सुधारों का शिकार

[ लीजिये प्रस्तुत है श्री अन्नपूर्णानन्द वर्मा कृत बहुप्रतीक्षित कहानी जो लाला मल्लूमल की सुधार-गाथा के क्रम में पहली है। ]

आजकल मैं सुधारा जा रहा हूँ। मेरे दिल और दिमाग को वह सुधारों के झाँवाँ से रगड़-रगड़ कर साफ़ कर रही है। जिस प्रकार अड़ियल टट्टू की पीठ पर कोड़े बरसते हैं उसी प्रकार मेरे सिर पर सुधारों के ओले बरस रहे हैं। उसे यह कौन समझाये कि बिगड़े दूध को मथने से मक्खन नहीं निकलता।

एक रोज़ उसने अचानक मुझसे कहा–’प्यारे! मैं आपको सुधारना चाहती हूँ।’

उस वक्त दोपहर के बारह बजे थे। मैं खाना खाकर लेटा हुआ पान कचर रहा था और झपकी लेने की तैयारी कर रहा था। इस बात नें मेरे हृदय में हलका-सा तहलका पैदा कर दिया। मेरे कान खड़े हो गये और मैं सहम कर उठ बैठा। मैनें पूछा–’क्या कहा, फिर तो कहना?’
‘मैं आपको सुधारना चाहती हूँ।’
‘मुझे?’
‘हाँ, आपको।’
‘सुधारना चाहती हो?’
‘हाँ, सुधारना चाहती हूँ।’
‘भला ऐसी कौन सी बुराइयाँ मेरे में हैं?’
‘उनकी संख्या एकाई-दहाई में न हो सकेगी, नहीं तो गिना देती। अभी देखिये, आप अपनी पीठ जनेऊ से खुजला रहे हैं। जनेऊ इसीलिये है?’
‘नहीं जनेऊ तो कुंजी बाँधने और दँतखोदनी लटकाने के लिये है।’
‘कितनी बार सिखाया आपको कि जम्हाई आये तो मुँह के आगे हाथ कर लेना चाहिये पर ऐसा आप कभी नहीं करते।’
‘यह बतलाओ कि परमात्मा ने लाखों गह्वर और गुफ़ायेँ बनायीं हैं पर किसको-किसको उन्होनें ढाँकने की कोशिश की है?’
‘हँसी न समझिये, मैं इस समय seriously बातें कर रही हूँ।’
‘अच्छा लाओ, एक गिलास पानी दो, मेरा गला सूख रहा है।’
‘आपने अच्छा याद दिलाया। कई बार सोचा था कि कहूँ पर भूल जाती हूँ। आप पानी पीते हैं तो ऐसा जान पड़ता है कि पास में कहीं पुरवट चल रहा है।’
‘पुरवट?’
‘हाँ, पुरवट! पानी पीते समय आपके गले से घटर-घट-घट-घट का शब्द क्यूँ होता है?’
‘घट-घट-व्यापी जानें, मैं क्या जानूँ!’
‘ख़ैर जाने दीजिये। लेकिन खाते वक्त आप कम-से-कम एक बात का ख़याल तो ज़रूर ही रखा करिये कि भात शब्द गँवारू है। ‘थोड़ा भात दो’ न कह कर ‘थोड़ा चावल दो’ कहना चाहिये।’
‘अच्छी बात है, अब से भात को चावल पुकारूँगा। इसी प्रकार रोटी को आटा कहा करूँ तो कोई हर्ज़ तो नहीं है?’
‘मज़ाक न करिये। अभी दो शब्द आपकी शिखा या चुन्दी के संबन्ध में कहने हैं।’
‘ज़रूर कहो। दो शब्द क्यूँ कहती हो, पूरी कविता कह डालो। कविता या लेख को मेरी चुन्दी से अच्छा विषय कौन मिलेगा!’
‘आपकी चुन्दी ज़रूरत से ज़्यादा मोटी है।’
‘मेरे मित्र पं. बिलवासी मिश्र नें इसकी तुलना भैंसिया जोंक से दी है।’
‘और लंबी भी ज़्यादा है।’
‘मेरे मित्र लाला झाऊलाल इसे पगहा पुकारते हैं।’
‘इसे छोटी करा दीजिये।’
‘मैं तो इसे जड़ से उखाड़ देता पर क्या करूँ, अपने पिताजी की यादगार है, इसी से छोड़े देता हूँ।’
‘आपकी शिखा पिताजी की यादगार है?’
‘हाँ, तुम जानती हो कि मेरे पिताजी बड़े ग़रीब थे। मरते समय वे मेरे बदन पर दो हाथ की लुँगी और सर पर एक हाथ की चुन्दी–यही दो चीज़ छोड़ गये थे।’
‘ख़ैर जाने दीजिये, मत छोटी कराइये। पर यह बताइये कि महादेवजी के दर्शन से लौटते समय आप उसमें बेलपत्र क्यों बाँध लेते हैं?’
‘साहित्यिक दृष्टि से देखो तो समझ जाओगी। चुन्दी कहाँ उगती है? खोपड़ी पर। खोपड़ी क्या है? एक प्रकार का बेल है। बेल-सी खोपड़ी पर चुन्दी– और चुन्दी में बेलपत्र! फल के साथ पत्ते का होना कैसा स्वाभाविक है।’
‘आपने शिखासूत्र तो धारण किया है पर कभी संध्योपासना तो करते नहीं।
‘संध्योपासना के लिये चौथेपन का इंतज़ार कर रहा हूँ।’
‘अधिक नहीं तो सुबह ईश्वर का नाम ले लिया करिये और रात में सोते वक्त अपने गुनाहों की माफ़ी उससे माँग लिया करिये।’
‘सोते वक्त अपने गुनाहों को याद करूँ कि रात भर अच्छी नींद भी न आये। तुम भी अच्छी शिक्षा देती हो!’

यह मेरे जीवन के एक दिन के सुधारों का आभासमात्र है। मैं जिधर देखता था उधर ही सुधार के दैत्य को मुँह फैलाये खड़ा पाता था। मुझे गढ़-छील कर आदमी बनाना ही उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य हो गया था। अनाड़ी, फूहड़ और अघोरी तो मैं कभी का साबित हो चुका था। सोलहो आने पशु साबित होने में थोड़ी ही क़सर रह गयी थी।

Published in: on August 27, 2006 at 9:20 pm Comments (11)

विश्व कुँवारा मंच द्वारा जारी सम्मन का जवाब

मेरी मुवक्किला ‘निधि देवी’ के पास समय पर कोई वकील उपलब्ध न होने के कारण मैं लाला मल्लूमल speechless-smiley-008.gif अपने आप को उनका वकील घोषित करता हूँ। ये रहे मेरे वक़ालत की शिक्षा के प्रमाण-पत्र…clipart_office_papers_020.gif

मेरी मुवक्किला पर विश्व कुँवारा परिषद के अध्यक्ष speechless-smiley-003.gif ने आरोप लगाया है कि उन्होनें कुँवारों की ‘बेइज़्ज़ती’ ख़राब की।

माई लॉर्ड, मेरी मुवक्किला मासूम है, निर्दोष है। उस पर जो भी आरोप लगाये गये वे निराधार हैं। अब इस किस्से के बारे में क्या कहूँ। हे भगवान! बात का बतंगड़, तिल का ताड़ और राई का पहाड़ सब बना डाला मेरी मुवक्किला की बात का। अब कुँवारा मंच के लोग कहेंगे कैसा तिल? कौन सी राई? क्योंकि ये लोग बात का सिर्फ़ शाब्दिक अर्थ देख पाते हैं। भाव समझने की बूझ विधाता शायद शादी के बाद ही दे इन्हें। ‘इन्सान‘ से लेखिका का मतलब ‘सुघड़ इन्सान‘ से था, पर कौन समझाये। वैसे कहा तो ये भी गया है कि मनुष्य सामाजिक पशु है, तो फिर वादी पक्ष ने इसके लेखक को ढूँढा अब तक कि नहीं? या फिर यह बात सबके लिये कही गयी है इसलिये स्वीकार कर लिया! मजे की बात यह कि ई-छाया जी को छोड़ किसी शादीशुदा पुरुष नें लेखिका का विरोध नहीं किया :) । सबको मज़ा आया पढ़ के। अनूप जी ने तो ‘कैसे कैसे सुधार किये गये’ इसके बारे में लेखिका को अपना व्यक्तिगत अनुभव लिख डालने को भी उकसा डाला। सागर भाई नें कहा है कि ‘हम भी लिखने लगें तो’। जी शौक़ से लिखिये। हमने कब रोका? अपनी मेहनत का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना चाहते हैं, अवश्य करिये। लेखिका नें नहीं कहा कि पत्नियाँ सर्व-गुण-संपन्न होती हैं।

माई लॉर्ड, शादीशुदा पुरुष दफ़्तर से सीधे घर को निकल लेता है, पत्नी और बाल-बच्चों के साथ समय जो बिताना होता है। किंतु कुँवारा मंच के लोग अपने खाली समय को व्यतीत करने के लिये मेरी मुवक्किला जैसे सीधे-सादे लोगों पर ऊल-जुलूल आरोप लगाते रहते हैं। उनसे उलझते रहते हैं…ऊट-पटाँग मुकदमे चलाते हैं। 

लेकिन अब मुद्दे की बात यह है कि मेरी मुवक्किला निधि देवी किसी भी सज़ा को मानने से इनकार करती हैं। हर्जाने के तौर पर प्रस्तावित वैवाहिक विज्ञापनों का स्वागत है। इससे मेरी मुवक्किला को दो फ़ायदे हैं- एक, लड़कियाँ भी चिट्ठा पढ़ने में रुझान दिखायेंगी। हो सकता है कि कुँवारी कन्याओं के माता-पिता, नाते-रिश्तेदार भी चिट्ठे में रुचि लें। टी.आर.पी. बढ़ने की ९९.९९% संभावनाओं के मद्देनज़र यह विकल्प लेखिका के मन को भा गया है। दूसरा फ़ायदा यह कि अगर ऐसे विज्ञापनों के चलते इस कुँवारा परिषद के दो-चार सदस्यों की भी शादी हो जाये तो ‘सुघड़ इन्सानों’ की संख्या में वृद्धि हो जायेगी और लेखिका के क्रांतिकारी विचारों के पीछे लट्ठ ले के घूमने वालों की संख्या में कमी। कुल मिला कर लेखिका की पौ बारह है। अत: ‘शुभस्य शीघ्रम’ की तर्ज पर कुँवारा मंच के सदस्य फटाफट विज्ञापन तैयार करवा लें। :D

वैसे मैं आखिर में मैं लेखिका की ओर से कहना चाहता हूँ कि नारी जीवन को एक सलीका़ देती है। इस बात के बारे में आप उनसे पूछिये जो शादीशुदा हैं। ऊपर ऊपर कहते होंगे कि जी हम तो फँस गये पर कभी अनुरोध कीजियेगा कि सच सच दिल की बात कहें।

बाकी रहा मैं, जिसकी कहानी सुनाते सुनाते मेरी मुवक्किला इस मुकदमेबाज़ी के पचड़े में पड़ गयी, उसकी आगे की कहानी सुन के आप को खुद अंदाज़ा हो जायेगा की मेरी मुवक्किला कहीं भी दोषी नहीं थी। मेरी मुवक्किला, मेरी कहानी के साथ शीघ्र ही उपस्थित होगी। धन्यवाद।

निर्णय: clipart_office_papers_006.gif ये अदालत निधि देवी को बाइज़्ज़त बरी करती है और कुँवारा मंच के लोगों को आदेश देती है कि एक साल के भीतर-भीतर शादी योग्य सभी सदस्य शादी कर सद्गति को प्राप्त हों, घर-गृहस्थी में दिमाग़ लगावें। cool-smiley-0211.gif aktion033.gif

Published in: on August 25, 2006 at 9:27 pm Comments (6)

गोरी का पति गोरिल्ला

[ अन्नपूर्णा नंद जी के कहानियों के एक मुख्य पात्र 'लाला जी' की आखिर शादी हो ही गयी। हाँलाकि लड़की-दिखाई से ले कर एक रूपसी कन्या से विवाह तक की कथा तीन-चार भागों मे बँटी है पर वे भाग फिर कभी बाँटूँगी। फिलहाल सोचती हूँ कि शादी के बाद हर पति को छील-छाल, गढ़-तराश के इन्सान बनाने की जो उठापटक पत्नियोँ को करनी पड़ती है उसका विवरण प्रस्तुत किया जाय। इसी क्रम में इस बार लाला जी की पत्नी का एक छोटा सा परिचय प्रस्तुत है। आगे आयेगी -- लाला जी की सुधार-गाथा]

    अकेले ब्रह्मा में इतनी बुद्धि कहाँ! त्रिदेवों ने मिल कर उसकी रचना की होगी। सौन्दर्य की एक नयी सीमा उसने का़यम कर दी है। छटाक-भर वजन, बुलबुल की चहक, प्यारी आँखे और चाँद सा मुखड़ा! मैनं उसे देखा और देखते ही आदमी से लट्टू हो गया। जैसा मेरा घर बसा ईश्वर करे सबका बसे।

    पाँच मिनट के अंदर वह दो बार मेरी ओर देख के हँसी और दोनों बार मैनें एक-एक चीज़ उसके हवाले कर दी–पहली बार अपना हृदय और दूसरी बार अपने सेफ़बकस की कुंजी। उसमे भी प्रसन्न होकर मुझे तुरन्त अपने प्रधान अर्दली के पद पर नियुक्त कर दिया।

    आज दिन में तीन बार वह मुझे चौक भेज चुकी थी–सुबह हाथी-दाँत की कंघी लाने, दोपहर में कमीज़ सिलवाने और इस वक्त एक पेटेंट इत्र ख़रीदने। मैं मुँह लटकाये चौक से लौटा, क्योंकि जो इत्र उसने माँगा था वह लाख तलाश करने पर भी नहीं मिला।

    उसने पूछा–’कहिये,ले आये।’
    ‘अजी, सारा चौक छान डाला, कहीं नहीं मिल रहा है!’
    ‘इतने बड़े शहर में ओटो-दिलबहार नहीं मिल रहा है!’

    ‘ओटो-दिलबहार? राम-राम!! मैं तो ओटो-सिरकपार का नाम पूछता फिरता था। अब इस तरह की कोई चीज़ लाने को कहोगी तो पर्चे पर नाम लिख लिया करूँगा!’

    ‘देखती हूँ कि आपकी स्मरणशक्ति लोप होती जा रही है।’

    ‘नहीं यह बात तो नहीं है। कहो तो आँखें मूँदकर बता दूँ कि तुम्हारे बायें गाल पर कितने तिल हैं।’

    ‘मैं एक बात पूछ सकती हूँ?’

    ‘एक नहीं, सौ बातें पूछो लेकिन पहले समीप बैठा लो।’
    ‘आप अँग्रेज़ी कुछ जानते हैं?’
    ‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं।’
    ‘कहाँ तक?’

    ‘अधिक नहीं जानता। केवल ‘डैमफ़ूल’ तक मैनें अंग्रेज़ी पढ़ी है। मैनें निश्चय कर लिया है कि अपने बच्चों को मैं डैमफ़ूल पुकारूँगा गो मेरे पिता जी मुझे सूअर-गधा पुकारते थे।’

    ‘हूँ! अच्छा हिन्दी तो आपने काफ़ी पढ़ी होगी?’

    ‘इसमें क्या शक़। सिंहासन बत्तीसी, बैताल पचीसी, किस्सा तोता मैना आदि मैनें सब पढ़े हैं। योगवशिष्ठ और किस्सा-साढ़े-तीन-यार तो मैनें एक जिल्द में बँधवा कर रख छोड़ा है। हिन्दी काव्य में भी मेरी अच्छी घुसपैठ है; बिहारी के बिरहे, केशो के कँहरवे, कहाँ तक गिनाऊँ! साहित्य सेवा भी मैनें कम नहीं की है; सच पूछो तो साहित्य सेवा करते-करते मुझे दाढ़ी-मूँछ निकल आयी है।’

    ‘जब हिन्दी-अँग्रेज़ी का यह हाल है तो संस्कृत के बारे में तो पूछना ही व्यर्थ है।’

    ‘नहीं, ऐसा मत सोचो। संसकृत में भी मैनें मनुस्मृति आदि व्याकरण की अनेक पुस्तकें पढ़ी हैं।’
    ‘कुछ समझ नहीं आता कि आपकी इन बातों पर रोऊँ या हँसूँ!
    ‘मुझे तुम दोनो दशा में सुंदर लगती हो।’

    ‘जब आप चार पढ़े-लिखे आदमियों के बीच में बैठते होंगे तो वे आपको क्या समझते होंगे?’
    ‘वे मुझे बेवकूफ़ समझते हैं मैं उन्हें बेवकूफ़ समझता हूँ।’
    ‘आखिर इस अविद्या की दशा में आपका कैसे काम चलेगा?’

    ‘काम क्या चलना है? ईश्वर करे मेरे स्वर्गीय चचाजी कल्पवृक्ष की छाँह में बैठ कर कामधेनु का दूध पियें। वे मुझे आजीवन मसनद तोड़ने के लिये स्वतंत्र कर गये हैं।’ [चाचा जी ने कोई संतान न होने के कारण अपनी अकूत संपत्ति लाला जी के नाम कर दी थी। यह किस्सा फिर कभी बताऊँगी--निधि]

    मेरी बातों पर उसे हँसी आ गयी। यदि शरद् ऋतु की चाँदनी रात में आपने कुंद कली को खिलते देखा होगा तो उसकी मुसकान की सुंदरता और सरसता का कुछ अनुमान आप कर सकेंगे। हँसी क्या थी सुधा का स्रोत था। ओठों के लाल पटल को हटाकर कुन्दन-से दाँत चमकने लगे।

    मैं आँखो द्वारा इस रूप-मदिरा को पीने लगा। अकसर ऐसा ही होता है कि जब मैं उसकी ओर देखने लगता हूँ तब राजा निमि मेरी पलकों की ड्योढ़ीदारी से अवकाश ग्र्हण कर भाग खड़े होते हैं। इस समय भी ऐसा ही हुआ! पीठ पर लटकती हुई उसकी चोटी मेरे हृदय पर नागफाँस का काम कर रही थी। उसके अंग-अंग में सौन्दर्य की छटा थी।

    सब बातों में वह मुझसे बढ़ कर है। जिसने अमा और पूर्णिमा एक साथ न देखी हो वह मुझे और उसे एक साथ देख ले। वह विदुषी है और मैं गँवार। वह सुंदरी है और मैं? क्या कहूँ!! जो कुछ कसर थी वह शीतला देवी ने बचपन ही में चेहरे पर मसूर की दालमोंठ छिड़क कर पूरी कर दी। आश्चर्य है कि इतने पर भी वह मुझे प्यार करती है–शायद उसी तरह जैसे कमल को कीचड़ प्यारा है।

  अपने हृदय पर उसका आधिपत्य मैनें बिला किसी चीं-चपड़ के स्वीकार कर लिया था। उसकी रीझ और खीझ के अनुसार मैं कभी लोटन कबूतर और कभी भींगी बिलली बना रहता था। मेरे हृदय की डोर अपने हाथ में करके वह पतंग की तरह मुझे उड़ाया करती–कभी ढील देती थी और कभी खीँच लेती थी।

    खेद है कि मैं कवि नहीं हूँ–यदि कवि होता तो उसके रूपलावण्य की प्रशंसा में कोटियों कवितायें लिख डालता, छपा डालता, और कोई न खरीदता तो मुफ़्त बाँट डालता। तब भी पं. बिलवासी मिश्र की मदद से मैनें कुछ लिखा है, सुनिये–

                   छलकि  छवापै  बजैं छागल छमाछम जो
                          सोनछरी - सी   वह  डोलैरी  मंद   कदम।
                   काकुल  संवारे  हेरि व्याकुल करत मैन
                          आनन निहारे चारु चंद्रमा को होत भ्रम॥
                   गात की गोराई पै सुवरन की खान वारौं
                          अधर  सुधारस  पै  वारौं   कोटि  चमचम।
                   रूप-मद छाके   बाँके नैनन बला के  जाके
                         ऐसी तिरिया के–हाँ! पिता के हैं दमाद हम॥

– अन्नपूर्णानंद वर्मा

Published in: on August 24, 2006 at 12:55 pm Comments (15)

पं. बिलवासी मिश्र

[यूँ तो हिन्दी साहित्य में कुल नौ रस माने गये हैं  और प्रत्येक रस का एक विशिष्ट स्थान है। पर मुझसे पूछें तो मेरी दृष्टि मे हास्यरस सर्वोपरि है। जो पढ़े सो हँसे, फिर पढे, मुँह की माँसेपेशियों की कसरत हो, ज्ञान बढे़, ख़ून बढ़े। और क्या चाहिये। अब हास्य-साहित्य मैनें बहुत तो पढ़ा नहीं पर जो पढ़ा उनमें श्री अन्नपूर्णानंद वर्मा विशेष प्रिय हैं। कहने को वे मेरे बड़े नाना होते हैं... नाना जी के छोटे ताऊ जी। पर उनसे मिलने का सौभाग्य विधाता ने मुझे नहीं दिया। २१ सितंबर, १८९५ में जन्मे श्री अन्नपूर्णानंद जी तीन भाइयों में बीच के थे। वर्ष १९६४ में जब उनका निधन हुआ तब वे अपने बड़े भाई सम्पूर्णानंद जी जो कि उस समय राजस्थान के राज्यपाल थे, के साथ जयपुर में रहते थे। जीवन में आये उतार-चढा़व के कारण स्वभाव से अति-गंभीर नाना जी की कलम से हास्यरस का ऐसा वेग फूटता था, ये बात मुझे चकित कर जाती है। उन्होनें बहुत तो नहीं लिखा पर जो भी लिखा, पठनीय है। इसलिये ये श्रंखला शुरू कर रही हूँ जिससे आप तक भी उनकी रचनायें पहुँच पायें। इस बीच उनके जीवन के बारे में जो भी थोड़ा बहुत जानती हूँ वह भी थोड़ा-थोड़ा कर आप तक पहुँचाती रहूँगी।]

 जम्बू नामक द्वीप के भारतवर्ष नामक खण्ड में- अवध के ऊपर और तराई के नीचे-हिंदुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है जिसका नाम है बहराइच। यहाँ गाज़ीमियाँ नाम के एक सिद्ध महापुरुष हो गये हैं जिनके दर्शन-पूजन का बड़ा माहात्म्य माना जाता है। हर साल हज़ारों हिन्दू आ कर यहाँ परमार्थ-चिन्तन का लाभ  उठाते हैं। एक अर्थशास्त्री ने पता लगाया है कि जितना फूल यहाँ गाज़ीमियाँ की दरग़ाह में प्रतिवर्ष हिन्दू स्त्रियाँ चढ़ाती हैं उन्हें बटोर कर यदि शहद निकाला जाय तो इतना शहद तैयार हो सकता है कि हिन्दू महासभा उसे अपने प्रस्तावों में लगाकर सदियों तक आनन्द्पूर्वक चाट सकती है।
  
 यहीं बहराइच में मेरी शादी तय हो रही थी और देन-लेन की चर्चा छिड़ गयी थी। लड़की के पिता के पस अकूत धन था। अभी तक इतना तय हो पाया था कि शादी में मुझे १ बीबी, २ इलाके, ३ मोटर, ४ मकान, ५ घोड़े, ६० हज़ार नक़द और ७० हज़ार के ज़ेवर मिलेंगे।

    यह सब बहुत ठीक था, सिर्फ़ एक बात गड़बड़ थी। किसी मत्स्य-भोजी से पूछिये कि उसके प्रिय खाद्य में काँटों का प्राचुर्य क्यों है। इस संसार मे मिसरी में फाँस वाली बात हर जगह पायी जाती है। मुझे उड़ती हुई खबर लगी कि लड़की रूप-रँग में त्रिजटा की सगी-सगोतिन है।

    मैंने तो समझा था सोने की चिड़िया हाथ लगी पर इस समाचार ने तो मेरी सारी आशाओं पर पानी फेर दिया। इस बात का पूरा विश्वास कर लेने से पहले अब यह ज़रूरी हो गया कि इसकी काफ़ी छानबीन की जाय। अपने किसी ख़ास आदमी को भेज कर इसका अनुसन्धान कराना उचित जान पड़ा। मैनें इस सम्बन्ध में अपने मित्र पं. बिलवासी मिश्र से मदद लेने का निश्चय किया।

    लड़कपन में बिलवासी जी से मेरा धौल-धप्पड़ का रिश्ता रहा और अब वे मेरे ख़ास दोस्तों में से एक हैं। मेरी तरह वे भी अपने घर में पड़े-पड़े सिर्फ़ भोजन और डासन से काम रखते हैं। भेद इतना है कि वे एक लेखक और कवि हैं और मैं एक भला आदमी। उन्होने अपनी लेखनी के बूते पर साहित्य-वन-विहङ्ग और साहित्यानन्द-सन्दोह आदि की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। ये लाखों में एक आदमी हैं। जिस समय इनका पूरा परिचय संसार को प्राप्त हो जायेगा उस समय लोग गली-गली इनकी जय बोला करेंगे। कुछ काम इनके ऐसे हैं जिन्हें अगर इतिहास की अमर सामग्री कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। उदाहरण के लिये ये लालटेन की बत्ती अपने अस्तुरे से काटते हैं। कोबरा पालिश और झाड़ू की सीँक से इन्होने दवात और क़लम का काम लिया है। ठाकुर जी की आरती इन्होनें कई बार मोमबत्ती से की है। पान में सुपारी नहीं रहती तो छुहारे का बीज काट कर डाल लेते हैं।

    मैं दोपहर के समय इनके मकान पर पहुँचा। वे खाना खा चुके थे। और मुँह में पान भर कर बाहर बैठक में लेटे हुए जुगाली कर रहे थे।
    मैनें कहा–’नमस्कार बिलवासी जी!’
    उन्होनें उत्तर दिया–’ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    ‘कुशल समाचार कहिये।’
    ‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    ‘इस समय आप क्या कर रहे हैं? आपसे एक राय करनी है।’
    ‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    मैं झल्ला गया; मैनें कहा–’आप की जान मे सिवा ऊँ के और भी कोई ऐसा शब्द है जिससे आप मेरा उत्तर दे सकें? आपको जानना चाहिये कि मैं पशुओं की बोली नहीं समझता।’

    वे थोडी़ देर मेरी ओर इस प्रकार देखते रहे जैसे मुझे वे कोई बरसाती कीड़ा समझते हों जो व्यर्थ उनके कानों के पस भनभन कर रहा था। फिर पान घोंट कर उन्होने अपना मुँह खाली किया और बोले–’लाला-जी! आप किसी भले आदमी से ऐसी आशा क्यों करते हैं कि जब वह भोजन के उपरांत मुँह में पान भर के लेटा हुआ पेट पर हाथ फेर रहा है उस समय वह आपकी बातों का उत्तर सिवाय ऊँ के अन्य किसी प्रकार से देगा।’
   ‘खैर जाने दीजिये। मैनें समझा था कि आप की जीभ ऐंठ गयी है। मैं इस वक्त इसलिये आया कि मुझे आपसे एक ज़रूरी काम है।’
   ‘काम के नाम से मैं घबराता हूँ। कोई राय देनी हो तो लेटे-लेटे दे सकता हूँ।’
   ‘मैं चाहता हूँ कि आप मेरी भावी पत्नी को देख कर उसकी सूरत-शकल के बारे में अपनी राय दें।’
   ‘बुला लाइये उन्हें। वे आप की बीबी होने वाली हैं — इसलिये उनके साथ सहानुभूति भी प्रकट करूँगा और साथ ही अपनी राय भी ज़ाहिर कर दूँगा। कहाँ हैं — क्या बाहर खड़ी हैं?’
   ‘आप भी पूरे अहमक हैं। वह बहराइच में रहती हैं, वहीं जाकर आपको किसी प्रकार उन्हें देख कर आना है।’
 
    पाँचवें दिन मुझे दो पत्र मिले, एक बिलवासी जी का, दूसरा लड़की के पिता का। बिलवासी जी का पत्र मैं ज्यों का त्यों उतारे देता हूँ। उन्होनें लड़की के संबन्ध मे केवल इतना लिखा था जो मेरे ख़याल से बहुत काफ़ी था –
                       तावा-सी तमाल-सी  तमाखू-सी तिलकुट-सी
                                पावस अमावस की   रैन अन्धकार-सी।
                       कागा-सी करइत-सी   काजल-सी कालिका-सी
                               कोइल-सी  कोयला-सी  खासी कोलतार-सी॥
                                                                     - बिलवासी

लड़की के पिता का पत्र पढ़ के मैं दंग रह गया। उसमें लिखा था — ‘आज एक ब्राह्मण देवता कहीं से घूमते-फिरते मेरे यहाँ आ गये थे। वे सामुद्रिक शास्त्र के अद्वितीय विद्वान जान पड़ते थे। उन्होनें अपना नाम बिलवासी मिश्र बताया था। उन्होनें हम सबका हाथ देखा। मेरी लड़की का हाथ देख कर उन्होंने बतलाया कि इसकी शादी जिसके साथ तय हो रही है वह महालम्पट और दुराचारी है और छः महीने के अन्दर उसकी मृत्यु अवश्य हो जायगी, या तो चुल्लूभर पानी में या कालेपानी में। ईश्वर को अनेकों धन्यवाद है कि आप के बारे में ये बातें पहले मालूम हो गयीं। मैं अपनी लड़की को आग में नहीं झोंक सकता। आपके साथ उसके विवाह की जो बात चल रही थी उसे अब भूल जाइये।’

Published in: on August 22, 2006 at 7:14 pm Comments (7)

कानपुर मेरी जान…दूसरा व अंतिम भाग!

गतांक से आगे…

मामा जी के दिशा-निर्देशानुसार जस तस रामादेवी चौक पर पहुँचे। उसके बाद लखनऊ की ओर मुड़ लिये। हमने सोचा अब आया टू बाई टू का हाईवे। पर कहाँ - टूटी-फूटी सड़क….उस पर भी डिवाइडर का अभाव। अब तो हम छोटे बच्चों से हुलस गये। हर सौ मीटर पर एक ही प्रश्न- “कब आयेगा हाइवे?”। अमित भी बड़े लोगों और नेताओं की तरह “बस आता ही होगा” कहते रहे। यह प्रश्नोत्तरी चल ही रही थी कि सामने  विपरीत दिशा से मोटरसाइकिलों और उनके पीछे ताँगो का जत्था आता दिखा। शोर मचाते, रूमाल हिलाते वे लोग हमारी दिशा में दौड़े आते थे। हमें लगा हो न हो आगे कोई संकट है …उसी की चेतावनी होगी यह। पर थोड़ी ही दूर पर दूसरी तरफ़ की सड़क पर भी कुछ ताँगे सरपट दौड़ते दिख गये। यीएह…येह..अउर ज्जोर के…। अब समझे …शायद ताँगा दौड़ थी। रजनीकांत की पिक्चरों सरीखी। थोड़ी देर पहले जिस बात पर हम कुड़कुड़ कर रहे थे अब उसी मे मज़ा आया, रोमांच का अनुभव हुआ। खैर वह टू बाई टू रोड कहाँ आई हमें पता नहीं चला । बकौल अमित सीटबेल्ट से बँधे हम सारे रस्ते अपनी खोपड़ी से वृत्त बनाते रहे और उन्हें ये इतना मज़ेदार लगा कि हमें जगाया ही नहीं। हमने तय किया कि लौटते में हम जागते रहेंगे। लखनऊ से निकलते ही करीब २५-३० किलोमीटर का रस्ता वाक़ई बढिया है, वापसी के समय हमने यह निष्कर्ष निकाला।

अगले दिन सोचा था कि नाना के साथ वक्त बिताया जायेगा। पर नाना ने तीन चार जगहों की लिस्ट बना दी थी- “यहाँ यहाँ जा के मिलना ही है”। पस्त हालत और खस्ता हो गयी इस बात पर। सुबह आठ से दोपहर तीन और फिर रात २ से सुबह ६ बजे तक बत्ती गोल रहती है इसलिये देर तक सोना भी संभव नहीं था, उठ कर कपड़े जो इस्तरी करने थे। इसलिये हमने बिना देर किये ‘हिट’ को इत्र की तरह अपने ऊपर छिड़का और पड़ गये। रात को तीन बजे बगल में सोती बहन ने जगाया -
“क्यूँ तुम्हे मच्छर काट रहे हैं?”
“हूँ”
“तो फिर सो कैसे रही हो?”
मुझे लगा मच्छरों के काटने से उसका दिमाग खराब हो गया है। अंधेरे में उसे घूर के भी लाभ ना होता। इसलिये बिना अपना आपा खोये सोना ही उचित समझा। अगले दिन लगभग कानपुर के हर छोर के दौरे के लिये जाना था।

बहुत सी जगह शादी के बाद पहली बार जाना हो रहा था। इसलिये हम टिप-टॉप तैयार हो गये। बीच रास्ते में एक चौक पर ज़बरदस्ती एक ट्रक वाले ने ट्रक ठूँस दिया। नतीजा- जाम, हार्न की चीख पुकार। आधे घन्टे में गाड़ी टस से मस न हुई। ट्रैफ़िक पुलिस सड़क के किनारे सुरती-तँबाखू मीसती रही। हमारा क्रीम-पाउडर, आधे घन्टे की मेहनत, बह चली। कपड़े ऐसे हो गये जैसे नानी के झाड़न वाली संदूक से निकाले हों। हम झल्ला रहे थे, बहन को परिहास सूझ रहा था। अंततः हमने उसे डपटते हुए कहा
“तुम्हारा मुँह बंद नहीं हुआ तुरंत तो किसी ट्रक के आगे फेंक दूँगी अब”
“हाँ इस आगे वाले ट्रक के आगे फेंक दो, ये ना कभी चलेगा न मैं मरूँगी”
उसने जले पर नमक छिड़का। लौटते में नवीन मार्केट होते हुए आना था। सड़क पर एक ही ओर से आती गाडि़यों का हुजूम। बिल्कुल वनवे का बोध होता था। ये बात और थी कि यह वनवे नहीं था। कुछ लोग बीच सड़क पर गाड़ी रोक शॉपिंग पर गयी अपनी बीबियों की राह देख रहे थे, उसी की परिणीति थी बस। खैर जैसे तैसे कानपुर भ्रमण हुआ। रात में मामा के यहाँ आकर थोड़ा सुकून मिला।  मामा ने कहा था बड़े नाना के पुस्तकालय को वह दान देने के सोच रहे हैं सो अगर मुझे कुछ चाहिये तो पहले ही ले लूँ। अंधा क्या चाहे दो आँखे। बस हम टूट पड़े…। तब तक ढेर लगाते रहे जब तक कि मम्मी, बहन और अमित ने आँखो से ये ऐलान न कर दिया कि बस इससे अधिक हम नहीं ढोने वाले। चार लोग अधिक से अधिक जितना उठा सकें उतना इंतज़ाम करके ही हमने दम लिया। अब जो लायी हूँ उसे आपके साथ शीघ्र ही बाँटूगी।

अगला दिन नाना के साथ और उन्हें डॉक्टर को दिखाने इत्यादि में निकल गया। १५ अगस्त का दिन।  सुबह सुबह झंडारोहण भी किया। बीमार होने के बावजूद नाना ने एक नया झंडा लाकर के रखा था। खैर अब वापस आना था। दिल में रह रह के खटका होता था। क्या विडंबना है कि जिस दिन हम स्वतंत्र हुए आज उसी दिन अपने देश में कहीं आते जाते भय लगता है। खैर ‘जाको राखे साइंया मार सके ना कोय’ का जाप करते हुए हम घर से निकल लिये। वापसी की गाड़ी प्लेटफ़ॉर्म ४ से थी। गाड़ी आने के ठीक तीन मिनट पहले घोषणा हुई कि गाड़ी अब ७ नंबर के प्लेटफ़ॉर्म से जायेगी। नाना जी के अनुसार यह तो वहाँ होता ही रहता है, यह कोई नयी घटना नहीं थी। वापसी का सफ़र भी रोचक रहा जिसके बारे में फिर कभी लिखूँगी।

गतांक पर हुई टिप्पणियों का धन्यवाद पर लगा कि लोग डर गये मेरे विवरण से। डराना मेरा उद्देश्य नहीं था। कानपुर के बारे में भी सकारात्मक बातें होंगी अवश्य जिनके बारे में फ़ुरसतिया जी बेहतर बता सकते हैं। :)  मैं कानपुर वासियों के बारे में कुछ नहीं कहती क्युँकि उनसे ऐसी कोई बातचीत ही न हुई। बात मैनें हँसी हँसी मे कही पर कानपुर, विशेषत: पनकी से मेरा अत्यधिक भावनात्मक लगाव रहा है, इसलिये नगर में इतनी अव्यवस्था देख के कहीं न कहीं दुख हुआ। शायद नागरिकों से अधिक नगर प्रशासन का दोष है यह। यदि नियम कानून कड़ाई से लागू किये जायें तो उनका पालन भी अवश्य होता है। चलिये यह बात फिर कभी करेंगे…अगली प्रविष्टियों में प्रयास रहेगा कि कुछ साहित्यिक रचनायें आप लोगों के समक्ष रख सकूँ जिनका भंडार मैं बटोर के लौटी हूँ।

Published in: on August 20, 2006 at 10:58 am Comments (4)

ये है कानपुर मेरी जान!

बड़े सालों बाद कानपुर दौरे का योग बना। विगत कुछ दिनों से नाना जी का स्वास्थ्य चिंताजनक था। इसलिये आनन-फ़ानन में कार्यक्रम बन गया। शनिवार, रविवार, और मंगलवार की छुट्टी थी। पतिदेव ने सोमवार की छुट्टी ले  ली और हम चल पड़े कानपुर। आगरा से मम्मी और छोटी बहन भी साथ हो लिये।

शनिवार सुबह-सुबह जोधपुर-हावड़ा में अपनी अपनी सीटों पर चारों जन सवार हो गये। कुछ वर्ष पूर्व यह कानपुर जाने वाली बढ़िया ट्रेनों में शुमार थी । अब भी ऐसा ही होगा ऐसा हमें भ्रम था। पर यह क्या…डेढ़ घंटे मे गाड़ी खाली टूँडला तक सरकी। बल्कि सही सही कहूँ तो टूँडला के आउटर पर ही खड़ी हो गयी। ‘अब और नहीं चला जाता रे!’ की सी मुद्रा में। कुछ यात्री ट्रेन से निकल सुबह की सैर पर चल पड़े और लौटते में पास के पेड़ों से दातुन-शातुन का बंदोबस्त भी कर लाये। हमें ट्रेन से उतरना सुहाता नहीं सो खिड़की से ही पास के पोखर में पड़े गुटखे के रैपर गिन डाले। पता है कि यह बड़ा फ़ालतू काम था पर समय नष्ट करने का और कोई साधन था ही नहीं। बाकी के तीन सहयात्री सोने के मह्त्वपूर्ण काम को अंजाम दे रहे थे। खैर, आखिरकार ट्रेन चली, थोड़ी दूर पर फिर रुकी, फिर चली। धूप खिड़की पर पसर गयी थी सो वह बंद करनी पड़ी। ट्रेन की धक्कम-पेल से ऊब कर हमने सहयात्रियों का अनुसरण करने का निश्चय किया। अपनी सीट तानी और लंब-लेट हो गये। और क्या गजब की टाइमिंग–सीधे पनकी से थोड़ा पहले ही आँख खुली। ट्रेन २ घंटा लेट थी। वैसे भारतीय रेल के समयानुसार इस विलंब नहीं माना जा सकता।

कानपुर सेंट्रल पर उतरना बड़ी मशक्कत का कार्य है। लोग आपातकालीन खिड़कियों तक से घुसना शुरू कर देते हैं । शरीर, जूता-चप्पल, सामान और जेब को संभाल कर गाड़ी में से उतरना अपने आप में एक कला है। हम सब कलाकार आखिरकार बाहर पँहुच ही गये। बाहर निकल कर ऑटोरिक्शा किया गया। नानाजी का ड्राइवर हम लोगों को पहचानता नहीं सो मम्मी ने उसे आने से मना कर दिया था। वैसे भी, देखा-भाला शहर…चिंता की कोई बात थी ही नहीं। भैया कानपुर में सबको क्या सम्मान दिया जाता है…दादा रे! हम तो दंग रह गये। क्या रिक्शा, क्या साइकिल और क्या ट्रक। सबको समान अधिकार। कोई बाँई-दाँई लेन का चक्कर नहीं। साइकिल सवार को भी बीच सड़क पर चलने का सर्वाधिकार प्राप्त है। बल्कि जिसे जहाँ जगह मिले या जहाँ मन आये वहाँ चलाओ गाड़ी। सब अपना ही है। फ़िकर कैसी। हमारा ऑटो चालक बड़ी कुशलता से दायें-बायें सर्प के समान चाल से गाड़ी चला रहा था। हमारे होश उड़े हुये थे। जो ग़ुलामी में जीता हो उसे ऐसी आज़ादी की आदत कहाँ। यहाँ तो सीट-बेल्ट, लेन ड्राइविंग, गति सीमा, प्रदूषण नियंत्रण, ट्रैफ़िक सिग़्नल जैसे कम से कम सौ पचड़े हैं। एक हियाँ देखो…। घर पहुँच कर हम सबको एक दूसरे के धुएं से बिगड़े चेहरे पहचानने में ही दो मिनट लग गये।

घर के भीतर पहुँच नाना जी से मिले। देख कर जी पता नहीं कैसा हो गया। हृष्ट-पुष्ट नाना कैसे हड्डी हड्डी हो गये हैं। बुढा़पे ने शरीर से अधिक उनका मन तोड़ दिया है। बस चले तो साथ ले आऊँ उन्हें पर जिस घर को अपने खून-पसीने से सीँचा, अपने हाथों से सँवारा, जिस घर में रहते उन्हें ३० बरस से ऊपर हो गये वह घर ऐसे कहाँ छूटता है उनसे। उनकी इस इच्छा को समझते हैं हम सभी…इसलिये एक कशमकश में घिरे रहते हैं, असहाय और बाध्य। खैर….हमसे मिल कर नाना जी को और उनसे मिल कर हमें बहुत ही अच्छा लगा। फ़ुरसतिया जी से भी बात हुई। शाम को मामा-मामी भी आ रहे थे सो उनके घर जाना संभव ही ना था, अतः हमारा आमंत्रण स्वीकार कर वह सपत्नीक एवं स-छोटेसुपुत्र हमसे मिलने आये। सभी को उनसे मिल कर काफ़ी खु़शी हुई, नाना जी को भी। इतने सारे लोग थे बात करने को इसलिये चर्चा का विषय सामान्य ही रहा।  मम्मी ने बिल्कुल भारतीय माँ के अनुकूल व्यवहार करते हुए हमारे बचपन के दो चार अनकट किस्से सुना डाले जिन्हें अपनी पिछली पोस्टों मे हमने जानबूझ के शामिल नहीं किया था। ब्लॉगिंग और हिन्दी साहित्य पर कोई विशेष चर्चा न हो सकी। उम्मीद करती हूँ कि अगली बार जब भी हम मिलें उनसे दो चार गुरूमंत्र मिल जायें।

अगले दिन लखनऊ जाना था। फ़ुरसतिया जी की एक पोस्ट में पढ़ा था कि २ बाई २ का बढ़िया हाईवे है। अब हाईवे के नाम पर हमने आगरा-दिल्ली के हाईवे का चित्र संजो रखा है। सोचा इसी का भाई-बंधु होगा यह कानपुर-लखनऊ मार्ग।

क्रमश:

Published in: on August 18, 2006 at 10:23 pm Comments (8)

हम बोले…बम बम भोले!

पिछले कुछ दिन से सोच रहे हैं कि लिखें पर लिख ही नही पाये ।  जिसके घर का चूल्हा तीन दिन से न जला हो वो लिखे भी तो कैसे !  तो हम बस दाल- रोटी की याद में किनारे पड़े रहे । सारी मनोकामनाओं को दरकिनार कर प्रभु से रोज़ यही कहा  कि  खीरा, टमाटर और ब्रैड कब तक खाँऊ !! च्यास इतनी लगी है कि क्या कहूँ । बाहर का खाना खा खा के पेट कल्ला रहा है । अब तो दया करो नाथ! आज तो गैस का सिलेंडर भेज ही दो दीनदयाल । प्रभु ने भी आज जा के सुध ली ।  गैस वाला आ गया । बोला २९३ रुपये हुए । हमने खुशी-खुशी ५०० का पत्ता थमाया । कहा ३ रुपये खुले देते हैं । पर ई का ! उसने ३ सौ सौ के नोट थमा दिये । “आप ९३ रुपये खुले दे दो” । अब हम इतने खुले पैसे कहाँ से लायें । पिछली बार भी ऐसा हुआ था । बंदे के पास खुले नही थे । अन्ततः हमने ६ रुपये अधिक दे के गैस ली थी । हमें लगा हो ना हो हमें मूर्ख बनाया जा रहा है । हमने कहा भाई देखो शायद हो एक १० का नोट । इतने खुले पैसे तो हैं नहीं मेरे पास । पर नहीं …रूखा सा जवाब मिला…सब खुले खतम । अब या तो हम खुले ढूँढे या फिर ७ रुपये अधिक दें । हमने भी सोचा ..बेटा लाओ आज तुम्हें ही ठीक करें  । अन्दर जा के अपना रेज़गारी का डब्बा निकाला ।  ५ के छः सिक्के, २-२  के इक्कीस, १ का एक और बीस का नोट निकाल हाथ में धर दिया । भैया जी की सूरत देखने लायक थी । “हमारे पास तो यही हैं, बड़ा ढूँढ कर निकाले” कहकर हमने विजयी मुस्कान के साथ धम्म से दरवाज़ा बंद कर लिया । मन में सोचा “हाँ नहीं तो, सबको उल्लू समझते हैं । मै क्यूँ दूँ चवन्नी भी ज़्यादा” । फिर गिलास भर कर चाय बनायी….जिससे कि पिछले दिनों चाय न मिलने से हुई से हुयी विटामिनों की कमी की पूर्ति हो जाये । अब लिखास दूर करने के लिये लिखने बैठे हैं ।

इस सप्ताहांत हम झाँसी के दौरे पर थे । झाँसी मतलब ससुराल । कुछ ज़रूरी काम था और नाग पंचमी का उत्सव भी । हमारे ससुराल मे इस दिन बड़ी ज़ोर शोर से पूजा होती है । असल में पापा ने एक मंदिर बनवा रखा है घर के बाहर । और समय के साथ इसकी मान्यता भी बढ़ती जा रही है । इसलिये लगभग हर तीज-त्यौहार पर मेले का सा नज़ारा हो जाता है ।  शादी को तीन साल हो गये पर कभी किसी ऐसे मौके पर जाना ही नहीं हो पाता था । इस बार मौका लग गया । शनिवार का सारा दिन अमित के काम में निकल गया । रात को थक कर कूलर के ऐन सामने जो धराशायी हुए तो सुबह जल के छीटों से ही आँख खुली । मम्मी पूजा करके सुबह सुबह घर भर में पूजा का जल छिड़कती हैं । हाय राम आठ बज गये - हम धक्क रह गये । पर मम्मी ने सर पर हाथ फेर कर कहा “रात में बहुत थक गयी थी इसलिये नहीं जगाया । चाय पी लो और १० बजे तक तैयार हो जाना” । जान में जान आयी । तब तक पापा की आवाज़ आयी “मोटी॓ऽऽऽऽ…जग गयी क्या” । “पाऽऽऽऽपा..हो जाऊँगी फिर से पतली…मैने एक्सर्साइज़ भी शुरू कर दी है” मैने मुँह लटका के पापा को समझाना शुरू किया । “अरे बेटी…हम तो ऐसे ही चिढ़ा रहे थे । ऐसी ही रहो । पतली हुई तो बाज़ूबंद ज़ब्त” पापा ने लाड़ से कहा । मेरे देवर की सगाई पर होने वाली देवरानी बाजूबंद पहनी थी…असली कि नकली पता नहीं । पर पापा को धुन लग गयी कि बड़ी बिटिया (बहू) के पास भी होना चहिये एक । अगले ही दिन एक सोने का बाजूबंद आ गया । अब जब पतले होने की बात करो उसी के ज़ब्त होने की धमकी देते हैं हमारे श्वसुर । अब उन्हें क्या कहूँ कि बाज़ूबंद कलाईबंद हुआ जा रहा है ।

बाहर सुबह ५ बजे से ‘ऊँ नमः शिवाय’ की धुन बैठ गयी थी । ढोल मँजीरों के साथ ‘ऊँ नमः शिवाय’ का जाप बड़ा मधुर सुनाई देता था । मंदिर सज गया था । इस बार शिव जी का अभिषेक मुझे और अमित को करना था । हम दोनों ही नहा धो के मंदिर पहुँच गये । मंदिर में इतनी चहल पहल तो मैनें पहली बार देखी । मंदिर के परिसर में रहने वाले खरगोश, कबूतर, बत्तखें, मछलियाँ और एक बँदरिया सभी मानो उत्सव मना रहे थे । पेड़ॊं पर झूले पड़े थे जिसके आस पास बच्चों का हुजूम था । रंग बिरंगी कंपट बेचने वाली, आइसक्रीम वाला और गुब्बारे वाला मंदिर के बाहर डेरा डाले थे ।  हम मंत्र मुग्ध से भक्तिमय वातावरण मे खोये ही हुए थे कि मंदिर में एक भयंकर आदमी के अभिवादन से हमारी तंद्रा टूटी । चक्क काला रंग, चेहरे पर बहुत से धब्बे, ऊँचा कद और लाल आँखे । हमने सोचा - ये कौन ? “बहू जी आपको साहब बुला रहे हैं “, व्यक्ति ने कहा । पापा बुला रहे थे । अमित भी पीछे पीछे आये । “पापा इसे भी दिखाइये ना… ” अमित ने पापा से कहा । अब तक कुछ भी हमारी समझ नहीं आया था । “लाओ लाखन, बहू को नाग देवता के दर्शन करा दो” पापा ने उस आदमी से कहा । “ओह ! तो ये एक सपेरे हैं । और अमित ने शायद कल ही देख लिया नाग ” मैने सोचा । घर में पापा को सर्प वगैरह के काटे का इलाज आता है और उस इलाके में अक्सर साँप निकलते ही रहते हैं । मंदिर मे भी साँप होते हैं कभी कभी । इसलिये वहाँ नाग-अजगर मानो बड़ी बात है नहीं । इन्हें और भाई-बहनों को इसी वजह से डर भी नहीं लगता । कहो तो गले में डाल लें । पर भैया हमने तो नाग का ‘न’ भी नहीं देखा कभी । तो दर्शन के नाम से ही झुरझुरी हो आयी । पिटारा खुला । एक नाग और एक छोटी सी नागिन (जैसा कि सपेरे ने बताया ) ।

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नागिन जितनी शांत , नाग उतना ही आक्रामक । उसकी साँस की आवाज़ और फ़ुँकार से मेरी तो कँपकँपी छूट रही थी । इतने में एक अजगर भी सपेरे ने निकाला और ज़मीन पर छोड़ दिया ।

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अब कँपकँपी घिग्घी में बदल गयी थी । अमित और पापा लगे समझाने - बेटा कुछ नहीं कहेगा वो तुम्हें । खैर उसने कहा भी नहीं । नहीं तो हम चाय ना सुड़क रहे होते । वह सर्र गया मंदिर के चबूतरे पर और जहाँ जगह मिली वहीं एक शाखा से गाँठ लगा के बैठ गया । हमने चट्ट-चट्ट दो चार फोटो खीँच लिये । फिर कैमेरा अमित को थमा पूजा की तैयारी करने निकल पड़े । मम्मी ने कहा था १०८ बेलपत्र पर सीता-राम लिखना है । सो जुट गये काम में । पीले चंदन से हरे पत्तों पे लिखा सीता-राम कितना सुंदर दीख पड़ता था । संयोगवश मैनें भी पीली-हरी साड़ी पहनी थी ( जिसके बारे में अमित कहते हैं कि उसे पहन कर मैं ब्राज़ील का झंडा लगती हूँ ) । अमित की दीदी ने आ कर खिंचाई की - यार निधि, तुम तो पत्तों की एकदम मैचिंग लग रही हो  । पहली बार पता लगा कि जितना सरल सोचा था उतना आसान नहीं था यह काम । घंटा लग गया लिखने में ।

अब तक जनता आ कर नाग पूजन आरंभ कर चुकी थी । वही नाग इतना शांत बैठा था कि क्या कहूँ । अब पापा ने हम दोनों को बुलाया पूजन के लिये । कहा - टीका लगाओ । हाय राम…नमस्कार से काम नहीं चलेगा क्या !! इतने लोगों के सामने रिरियाऊँ भी तो कैसे !! कुल मिला के हमारी नज़रों मे अपनी स्थिति दयनीय थी :(। पापा ने नाग देव को हाथों से पकड़ रखा था । अमित ने टीका लगाया । हमने भी राम-राम करते हुये टीका लगा दिया । देव हिले भी नहीं । जाने उनका क्रोध कहाँ चला गया था । हाथ जोड़ प्रार्थना की । अब नागिन की पूजा की बारी । वह तो सर्र-पर्र भाग रही थी । जैसे जैसे वह हिले वैसे वैसे हम । कुल मिला कर दोनो नगीना टाइप युगल नृत्य कर रहे थे । अन्तत: पापा ने उसे भी पकड़ा तो हमने पूजा की । इसके बाद भोले बाबा के अभिषेक की बारी । जल, दुग्ध, घृत, शहद, दही, शक्कर व पंचामृत से बाबा को स्नान कराया । उसके बाद ‘ऊँ नमः शिवाय’ के जाप के साथ पीतल के बने गो-मुख से जलाभिषेक और फिर मंत्रोच्चार के साथ बेलपत्र अर्पित किये । भोग लगा, हवन हुआ व फिर आरती । उसके बाद भंडारा था । धीरे धीरे शाम भी हो चली थी । साँध्यकालीन आरती बहुत ही मोहक रही । ढोलक, हारमोनियम, मँजीरे, घंटे और शंखनाद के स्वरों के साथ भक्तो के एक विशाल समूह ने जब गाना प्रारंभ किया तो मन हुआ कि यह कभी खत्म ही ना हो । क्या बच्चे, क्या बूढे़, सभी आँख मूँदे प्रार्थना में लीन । पंडित जी कब आरती का थाल ले सामने आ खड़े हुए, मुझे भान ही नहीं हुआ । फिर पापा ने सर्प विसर्जन किया । सर्प विसर्जन यानि सभी सर्पों को मुक्त करना । उसके बाद हम लोगों (दीदी (ननद), उनके बच्चे इत्यादि)  ने झूले हथियाये ।  बड़े दिनों के

 बाद झूला झूला । आत्मा प्रसन्न हो गयी । थोड़ी देर में सासु माँ भी काम निपटा आ गयीं थीं । मुझे देख कर बोलीं “अरे तुम तो बिल्कुल भी ऊँचा नहीं झूल पा रही, लाओ हम झुलायें” । ” हाँ निधि, मम्मी बहुत बढिया झुलाती हैं ” दीदी (ननद) बोलीं । हम थोड़ा हिचकिचाये, सासु माँ हमें झूला झुलायें….ठीक होगा क्या । पर मम्मी ने एक ना सुनी । दीदी और मम्मी ने खूब झुलाया ।

 

बड़ा मज़ा आया । जहाँ तन हल्की बारिश की नन्हीं बूँदो से भीग रहा था वहीं मन स्नेह से । फिर हम सबने पोज़ बना बना फोटो भी खिँचा डाले झूलों पर । इस बार घर के पेड़ से नीँबू, करौंदे भी तोड़े । पिछली बार जामुन और उससे पहले अमिया तोड़ने का आनंद लिया था । सच्ची, अपने हाथ से फ़ल तोड़ कर खाने में बड़ा सुख मिलता है । खैर, रात को ट्रेन थी वापसी की । सामान बटोरा और सारी चहल-पहल छोड़ वापस हो लिये । यहाँ यूँ तो हर तरह के संसाधन उपलब्ध हैं - ऊँची इमारतें, विशाल शॉपिंग मॉल्स, चौड़ी सड़कें, बड़ी गाड़ियाँ । नहीं है तो छोटे शहरों सी आत्मीयता, नहीं है हर छोटे-बड़े उत्सव पर मिल जुल कर संस्कृति को जीवंत करने की क्षमता । कब त्योहार आये और कब चले गये पता ही नहीं चलता । न सावन के झूले हैं, न फागुन के गीत, न पतंग, न लकड़ी और मिट्टी के रंग बिरंगे खिलौने, न मेला, न खेत ना आँगन । सोचती हूँ असली भारत इन बड़े शहरों में बसता ही कहाँ  है । लगता है मानो जीवन की आपाधापी में हम जीवन के आनंद और अर्थ को ही छोड़ आये…कहीं दूर, बहुत पीछे …अपने छोटे शहरों और गावों मे ।

Published in: on August 2, 2006 at 4:20 pm Comments (7)