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	<title>Comments on: मैने जो लिखा था&#8230;.</title>
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	<description>डायरी के कुछ पन्ने</description>
	<pubDate>Sun, 18 May 2008 09:58:00 +0000</pubDate>
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		<title>By: अनाम अंतर्मन</title>
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		<dc:creator>अनाम अंतर्मन</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 11 Jul 2006 02:15:30 +0000</pubDate>
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		<description>उम्दा शेर हैं, आशा है आगे भी लिखते रहिये...ये शेर देखकर मुझे अपने स्कूल के दोनों का शेर-कविता लेखन याद  गया..जाने कहां डाल दिये मैंने वो पन्ने!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>उम्दा शेर हैं, आशा है आगे भी लिखते रहिये&#8230;ये शेर देखकर मुझे अपने स्कूल के दोनों का शेर-कविता लेखन याद  गया..जाने कहां डाल दिये मैंने वो पन्ने!</p>
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	<item>
		<title>By: आशीष</title>
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		<dc:creator>आशीष</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Jul 2006 06:13:38 +0000</pubDate>
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		<description>आंटी जी.....क्षमा किजीये नीधी जी, विवाह वाला लेख अच्छा लिखा है :) मजा आ गया।

मेरे लिये कुछ टिप्स है, उसमे ... अब क्या ये मत पूछना</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आंटी जी&#8230;..क्षमा किजीये नीधी जी, विवाह वाला लेख अच्छा लिखा है <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> मजा आ गया।</p>
<p>मेरे लिये कुछ टिप्स है, उसमे &#8230; अब क्या ये मत पूछना</p>
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	<item>
		<title>By: pratyaksha26</title>
		<link>http://abhivyakta.wordpress.com/2006/07/05/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%a5%e0%a4%be/#comment-80</link>
		<dc:creator>pratyaksha26</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Jul 2006 04:46:04 +0000</pubDate>
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		<description>बढिया लेख लिखा निधि.इस तरह के तारतम्य बिठाने का भी अपना एक अलग मज़ा है बशर्ते ये काम दोनों तरफ से हो.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बढिया लेख लिखा निधि.इस तरह के तारतम्य बिठाने का भी अपना एक अलग मज़ा है बशर्ते ये काम दोनों तरफ से हो.</p>
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		<title>By: अनूप शुक्ला</title>
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		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Jul 2006 18:27:49 +0000</pubDate>
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		<description>फिर अच्छा लगा लेख।कवितायें।जल्दी-जल्दी लिखा करें। बहुत अच्छा लिखतीं आप।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>फिर अच्छा लगा लेख।कवितायें।जल्दी-जल्दी लिखा करें। बहुत अच्छा लिखतीं आप।</p>
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	<item>
		<title>By: Nidhi</title>
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		<dc:creator>Nidhi</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Jul 2006 16:22:11 +0000</pubDate>
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		<description>धन्यवाद नाहर जी, आपके साधुवाद के लिये । आप लोगों का स्नेह और प्रोत्साहन ही है जो फिर से लिखना शुरू किया । आपकी बात ध्यान मे रखूँगी । कोशिश रहेगी कि अगली पोस्ट मे इतना विलंब न हो । रही बात कविता की तो सन्ग्रह मे कुछ पुरानी कवितायें ही हैं । अभी तो बडे़ दिनों से कविता का 'क' भी नहीं लिखा । आशीष जी, आपका भी धन्यवाद, पता नहीं क्यूँ उस पोस्ट पर टिप्पणी काम नहीं कर रही । जो परिस्थितियाँ एक नववधु के समक्ष आती हैं, वह मैने सिर्फ़ इसलिये लिखीं जिससे कि यह स्पष्ट हो सके की शादी से एक लड़की के जीवन मे भारी परिवर्तन हो जाता है । जबकि अपेक्षाक्रत पुरुषों के जीवन मे ऐसा कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होता । इन रिवाज़ों से मुझे कुछ परहेज़ हो ऐसा नहीं है । समय के साथ कुछ बातें अतार्किक लगती हैं क्युँकि उनका कोई पुख़्ता कारण कभी हमें बताया ही नहीं गया । पर फिर भी स्त्रियाँ बड़ों के कहे अनुसार उन नियमों का पालन करतीं हैं । जहाँ तक शादी का सवाल है , मैं ख़ुश हूँ । मुझे अपनी सभ्यता के अनुसार आचरण करने मे कोई परेशानी नहीं । आमित को मैं बड़ों के सामने आप कह कर ही संबोधित करती हूँ जिससे उनके कहे का मान रहे । आपस में तुम कहने से भी परहेज़ नहीं है । मुझे नहीं पता कि इसे मैं पूर्ण स्त्री वर्ग के लिये सच मान सकती हूँ कि नहीं पर मेरा मानना है कि आज की शिक्षित नारी अपनी सभ्यता और आधुनिकता मे सामंजस्य बिठा सकती है । रही बात वधु की आशाओ की तो वह तो व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है । शादी की सफ़लता आपसी समझ, प्रेम और विश्वास से ही निश्चित ही संभव है । अतः आप घबरायें ना ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>धन्यवाद नाहर जी, आपके साधुवाद के लिये । आप लोगों का स्नेह और प्रोत्साहन ही है जो फिर से लिखना शुरू किया । आपकी बात ध्यान मे रखूँगी । कोशिश रहेगी कि अगली पोस्ट मे इतना विलंब न हो । रही बात कविता की तो सन्ग्रह मे कुछ पुरानी कवितायें ही हैं । अभी तो बडे़ दिनों से कविता का &#8216;क&#8217; भी नहीं लिखा । आशीष जी, आपका भी धन्यवाद, पता नहीं क्यूँ उस पोस्ट पर टिप्पणी काम नहीं कर रही । जो परिस्थितियाँ एक नववधु के समक्ष आती हैं, वह मैने सिर्फ़ इसलिये लिखीं जिससे कि यह स्पष्ट हो सके की शादी से एक लड़की के जीवन मे भारी परिवर्तन हो जाता है । जबकि अपेक्षाक्रत पुरुषों के जीवन मे ऐसा कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होता । इन रिवाज़ों से मुझे कुछ परहेज़ हो ऐसा नहीं है । समय के साथ कुछ बातें अतार्किक लगती हैं क्युँकि उनका कोई पुख़्ता कारण कभी हमें बताया ही नहीं गया । पर फिर भी स्त्रियाँ बड़ों के कहे अनुसार उन नियमों का पालन करतीं हैं । जहाँ तक शादी का सवाल है , मैं ख़ुश हूँ । मुझे अपनी सभ्यता के अनुसार आचरण करने मे कोई परेशानी नहीं । आमित को मैं बड़ों के सामने आप कह कर ही संबोधित करती हूँ जिससे उनके कहे का मान रहे । आपस में तुम कहने से भी परहेज़ नहीं है । मुझे नहीं पता कि इसे मैं पूर्ण स्त्री वर्ग के लिये सच मान सकती हूँ कि नहीं पर मेरा मानना है कि आज की शिक्षित नारी अपनी सभ्यता और आधुनिकता मे सामंजस्य बिठा सकती है । रही बात वधु की आशाओ की तो वह तो व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है । शादी की सफ़लता आपसी समझ, प्रेम और विश्वास से ही निश्चित ही संभव है । अतः आप घबरायें ना ।</p>
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	<item>
		<title>By: सागर चन्द नाहर</title>
		<link>http://abhivyakta.wordpress.com/2006/07/05/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%a5%e0%a4%be/#comment-77</link>
		<dc:creator>सागर चन्द नाहर</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Jul 2006 15:53:30 +0000</pubDate>
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		<description>निधि जी,
विवाह वाले लेख बहुत अच्छा लिखा है, पढ़ते हुए बहुत हँसी आई खासकर जहाँ  आपके घर वालों ने  आपको अकेले छोड़ दिया था बातें करने के लिये और आप कनस्तर की बातें कर रहे थे। और जब आप बन सवँर कर अमित जी के लिये दरवाजा खोलने गई थी।
लिखने की शैली हर बार निखरती जा रही है, और मुझे भी प्रेरित कर रही है कि कुछ लिखूं। लिखती रहिये... और थोड़ा जल्दी जल्दी लिखो।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>निधि जी,<br />
विवाह वाले लेख बहुत अच्छा लिखा है, पढ़ते हुए बहुत हँसी आई खासकर जहाँ  आपके घर वालों ने  आपको अकेले छोड़ दिया था बातें करने के लिये और आप कनस्तर की बातें कर रहे थे। और जब आप बन सवँर कर अमित जी के लिये दरवाजा खोलने गई थी।<br />
लिखने की शैली हर बार निखरती जा रही है, और मुझे भी प्रेरित कर रही है कि कुछ लिखूं। लिखती रहिये&#8230; और थोड़ा जल्दी जल्दी लिखो।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: आशीष गुप्ता</title>
		<link>http://abhivyakta.wordpress.com/2006/07/05/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%a5%e0%a4%be/#comment-76</link>
		<dc:creator>आशीष गुप्ता</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Jul 2006 15:35:23 +0000</pubDate>
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		<description>आपकी पिछली प्रविष्टी पर टिप्पणियाँ काम नहीं कर रही तो यही लिख रहा हूँ। आपके लेख की सादगी और नारी दृष्य से विवाह अनुभव सुनकर अच्छा लगा। रही बात आँटी की तो अब मै क्या कहूँ अपनी लंबाई की वज़ह से १८ वर्ष की उम्र से ही अंकल बना बैठा हूँ! पर यह तो सच है कि इस शब्द में झटके देने की क्षमता है और इससे सबब में आना मज़बूरी। मार्केटिंग प्रबंधक लोग इस बात को ध्यान देंगे तो व्यापार में उपयोगी रहेगा :)

एक मध्यम वर्गीय पुरुष होने के नाते अंतर्जाल में मुझे स्त्रीयों की विचार फ़ेमिनिज़्म के स्तर को लेकर प्रतिकूल प्रतीत होते है और ये समझना मुश्किल हो जाता है कि अपनी होने वाली पत्नी से किस स्तर तक व्यवहार करना चाहिये। गौरतलब है कि आपने अपनी प्रविष्टी के अंत तक "पति'देव'" शब्द प्रयोग करना चालू कर दिया था। अगर फ़ेमिनिज़्म की सीमायें जो पश्चिम मे लागू होती है उस अनुसार स्वतंत्रता देकर पेश आऊ तो संभव है उसकी आशाओं का बिना जाने ही दमन कर दू अथवा उसके परिक्षेप में बदलाव लाऊ (उदाहरणत: चिठ्ठाजगत में अधिकतर स्त्रीयाँ अपनें पति के उपनाम को लेना और मंगलसूत्र पहनना शोषण के चिन्ह मानती हैं)। और दूसरी सीमा के अनुसार चलू तो संघर्ष की संभावना है। इनका सही अनुपात बिताना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपकी पिछली प्रविष्टी पर टिप्पणियाँ काम नहीं कर रही तो यही लिख रहा हूँ। आपके लेख की सादगी और नारी दृष्य से विवाह अनुभव सुनकर अच्छा लगा। रही बात आँटी की तो अब मै क्या कहूँ अपनी लंबाई की वज़ह से १८ वर्ष की उम्र से ही अंकल बना बैठा हूँ! पर यह तो सच है कि इस शब्द में झटके देने की क्षमता है और इससे सबब में आना मज़बूरी। मार्केटिंग प्रबंधक लोग इस बात को ध्यान देंगे तो व्यापार में उपयोगी रहेगा <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>एक मध्यम वर्गीय पुरुष होने के नाते अंतर्जाल में मुझे स्त्रीयों की विचार फ़ेमिनिज़्म के स्तर को लेकर प्रतिकूल प्रतीत होते है और ये समझना मुश्किल हो जाता है कि अपनी होने वाली पत्नी से किस स्तर तक व्यवहार करना चाहिये। गौरतलब है कि आपने अपनी प्रविष्टी के अंत तक &#8220;पति&#8217;देव&#8217;&#8221; शब्द प्रयोग करना चालू कर दिया था। अगर फ़ेमिनिज़्म की सीमायें जो पश्चिम मे लागू होती है उस अनुसार स्वतंत्रता देकर पेश आऊ तो संभव है उसकी आशाओं का बिना जाने ही दमन कर दू अथवा उसके परिक्षेप में बदलाव लाऊ (उदाहरणत: चिठ्ठाजगत में अधिकतर स्त्रीयाँ अपनें पति के उपनाम को लेना और मंगलसूत्र पहनना शोषण के चिन्ह मानती हैं)। और दूसरी सीमा के अनुसार चलू तो संघर्ष की संभावना है। इनका सही अनुपात बिताना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।</p>
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		<title>By: सागर चन्द नाहर</title>
		<link>http://abhivyakta.wordpress.com/2006/07/05/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%a5%e0%a4%be/#comment-75</link>
		<dc:creator>सागर चन्द नाहर</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Jul 2006 14:52:24 +0000</pubDate>
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		<description>क़दम क़दम पे बिखेरा है आशियाँ मेरा,
कब तलक ले वो जाने यूँ इम्तिहाँ मेरा ।

जो था अज़ीज़ मुझे, जो था करीब मेरे,
दूर होता रहा हर एक मेहरबाँ मेरा।
जिसके आगे मैं तन्हा सफ़र ना कर पाँऊ,
बस उसी मोड़ पे खोया है निगहबाँ मेरा।
करीबियों की दहशत अभी है दिल मे मेरे,
हुआ है ख़ौफ़े जुदाई अभी जवाँ मेरा ।
बहुत खूब निधि जी, १९ वर्ष की उम्र में इतना बढ़िया लिखती थी तो अब तो और परिपक्वता आ गयी होगी, कृपया अपने संग्रह में से और कविताओं और गज़लों को निकालें और यहाँ प्रकाशित करें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>क़दम क़दम पे बिखेरा है आशियाँ मेरा,<br />
कब तलक ले वो जाने यूँ इम्तिहाँ मेरा ।</p>
<p>जो था अज़ीज़ मुझे, जो था करीब मेरे,<br />
दूर होता रहा हर एक मेहरबाँ मेरा।<br />
जिसके आगे मैं तन्हा सफ़र ना कर पाँऊ,<br />
बस उसी मोड़ पे खोया है निगहबाँ मेरा।<br />
करीबियों की दहशत अभी है दिल मे मेरे,<br />
हुआ है ख़ौफ़े जुदाई अभी जवाँ मेरा ।<br />
बहुत खूब निधि जी, १९ वर्ष की उम्र में इतना बढ़िया लिखती थी तो अब तो और परिपक्वता आ गयी होगी, कृपया अपने संग्रह में से और कविताओं और गज़लों को निकालें और यहाँ प्रकाशित करें।</p>
]]></content:encoded>
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