पिछले अंक से आगे…
अपनी पिछली पोस्ट पढ़ कर लगा कि सात सालों के अनुभव को दो किस्सों मे समेट देना न्यायसंगत नहीं है । इसलिये वापस जा रही हूँ नाना – नानी के पास ।
अब जब पलट के देखती हूँ तो लगता है कि बड़ा मीठा युग देखा मैने भी । पता नहीं जगह छोटी थी या सच मे तब ज़माना इतना पुराना था । मेरा मतलब ???? अभी पता लगेगा भाई…रुकिये तो । मैनें स्कूल मे दाखिला लिया सन् १९८३ में । तब ये प्लेग्रुप जैसा झमेला तो होता नहीं था । और स्कूल था हिन्दी माध्यम सो नर्सरी, फिर के.जी., फिर सीधे कक्षा १ । नर्सरी मे, ऐलुमिनियम की छोटी से बकसिया मे एक तख्ती, सरकन्डे की कलम और खड़िया का घोल लिये पहुँच जाते थे स्कूल । अरे ! सच मानिये (ये इसलिये कहा कि मुझे कोई अन्दाज़ा नहीं कि उस समय आप सब में से जिन लोगों ने पढना शुरू किया, क्या उन्हे भी लिखने के लिये पेन्सिल न मिली होगी ) । और कभी किसी विद्यार्थी के हाथ ब्लेड लग जाया करता तो मजे ही आ जाते । लिखते कम, कलम की छिलाई ज़्यादा होती । जब मौका हाथ लगता स्कूल के पीछे आम के पेड़ से बौर या छोटी अमिया तोड़ने की उठा-पटक में लगे रहते ।
घर आ कर शाम को जब खेलने जाने का समय होता, तो पूरी मन्डली परिसर मे बने नाना जी के दफ़्तर के तालाब के किनारे इकट्ठी होती । कुछ नाम याद हैं अभी भी – सोनी, गुड़िया, धन्नो (असली नाम तो याद नहीं पर घर का नाम यही था), नवीन, माला, मिनी, गुड्डन दीदी, विवेक भैया , सीता, रीता और गीता । आखिर के तीन नामों को पढ़ के आपने ज़रूर सोचा होगा कि ये क्या बहनें थी ? हाँ जी , यह बहनें थी । हर बहन माता – पिता की लड़के की बुझी हुई आस । मुझे याद नहीं कि उनके कोई भाई हुआ कि नहीं । अच्छा हो कि हो ही गया हो नहीं तो हुई होंगी नीता, मीता…। तालाब के किनारे बैठ बादलों के हनुमान जी, रथ, धनुष, फूल न जाने क्या क्या बनाते । अमलताश के फूलों के बीच की डन्डी से राजाओं का युद्ध होता । कच्चे हरे फालसे बटोरते …याद नहीं कि खाते भी थे क्या ।
मनोरन्जन के साधन भी हम बच्चों के जैसे मासूम थे । टी.वी., ट्राँज़िस्टर इतने प्रचिलित जो नहीं हुए थे । नानी नत्थू बाबा की छोटी लड़की को बुलवा लेतीं । नाम था लल्ला, मेरी हमउम्र या शायद एकाध साल बड़ी रही होगी । फिर लल्ला देवी देशज गानों पर ठुमक ठुमक के नाचती थीं । कुछ गानों की पहली लाइनें याद हैं — बन्सी वाले ने टेर लयी, अकेली राधा पनिया भरन को गयी, इक्के वाले ने अठन्नी जादा ले लयी लाँगुरिया, पढ़ी लिखी अंग्रेज़ी मेरी कदर बिगड़ गयी मम्मी जी । मेरे लिये तो वो जीवन की पहली सरोज खान से कम नहीं है । कैसेट तो जीवन मे बड़ी बाद मे आयी । पहले तो नानी गाती और हम इन्ही गानों पर लल्ला देवी की कॉपी करते । सिनेमा देखना हो तो या तो वी.सी.आर. और एक टी.वी. लगा कर बनाये एक कमरे के हॉल मे देखो या फिर पास के बडे़ शहर जाओ । और तो कुछ याद नहीं सिनेमा से जुडा़, बस कुत्ते वाली पिक्चर याद है । बडे़ चाव से देखी थी मैने । लोग जैकी श्रॉफ़ को छोड़ के कुत्ता देखने जाते थे । बडा़ चर्चा हुआ था कुत्ते के अभिनय का । अरे, 'तेरी मेहरबानियाँ' याद है ना ??? फिर एक दिन घर मे टी.वी. भी आ गया । दादा दादी की कहानियाँ, विक्रम वेताल का समय ना हो तो दूरदर्शन पर बारिश देख के खुश हो जाते। नहीं समझे ? अरे जब रिले ना आये तब की स्क्रीन देखी है ना….वही ।
रात में जब सोने जाते तो नानी बड़े प्यार से थपकती हुई गातीं 'तुझे सूरज कहूँ या चन्दा, तुझे फूल कहूँ या तारा….' । सच मानिये ये गीत आज भी गूँजता है कानों में । क्यूँ, इसका कारण फिर कभी बताउँगी । ख़ैर, समय बीत रहा था और माँ के घराने की ओर से मिलने वाले गुणों की नीँव पड़ चुकी थी । जाने का वक्त पास था और मैं यह समझ ही नहीं पा रही थी कि मम्मी और नानी दोनो एक साथ क्युँ नहीं मिल सकते मुझे । इस दुविधा का तो कोई हल था नहीं । तो अन्तत: जैसे मैने बताया था – मैं आगरा आ गयी मम्मी के पास ।
यहाँ का माहौल नानी के घर से बिल्कुल अलग । किताबों मे किसी को रुचि न थी । घर की स्त्रियाँ घरेलू कामों मे लगी रहतीं और पुरुष काम पर चले जाते । हाँ एक चीज़ यत्र तत्र बिखरी पडी़ दिखती थी – इलेक्टरॉनिक्स के सामान । बड़ा अजीब लगा शुरू में । मम्मी पूरे घर का काम करने मे लगी रह्तीं तो लगता कि क्या यहाँ नत्थू बाबा नहीं होते ! थोडा़ वक्त लगा पर घर मे छोटे भाई बहनों के साथ मैं जल्दी ही रम गयी । शहर के एक मिशनरी स्कूल मे दाखिला करा दिया गया । पर यहाँ न वैसे दोस्त मिले ना वातावरण । मैं कब अन्तर्मुखी होती गयी पता ही न चला । अपनी किताबों के पीछे ही गोल रहती हमेशा । हाँ कभी कभी उल्टी सीधी कोशिश करती कि घर मे साख जमा सकूँ । बचपन से एकाधिपत्य रहा था नाना के घर । यहाँ — पटर पटर बोलने वाली छोटी बहन के चलते मेरा सिक्का जमने का नाम ही न लेता था । इससे जुडा़ एक किस्सा कहती हूँ । उस समय शायद मैगी कम्पनी नयी नयी आयी होगी । सन् ८६-८७ की बात है । तो कम्पनी ने अपने प्रचार के तहत स्कूलों में मैगी बाँटे । किया ये गया कि हर स्कूल में जा सभी बच्चों को एक-एक मैगी का पैकेट दिया गया । एक छोटी सी सामन्य ज्ञान प्रतियोगिता भी रखी गयी । जिस बच्चे ने सही जवाब दिया उसे तीन पैकेट मिले । अब इस बात को घर आ कर, हेर-फेर कर मैने कुछ यूँ सुनाया – "मम्मी आज स्कूल मे मैगी वाले आये थे । उन्होने सबसे जी.के. के सवाल किये, जिसने जवाब दिया उसे एक पैकेट मैगी मिला ।" एक सुना हुआ सवाल भी बता दिया। माँ निहाल हो गयीं । कैसी होनहार लड़की दी है भगवान ने । शाम को पिता जी जब दफ़्तर से लौटे तो वह भी बड़े खुश हुए । और हम तो प्लान की सफ़लता पर खुश थे ही । अगले दिन पिता जी के एक मित्र घर आये । पिता जी ने मेरे सामने उन्हे किस्सा बताया । सुन के वह बडी़ देर तक मुस्कुराते रहे । पिता जी के बचपन के मित्र थे । और हुआ यूँ था कि उनकी पत्नी भी एक स्कूल मे अध्यापिका थीं । और जैसे कि मैगी का यह अभियान सभी स्कूलों के लिये था, उन्हे इस प्रचार का पता था । दफ़्तर मे उन्होने इसका पिता जी से ऐसे ही ज़िक्र किया और पिता जी असलियत जान गये । शाम को जो मेरे सामने जो ये सब बातें दुहरायी गयीं वह मुझे अपने किये का बोध कराने कि लिये थीं । मम्मी बडी़ मायूस हुई । मुझे समझाया कि ऐसे झूठ नहीं बोलते । उनके सिखाने का असर था या उस समय हुई शर्मिन्दगी का, पता नहीं । पर ज़िन्दगी का तीसरा सबक ये लिया कि कभी शेखी़ न बघारो । और दूसरे के किये काम का श्रेय खुद लूटने की कोशिश बिल्कुल ही न करो ।
इस कड़ी के अगले अंक मे आपको अपने कुछ और अनुभवों और विज्ञान के प्रयोगों के बारे में बताऊँगी । घर मे बिजली का फ़्यूज़ कैसे उडा़यें, इस विषय पर भी आसान जानकारी दी जायेगी…..क्रमश:

निधि जी,
बहुत कम समय में छा गई आप, लेखनशैली इतनी अच्छी है कि पता ही नहीं लगता कि पढ़ रहे हैं यों लगता है मानों यह सब अब भी हमारी आँखों के सामने हो रहा है।
विज्ञान के प्रयोग तो हमने भी बहुत किये कभी चिठ्ठे पर लिखेंगे, घर के चलते रेडियो और अलार्म घडी़ को कैसे ठीक किया जाये। और बाद कैसे पापा के हाथों पिटाई खाई जाये…..
धन्यवाद सागर जी । लड़की होने का ये तो फ़ायदा मिला हमें कि हम पिटे नहीं |
आपके बचपन की कालावधि हममें से बहुतों के समान है, इसलिये लगता है आप हमें हमारे ही बचपन की कहानी सुना रहीं हैं। बहुत सुंदर लिखा है आपने।
निधि, कभी भूतों की कहानियां नहीं सुनीं तुमने बचपन में? मैं आवासीय विद्यालय में था, और मेरे एक मित्र के नाना भूतों से कुश्ती किया करते थे! उसने कितनी सारीं रातों को पता नहीं कितनी बार यह किस्सा सुनाया था हम सबको. तुम्हारा कोई संस्मरण हो तो बताओ.
बचपन , जिन्दगी का सुनहरा पन्ना और सुनहरी मधुर यादे !
धन्यवाद याद दिलाने के लिये !
आप सभी का धन्यवाद आपके अमूल्य विचारों और मेरे उत्साहवर्धन के लिये । अमित, भूत की कहानियाँ नहीं सुनी मैने
। नाना की लिखी हुई एक कहानी पढ़ी ज़रूर थी पर वह एक डीँग हाँकने वाले आदमी की कहानी थी । भूत से जुड़ी एक और भी बात याद है । अगली बार बताऊँगी । अगली बार विज्ञान विशेषांक के बारे में सोचा है । जादुई शीशा , काँच मे तैरती मछलियाँ, साँप का बदला , असफ़ल विज्ञान के प्रयोग और साथ में सबक सँख्या चार ।
it really seems to be coming from heart and takes back to those old days. Sorry cannot type in Hindi. but reading you blog was nostalgic not only for description of childhood but also due to the language and simplicity of writing.
looking forward to the next episode.
Thank you Prashant
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बहुत ही रोचक है..’तेरी मेहरबानियां’ मुझे भी याद है…कुछ महीनों पहले मैंने अपने बचपन के बारे के लेख में ही इस फिल्म का उल्लेख किया था!