बड़े सालों बाद कानपुर दौरे का योग बना। विगत कुछ दिनों से नाना जी का स्वास्थ्य चिंताजनक था। इसलिये आनन-फ़ानन में कार्यक्रम बन गया। शनिवार, रविवार, और मंगलवार की छुट्टी थी। पतिदेव ने सोमवार की छुट्टी ले ली और हम चल पड़े कानपुर। आगरा से मम्मी और छोटी बहन भी साथ हो लिये।
शनिवार सुबह-सुबह जोधपुर-हावड़ा में अपनी अपनी सीटों पर चारों जन सवार हो गये। कुछ वर्ष पूर्व यह कानपुर जाने वाली बढ़िया ट्रेनों में शुमार थी । अब भी ऐसा ही होगा ऐसा हमें भ्रम था। पर यह क्या…डेढ़ घंटे मे गाड़ी खाली टूँडला तक सरकी। बल्कि सही सही कहूँ तो टूँडला के आउटर पर ही खड़ी हो गयी। ‘अब और नहीं चला जाता रे!’ की सी मुद्रा में। कुछ यात्री ट्रेन से निकल सुबह की सैर पर चल पड़े और लौटते में पास के पेड़ों से दातुन-शातुन का बंदोबस्त भी कर लाये। हमें ट्रेन से उतरना सुहाता नहीं सो खिड़की से ही पास के पोखर में पड़े गुटखे के रैपर गिन डाले। पता है कि यह बड़ा फ़ालतू काम था पर समय नष्ट करने का और कोई साधन था ही नहीं। बाकी के तीन सहयात्री सोने के मह्त्वपूर्ण काम को अंजाम दे रहे थे। खैर, आखिरकार ट्रेन चली, थोड़ी दूर पर फिर रुकी, फिर चली। धूप खिड़की पर पसर गयी थी सो वह बंद करनी पड़ी। ट्रेन की धक्कम-पेल से ऊब कर हमने सहयात्रियों का अनुसरण करने का निश्चय किया। अपनी सीट तानी और लंब-लेट हो गये। और क्या गजब की टाइमिंग–सीधे पनकी से थोड़ा पहले ही आँख खुली। ट्रेन २ घंटा लेट थी। वैसे भारतीय रेल के समयानुसार इस विलंब नहीं माना जा सकता।
कानपुर सेंट्रल पर उतरना बड़ी मशक्कत का कार्य है। लोग आपातकालीन खिड़कियों तक से घुसना शुरू कर देते हैं । शरीर, जूता-चप्पल, सामान और जेब को संभाल कर गाड़ी में से उतरना अपने आप में एक कला है। हम सब कलाकार आखिरकार बाहर पँहुच ही गये। बाहर निकल कर ऑटोरिक्शा किया गया। नानाजी का ड्राइवर हम लोगों को पहचानता नहीं सो मम्मी ने उसे आने से मना कर दिया था। वैसे भी, देखा-भाला शहर…चिंता की कोई बात थी ही नहीं। भैया कानपुर में सबको क्या सम्मान दिया जाता है…दादा रे! हम तो दंग रह गये। क्या रिक्शा, क्या साइकिल और क्या ट्रक। सबको समान अधिकार। कोई बाँई-दाँई लेन का चक्कर नहीं। साइकिल सवार को भी बीच सड़क पर चलने का सर्वाधिकार प्राप्त है। बल्कि जिसे जहाँ जगह मिले या जहाँ मन आये वहाँ चलाओ गाड़ी। सब अपना ही है। फ़िकर कैसी। हमारा ऑटो चालक बड़ी कुशलता से दायें-बायें सर्प के समान चाल से गाड़ी चला रहा था। हमारे होश उड़े हुये थे। जो ग़ुलामी में जीता हो उसे ऐसी आज़ादी की आदत कहाँ। यहाँ तो सीट-बेल्ट, लेन ड्राइविंग, गति सीमा, प्रदूषण नियंत्रण, ट्रैफ़िक सिग़्नल जैसे कम से कम सौ पचड़े हैं। एक हियाँ देखो…। घर पहुँच कर हम सबको एक दूसरे के धुएं से बिगड़े चेहरे पहचानने में ही दो मिनट लग गये।
घर के भीतर पहुँच नाना जी से मिले। देख कर जी पता नहीं कैसा हो गया। हृष्ट-पुष्ट नाना कैसे हड्डी हड्डी हो गये हैं। बुढा़पे ने शरीर से अधिक उनका मन तोड़ दिया है। बस चले तो साथ ले आऊँ उन्हें पर जिस घर को अपने खून-पसीने से सीँचा, अपने हाथों से सँवारा, जिस घर में रहते उन्हें ३० बरस से ऊपर हो गये वह घर ऐसे कहाँ छूटता है उनसे। उनकी इस इच्छा को समझते हैं हम सभी…इसलिये एक कशमकश में घिरे रहते हैं, असहाय और बाध्य। खैर….हमसे मिल कर नाना जी को और उनसे मिल कर हमें बहुत ही अच्छा लगा। फ़ुरसतिया जी से भी बात हुई। शाम को मामा-मामी भी आ रहे थे सो उनके घर जाना संभव ही ना था, अतः हमारा आमंत्रण स्वीकार कर वह सपत्नीक एवं स-छोटेसुपुत्र हमसे मिलने आये। सभी को उनसे मिल कर काफ़ी खु़शी हुई, नाना जी को भी। इतने सारे लोग थे बात करने को इसलिये चर्चा का विषय सामान्य ही रहा। मम्मी ने बिल्कुल भारतीय माँ के अनुकूल व्यवहार करते हुए हमारे बचपन के दो चार अनकट किस्से सुना डाले जिन्हें अपनी पिछली पोस्टों मे हमने जानबूझ के शामिल नहीं किया था। ब्लॉगिंग और हिन्दी साहित्य पर कोई विशेष चर्चा न हो सकी। उम्मीद करती हूँ कि अगली बार जब भी हम मिलें उनसे दो चार गुरूमंत्र मिल जायें।
अगले दिन लखनऊ जाना था। फ़ुरसतिया जी की एक पोस्ट में पढ़ा था कि २ बाई २ का बढ़िया हाईवे है। अब हाईवे के नाम पर हमने आगरा-दिल्ली के हाईवे का चित्र संजो रखा है। सोचा इसी का भाई-बंधु होगा यह कानपुर-लखनऊ मार्ग।
क्रमश:

थोड़ा सा इंतजार करिये, फुरसतिया जी से मिली हैं, इतने से वृतांत से काम नही चलेगा, उनका लेखा झोखा आता ही होगा.बस उसी का इंतजार है. खैर, ऎसी शख्सियत से मिलना ही सौभाग्य का विषय है और मै उन कुछ सौभाग्यशाली लोगों मे से एक हूँ, आपकी ही तरह…
हम पढ़ते हुये मुस्करा रहे हैं और मुस्कराते हुये पढ़ रहे हैं।
1.ट्रेन से उतरना सुहाता नहीं सो खिड़की से ही पास के पोखर में पड़े गुटखे के रैपर गिन डाले।
2.अपनी सीट तानी और लंब-लेट हो गये।
3.जो ग़ुलामी में जीता हो उसे ऐसी आज़ादी की आदत कहाँ।
4.एक हियाँ देखो…।
जैसे प्रयोग ही हमसे यह कामना करवाते हैं कि चिंतन निरंतर होता रहे!
भाई यह चिट्ठा तो हमें कानपुर जाने की सोचने वालों को डराने का षडयंत्र लगता है, अगर शहर ऐसा है तो रहनेवाले कैसे होंगे? अपने फुरसतिया जी इस शहर के वासियों के प्रतिनिधि हैं या फ़िर अपनी भलेमानसत से वहाँ भी एक अपवाद हैं? लिखने का अंदाज़ बहुत सुंदर लगा.
मै अनूपजी का अनुमोदन करता हुँ।
समीरजी ने फुरसतियाजी से मिलने की तृष्णा बढा दी है, जाने कब भाग्य साथ देगा। पर कानपुर नही जाना चाहता.. बाबा रे!!!
फुरसतियाजी क्षमा करें
कानपुर की बिजली की सेवाओं को तो आप भूल ही गयी , मेरा पुत्र मेरे पास मे बैठा है और आपका लेख पढ कर मुस्करा रहा है,कारण वह कई सालों से अपने नाना के यहाँ बिजली की व्यवस्था को सोच कर जाने के नाम से भडक जाता है।
प्रभात
भैया कानपुर में सबको क्या सम्मान दिया जाता है…दादा रे! हम तो दंग रह गये। क्या रिक्शा, क्या साइकिल और क्या ट्रक। सबको समान अधिकार। कोई बाँई-दाँई लेन का चक्कर नहीं। साइकिल सवार को भी बीच सड़क पर चलने का सर्वाधिकार प्राप्त है। बल्कि जिसे जहाँ जगह मिले या जहाँ मन आये वहाँ चलाओ गाड़ी। सब अपना ही है। फ़िकर कैसी। हमारा ऑटो चालक बड़ी कुशलता से दायें-बायें सर्प के समान चाल से गाड़ी चला रहा था। हमारे होश उड़े हुये थे। जो ग़ुलामी में जीता हो उसे ऐसी आज़ादी की आदत कहाँ।
कानपुर का वर्णन पढ़ कर बहुत हँसी आई, आजकल लगभग सभी शहरों का यही हाल है।
Bahut bhadiya lekh hai aur utne hi bhadiya photos. Triggered a india trip desire for me.
HOW I CAN MAKE MY HINDI BLOG?
Plz help me about this,
I am nitin sharma from agra
-Tnx
Regards,
NITIN
nitinsharma100@gmail.com
myself amit Group ‘A’ Gazetted Officer in Ministry Of Defence learn everything in my home town i.e Kanpur
No one is 100% perfect and no one city is perfect in india
so why should we see only negative shades…
we should also tells us all positive aspects of our city?
good day
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regards..
Amit
crazy_29amit@yahoo.com