ठीक से बनी-सँवरी मिलना । शादी से पहले इन सब बातों की महत्ता ही नहीं थी । जैसे चाहो रहो । पर अब बात और थी । हमने भी देखा था पिक्चर मे हिरोइन कैसे बनी ठनी रहती है । ‘रेखा’ के रूप को आदर्श मान शाम होते ही हमने बढ़िया साड़ी पहनी । हाथ मे एक एक दर्जन के भाव से मैचिंग चूड़ियाँ डालीं । बालों की जूड़ी बना ( जूड़ा हमारे बालों का बनता ही नहीं है ) माँग मे पूरे ढाई तोले सिंदूर भर लिया । बाकी के सौन्दर्य प्रसाधनों और अनावश्यक गहनों से सख्त परहेज़ ना होता तो उन्हे भी आज़मा लेते ।पर इतना ही काफ़ी था । शीशे मे खुद को कम से कम १० बार निहारा फिर निहाल हो गये । दरवाज़े की घन्टी बजी । सुन के वैसा अनुभव हुआ जैसा कॉलेज मे परिणाम निकलने के दिन होता है । आँखे नीची किये दरवाज़ा खोला । “आँटी वो क्रिकेट कि बॉल आपकी बालकनी में आ गयी है शायद”, सामने मकान मालिक कि १५-१६ वर्षीय लड़की खड़ी थी । २३ वर्ष की उम्र मे मुझे हृदयाघात होते होते बचा । लगा मानो कन्या ने क्रिकेट का बल्ला ही घुमा के धर दिया हो कानों पर । हमने कहा कुछ नहीं बस बॉल ला के दे दी | आँटी…आँटी…कानों पर अब भी हथौड़े बज रहे थे । लगा प्रयोग मे कहीँ गड़बड़ हो गयी । कमरे में आ कर दस बार फिर आइना देखा । नहीं, ऐसी तो कोई गड़बड़ न थी । एक-दो एंगल बदल के देखा…”मोटी भी नहीं हूँ मैं तो” :neutral: । हाँ षोडषी नहीँ लग रही थी पर…. आँटी  ? शादी से पहले जब लॉज में रहते थे तब तो ऐसे नहीं कहा किसी ने । सिर्फ़ दो महीने में नयी पदवी ? शादी की इस सौगात पे जी कुढ़ गया ।

शुरू के ४-५ महीने पँख लगा के उड़ गये । मकान को घर बनाने मे मेरा सारा वक्त मज़े से कट गया । उसके बाद सोचा कि चलो पुनः नौकरी कर लें । सभी को लग रहा था कि मैं पढा़-लिखा बरबाद कर रही हूँ । सो नौकरी कर के भी देखी । किन्तु १२ घन्टे की प्राइवेट कम्पनी की नौकरी और साथ मे घर का पूरा काम…शरीर के उर्जे-पुर्जे धीरे धीरे हड़ताल पर जाने लगे । पतिदेव कितनी भी मदद करायें, घर की मुख्य ज़िम्मेदारी तो पत्नी के कँधो पर ही होती है । अन्तत: एक बार फिर से नौकरी छोड़नी पड़ी ।…बस तबसे घर की गाड़ी खीँच रहे हैं । एक बार और नौकरी की असफल कोशिश की । मित्रगण अब मेरी नौकरी की बात सुनते ही हँसने लगते हैँ । उन्हे लगता है कि मैं अधिकतम इस्तीफ़ों का रेकॉर्ड बना सकती हूँ । वैसे मुझे कुछ भी करने की स्वतन्त्रता है…बस करने का समय नहीं है ।

पतिदेव का शादी से पहले वाला रूप तो याद ही नहीं आता । कहने का अर्थ ये नहीं कि मुझे कोई शिकायत है….पतिदेव बहुत ही प्रेम करने वाले, शान्त, सहयोगी और समझदार हैं । हर कम करने से पहले पूछते हैं क्युँकि उनके अनुसार पति लोग ‘बेचारे’ होते हैं और बिना पूछे कुछ नहीं करते । उदाहरण के तौर पर… “फूल लोगी क्या?” , “सब्जी जल रही थी अभी रसोई मे गया तो, गैस बंद कर दूँ क्या?” । कहीं बाहर जाने पर या फिर अपनी या मेरी माँ के आगे कुछ भी (खासतौर से मीठा) खाने से पहले मेरा मुँह ऐसे देखते हैँ जैसे डराये-धमकाये हुए बच्चे अपनी माँ को देखते हैं । एक और बड़ी खास आदत ये कि माँए जो भी बना के खिलायें वो मैने कभी बनाया ही नहीं होता भले ही दो दिन पहले वही व्यन्जन मैने बना के खिलाया हो । इतने मासूम और भुलक्कड़ बन जाते हैं कि क्या कहूँ । ये सब मुझे चिढा़ने के लिये ।  मेरा मानना है कि सब पति ऐसे ही होते हैं । शादी से पहले एक बार मैने ऐसे ही पं. विश्व मोहन भट्ट की एक कैसेट के प्रति रुझान ज़ाहिर कर दिया था । दिल्ली के हर बाज़ार की ख़ाक छानी गयी और कैसेट ढूँढ के ही दम लिया । पर अब ज़रा बाज़ार चलने को कह भर दूँ । चेहरे के भावों से लगता है कि आसमान टूट पड़ा हो । इतने सब के बाद भी पति ही बेचारा रहता है ।

खै़र, अब तो मेरे विचारों मे काफ़ी परिपक्वता आ गयी है । शुरू मे शायद बचपना रहा हो सोच में । ससुराल में सास-श्वसुर, माँ-बाप सरीखा प्रेम देते हैं । कोई अनावश्यक बन्धन नहीँ रखा उन्होने कभी, चाहे पहनावा हो या रहन सहन । मेरी भी यही कोशिश होती है कि हमेशा बहू की मर्यादा का पालन करूँ सो जो भी थोडे़ बहुत नियम हैं उनका पालन करने में सुख का ही अनुभव होता है । हाँ ‘इनके’ साथ खट्टी-मीठी नोंक झोंक हर रोज़ लगी रहती है । पर शादी के तीन साल में अब हर बात की अभ्यस्त हो गयी हूँ सिवाय एक चीज़ के….आँटी..आँटी । अब साड़ी की जगह अधिकतर सूट पहनती हूँ,  सिन्दूर की  मात्रा चुटकी भर कर दी है, बिन्दी छोटी हो गयी है, चूड़ी सिर्फ़ दो या तीन रह गयीं हैं और पायल तथा अन्य गहने जो होली, दीवाली और करवाचौथ पर काम आते हैं उन्हे पहले ही लॉकर में सहेज के रख दिया है । इस रूप में मैं अपने को सुरक्षित महसूस करती हूँ ।  अभी सब्ज़ी लेने निकली हूँ । पीछे खड़ा सब्ज़ी बेचने वाला युवक बुला रहा है “आँटी धनिया-पुदीना ले लो”, “सब्ज़ी देखो एकदम ताज़ी है” । सब्ज़ी अच्छी है …सस्ती भी है । पर. उफ़्फ़, अब भी….आँटी ??? कल से ३ की जगह ५ किलोमीटर चला करूँगी, शायद वज़न बढ़ गया एक-दो किलो । या फिर स्वीकार कर लूँ इसे भी ?? नहीं अभी नहीं !!!  आगे से एक और आवाज़ आ रही है…”आइये मैडम..” । मैं उस आवाज़ की ओर चल पड़ी हूँ ।

आप सब बुद्धीजीवियों से ये उम्मीद ना थी…!

अभी हाल फिलहाल अपने इस ब्लॉग जगत मे एक नये शब्द से परिचय हुआ - ‘टी. आर. पी’ । अनूप जी हों कि पंकज जी या फिर नाहर जी, सभी टी.आर.पी की बात कर रहे हैं । पढ़ के तुरंत कॉम्प्लेक्स हो आया । ग़ौर किया तो लगा कि अपनी टी.आर.पी तो यहाँ उतनी है जितनी टी.वी. पर दूरदर्शन की । ह्म्म्म्म्म….ऐसे कैसे चलेगा ?

अभी आये हुए जुमा जुमा दो महीने हुए हैं सो सन्यास की धमकी का किसी पे कोई फ़रक नहीं पड़ेगा । नाहर भाई जैसी अटेन्शन हमें मिलने से रही । जो थोड़ी बहुत साख है वो भी चली जायेगी सो अलग । महिला वर्ग के अन्तर्गत आरक्षण की माँग रख दूँ क्या ? नारियों को प्रोत्साहित करने के लिये उनके ब्लॉग की टी.आर.पी ३०% बढा़ के आँकी जायगी । पर नहीं इससे तो डॉक्टरों के बाद पुरुष ब्लॉगरों की भूख हड़ताल का खतरा हो सकता है । फिर क्या करूँ ? पिछली पोस्ट मे नाहर जी और अनूप जी ने कहा था कि जल्दी जल्दी लिखा करूँ । इससे टी. आर. पी. बढ़ेगी क्या?? हैं?? पर लिखूँ किस पर ? विषयों का सख्त अकाल पड़ा है मेरे पास । खेलों का ज्ञान तो गेंद की तरह गोल है । सामजिक विषय पे लिखने के लिये जो जोश चहिये वो आ ही नहीं रहा । खबरें आजकल सिर्फ़ मुँह बिचकाने को प्रेरित कर रही हैं । यात्रा वृत्तांत  लिखती प्रत्यक्षा जी की तरह पर क्या करूँ घूमने गये हुए तो पूरा साल भर होने को आ रहा है । फिर बची ज्ञान की बात जो कोई पढ़ता नहीं । दिमाग खर्च होता है सो अलग । फिर ?? टी.आर.पी बढा़ने का कोई हथकन्डा भी नहीं सूझ रहा था । सोचा लाओ टी.वी. देखूँ । वहाँ लोगों को दिन भर चालें चलने के सिवा कोई काम नहीं होता । शायद कोई फ़ार्मूला हाथ लग जाये ।

टी.वी चालू किया….स्टार पर ‘क्यूँकि सास भी ….’ चल रहा था । सुना था कि ‘बा’ जीवित हैं…आज देख भी लिया । कल्पना ने उड़ान भरी — पर-पर-परददिया सास बनना कैसा लगता होगा ! ये बा तो ‘रामदेव बाबा’ को भी फ़ेल कर गयीं । इतनी लम्बी उमर तो उनके योग भी नहीं दे सकते । हाय बा, आपके चरण कहाँ है….नहीं नहीं केकता कपूर के चरण कहाँ हैं (केकता शब्द मैने संजय जी की परिचर्चा मे की गयी एक पोस्ट से उड़ाया है । इससे पहले कि वह कॉपीराइट का दावा करें मैने सोचा श्रेय का झुनझुना उन्हें पकड़ा दूँ । वैसे इस हिसाब से केकता अपने बैनर का नाम ‘काला जी कम्यूनिकेशन’ क्यूँ नहीं कर देतीं । साथ ही ‘तुषार’ को ‘कुषार’ नाम दे दें, शायद उसकी भी गाड़ी चल पड़े) । कहानी समझ आ नहीं रही थी क्यूँकि ‘क्यूँकि….’ देखे महीने बीत चुके हैं तो बेहतर समझा कि कुछ और देखा जाय ।

‘कसौटी..’ पर आये । प्रेरणा को देख के जी किलस गया । हमें लोग अभी से आँटी कहते हैं ।  इन्हें देखो…दादी बन के भी जस की तस । अनुराग बासु को देख के और मज़ा आया । पहले प्रेरणा, फिर कोमोलिका, फिर प्रेरणा, फिर ऑपर्णा, फिर से प्रेरणा और अब ये नयी सम्पदा । ऐसी किस्मत… सारा पुरुष समाज हाय-हाय करता होगा देख के ।

दो धारावाहिकों मे ही दिमाग साँय-साँय करने लगा था तो ‘कहानी घर-घर की’, ‘के स्ट्रीट..’ आदि देखने की हिम्मत ही नहीं पड़ी । ये ‘स्टार प्लस’ अपने बूते का नहीं । तो रुख किया ‘ज़ी’ की तरफ़ । सुना है यहाँ हर सीरियल में राज़ खुलने वाले हैं । ‘कसम्ह (??) से’ आने वाला था । यहाँ भी ‘केकता’ । हिरोइन अपनी ननद को आँटी कहती है । और उसके बेटे से अपनी बहन की शादी भी करा रही है । इस प्रकार वह अपने ही भतीजे की साली हुई । या फिर अपनी बहन की सास? पूरे धारावाहिक मे रिश्तो के इसी चक्रव्यूह में घिरी रही । कोई राज़ नहीं खुला ।

फिर आया ‘सात फ़ेरे..’ । यहाँ कोई कितना भी दुखी हो पहनावा देख के लगता है मानो बारात मे शामिल होने जा रहा है । दामाद फाँसी की कगा़र पर है । माँ अपनी ‘लाडो’ के ग़म से मरी जा रही है । पर मैचिंग बिन्दी और गहने पहनने की फ़ुर्सत तब भी है । और तो और ये चेहरे पीले कर क्लोज़-अप दिखाने का नया फ़ैशन चल पड़ा है । १५ लोगों के घर मे तीन तीन बार हर चेहरा देखो…गये १५ मिनट इसी में । अब और झेला नहीं जा रहा । यहाँ अपनी जान को कम क्लेश होते हैं जो जनता ये सब देखती है ? समाचार देखना ही ठीक रहेगा, मैं सोचती हूँ । न्यूज़ चैनल पर आ रहे कार्यक्रम के होस्ट को देख के ही डर जाती हूँ । पिता ने ढाई साल के बच्चे को जला दिया, माँ ने अपने बच्चों को कुल्हाड़ी से काट दिया… । पहले ये सब देख के मन दुखी हो जाता था, अब ऊब होती है । दिमाग थक के झपकी ले रहा है…कि ज़ोर की आवाज़ आती है…”चैन से सोना है तो अब जाग जाओ” । लो भैया जग गये । इन सब के बीच यहाँ आने का असली मक़सद तो मैं भूल ही गयी थी ।  टी. आर. पी. के हिसाब से पहले और दूसरे नम्बर पर आने वाले चैनल झेल लिये ।  दिल-दिमाग दहाड़ें मार के रो रहे हैं कि  कल जो तीन नयी मैग़्ज़ीन आयी उन्हे क्यूँ नहीं पढा़ बजाय ये देखने के । अब और कुछ देखने का साहस नहीं बचा है । वैसे भी आइडिया मिल गया है..।

विषय या कहिये पोस्ट का हैडर रोचक रखूँ । जनता को विषय पढ़ के लगना चहिये कि कुछ धमाकेदार या  कॉन्ट्रोवर्शियल है यहाँ । कन्टेन्ट जाय भाड़ में । विषय का कन्टेन्ट से कुछ लेना देना होना भी ज़रूरी नहीं । यही सोच के इस पोस्ट का विषय ये रखा । बाकी ऐसा कुछ है नहीं । केकता कपूर के सभी धारावाहिकों का यही सार है । जैसे कुछ दर्शक भटक के उनके सीरियल देखते हैं मुझे विश्वास है कि कुछ पाठक भी भटक आयेंगे मेरे ब्लॉग पर । बाकी एक काम और कर सकते हैं । जब इन धारावाहिक निर्माताओं को आगे की कहानी नहीं सूझती तो ‘पब्लिक पोल’ करा लेते हैं । मैं भी ट्राई करती हूँ । चलिये आप ही बताइये कुछ—कैसे बढ़ाऊँ टी.आर.पी. ?

मम्मी के डायलॉग

अभी थोड़ी देर पहले मेरी मम्मी से मेरी बात हुई…फोन पर । जब भी बात होती है…चाहे फोन पर या फिर आमने सामने, मम्मी के कुछ ऐसे डायलॉग हैं जो ज़रूर सुनने को मिलते हैं । और मुझे लगता है कि शायद ये हर बच्चा अपने माता-पिता से कभी न कभी ज़रूर सुनता होगा…सोचा ऐसी कुछ बातें आपके साथ बाँटू ।

१. “हमें तो पहले ही पता था” ।

ये डायलॉग शायद सबसे आम है । और ये तब कहा जाता है जब आप कुछ गड़बड़ कर देते हैं । मसलन आपसे दूध गिर गया या मान लीजिये और कोई नुकसान हो गया तो कहा जाता है “हमें तो पहले ही पता था ये होने वाला है” । बड़ी नाइन्साफ़ी है । अगर पहले पता होता है तो हम लोगों को बताना चहिये न जिससे हम पहले ही सावधानी बरतें ।

२. “जब हम तुम्हारी उमर के थे…

ये तो पूरी सीरीज़ है । बहुत सी जगह इसके विविध प्रयोग किये जाते हैं । उदाहरण के लिये…

“जब हम तुम्हारी उमर के थे तो पूरा घर संभाल लेते थे”

“जब हम तुम्हारी उमर के थे हमारा ध्यान सिर्फ़ पढ़ाई पे रहता था”

“जब हम तुम्हारी उमर के थे तो फ़ैशन क्या होता है हमे पता भी नहीं था”

३. “हमने कभी अपनी माँ से ऊँची आवाज़ मे बात नहीं की

मुझे पूरा विश्वास है कि यह वाक्य पीढी दर पीढी चला आता है । जैसे मम्मी ने मुझसे कहा वैसे ही मैं भी कहा करूँगी अपने बच्चों से एक दिन ।

४. “हमें कभी पढाई के लिये कहना नहीं पड़ता था

इसका प्रयोग अधिकान्शत: स्कूल के दिनो मे किया जाता रहा । काफ़ी दिनो से कानों मे ये शब्द नहीं पडे़ अब तो ।

५. “पापा से पूछ लो, जैसा वो कहें

ये तब कहा जाता है जब किसी चीज़ को मना करना हो और मना करने के बाद बच्चे जो ड्रामा करते हैं उससे बचना हो । ९९% सम्भावना है कि पिता जी आपको वापस मम्मी के पास भेज देगें ।

६. “अब बाकी जैसी तुम्हारी मर्ज़ी

यह बेहद खतरनाक वाक्य है । इसका अर्थ शाब्दिक अर्थ का बिल्कुल उल्टा होता है । सीधे शब्दों मे कहें तो इसका मतलब है “अब और बहस नहीं, हमारा निर्णय अंतिम है (और इसे मानने मे ही भलाई है)” ।

अभी फिलहाल एक और बात याद आ गयी मम्मी की…”हर चीज़ का एक समय होता है” । अभी फिलहाल रात्रिभोज तैयार करने का वक्त हो गया सो चलती हूँ । कुछ याद आया तो फिर लिखूँगी ।

Published in: on June 15, 2006 at 2:48 pm Comments (23)

बचपन बीत गया..

गतांक से आगे…

पिछली कड़ी पर की गयी एक टिप्पणी में अमित ने पूछा कि मैने भूत के किस्से सुने हैं कि नहीं । भूत की कहानियाँ नहीं सुनायीं मुझे किसी ने । भूत से जुड़ा सिर्फ़ एक वाक़या याद है । मुझे बचपन मे चप्पल पहनने से सख़्त नफ़रत थी । नाना ने बहुत समझाया पर मैं वही ढाक के तीन पात जैसी । तर्क ये प्रस्तुत किया कि मैं भूल जाती हूँ । नाना ने तुरन्त एक काग़ज़ पर लिख कर टाँग दिया 'चप्पल पहनो' । अब याद ना रहने का बहाना भी छिन गया । मैनें युक्ति निकाली । पर्ची दीवार से नोच के फेंक दी । कह दिया हवा से उड़ गयी । अब जब जब नाना ने पर्ची टाँगी, मैने ऐसी हवायें चलायीं । तब ये समझ ही नहीं थी कि टेप से चिपकी पर्ची को हवा क्या उडा़येगी । मैं ये सोच के खुश रहती कि नाना को यही सच लग रहा है । नाना को लगा कि घी सीधी उँगली से निकलने वाला नहीं । और ऐसे जन्मा 'लँगडा़ भूत' । सफ़ेद चादर ओढ़ के मेरे ६ फ़ुट ३ इन्च के नाना जी जब लहराते हुए कहते "माँऽऽऽऽऽय लँगड़ाऽऽऽऽऽऽ भूऽऽऽऽऽऽत हूँ"  तो सच मेरी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती । और नाना इस द्वन्द मे जीत गये । लँगड़ा भूत पैर काट के ना ले जाये इस डर से मैं बिना चप्पल ज़मीन पे पावँ ही ना रखती । तो बस इतना ही जाना मैनें भूतों के बारे में ।

मम्मी - पापा के पास ज़िन्दगी सिलसिलेवार चले जा रही थी । स्कूल से घर और घर से स्कूल बस यही काम था । आस पास दोस्त थे नहीं । शाम ढले बाबा घर आ कर पूछ्ते "गणित लगाया?" । मैं इसी सवाल से बची बची घूमती । फिर भी जब तब बाबा पकड़ के बिठा लेते "लघुत्तम-मह्त्तम के सवाल हल करो" , " बीज गणित, रेखा गणित लगाओ" । बाबा गणित और भूगोल के अध्यापक थे । दोनों विषय मेरी रुचि से पूर्णतः परे । पर जी मसोस के सब करना पड़ता । बाबा के घर आने से सिर्फ़ एक खुशी मिलती । उनकी बड़ी साइकिल घर जो आ जाती । छोटे भाई बहन धक्का लगाते । बड़ी दीदी शान से कैंची डाल के साइकिल चलातीं । जिस दिन पहली बार उस साइकिल कि गद्दी पर फ़तह पायी…सच मानिये वैसा सुख फिर नही मिला । चलाने को आज कार भी चला लेती हूँ पर वो मज़ा नहीं पाया ।

ऐसे ही एक सामान्य दिन पर ज़िन्दगी का चौथा सबक मेरा इन्तज़ार कर रहा था । स्कूल से घर के बीच एक बाज़ार पड़ता था । मैं और मेरी एक सहेली रोज़ की तरह घर लौट रहे थे । वहीं बाज़ार मे एक १० का नोट पडा़ मिला । चवन्नी - अठन्नी के ज़माने में १० का नोट तो कल्पना से परे की बात थी । हम दोनो की तो बाँछे खिल गयीँ । उस समय कोका कोला ३-४ रुपये की रही होगी..दोनो ने ठन्डे और समोसे का भोग लगाया । बाकी बचा एकाध रुपया मेरा हुआ । आखिर खज़ाना मुझे मिला था । घर आ कर गौरव गाथा सुनाने को मन उतावला हुआ जा रहा था । "मम्मी आज मुझे १० का नोट पड़ा मिला …मैने.." । "उठाया तो नहीं ना तुमने??" मम्मी ने प्रतिप्रष्न किया । पूछने के लह्ज़े से साफ़ था कि मुझसे क्या उत्तर आपेक्षित है । मैने डर के मारे कह भी दिया "हाँ मम्मी नहीं उठाया" । मम्मी ने आगे कहा " ठीक किया बेटा, पता नहीं किसका गिरा हो । बेचारा अगर ज़रूरतमन्द हुआ तो अपना पैसा ढूँढता होगा । ऐसा पैसा उठाना फलता नहीं है" । मैने कहा "मम्मी कोई ज़रूरी है कि उसका पैसा उसे मिले, मैने नहीं उठाया , कोई और उठा लेगा" । मम्मी बोली "हो सकता है । पर अगर कोई कुएं मे गिरे तो क्या तुम भी गिरोगी । जो पैसा मेहनत से ना मिला हो, किसी और का हो, उसे लेना नैतिक नहीं है । और अगर सब लोग ऐसे सोचेगें   तो सोचो उस आदमी का पैसा उसे ही मिलेगा ना" । अब बात ठीक जान पड़ी । मन सोचता रहा कि कहीं वो किसी गरीब के पैसे तो नहीं थे । अब क्या होगा ? खैर मन ही मन निश्चय किया कि आगे से ऐसा नहीं होगा । ये बात आज के परिपेक्ष्य मे सही हो या न हो, भले ही कुछ लोग इसे मूर्खता कहें, लक्ष्मी का अपमान कहें, पर मैं अपने निर्णय पर का़यम हूँ ।

जीवन एक नये मोड़ पर खड़ा था । विज्ञान मे रुचि और नये नये प्रयोगों के प्रति उत्सुकता चरम पर थी । स्वभाव में पता नहीं कैसे एक हठ्धर्मिता ने घर कर लिया था । जो मन मे ठान लिया वो करना है । कोई करने मे मदद करे तो बढ़िया न करे तो और भी बढि़या । ऐसे मे ही एक पुस्तक हाथ लग गयी 'विज्ञान के १०१ प्रयोग', डायमंड प्रकाशन की किताब थी शायद । विद्युत-चुम्बक, मोमबत्ती का सी-सॉ झूला, स्टीमर, रँगीन पौधा…और भी पता नही क्या क्या । इनमे से इलैक्ट्रोमैगनेट का प्रयोग बहुत ही रोमाँचक रहा । घर मे सारे साधन पापा और चाचा की बदौलत पहले ही उपलब्ध थे । हमने सोचा चुम्बक बना के घर वालों को चकित कर दें । अब निर्देशानुसार बना ली गयी चुम्बक । पर ये क्या..कील तो दूर उसने पिन को भी हिलाने से मना कर दिया । अब ये समझ आया नहीं कि हमने तार कम लपेटा है…सोचा कि शायद सेल से बात नहीं बनेगी । सीधे बिजली का कनेक्शन चहिये । सो फ़टाक से लपेटे हुए तार के दोनो सिरे प्लग मे ठूँस दिये और ये क्या.. 'भटाक…' की आवाज़ और बत्ती गुल । फ़्यूज़ उड़ने के विषय मे जानकारी थी नहीं इसलिये लगा कि हो गयी कोई बड़ी बात । खैर डाँट लगी उसके बाद । वो भी इसलिये कि इस प्रक्रिया मे झटका लगने की पूरी सम्भावना थी । पर हम सुधरने वाली आत्मा कहाँ । उसके बाद भी हमने अपना अभियान जारी रखा । झालर का 'एक' बल्ब सीधे प्लग से लगा के देखा गया । एक लाइव तार से प्लग के दोनों छिद्रों को जोड़ के भी देखा । सभी प्रयोगों का एक ही निष्कर्ष :- घर का फ़्यूज़ मेरे बिजली का कोई भी काम करते ही उड़ जाता है :(   । एक लड़के और एक लड़की -दोनो के स्वभाव के मिश्रण का एक उम्दा उदाहरण ये था कि पापा की सोल्डरिंग आयरन का प्रयोग कर के मैने अपनी गुडि़या के लँहगे पर बड़े सितारे बनाये । बाबा के 'maginfying lense' से सूरज की किरणें केन्द्रित कर मेरी गुड़िया के घर का चूल्हा जलता और पापा के खज़ाने से चुराये 'resistors' और 'capacitors' से गुड़िया के गहने बनते।

इन सब के बीच बचपन से निकल कब किशोरावस्था मे कदम रख दिया पता ही नहीं चला । मेरे लेख और कहानियाँ कब शेरो-शायरी मे तब्दील हो गये मुझे याद नहीं पड़ता । मेरा दायरा और सिमट गया था । नाम को एक सहेली और बस किताबें । हाँ गर्मियों की छुट्टियाँ ज़रूर मज़े से कटतीं । नाना के घर जा कर दिन भर वी. सी. आर. पर फ़िल्में देखना और रात मे छत पर अकेले मे रेडियो लिये पडे़ रहना । ये उस सब का ही असर था जो मैने शेर लिखने शुरू कर दिये थे । हर शेर, हर नज़्म ऐसी कि लगे नया नया दिल टूटा है । बस तुक बैठना चहिये । पिता जी के हाथ हमारी डायरी लग गयी एक दिन । मेरे हर शेर पर पेट पकड़ पकड़ के हँसे । पूछा ये दिल कब टूटा जो ये सब लिखा है? हमने भी दार्शनिकों सरीखा जवाब दिया "अगर म्रुत्यु पे लिखना हो तो क्या खुद मर के देखा जाता है" । तब तो कुछ नहीं कहा पापा ने पर शायद बाद मे बड़ा लोटपोट हुए होगे हँसी के मारे । उस समय लगता था कि एक मियाँ गा़लिब हुए और एक हम होंगे । आज अपना लिखा पढ़ती हूँ तो लगता है कि किसी थर्ड क्लास की पिक्चर के डायलॉग पढ़ रही हूँ । एकदम वाहियात …बेतुका। अगर हँसने ( या अपने सर के बाल नोचने) का जी करे तो ये नमूना पढ़ लीजिये -

तू जहाँ हो वो वीराना मेरी मह्फ़िल है,
तू ही राहे मुका़म, तू ही मेरी मन्ज़िल है ।

हैराँ हूँ मेरे दिल को तू क्यूँ नहीं समझा,
तू ही तो दिल कि ज़बाँ, तू खुद मेरा दिल है ।

और एक नमूना देखिये :

तू मुझको मिल ना सके तो सब्र है मुझको
जो मिल गया तो डर होगा तेरे खो जाने का ।
 
दोनो पक्तियाँ परस्पर विरोधी हैं । खैर भगवान का शुक्र है कि   जल्द ही ये भूत उतर गया और ऐसी और रचनाओं का जन्म नहीं हुआ । उसके बाद तो जो लिखा हिन्दी के इम्तिहान मे लिखा । उस समय हिन्दी के पर्चे मे जिसने जितने 'quotations' डाल दिये उसे उतने अधिक अंक मिले समझो । अब कहाँ तक याद रखते, तो परीक्षा मे तत्कालिक रूप से चार लाइन की कविता लिख दी जाती । हरे पेन से लिखते "किसी कवि ने ठीक ही कहा है…" आगे काले पेन से कविता लिख दी जाती । अब कविता का विषय सुनिश्चित होता था,  इसलिये ठीक ठाक लिख लेते थे । बाद में कभी अध्यापिका तारीफ़ करती तो मन ही मन खुशी से फूले नहीं समाते…बस हमेशा एक बात कह्तीं पर वह..कि लेखक का नाम डाला करो । अब उन्हे क्या कहते । इस सब के चलते हमने अपने को मिर्ज़ा गालिब के कूँचे से निकाल सुमित्रा नन्दन पन्त, निराला, प्रसाद, नीरज, महादेवी वर्मा..इनकी कतार मे शामिल कर लिया था । रोज़ अध्यापिका का दिमाग चाटते कि हमें विषय दीजिये हम उस पर लिखेंगे….। बस यूँ समझिये कि उस रफ़्तार से हमारी पुस्तक छपने में कोई खास देरी न थी ।…

क्रमश: