गोरी का पति गोरिल्ला

[ अन्नपूर्णा नंद जी के कहानियों के एक मुख्य पात्र 'लाला जी' की आखिर शादी हो ही गयी। हाँलाकि लड़की-दिखाई से ले कर एक रूपसी कन्या से विवाह तक की कथा तीन-चार भागों मे बँटी है पर वे भाग फिर कभी बाँटूँगी। फिलहाल सोचती हूँ कि शादी के बाद हर पति को छील-छाल, गढ़-तराश के इन्सान बनाने की जो उठापटक पत्नियोँ को करनी पड़ती है उसका विवरण प्रस्तुत किया जाय। इसी क्रम में इस बार लाला जी की पत्नी का एक छोटा सा परिचय प्रस्तुत है। आगे आयेगी -- लाला जी की सुधार-गाथा]

    अकेले ब्रह्मा में इतनी बुद्धि कहाँ! त्रिदेवों ने मिल कर उसकी रचना की होगी। सौन्दर्य की एक नयी सीमा उसने का़यम कर दी है। छटाक-भर वजन, बुलबुल की चहक, प्यारी आँखे और चाँद सा मुखड़ा! मैनं उसे देखा और देखते ही आदमी से लट्टू हो गया। जैसा मेरा घर बसा ईश्वर करे सबका बसे।

    पाँच मिनट के अंदर वह दो बार मेरी ओर देख के हँसी और दोनों बार मैनें एक-एक चीज़ उसके हवाले कर दी–पहली बार अपना हृदय और दूसरी बार अपने सेफ़बकस की कुंजी। उसमे भी प्रसन्न होकर मुझे तुरन्त अपने प्रधान अर्दली के पद पर नियुक्त कर दिया।

    आज दिन में तीन बार वह मुझे चौक भेज चुकी थी–सुबह हाथी-दाँत की कंघी लाने, दोपहर में कमीज़ सिलवाने और इस वक्त एक पेटेंट इत्र ख़रीदने। मैं मुँह लटकाये चौक से लौटा, क्योंकि जो इत्र उसने माँगा था वह लाख तलाश करने पर भी नहीं मिला।

    उसने पूछा–’कहिये,ले आये।’
    ‘अजी, सारा चौक छान डाला, कहीं नहीं मिल रहा है!’
    ‘इतने बड़े शहर में ओटो-दिलबहार नहीं मिल रहा है!’

    ‘ओटो-दिलबहार? राम-राम!! मैं तो ओटो-सिरकपार का नाम पूछता फिरता था। अब इस तरह की कोई चीज़ लाने को कहोगी तो पर्चे पर नाम लिख लिया करूँगा!’

    ‘देखती हूँ कि आपकी स्मरणशक्ति लोप होती जा रही है।’

    ‘नहीं यह बात तो नहीं है। कहो तो आँखें मूँदकर बता दूँ कि तुम्हारे बायें गाल पर कितने तिल हैं।’

    ‘मैं एक बात पूछ सकती हूँ?’

    ‘एक नहीं, सौ बातें पूछो लेकिन पहले समीप बैठा लो।’
    ‘आप अँग्रेज़ी कुछ जानते हैं?’
    ‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं।’
    ‘कहाँ तक?’

    ‘अधिक नहीं जानता। केवल ‘डैमफ़ूल’ तक मैनें अंग्रेज़ी पढ़ी है। मैनें निश्चय कर लिया है कि अपने बच्चों को मैं डैमफ़ूल पुकारूँगा गो मेरे पिता जी मुझे सूअर-गधा पुकारते थे।’

    ‘हूँ! अच्छा हिन्दी तो आपने काफ़ी पढ़ी होगी?’

    ‘इसमें क्या शक़। सिंहासन बत्तीसी, बैताल पचीसी, किस्सा तोता मैना आदि मैनें सब पढ़े हैं। योगवशिष्ठ और किस्सा-साढ़े-तीन-यार तो मैनें एक जिल्द में बँधवा कर रख छोड़ा है। हिन्दी काव्य में भी मेरी अच्छी घुसपैठ है; बिहारी के बिरहे, केशो के कँहरवे, कहाँ तक गिनाऊँ! साहित्य सेवा भी मैनें कम नहीं की है; सच पूछो तो साहित्य सेवा करते-करते मुझे दाढ़ी-मूँछ निकल आयी है।’

    ‘जब हिन्दी-अँग्रेज़ी का यह हाल है तो संस्कृत के बारे में तो पूछना ही व्यर्थ है।’

    ‘नहीं, ऐसा मत सोचो। संसकृत में भी मैनें मनुस्मृति आदि व्याकरण की अनेक पुस्तकें पढ़ी हैं।’
    ‘कुछ समझ नहीं आता कि आपकी इन बातों पर रोऊँ या हँसूँ!
    ‘मुझे तुम दोनो दशा में सुंदर लगती हो।’

    ‘जब आप चार पढ़े-लिखे आदमियों के बीच में बैठते होंगे तो वे आपको क्या समझते होंगे?’
    ‘वे मुझे बेवकूफ़ समझते हैं मैं उन्हें बेवकूफ़ समझता हूँ।’
    ‘आखिर इस अविद्या की दशा में आपका कैसे काम चलेगा?’

    ‘काम क्या चलना है? ईश्वर करे मेरे स्वर्गीय चचाजी कल्पवृक्ष की छाँह में बैठ कर कामधेनु का दूध पियें। वे मुझे आजीवन मसनद तोड़ने के लिये स्वतंत्र कर गये हैं।’ [चाचा जी ने कोई संतान न होने के कारण अपनी अकूत संपत्ति लाला जी के नाम कर दी थी। यह किस्सा फिर कभी बताऊँगी--निधि]

    मेरी बातों पर उसे हँसी आ गयी। यदि शरद् ऋतु की चाँदनी रात में आपने कुंद कली को खिलते देखा होगा तो उसकी मुसकान की सुंदरता और सरसता का कुछ अनुमान आप कर सकेंगे। हँसी क्या थी सुधा का स्रोत था। ओठों के लाल पटल को हटाकर कुन्दन-से दाँत चमकने लगे।

    मैं आँखो द्वारा इस रूप-मदिरा को पीने लगा। अकसर ऐसा ही होता है कि जब मैं उसकी ओर देखने लगता हूँ तब राजा निमि मेरी पलकों की ड्योढ़ीदारी से अवकाश ग्र्हण कर भाग खड़े होते हैं। इस समय भी ऐसा ही हुआ! पीठ पर लटकती हुई उसकी चोटी मेरे हृदय पर नागफाँस का काम कर रही थी। उसके अंग-अंग में सौन्दर्य की छटा थी।

    सब बातों में वह मुझसे बढ़ कर है। जिसने अमा और पूर्णिमा एक साथ न देखी हो वह मुझे और उसे एक साथ देख ले। वह विदुषी है और मैं गँवार। वह सुंदरी है और मैं? क्या कहूँ!! जो कुछ कसर थी वह शीतला देवी ने बचपन ही में चेहरे पर मसूर की दालमोंठ छिड़क कर पूरी कर दी। आश्चर्य है कि इतने पर भी वह मुझे प्यार करती है–शायद उसी तरह जैसे कमल को कीचड़ प्यारा है।

  अपने हृदय पर उसका आधिपत्य मैनें बिला किसी चीं-चपड़ के स्वीकार कर लिया था। उसकी रीझ और खीझ के अनुसार मैं कभी लोटन कबूतर और कभी भींगी बिलली बना रहता था। मेरे हृदय की डोर अपने हाथ में करके वह पतंग की तरह मुझे उड़ाया करती–कभी ढील देती थी और कभी खीँच लेती थी।

    खेद है कि मैं कवि नहीं हूँ–यदि कवि होता तो उसके रूपलावण्य की प्रशंसा में कोटियों कवितायें लिख डालता, छपा डालता, और कोई न खरीदता तो मुफ़्त बाँट डालता। तब भी पं. बिलवासी मिश्र की मदद से मैनें कुछ लिखा है, सुनिये–

                   छलकि  छवापै  बजैं छागल छमाछम जो
                          सोनछरी - सी   वह  डोलैरी  मंद   कदम।
                   काकुल  संवारे  हेरि व्याकुल करत मैन
                          आनन निहारे चारु चंद्रमा को होत भ्रम॥
                   गात की गोराई पै सुवरन की खान वारौं
                          अधर  सुधारस  पै  वारौं   कोटि  चमचम।
                   रूप-मद छाके   बाँके नैनन बला के  जाके
                         ऐसी तिरिया के–हाँ! पिता के हैं दमाद हम॥

– अन्नपूर्णानंद वर्मा

Published in: on August 24, 2006 at 12:55 pm

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15 Comments Leave a comment.

  1. On August 24, 2006 at 5:32 pm Ashish Said:

    “शादी के बाद हर पति को छील-छाल, गढ़-तराश के इन्सान बनाने की जो उठापटक पत्नियोँ को करनी पड़ती है”…कहते हैं ना कि मर्द शादी करता है सोच कर कि पत्नि नही बदलेगी और पत्नि शादी करती है सोचकर कि मर्द बदल जायेंगे/दिये जायेंगे। शादी के बाद पत्नि बदल जाती है और मर्द नही और शुरुआत होती है गृहयुद्ध की!

  2. On August 24, 2006 at 6:37 pm ई-छाया Said:

    क्या मतलब है आपका निधि जी शादी के पहले मर्द इंसान नही होते क्या? कहां गये विश्व कुंवारा मंच के अध्यक्ष महोदय? मुझे इंतजार है उनकी प्रतिक्रिया का।
    बहरहाल यह किस्सो की श्रंखला बेहद रोचक प्रतीत होती है। धन्यवाद।

  3. On August 24, 2006 at 7:48 pm अनूप शुक्ला Said:

    “दो बार मेरी ओर देख के हँसी और दोनों बार मैनें एक-एक चीज़ उसके हवाले कर दी–पहली बार अपना हृदय और दूसरी बार अपने सेफ़बकस की कुंजी”
    के अलावा भी कई वाक्य मजेदार हैं। अब कोई महिला ब्लागर यह अनुभव लिखने के
    लिये आगे आयेगीं क्या कि उन्होंने अपने पति को शादी के बाद कितना छीला?

  4. On August 25, 2006 at 1:07 am समीर लाल Said:

    बढ़ियां है, मजा आया…अगली कड़ी का इंतजार है.

  5. On August 25, 2006 at 6:44 am pratyaksha26 Said:

    :-)

  6. On August 25, 2006 at 6:49 am सागर चन्द नाहर Said:

    फिलहाल सोचती हूँ कि शादी के बाद हर पति को छील-छाल, गढ़-तराश के इन्सान बनाने की जो उठापटक पत्नियोँ को करनी पड़ती है उसका विवरण प्रस्तुत किया जाय।
    क्या पतियों को कम मशक्कत करनी पड़ती है? अगर हम भी विवरण लिखनें लगें तो…..!!

  7. On August 25, 2006 at 12:55 pm आशीष Said:

    लेखिका महोदया,
    इस टिप्पणी के द्वारा आपको नोटीस भेजा जा रहा है कि आपके लेख मे कंवारे लोगो के लिये आपत्ती जनक भाषा का प्रयोग किया गया है। निम्नलिखीत टिप्पणी क्वांरे प्रजाति के सम्मानीय और समझदार बंधुओ के बेईज्जती खराब कर रही है।

    फिलहाल सोचती हूँ कि शादी के बाद हर पति को छील-छाल, गढ़-तराश के इन्सान बनाने की जो उठापटक पत्नियोँ को करनी पड़ती है उसका विवरण प्रस्तुत किया जाय।

    हमारे वकील इ-छाया जी के अनुसार इस टिप्पणी के द्वारा आप यह कहने का प्रयास कर रही है कि कंवारे लोग इन्सान नही होते है, जो हमारे मुवक्कील की मानहानी है।
    हम आपसे इस टिप्पणी के लिये दंड स्वरूप आपको कंवारे लोगो(अमीत, खालीपीली, नितिन बागला,शुयेब…..) के चिठ्ठे पर आपसे अगले २ महिने तक हर दिन कम से कम २ टिप्पणी के हरजाने का दावा करते है।
    हरजाने की पूर्ती ना होने पर विश्व कंवारा मण्च आपके चिठ्ठे पर हर दिन टिप्पणी के रूप मे कंवारो के वैवाहिक विज्ञापन चिपकायेगा।

    आपका
    आशीष
    अध्यक्ष
    विश्व कंवारा मंच

  8. On August 25, 2006 at 2:25 pm Laxmi N. Gupta Said:

    यह तो बहुत पुरानी कहानी है। चली आ रही है, तब से जब हव्वा ने आदम को उल्लू बनाया था और चलती रहेगी। बढ़िया है। अगली किश्त का इन्तज़ार है।

  9. On August 25, 2006 at 7:39 pm ई-छाया Said:

    हालांकि मै कुंवारा नही हूं लेकिन मै हमारे छोटे कुंवारे भाइयों का और सागर भाई का पूर्ण समर्थन करता हूं।
    कृपया दी गई सजा का पालन करें।

  10. On August 25, 2006 at 9:37 pm विश्व कुँवारा मंच द्वारा जारी सम्मन का जवाब « चिन्तन Said:

    [...] मेरी मुवक्किला पर विश्व कुँवारा परिषद के अध्यक्ष ने आरोप लगाया है कि उन्होनें कुँवारों की ‘बेइज़्ज़ती’ ख़राब की। [...]

  11. On August 31, 2006 at 3:55 pm बेचारे पति! « दस्तक Said:

    [...] पिछले दिनों निधि जी ने अपने चिट्ठे गोरी का पति गोरिल्ला में बताया कि पत्नियों को अपने पति को इन्सान बनाने के लिये उन्हें गढ़ने और छीलने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है” यह पढ़ कर हम भी तैश में आ गये और टिप्पणी लिख दी कि [...]

  12. On September 2, 2006 at 10:23 pm फ़ुरसतिया » पति एक आइटम होता है Said:

    [...] पत्नी के बारे में शास्त्रों में तमाम बातें कहीं गई हैं लेकिन सबसे नया तथ्य यह सामने आया है कि पत्नी असल में वह प्राणी होती है जो अपने पति को छील-छाल, गढ़-तराश कर आदमी बनाती है। [...]

  13. On February 3, 2007 at 12:40 pm phentermine Said:

    phentermine

    news

  14. On April 11, 2007 at 6:08 am हरिराम Said:

    निधि जी,
    कृपया हाथी-दाँत की बनी कंघी के उपयोग का महत्व बताइए?

  15. On April 11, 2007 at 6:13 am हरिराम Said:

    सुना है, क्या सच है कि हाथी के दाँत(सींग)से बनी कंघी से रगड़कर केश-सँवारने से कभी बाल सफेद नहीं होते?

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