‘आजा लिख ले’

ई हौ मेरी ‘कम-बैक पोस्ट’. सबसे पहले तो सभी भाई-बंधुओं, चिट्ठा-जगत के सदस्यों व पाठकों को मेरी ओर से नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें. गत एक वर्ष से मैनें चिंतन पर कुछ नहीं लिखा. ये बात और है कि जितना चिंतन मैने साल २००७ में किया है उतना शायद ही कभी किया हो. इस बीच बहुत से ई-मेल मुझे मिले, टिप्पणियाँ भी आती रहीं. सभी उत्साहवर्धक. बहुत से लोगों ने कहा कि लिखना पुनः शुरू करें. मैं इस पोस्ट के ज़रिये उन सभी को धन्यवाद कहती हूँ जिनके प्रोत्साहन की वजह से लिखने कि चाह मन मे सदा बनी रही, यद्यपि मैनें कुछ लिखा नहीं. साल २००६, दिसंबर में मैने अपनी अंतिम पोस्ट लिखी थी. एक साल बाद पुनः लिख रही हूँ तो ‘आमिर खान’ टाइप भी फ़ील कर रही हूँ.  एक साल में एक पिक्चर, एक साल मे एक पोस्ट.  वर्ष २००७ मेरे लिये इतना उथल-पुथल भरा रहा कि मुझे फ़ुर्सत ही नहीं मिली कि कभी कुछ लिखूँ.  या फिर शायद फ़ुर्सत मिली हो, किंतु शब्द नहीं मिले.

अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ शुरू हुआ था सन् २००७. मैनें सोचा था कि नियमित लिखूँगी. कोशिश करूँगी कि लिखने के विषयों का दायरा विस्तृत हो सके इत्यादि इत्यादि. अमित का रोग गंभीर था किंतु असाध्य नहीं था, चिकित्सकों ने आखिरकार जड़ ढूँढ ही ली थी. अब चिंता को था ही क्या. ४ या ५ जनवरी २००७ (तारीख़ तो अब ठीक से याद नहीं)- अमित को फिर से अस्पताल जान पड़ा. कारण इस बार नया था. डॉक्टरों ने कहा कि शायद अब पेट का ऑपरेशन करना पड़े. अमित के दो ऑपरेशन वर्ष २००६ में हो चुके थे. इस बार मैनें पहली बार कुछ टूटते हुए मह्सूस किया. एक के बाद एक घिरती हुई समस्यायें, बढ़ती अपेक्षायें. मैं ऊपर से जितना मज़बूत होने की कोशिश कर रही थी, उतना बिखर रही थी. खै़र, अमित के पेट का ऑपरेशन नहीं हुआ.  १ हफ़्ते वह अस्पताल में रहे, पर चिकित्सकों की कुशलता से ऑपरेशन के बिना ही उनकी सम्स्या का समाधान हो गया. किंतु यह अंत नहीं था. समस्यायों का ताँता ज्यों का त्यों रहा. सारे साल मैं यही सोचती रही कि भैया भगवान जी आप चाह क्या रहे हो.

यहाँ उन मानसिक और शारीरिक समस्यायों का ज़िक्र करना निरर्थक लगता है जिनसे यह साल भरा रहा. अब तो रात गयी और बात गयी. जनवरी से दिसंबर तक का समय चाहे जैसे निकाला हो किंतु अब अंत में आ के देखती हूँ तो लगता है कि कुछ भी बेवजह नहीं हुआ. २००७ जाते जाते मुझसे मेरी आने वाली संतान को भी ले गया और मैं ऐसे बनी रही जैसे कोई चलचित्र देख रही हूँ. ये नहीं कहूँगी कि कोई फ़र्क नहीं पड़ा, पड़ा था, लेकिन इतना नहीं कि मैं सँभल ना पाऊँ. ये आघात शायद मुझे पूरी तरह हिला देता अगर साल भर छोटे छोटे कष्ट झिला झिला के भगवान ने बाई गॉड इतना पक्का न कर दिया होता. पता नही इस घटना का ज़िक्र करना चाहिये था या नहीं. पर अब मैं इतनी निर्लिप्त हो चुकी हूँ कि कहना न कहना सब एक बराबर है.

जीवन के उलझावों को सुलझाते सुलझाते मैं एक इंसान के रूप मे इतना सुलझ जाऊँगी पता नहीं था.  मज़ेदार साल था अगर अनुभवों के मद्देनज़र देखा जाये तो. कितना कुछ खो के भी मैनें कितना कुछ पा लिया. धैर्य,  साहस, सूझ-बूझ, जीवन के प्रति एक सर्वथा नया दृष्टिकोण, पुराने रिश्तों मे नये आयाम और ढेर सारे लोगों का बहुत ढेर सारा प्यार. अमित अब क़रीब क़रीब ठीक हो चुके हैं. पति से अधिक अब वे मेरे मित्र है. बीच में कुछ पल ऐसे थे कि लगा हमने शायद एक दूसरे को ही खो दिया है. एक दूसरे को फिर से ढूँढते-ढूँढते हमने कब एक दूसरे  गुम हुआ दोस्त पा लिया, पता नहीं चला. जो हो, जीवन पुनः मधुर प्रतीत होता है. बल्कि यूँ कहूँ कि मेरे लिये ये एक नया जीवन है तो अधिक बेहतर होगा. बस ईश्वर से यही कामना है कि मुझमें यही शक्ति, यही धीरज सदैव बनाये रखे.

ईश्वर से यह भी प्रार्थना है कि यह नया साल सभी के लिये ढेरों खुशियाँ ले के आया हो, सभी के लिये मंगलमय रहे. अब और क्या लिखूँ. अधिक कुछ है नहीं इस पोस्ट में लिखने को. बस यूँ ही लिख दी. आप भी बस यूँ ही पढ़ लीजियेगा.

Published in: on January 15, 2008 at 12:48 pm Comments (8)

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8 Comments Leave a comment.

  1. वापस लेखन की शुरुआत करने के लिए बधाई। आशा है भगवन इस नए साल में आपके धैर्य और मनोबल की इतनी कड़ी परीक्षा ना ले जैसी पिछले साल ली।

  2. नया साल आपके लिये खुशियां लेकर आये, अमित जी एकदम ठीक हों। आप पुरानी तरह से लेखन शुरू करें।

  3. धन्यवाद :)

  4. कम बैक पोस्ट पर वेलकम बैक स्वीकारें!!

  5. निधि जी, आपको जानती नहीं परन्तु आपका पिछला वर्ष इतना कष्टप्रद रहा जानकर दुख हुआ । आशा ह यह वर्ष खुशियों व मुस्कान से भरा होगा और आप यूँ ही लिखती रहेंगी ।
    घुघूती बासूती

  6. ये पोस्ट पढ़कर बहुत अच्छा लगा। अब नियमित लिखती रहो।

  7. Bahut dhnayawaad ki aapne hamari prathna swikar kar li. chinta mat kijiye sab theek ho jayega :-)

  8. Well done keep it up.


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