बिलेटड हैप्पी टीचर्ज़ डे :)

यूँ तो शिक्षक दिवस आया और चला गया। हमने मन ही मन अपने शिक्षकों को याद किया। पर लिखा कुछ नहीं। ‘फिर कभी’ वाला मूड हम पर हावी था। और ऐसे में हम मलूका दास जी के श्री चरणों में गिर अकर्मण्यता को प्राप्त हो जाते हैं। स्वयं को समझाया कि क्या लिखें, कितना लिखें….और ख़ुद को तसल्ली दे ली कि ठीक ही है, मन में याद कर लिया, लिखना क्या! पर अभी गत सप्ताहांत पर किसी कार्यवश अपने विश्वविद्यालय जाना हुआ। अब ऐसे तो जीवन को आकार देने में स्कूल के शिक्षकों का भी कम योगदान नहीं रहा, किन्तु विश्वविद्यालय में जो अध्यापक मिले उनकी अमिट छाप आजीवन मन पर अंकित रहेगी। खै़र विश्वविद्यालय जा कर सभी शिक्षकों से भेंट हुई। सोया विद्यार्थी जाग उठा और हमें लगा कि हम भी बतायें कि कैसे थे हमारे ‘वह गुरू’ जिनसे मैनें मात्र शिक्षा नहीं अपितु जीने का सलीका़ भी पाया है।

मैनें स्नातक तथा परास्नातक दोनों ही ‘दयालबाग़ विश्व्विद्यालय, आगरा’ से किया। यह आगरा का सर्वाधिक अनुशासित कॉलेज हुआ करता था बल्कि शायद आज भी है। प्रोफ़ेसर वी. जी. दास भौतिकी के विभागाध्यक्ष हो कर नये नये आये थे। गोरा रंग, ऊँचा कद, दुबला-पतला शरीर और चेहरे पर चिरस्थायी हँसी। स्नातक में बस इतना पता था कि वह अब नये विभागाध्यक्ष हैं और साइकिल से आते हैं। यह साइकिल से आने वाली बात हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण थी। जब अधिकांश अध्यापक कार से या फिर कम से कम स्कूटर, मोपेड से आते थे तब विभागाध्यक्ष का साइकिल से आना हमें उनके ‘स्टेटस’ के अनुकूल नहीं लगता था। हमारी कोई भी कक्षा वह नहीं लेते थे अत: एक अध्यापक के तौर पर उन्हें जानने का मौका हमें नहीं मिला था। यद्यपि यह पता था कि वह ‘इलेक्ट्रॉनिक्स’ के क्षेत्र से संबद्ध हैं। एक बार की बात– हमारी ‘क्वांटम मेकैनिक्स’ की कक्षा चल रही थी। कुछ विषय उबाऊ और कुछ पढ़ाने वाले अध्यापक उदासीन…कुल मिला कर कुछे बच्चे खिड़कियों से बाहर झाँक रहे थे, पीछे की बेंच वाले पर्ची-पर्ची खेल रहे थे और अगली कतार के लोग सर हिलाते हुए समझने का अभिनय कर रहे थे। कक्षा की अवधि समाप्त होने की घंटी से पहले अध्यापक की पढ़ाने की इच्छा बोल गयी और वह अपनी किताब उठा बाहर निकल गये। और जैसा कि नींद से जागे बालक करते हैं ठीक वैसे छात्र लगे शोर मचाने। यह शोर जा पहुँचा बाहर से ग़ुज़रते दास सर के कानों तक और उसके बाद सर सीधे कक्षा में। बोले-
‘आप लोगों की क्लास छूट गयी?’
‘जी सर।’
‘क्यूँ? अभी तो २० मिनट बाकी हैं।’
‘सर ने छोड़ दिया आज जल्दी।’
‘ह्म्म्म क्या पढ़ रहे थे आप लोग….’
‘क्वांटम मेकैनिक्स की क्लास थी सर।’
‘तो आज का लेक्चर कौन समझाएगा मुझे….।’
इस अप्रत्याशित प्रश्न से हम सभी अवाक थे। वैसे भी समझ कुछ आया नहीं था। सारे छात्रों को बगलें झाँकते देख सर ने स्वयं वह क्लास दुबारा ली। और जब आगे चलकर भी जब सर ने हमारी कक्षायें ली तब भी बोर्ड पर पिछली क्लास के लेक्चर को देख अक्सर सवाल पूछ बैठते थे। और अगर जवाब नहीं मिला तो फिर उस विषय पर लेक्चर मिलना तय होता था। प्रत्येक विषय पर उनका समान अधिकार हतप्रभ करने वाला था।

सर हमेशा समय की महत्ता पर बल देते थे। एक बार शिक्षक दिवस मनाने के लिये सभी बच्चों ने २०-२० रुपये इकट्ठे करने का सोचा। किसी तरह इस बात की भनक सर को लग गयी। और उस दिन हम सभी को बहुत झाड़ पड़ी। उनका कहना था कि माँ-बाप की मेहनत की कमाई को व्यर्थ खर्च करना उचित नहीं है। इस बात पर हम सबने निर्णय लिया कि हाथों से बना के कार्ड दिये जायें। अन्तत: जब कार्ड बन के तैयार हुए और हमने सभी अध्यापकों को दिये तो सभी ने तारीफ़ करी। दास सर ने भी कहा-
वाह। बड़े सुन्दर कार्ड हैं,  पर हाथ के बने कार्ड कहाँ मिले?
हम सब खुश हो गये सुन के। फ़ूल के बोले - ‘सर हम सब ने बनाये हैं’।
‘अच्छा, कितना समय लगा?’
‘सर दो घंटे’
‘बेटा इतने में तो कम से कम दस न्यूमेरिकल हल कर लेते तुम लोग।’ सर हँसते हुये बोले।
फिर सब के उतरे चेहरे देख सर ने गंभीर हो आगे कहा-’ बेटा, मेरी बात को समझो। तुम लोगों ने बहुत मेहनत करी। पर तुम लोग जो सम्मान हम सबको देते हो वही काफ़ी है।  और रही बात उपहार की तो एक शिक्षक के लिये सबसे बड़ा उपहार यही है कि उसके छात्र एक सफ़ल और ज़िम्मेदार नागरिक बनें। इस समय तुम्हारा ध्यान सिर्फ़ पढ़ाई पर होना चाहिये।’ यह बात हम लोगों के दिल को छू गयी। और हमने मन ही मन उनके आदर्शों को अपनाने का निश्चय किया। पर ऐसा नहीं कि सर ने सिर्फ़ पढ़ाई पर ज़ोर दिया हो। जब ‘सांस्कृतिक सप्ताह’ मनाया जाता तो वह हमें सभी प्रतियोगितायों में बढ़-चढ़ के हिस्सा लेने को कहते।

अपने कार्य के प्रति उनके जैसी लगन और समर्पण मैनें कहीं नहीं देखा। सुबह सबसे पहले विभाग में पहुँच जाना, देर शाम तक काम करते रहना। कभी बीमारी की वजह से किसी छात्र की पढ़ाई का हर्ज़ा हो जाता तो सर स्वयं समय निकाल कर उसे अलग से पढ़ाते। विद्यार्थियों की हर प्रकार से मदद के लिये मैनें उन्हें हमेशा तत्पर देखा। एक दिन काम की वजह से मैं उनसे मिलने गयी। उस समय वह अपने कमरे में नहीं थे। उनकी मेज पर एक आकर्षक किताब रखी थी-माइक्रोप्रोसेसर से संबंधित, एकदम नयी। किताब हमारे पाठ्यक्रम से संबंधित नहीं थी। हम अभी निचले स्तर के प्रोसेसर्ज़ के बारे में पढ़ रहे थे जबकि यह किताब अन्य विकसित प्रोसेसर से संबंधित थी।  किंतु मैं अपनी उत्सुकता रोक न सकी और किताब के पन्ने पलट कर देखने लगी।  यह वैसे भी मेरा प्रिय विषय था । इस बीच सर कब आये मुझे पता भी नहीं चला। मुझे किताब देखते हुए देख सर ने कहा- ‘यह मैनें कल ही मंगवाई है, यहाँ मिलती नहीं। बहुत अच्छी किताब है। तुम्हारे पाठ्यक्रम में नहीं है पर क्या तुम पढ़ना चाहोगी?’ मेरे यह पूछने पर कि उन्हें यह किताब कब तक वापस चाहिये होगी वह बोले-’बेटा इस तुम ही रख लो। मैं और मँगा लूँगा। और भी बच्चों से कहना अगर उन्हें किसी तरह की किताब चाहिये तो मुझे बतायें मैं खरीद के दूँगा। बस तुम लोग खूब पढ़ो।’ और यह सिर्फ़ कहने की बात नहीं थी। कितनी ही किताबें जिनका मूल्य छात्र वहन नहीं कर सकते थे, उन्होंने अपने पैसों से खरीद के दीं।

मुझे याद आता है जब मैनें उनसे पूछा था कि आई.आई.टी. और नोएडा में मिली नौकरी में से क्या चुनूँ तो उन्होनें कहा था कि वह चाहेंगे कि अभी मैं और पढ़ाई करूँ, कम से कम एम.टेक. तो करूँ ही। पर ‘पियर प्रेशर’ नाम का कल्पित भूत था या शीघ्रातिशीघ्र आत्मनिर्भर होने की लालसा, मैनें उनकी सलाह पर अमल नहीं किया। और जब आज मुड़ के देखती हूँ तो पाती हूँ कि मैं कितनी ग़लत थी। शायद मैनें उस समय अपनी क्षमताओं और उनकी दूरदर्शिता का सही आँकलन नहीं किया था।

सर अब ‘निदेशक’ हो गये हैं। पर अभी जब मैं कॉलेज गयी तो वह अपनी अति-व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर हमसे मिले। औरों को चाहे मिलने की लिये कितनी मेहनत करनी पड़ती हो पर वह विद्यार्थियों के लिये हमेशा उपलब्ध रहे हैं। छ: साल बाद भी उन्हें मुझे पहचानने में क्षण नहीं लगा। वैसे ही हँसमुख, वैसे ही ऊर्जावान, सर बिल्कुल नहीं बदले। पति के बारे में पूछा। जब सुना कि उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं तो पूछ बैठे कि तुम लोग एक्सर्साइज़ करते हो? मैनें कहा कि सुबह ७-७:३० बजे दफ़्तर जाना होता है तो नहीं हो पाती। इस बात पर बोले-बेटा मेरी घड़ी में ढाई बजे का अलार्म लगा होता है, पर आलस……क्या करूँ तीन बजे से पहले उठ ही नहीं पाता। लेकिन फिर जो उठता हूँ तो थकता नहीं। सुबह खेतों में जा के पाटे चलाता हूँ और अभी कहो तो रेस लगा लूँ। कसरत बहुत ज़रूरी है बेटा। अच्छा बुलाओ लड़के को, डाँट लगाऊँ, कुछ भला काम करूँ आज’। फिर अमित को बुला व्यक्तिगत तौर पर फ़ायदे-नुकसान बताये। 

उनकी इस आत्मीयता से हृदय मानों भीग गया। चलते चलते पूछा-क्या कर रही हो तुम आजकल। मैं जानती हूँ मेरे पास इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं था। कम से कम उस हिसाब से संतोषजनक तो बिल्कुल नहीं जिस हिसाब से उन्हें मुझसे अपेक्षायें थीं। किंतु फिर भी जो भी मेरी छोटी-छोटी उपलब्धियाँ हैं उन्हें सर ने सराहा। कहा कोई मदद चाहिये हो तो उनसे कभी भी संपर्क करूँ। उनसे मिलने के बाद मैं एक नयी ऊर्जा, नये उत्साह से सराबोर हूँ। अपने लक्ष्य को पाने की एक लगन है अब। सोचती हूँ तो पाती हूँ कि  प्रोफ़ेसर दास बिल्कुल उस दीप की तरह हैं जो स्वयं जल कर औरों का पथ प्रकाशित करता है। ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि उन्हें लंबी आयु दे और मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं उनकी अपेक्षाओं पर खरी उतर पाऊँ।

Published in: on September 14, 2006 at 8:36 pm Comments (11)

मेरा भारत और एक छोटा सा प्रश्न

बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं. बस जी नहीं किया. इस बीच बड़ी बड़ी घटनायें हो गयीं भारत में. मैं कुछ लिखने के बजाय बस यह सोचती रह गयी कि क्या हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने इसी भारत का सपना देखा था. अगर नहीं तो कहाँ चूक गये हम.  आज अन्तर्जाल पर ऐसे ही विचरते हुए श्री ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के एक लेख ने ध्यान आकर्षित किया, शीर्षक था–’भारतीय होने पर गर्व करें’. आज के समय में यदि राजनीति से जुड़े किसी व्यक्ति ने मेरे मानसपटल पर छाप छोड़ी है तो वे हैं हमारे माननीय राष्ट्रपति महोदय. अत्यंत ज्ञानी, विद्वान तथा अनुभवी श्री कलाम अपने ज्ञान, सकारात्मक एवं वैज्ञानिक सोच तथा विनम्र व्यवहार के कारण सदा ही मेरे लिये श्रद्धेय रहे हैं. उनके शब्दों ने मन में हमेशा एक आशा तथा ऊर्जा का संचार किया है. अत: उनके लेखन के प्रति मेरा सहज आकर्षण स्वाभाविक है. मुझे नहीं पता कि इस लेख को कितने लोगों ने पढ़ा है पर इस लेख को पढ़ कर मुझे ये अवश्य लगा कि  हर भारतीय को इसे पढ़ना चाहिये. अत: उनके इस लेख के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ जिन्होंने मुझे न सिर्फ़ अत्यधिक प्रभावित किया अपितु मेरी सोच को एक नयी दिशा दी.

” भारत को लेकर मेरे तीन दृष्टव्य हैं. हमारे इतिहास के तीन हज़ार सालों में दुनिया भर के लोगों ने हम पर आक्रमण किये हैं, हमारी ज़मीनें हथियायी हैं, हमारे दिमाग़ों पर विजय पायी है. सिकंदर के बाद से  ग्रीक, तुर्क, मुसलमान, पुर्तगाली, बर्तानी, फ़्रांसीसी तथा डच सभी आये, हमें लूटा और जो हमारा था वह ले के चले गये. किंतु इसके बाद भी हमने किसी राष्ट्र के साथ ऐसा नहीं किया. हमने कभी किसी पर विजय पाने की कोशिश नहीं की, उनकी ज़मीन, सभ्यता तथा इतिहास पर आधिपत्य स्थापित करने की चेष्टा नहीं की. अपना जीने का ढंग किसी पर नहीं थोपा. क्यों? क्योंकि हम दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं.

इसीलिये भारत को लेकर मेरा पहला दृष्टव्य स्वतंत्रता से संबधित है. मुझे लगता है कि भारत को यह द्रष्टव्य १८५७ में मिला जब स्वतंत्रता की लड़ाई की शुरुआत हुई. हमें अपनी इस स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिये, इसका सम्मान करना चाहिये. यदि हम स्वतंत्र नहीं है तो कोई हमारा सम्मान नहीं करेगा.

भारत को लेकर मेरा दूसरा दृष्टव्य प्रगति को लेकर है. ५० सालों से हम एक विकासशील देश हैं. अब समय आ चुका है कि हमें स्वयं को विकसित देश के रूप में देखना होगा. जी.डी.पी. की दृष्टि से हम विश्व के प्रथम पाँच राष्ट्रों में से हैं. अधिकांश क्षेत्रों में हमारी विकास दर १० % के लगभग है. हमारा गरीबी का स्तर गिरा है. हमारी उपलब्धियाँ विश्व स्तर पर पहचान पा रही हैं. इसके बाद भी हम में आत्म-विश्वास की कमी  है जो हम खुद को एक विकसित, आत्म निर्भर तथा आश्वस्त देश के रूप में नहीं देख पाते. क्या यह उचित है?

मेरा तीसरा द्रष्टव्य है कि भारत को विश्व के सामने खड़ा होना होगा. शक्तिशाली शक्ति का ही सम्मान करते हैं. हमें न सिर्फ़ सैन्य दृष्टि से अपितु आर्थिक दृष्टि से भी सुदृढ़ होना होगा. ये दोनों साथ-साथ चलते हैं.
 

……..

आण्विक ऊर्जा विभाग तथा डी.आर.डी.ओ. की हाल ही में ११ तथा १३ मई को हुए नाभिकीय परीक्षणों में महत्वपूर्ण भागीदारी रही. अपनी टीम के साथ इन परीक्षणों मे भाग लेने तथा विश्व को यह दिखा पाने कि भारत यह कर सकता है एवं अब हम एक विकासशील देश नहीं अपितु विकसित देशों में एक हैं, की खुशी मेरे लिये अतुलनीय है. इससे मुझे भारतीय होने पर बेहद गर्व हुआ. हमने ‘अग्नि’ के पुनरागमन के लिये भी एक अन्य ढाँचा तैयार किया है जिसके लिये हमने एक अत्यंत हलके पदार्थ का विकास किया है. बहुत ही हलका पदार्थ जिसे कार्बन-कार्बन कहते हैं.

एक दिन ‘निज़ाम इन्स्टिट्यूट ऑव़ मेडिकल साइंसज़’ के एक हड्डी रोग विशेषज्ञ मेरी प्रयोगशाला में आये. उन्होंने वह पदार्थ उठाया और पाया कि वह बहुत हल्का था. उसके बाद वह मुझे अपने अस्पताल ले गये, मरीज़ों से मिलवाने के लिये. वहाँ छोटे-छोटे लड़के और लड़कियाँ भारी भारी धात्विक कैलीपर पहने हुए थे. लगभग तीन-तीन किलो वज़न वाले कैलीपर पहन कर ये बच्चे किसी प्रकार अपने पैरों को घसीट रहे थे. डॉक्टर ने मुझसे कहा - ‘मेरे मरीज़ों का कष्ट दूर कर दीजिये’. मात्र तीन हफ़्ते में हमने ३०० ग्राम के वज़न वाले कैलीपर का निर्माण कर लिया. जब हम उन्हें लेकर अस्पताल गये तो बच्चे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पाये. अब वे घिसटने की बजाय आराम से चल सकते थे. उनके माता-पिता के नेत्र हर्षातिरेक से भर आये. इस कार्य से मुझे स्वर्गीय-सुख मिला.

हम अपने देश में अपनी ही क्षमताओं और उपलब्धियों को पहचानने में क्यों हिचकिचाते हैं? हम एक अत्यंत गौरवशाली राष्ट्र हैं. हमारी सफलता की कितनी ही अद्भुत कहानियाँ हैं जिन्हें हम अनदेखा कर देते हैं. क्यों? हम विश्व में गेहूँ के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं. हम चावल के भी दूसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं. दुग्ध-उत्पादन में हम प्रथम स्थान पर हैं. ‘रिमोट सेन्सिंग सैटेलाइट’ के क्षेत्र में भी हम प्रथम हैं.

डॉ. सुदर्शन को देखिये. उन्होंने एक आदिवासी गाँव को स्व-पोषित आत्म-निर्भर इकाई में बदल दिया. ऐसे लाखों उदाहरण हैं किंतु हमारे मीडिया को मुख्यत: बुरी खबरों, असफलताओं तथा आपदाओं की धुन लगी रहती है. एक बार मैं तेल अवीव में था और इज़राइली समाचार पत्र पढ़ रहा था. यह दिन उस दिन के बाद का था जब बहुत से हमले और बमबारी हो के चुकी थी. बहुत से लोग काल का ग्रास बन चुके थे. हमस ने हमला किया था. किंतु समाचार पत्र के पहले पन्ने पर एक ज्यूइश सज्जन का चित्र था जिन्होंने पाँच साल में अपनी बंजर रेगिस्तान ज़मीन को हरे-भरे बाग़ मे बदल दिया. हर इंसान ने उठते ही ऐसी प्रेरणाप्रद तस्वीर देखी. हत्या, बमबारी तथा मृत्यु के भयावह समाचार भीतर के पन्नों में अन्य समाचारों के बीच दफ़्न थे.

भारत में हम सिर्फ़ मृत्यु, बीमारी, आतंकवाद तथा अपराध से संबंधित समाचार ही क्यों पढ़ते हैं? हम क्यों इतने नकारात्मक हैं? एक और प्रश्न- एक राष्ट्र के तौर पर हम विदेशी वस्तुओं से इतना प्रभावित क्यों हैं? हमें विदेशी टी.वी. चाहिये, विदेशी कपड़े चाहिये, विदेशी तकनीक चाहिये. हर आयात की गई वस्तु से इतना लगाव क्यों? क्या हमें इस बात का अहसास है कि आत्म-सम्मान आत्म-निर्भरता के साथ ही आता है. मैं हैदराबाद में एक भाषण दे रहा था जब एक १४ वर्ष की लड़की मेरा ऑटोग्राफ़ लेने आयी. मैनें उससे पूछा उसके जीवन का उद्देश्य क्या है : उसने कहा - ‘मैं विकसित भारत में रहना चाहती हूँ’. मुझे और आपको, उसके लिये, ये विकसित भारत बनाना  ही होगा.”

यह पूरा लेख आप यहाँ  पढ़ सकते हैं. इस लेख यदि हमें कोई प्रेरणा मिली तो उसे हमें हृदय तक सीमित नहीं रखना है, हमें कर्म करना होगा, राष्ट्र-सेवा के मौके ढूँढने होंगे. समय आ गया है कि आज की युवा पीढ़ी परिवर्तन लाने का बीड़ा उठाये. और यह हमारा विश्वास है कि जब हमारे देश कि लाखों-करोड़ों प्रतिभायें हाथ से हाथ मिला आगे बढ़ेंगी तो कोई शक्ति, कोई आपदा हमारे विकास का मार्ग नहीं रोक पायेगी.

इस के साथ आप सब से एक और प्रश्न करना चाहूँगी. एक बात को लेकर दुविधा में हूँ. कई बार अन्तर्जाल पर ऐसा कुछ दिख जाता है जो बहुत प्रेरणाप्रद लगता है. ऐसे में यह सोचती हूँ कि उसे चिट्ठे पर डालूँ य न डालूँ, क्योंकि वह मौलिक नहीं है. वैसे यह निजी सोच हो सकती है पर आप क्या कहते हैं? क्या नवीनता और मौलिकता को वरीयता दूँ या अगर कुछ अच्छा मिले तो सिर्फ़ बाँटने तथा औरों को भी वह दिशा दिखाने के उद्देश्य से यहाँ डालूँ, यह जानते हुए भी कि वह सामग्री और भी कहीं उपलब्ध है. आप अन्तत: क्या ढूँढते हैं किसी चिट्ठे पर?

Published in: on September 8, 2006 at 11:41 pm Comments (9)