बडे़ सारे ब्लॉग देखे जहाँ ‘शादी’ शब्द की विवेचना की गयी है । पर सभी विचार हमें पुरुष प्रधान लगे । सोचा क्यूँ न अपना पक्ष भी आप बुद्धीजीवियों के आगे रखूँ । वैसे यह विश्लेषण कम और अनुभव अधिक है ।
मेरी शादी हुए सुखद तीन साल बीत चुके है । ये ‘सुखद’ मैने औसतन कहा । मेरा प्रेम-विवाह हुआ था । कथा थोड़ी मज़ेदार है ये भी । मेरे साथ स्नातक में दो लड़के पढ़ते थे । सामान्य मित्रता थी हमारे बीच । हाय-हैलो वाली समझ लीजिये बस । जब हम सब परास्नातक में आये तो उनके बडे़ भाई ने भी हमारे कॉलेज मे दाखिला ले लिया । हम लड़कियों के समूह को जब पता चला तो हमने आपस मे इस बारे मे ऐसे चर्चा की मानो देश की अर्थव्यवस्था के बारे मे बात चल रही हो । “बड़ा भाई ??? ” , “अच्छा !! एम. बी. ए. कर के आया है”, “ओ-हो!!”, “नौकरी भी कर रहा था??”, “छोड़ दी….??”, “पागल है क्या थोडा़ ?? ” (हम लोगों के लिये तो नौकरी पाना बैकुंठ धाम को पाने जैसा था) , “…पर हैंडसम है “…। कुछ समय बाद मामला ठन्डे बस्ते में चला गया । सिवाय एक लड़की के, जो कि भैया जी पे मर मिटी थी, सबने इस विषय मे रुचि लेना बन्द कर दिया । बाकी सबने ‘दोस्त का भाई अपना भाई की तर्ज ‘ पर उन्हे भैया कि पदवी दे दी थी, हालाँकि ये हम सखाओं के बीच की बात थी । उनसे कोई बात-चीत तो होती न थी । वह गणित के छात्र थे और हम भौतिकी के ।
एम.एस.सी. के आखिरी सेमेस्टर में उन्हें हमारे साथ प्रोजेक्ट दिया गया । उन्हें हमारे अध्यापक पहले से जानते थे और उनकी रुचि हमारे प्रोजेक्ट में देख ये मौका उन्हे दिया गया था । हमारे अध्यापक का ये भी मानना था कि उनके अनुभव से हमारा प्रोजेक्ट और भी बेह्तर बनेगा । कम्प्यूटर वैसे भी हम सभी का विषय था । और तब मुझे उन्हें एक इन्सान के तौर पर जानने का मौका मिला । अब भाग्य का लेखा कहिये या जो भी, जान पहचान कब दोस्ती और दोस्ती कब प्रेम मे परिवर्तित हुई पता ही न चला । एक दिन अचानक हमारे सामने प्रेम प्रस्ताव भी प्रस्तुत हो गया । हालाँकि हमने लड़कियों के अनुकूल व्यवहार करते हुए दो तीन महीने ना-नुकुर करी पर फिर हार मान ली । इस बीच हम दोनो को ही एक ही कम्पनी से नौकरी का प्रस्ताव आ चुका था । हमने आई. आई. टी. कानपुर के कम्प्यूटर विभाग के ‘रिसर्च असोसिएट’ के पद के प्रस्ताव को ठुकरा कर इस कम्पनी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया । प्रेम जो न कराये सो कम है
। दोनों पक्षों के माता-पिता जी को शीघ्र ही पता चल गया । उन्हें हमारी शादी से कोई ऐतराज़ न था सो ख़ुशी ख़ुशी फ़रमान जारी हो गया । पर हमारे ज्योतिष शास्त्र की मेहरबानी से पूरे तीन साल बाद हमारी शादी हुई ।
अब आप सोचेंगे कि शादी के बारे मे बात शुरू हुई थी, ये प्रेम कहानी सुनाने की क्या आवश्यकता थी!!!! तो भाई हीरो-हिरोइन का बैकग्राउन्ड जानना ज़रूरी होता है ना । बस स्टोरी का मेन एंगल अब शुरू होता है । शादी से पहले माँ ने समझाया..”तुम अमित को ‘तू’ कहना छोड़ दो, अब तुम्हारी शादी होने वाली है” । अब इस बारे मे हमने कभी सोचा ही नहीं । दोस्त थे तो दोस्त के जैसे बात करने की आदत भी थी । जैसे तैसे मैं ‘तुम’ और फिर ‘आप’ पर आ पायी । बड़ा विचित्र लगा । पर भैया नारी जीवन है, क्या करें । आदेश का पालन तो करना ही होता है । और ये तो सिर्फ़ शुरुआत थी ।
ससुराल पहुँचे तो देवरों ने भाभी कहने से इनकार कर दिया । उन्हें भैया कहना हमें हजम नहीं हो रहा था । पर करना था सो करना था….शुरू तो बड़ों के सामने भैया-भाभी कहने के नाटक से किया पर बाद मे आदत पड़ गयी । रिश्ते की एक सास ने समझाया पति का नाम भी नहीं लेते इससे पति की उम्र कम हो जाती है । अब ‘ए जी, सुनिये जी’ तो मेरे लिये कल्पना से परे था । आगे कहा, माँग मे सिँदूर अन्त तक भरना चहिये, इससे पति कि उम्र लंबी होती है । पति कि उम्र का पैमाना तो मानो अब मेरे हाथों मे आ गया था। और भी ऐसे बड़े सारे नियम । हाँलाकि मेरी अपनी सासु माँ बड़े खुले विचारों की हैं इसलिये कुछ दकियानूसी नियमों से मुझे उन्होने मुक्त कर दिया था । फिर भी सब नया नया प्रतीत होता था । खुद को शीशे मे देख के लगता था कि किसी और को देख रहे हैं । इस नये रूप से दिक्कत भी बड़ी होती थी कभी कभी । हाथ मे पड़े सोने के कड़े साड़ी से उलझते, बिछिया, पायल जब तब पैर में चुभ जाती या फिर इधर उधर गिर जाती, एकाध हार तो हर समय पहने रहना पड़ता था जो मेरे बचे खुचे बालों मे फँसता रहता । आप ही कहिये, किसी पुरुष को भी ये सब करना पड़ता है क्या ? खै़र शादी के दो-चार दिन बाद घर वाले हम लोगों को पास में ही घुमाने ले गये । घर वाले मतलब भाई बहन । उस समय छुट्टी मिली नहीं थी तो हमारा तो कोई घूमने फिरने का कार्यक्रम था नहीं । अब बाग़-बगी़चे मे पहुँच दीदी-जीजा जी ने प्लान बनाया कि हमें अकेले छोड़ दिया जाये । पर क्यूँ ? घरवालों के बीच अच्छा लग रहा था । ऐसे भी तीन साल में एक दूसरे के व्यक्तित्व के बारे में सब कुछ जान ही चुके थे तो अकेले क्या बात करते । पर फिर भी हमें भेजा गया । कुछ दूर गुलाब की क्यारियों के बीच एक पेड़ की छाँव मे बैठ हमारी बातें शुरू हुयीं । “सुनो….मम्मी ने दो कनस्तर दिये हैं । एक चावल का हो जायेगा एक आटे का । बाकी दाल, चीनी वगैरह के डब्बे लेने होंगे ” ।”गैस कनेक्शन लिया क्या तुमने??” ….”नहीं, अब ले लेंगे । काम से टाइम ही नहीं मिला”…..”सामान कब तक पहुँचेगा?”..। दूर बैठे दीदी-जीजा जी खुश हो रहे थे जैसे सोच रहे हों ‘बेकार ही संकोच कर रहे थे दोनो, अब देखो कैसे बतिया रहे हैं’ । खैर ससुराल में लाड़-प्यार के बीच सारा वक्त मज़े से बीत गया ।
अब लौट के नौएडा आना था और इनको आते ही काम पर वापस लौटना था । बस एक दिन का वक्त था बीच में । अपने घर मे शादी के बाद पहली बार पाँव रखने की अनुभूति ही और होती है । सोचा अब तसल्ली से भविष्य की कुछ बातें करेंगे । घर पहुँचे तो देवर, जो हमारे साथ ही रहते थे, दफ़्तर जा चुके थे । दोपहर में ज़मीन पर बैठी मैं जीवन के इस नये अध्याय के बारे मे सोच ही रही थी कि तभी पतिदेव का पदार्पण हुआ । मेरा हाथ पकड़ फ़िल्मी अन्दाज़ से बोले…..”तो क्या बना रही हो डिनर में मेरे भाईयों के लिये” । ये तो असंभावित प्रश्न था । अब चाहे जान पहचान पुरानी हो गयी थी पर दुल्हन तो मैं नयी ही थी न । जी मे आया कह दूँ “तुम्हारा सर” । अरे आज मैं पहली बार इस घर मे आयी थी । पिक्चरों में तो ऐसे नहीं होता । पर मम्मी का दोस्त और पति वाला भाषण याद आ गया । समझ नहीं आया कि खीजूँ अपने पति की इस सादगी पर या हँसू । पतिदेव ने शायद चेहरे के भाव भाँप लिये…फ़ट से लीपापोती की…मैं तो मज़ाक कर रहा था ।
अगले दिन से हमने गृहस्थी की बागडोर सँभाल ली । अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे ही चुके थे । माँ और सासू माँ के दिये उपदेशों - निर्देशों को जब तब पल्लू से खोल देख लेती । सासू माँ ने समझाया था कि बेटा पति जब लौट के घर आये तो ठीक से बनी-सँवरी मिलना । शादी से पहले इन सब बातों की महत्ता ही नहीं थी । जैसे चाहो रहो । पर अब बात और थी । हमने भी देखा था पिक्चर मे हिरोइन कैसे बनी ठनी रहती है । ‘रेखा’ के रूप को आदर्श मान शाम होते ही हमने बढ़िया साड़ी पहनी । हाथ मे एक एक दर्जन के भाव से मैचिंग चूड़ियाँ डालीं । बालों की जूड़ी बना ( जूड़ा हमारे बालों का बनता ही नहीं है ) माँग मे पूरे ढाई तोले सिंदूर भर लिया । बाकी के सौन्दर्य प्रसाधनों और अनावश्यक गहनों से सख्त परहेज़ ना होता तो उन्हे भी आज़मा लेते ।पर इतना ही काफ़ी था । शीशे मे खुद को कम से कम १० बार निहारा फिर निहाल हो गये । दरवाज़े की घन्टी बजी । सुन के वैसा अनुभव हुआ जैसा कॉलेज मे परिणाम निकलने के दिन होता है । आँखे नीची किये दरवाज़ा खोला । “आँटी वो क्रिकेट कि बॉल आपकी बालकनी में आ गयी है शायद”, सामने मकान मालिक कि १५-१६ वर्षीय लड़की खड़ी थी । २३ वर्ष की उम्र मे मुझे हृदयाघात होते होते बचा । लगा मानो कन्या ने क्रिकेट का बल्ला ही घुमा के धर दिया हो कानों पर । हमने कहा कुछ नहीं बस बॉल ला के दे दी | आँटी…आँटी…कानों पर अब भी हथौड़े बज रहे थे । लगा प्रयोग मे कहीँ गड़बड़ हो गयी । कमरे में आ कर दस बार फिर आइना देखा । नहीं, ऐसी तो कोई गड़बड़ न थी । एक-दो एंगल बदल के देखा…”मोटी भी नहीं हूँ मैं तो”
। हाँ षोडषी नहीँ लग रही थी पर…. आँटी ? शादी से पहले जब लॉज में रहते थे तब तो ऐसे नहीं कहा किसी ने । सिर्फ़ दो महीने में नयी पदवी ? शादी की इस सौगात पे जी कुढ़ गया ।
शुरू के ४-५ महीने पँख लगा के उड़ गये । मकान को घर बनाने मे मेरा सारा वक्त मज़े से कट गया । उसके बाद सोचा कि चलो पुनः नौकरी कर लें । सभी को लग रहा था कि मैं पढा़-लिखा बरबाद कर रही हूँ । सो नौकरी कर के भी देखी । किन्तु १२ घन्टे की प्राइवेट कम्पनी की नौकरी और साथ मे घर का पूरा काम…शरीर के उर्जे-पुर्जे धीरे धीरे हड़ताल पर जाने लगे । पतिदेव कितनी भी मदद करायें, घर की मुख्य ज़िम्मेदारी तो पत्नी के कँधो पर ही होती है । अन्तत: एक बार फिर से नौकरी छोड़नी पड़ी ।…बस तबसे घर की गाड़ी खीँच रहे हैं । एक बार और नौकरी की असफल कोशिश की । मित्रगण अब मेरी नौकरी की बात सुनते ही हँसने लगते हैँ । उन्हे लगता है कि मैं अधिकतम इस्तीफ़ों का रेकॉर्ड बना सकती हूँ । वैसे मुझे कुछ भी करने की स्वतन्त्रता है…बस करने का समय नहीं है ।
पतिदेव का शादी से पहले वाला रूप तो याद ही नहीं आता । कहने का अर्थ ये नहीं कि मुझे कोई शिकायत है….पतिदेव बहुत ही प्रेम करने वाले, शान्त, सहयोगी और समझदार हैं । हर कम करने से पहले पूछते हैं क्युँकि उनके अनुसार पति लोग ‘बेचारे’ होते हैं और बिना पूछे कुछ नहीं करते । उदाहरण के तौर पर… “फूल लोगी क्या?” , “सब्जी जल रही थी अभी रसोई मे गया तो, गैस बंद कर दूँ क्या?” । कहीं बाहर जाने पर या फिर अपनी या मेरी माँ के आगे कुछ भी (खासतौर से मीठा) खाने से पहले मेरा मुँह ऐसे देखते हैँ जैसे डराये-धमकाये हुए बच्चे अपनी माँ को देखते हैं । एक और बड़ी खास आदत ये कि माँए जो भी बना के खिलायें वो मैने कभी बनाया ही नहीं होता भले ही दो दिन पहले वही व्यन्जन मैने बना के खिलाया हो । इतने मासूम और भुलक्कड़ बन जाते हैं कि क्या कहूँ । ये सब मुझे चिढा़ने के लिये । मेरा मानना है कि सब पति ऐसे ही होते हैं । शादी से पहले एक बार मैने ऐसे ही पं. विश्व मोहन भट्ट की एक कैसेट के प्रति रुझान ज़ाहिर कर दिया था । दिल्ली के हर बाज़ार की ख़ाक छानी गयी और कैसेट ढूँढ के ही दम लिया । पर अब ज़रा बाज़ार चलने को कह भर दूँ । चेहरे के भावों से लगता है कि आसमान टूट पड़ा हो । इतने सब के बाद भी पति ही बेचारा रहता है ।
खै़र, अब तो मेरे विचारों मे काफ़ी परिपक्वता आ गयी है । शुरू मे शायद बचपना रहा हो सोच में । ससुराल में सास-श्वसुर, माँ-बाप सरीखा प्रेम देते हैं । कोई अनावश्यक बन्धन नहीँ रखा उन्होने कभी, चाहे पहनावा हो या रहन सहन । मेरी भी यही कोशिश होती है कि हमेशा बहू की मर्यादा का पालन करूँ सो जो भी थोडे़ बहुत नियम हैं उनका पालन करने में सुख का ही अनुभव होता है । हाँ ‘इनके’ साथ खट्टी-मीठी नोंक झोंक हर रोज़ लगी रहती है । पर शादी के तीन साल में अब हर बात की अभ्यस्त हो गयी हूँ सिवाय एक चीज़ के….आँटी..आँटी । अब साड़ी की जगह अधिकतर सूट पहनती हूँ, सिन्दूर की मात्रा चुटकी भर कर दी है, बिन्दी छोटी हो गयी है, चूड़ी सिर्फ़ दो या तीन रह गयीं हैं और पायल तथा अन्य गहने जो होली, दीवाली और करवाचौथ पर काम आते हैं उन्हे पहले ही लॉकर में सहेज के रख दिया है । इस रूप में मैं अपने को सुरक्षित महसूस करती हूँ । अभी सब्ज़ी लेने निकली हूँ । पीछे खड़ा सब्ज़ी बेचने वाला युवक बुला रहा है “आँटी धनिया-पुदीना ले लो”, “सब्ज़ी देखो एकदम ताज़ी है” । सब्ज़ी अच्छी है …सस्ती भी है । पर. उफ़्फ़, अब भी….आँटी ??? कल से ३ की जगह ५ किलोमीटर चला करूँगी, शायद वज़न बढ़ गया एक-दो किलो । या फिर स्वीकार कर लूँ इसे भी ?? नहीं अभी नहीं !!! आगे से एक और आवाज़ आ रही है…”आइये मैडम..” । मैं उस आवाज़ की ओर चल पड़ी हूँ ।