हम क्या बनाने आये थे और क्या बना बैठे!!!
पिछले एक वर्ष में दिल्ली में रहने का अगर कोई सबसे बड़ा फ़ायदा मुझे हुआ है तो वो है महान कलाकारों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होना. गत वर्ष उस्ताद राहत फ़तेह अली ख़ान, श्री जगजीत सिंह, फ़रीदा ख़ानम, उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, पंडित शिव कुमार शर्मा(संतूर), बिक्रम घोष(तबला), तौफ़ीक़ क़ुरैशी(पर्कशन), पंडित रोनू मौजुमदार(बाँसुरी), अतुल रानिंगा(की-बोर्ड), गुंडेचा बंधु(ठुमरी गायन), शुभेन्द्र राव और सस्किया राव-दे-हास (सितार और सेलो). इसी क्रम में इस सप्ताहांत हमें वडाली बंधु, साबरी बंधु, गाज़ी ख़ान बरना (माँगनेयार - जैसलमेर) और कैलाश खेर तथा उनके ग्रुप कैलासा को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ.
बड़ों के मुख से अक्सर एक उक्ति सुना करते थे कि वृक्ष जितना फल से लदा होता है उतना झुका होता है. ये कलाकार उस उक्ति को अक्षरष: चरितार्थ करते हैं. इतनी मधुर वाणी, इतना ओज, अपनी कला में इतनी महारत और उसके बाद भी इतना विनम्र स्वभाव. मैं सच कहूँ तो इतनी श्रद्धा मुझे मंदिर में जा कर नहीं आती जितनी मैनें इन लोगों के प्रति महसूस की. इन्हें देख कर ऐसा प्रतीत होता है मानों भगवान के साक्षात दर्शन कर लियें हों. शिक्षा-अशिक्षा की सीमाओं से परे इनके विचारों की महानता के आगे बरबस नतमस्तक हो जाने को जी करता है. इनकी कला और ज्ञान के आगे धर्म, जाति और देश की सीमाओं के मसले इतने छोटे हो जाते हैं कि क्या कहना. अहसास होता है कि हम हिंदु - मुस्लिम से पहले एक इंसान हैं.
एक ओर हमारे राजनेता हैं जो लोगों को धर्म और प्रांत के आधार पर बाँट कर झगड़े करवा रहे हैं और एक ओर ऐसे महान लोग जिनके लिये ईश्वर एक है, कला ही ईश्वर है. यहाँ सम्मान ज्ञान का होता है धर्म का नहीं. एक ओर जहाँ छोटे वडाली बंधु ने साबरी जी के चरण स्पर्श किये वहीं ग़ाज़ी खान बरना ने अपने कार्यक्रम का प्रारंभ ‘गणपति वंदना’ से किया. सच मानिये पूरे कार्यक्रम में मेरा सर श्रद्धा से झुका रहा. हाँलाकि मैं कभी भी बहुत धार्मिक नहीं रही हूँ किंतु अब ऐसे लोगों के दर्शन होने के बाद, यह जानने के बाद कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति क्या है तो मैं अपने आपको सभी धर्मों और सीमाओं से बिल्कुल परे पाती हूँ. और क्या ही अच्छा हो कि हमारी पीढ़ी नेताओं के अतिवादी विचारों का अंधाधुंध अनुसरण करने के बजाय अपना आदर्श ऐसे लोगों को चुनें जो सचमुच अनुसरणीय हैं. वडाली बंधुओं ने अपनी प्रस्तुति के बीच चार लाइनें कही थीं, उन्हीं के साथ और इस आशा के साथ कि हम एकता की महत्ता को समझेंगे, अपनी बात समाप्त करती हूँ -
”हम क्या बनाने आये थे और क्या बना बैठे
कहीँ मंदिर, कहीँ मस्जिद, गुरुद्वारे औ गिरिजा बना बैठे,
अरे, हमसे अच्छी तो परिंदो की ज़ात है,
कभी मंदिर पे जा बैठे, कभी मस्जिद पे जा बैठे”
