मेरे दिन कुछ यूँ बीते…

आज बहुत दिनों बाद जब पुनः लिखने बैठी हूँ तो सोचा सबसे पहले वह लिखूँ जो गये दिनों मे लिखने का मन तो किया किंतु शब्दों ने साथ नहीं दिया. बीते तीन महीने मेरे लिये एक परीक्षा की तरह बीते हैं. मुझे लगा जैसे मैं १९९९ को पुन: जी रही हूँ. एक के बाद एक परेशानी और बिखरता हुआ मनोबल. इस सब के बीच लिख पाने की क्षमता मुझमें थी नहीं. मैं कुछ दु:खद लिखना नहीं चाहती थी पर अब लगता है कि उस दु:ख, निराशा और आक्रोश का बह जाना ही अच्छा है. और फिर अंत भला तो सब भला. इसलिये जो जैसा है या था- लिख रही हूँ.

९९ में जब पापा का देहांत हुआ तो सब इतना अकस्मात हुआ कि कुछ सोचने या समझने का समय ही नहीं मिला. १० मिनट और सब खत्म. और उन १० मिनटों में मैनें क्या महसूस किया था यह मैं आज तक नहीं समझ पाती. २८ दिन बाद नानी भी चली गयीं, अचानक. मैं जैसे किसी और लोक में थी. कुछ प्रतिक्रिया नहीं, कोई दर्द नहीं, दु:ख नहीं. दिमाग़ इतना सुन्न था कि समझ ही नहीं आया हो क्या रहा है. और शायद यही अच्छा था. नाना जी के जाने के लिये मानसिक रूप से मैं कहीं तैयार थी, किंतु मृत्यु को इतने निकट से देखूँगी यह नहीं जानती थी. दशहरे वाले दिन जब हम कानपुर पहुँचे तो नाना अस्पताल में थे. डॉक्टरों को कोई उम्मीद नहीं थी. उनके अंग काम करना बंद कर रहे थे और आंशिक पक्षाघात हो चुका था. मैं शायद इसके लिये तैयार नहीं थी. नाना सारी रात पानी माँगते रहे, छटपटाते रहे और मैं असहाय खड़ी थी. मैं इसके लिये तैयार नहीं थी. ‘मर्सी किलिंग’ - मैं हमेशा जिसकी पक्षधर रही हूँ, पहली बार जाना कि यह उतना आसान नहीं जितना मुझे प्रतीत होता था. आपमें बहुत साहस होना चाहिये जो आप इतना बड़ा कदम उठा सकें. यह साहस किसी में नहीं था. मैनें पहली बार उस छटपटाहट को महसूस किया जिसमें आप यह नहीं जानते कि आप ईश्वर से अपने प्रिय का जीवन माँगे या मृत्यु. ४ दिन के पीड़ादायक संघर्ष के बाद नाना अंतत: चले गये और मैनें पहली बार इतने निकट से प्राणों को मुक्त होते देखा….एक एक कर अंगो का फ़ड़क कर शिथिल होना….मानो दिये की लौ बुझने से पहले एक आखिरी बार तेज़ हो रही हो. महसूस कर सकती थी सब. मैं इस सब के लिये तैयार नहीं थी.

यह सब जैसे कम था. रही बची कसर पूरी करने के लिये हमारे कर्मकांड और समाज होते ही हैं. झूठा ढोंग…दिखावा और झूठी सहानुभूति. लोग मृत्यु जैसी घटना को भी एक व्यवसायिक रूप दे देते हैं. जो चला गया उसके गुण दोषों का विश्लेषण होगा, एक ही कहानी इतनी बार इतनी तरह से सुनायी जायेगी मानो किसी फ़िल्म की कहानी हो. और जो सुनायेगा वह नायक बन जायेगा…भले ही जीते जी उसने दिवंगत की खैर भी न ली हो कभी. मैं चीखना चाहती थी…भगा देना चाहती थी ऐसे लोगों को या खुद भाग जाना चाहती थी इस सब से दूर, पर कुछ संभव नहीं था. दबा आक्रोश कब अवसाद बन गया पता नहीं चला. अजीब अजीब सपने, हर पल आशंकाओं से ग्रस्त…अजीब अनुभव…..

इन सब से निकल पाती कि उससे पहले ही अमित (मेरे पति) का स्वास्थ्य अचानक तेज़ी से गिरने लगा. वैसे तो मार्च में हुए ऑपरेशन के बाद से थोड़ा बहुत कुछ लगा ही था पर डॉक्टर कह रहे थे कि सब धीरे धीरे ठीक हो जायेगा…लेकिन लगा कि कुछ गंभीर है जो छुपा हुआ है. इधर अमित अपने सामान्य कार्य करने में असमर्थ हो रहे थे उधर बीमारियों के सभी टेस्ट ‘नेगेटिव’. बीमारी का कोई पता नहीं. एक के बाद एक महँगे और बडे़ टेस्ट से भी कुछ पता नहीं लग पा रह था. दो महीने तक पता ही नहीं लगा कि समस्या है क्या…. अचानक लिवर की जाँच के लिये किये गये कैट-स्कैन से पता चला कि रीढ़ की हड्डी में गलाव है. हम लोगों ने दूर दूर तक यह तो कल्पना भी नहीं की थी. डॉक्टर कह चुके थे कि अमित को बहुत सावधान रहना होगा और तीन महीने तक बेड-रेस्ट…अन्यथा कुछ भी हो सकता है. साथ ही पूरा मामला सर्जन से न्यूरो-सर्जन के हाथ में चला गया. मैं पूरी तरह निराश हो चुकी थी. ईश्वर के सिवा कोई रास्ता नहीं दिख रहा था. अंतत: मैंने सब उनके हाथ में छोड़ दिया और प्रार्थना की शक्ति को शायद पहली बार देखा. हाल में यहाँ जब हम कुछ एडवांस टेस्ट की रिपोर्ट ले कर न्यूरो-सर्जन से मिले तो उन्होंने कहा मरीज़ को बुलाइये. अमित ने कहा कि मैं ही तो हूँ. डॉक्टर हतप्रभ थे कि अमित अपने पैरों पर खड़े हैं, चल-फिर रहे हैं. यह देख उन्होंने ऑपरेशन की संभावनाओं को नकार दिया. थोडे़ दिन के लिये बेड-रेस्ट कहा और ये भी कि लंबे समय तक सावधान रहना होगा किंतु दवाओं से ही सब ठीक हो जायेगा यह हमारे लिये खुशी की बात थी. अमित की सेहत में सुधार हो रहा है. वह अपने काम खुद कर पा रहे हैं. उनके चेहरे पर हँसी लौट आयी है और मेरे मन में शांति.

कहते हैं हर बात का एक धनात्मक पहलू होता है. यह कठिन समय न आता तो मैं जान भी नहीं पाती कि मेरे मित्र मुझे ईश्वर का आशीर्वाद हैं. यहाँ इस कठिन घड़ी में उन्होंने मुझे इतना प्यार और सहयोग दिया है कि मुझे परिवार की कमी महसूस नहीं हुई. कभी लगा नहीं कि इतने बड़े शहर में हम अकेले हैं. अँकुर, दीप्ति, आलोक और नवीन…मैं इन्हें धन्यवाद तो नहीं कहूँगी क्यूँकि यह शब्द प्रति आभार प्रकट करने के लिये बहुत छोटा है पर बस इतना कहना चाहूँगी कि इन सबके बिना मेरा इस कठिन समय को पार करना लगभग असंभव था. अँकुर को तो मैं शायद तीन या चार महीने पहले मिली हूँ….बल्कि मिली तो दो महीने पहले पर हाँ चार महीने से जानती हूँ. इतने छोटे अरसे में बने संबंध में इतना प्यार, विश्वास और अपनापन हो सकता है यक़ीं नहीं होता. ईश्वर नें मानों जीवन में छोटे भाई की कमी को पूरा कर दिया है . नवीन…..पुने में नौकरी करता है. दो महीने पहले जब मेरी उससे बात हुई तो उसे लगा की शायद मैं बहुत परेशान हूँ. इस माह वह हृषिकेश गया सिर्फ़ इसलिये क्यूँकि उसे विश्वास है कि वहाँ एक मंदिर में अगर किसी के नाम से पूजा कराओ तो उसके सब रोग ठीक होते हैं. अभी दो दिन पहले उस से बात हुई तब उसने बताया कि उसने अमित के नाम से पूजा करायी है. और मुझसे इसलिये नहीं पूछा कि मैं पहले ही परेशान हूँ और फिर पता नहीं मेरा इस सब में विश्वास हो या न हो. भावातिरेक से मैं नि:शब्द रह गयी. अपने इन मित्रों के अतिरिक्त मैं उन सभी लोगों और चिट्ठा-परिवार की भी आभारी हूँ जो इस कठिन घड़ी में मेरा मनोबल बढ़ाते रहे. मुझे नहीं पता था कि अनजाने में बने कुछ रिश्तों कि डोर इतनी मज़बूत है. बहुत अच्छा लगा जान कर. शायद भगवान बताना चाहते थे कि ज़िंदगी अब भी ख़ूबसूरत है. अब फिलहाल तो नये साल का बेसब्री से इंतज़ार है क्यूँकि- ‘एक बरहमन ने कहा है कि वो साल अच्छा है’. उम्मीद है कि नया साल आप सब के जीवन में भी खुशियों की ढेरों सौगा़त ले के आयेगा. आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें. ……चलिये फिर अगले साल मिलते हैं :) .

Published in: on December 28, 2006 at 10:00 am Comments (24)