बचपन में जो सीखा…
यूँ तो मैं उन लोगों मे से हूँ जिनके लिये बीता हुआ समय हमेशा आज से बेहतर होता है, यानि जो आज है वह भी खू़बसूरत हो जायेगा…कल । कम से कम अब तक तो ऐसा ही लगता आया है । आगे की कौन जाने । इस बीते हुए कल से बहुत ही मधुर स्मृतियाँ जुडी़ हैं मेरी, लेकिन सबसे मधुर हैं यादें बचपन की । भोला बचपन , प्यारा बचपन और थोड़ा थोडा़ बुद्धू बचपन ।
पिता जी दिल्ली मे कार्यरत थे जब मेरा जन्म हुआ । दिल्ली मे रहते कुछ एकाध साल ही हुए होंगे । दमे की बीमारी यूँ तो उन्हे बचपन से थी पर अब जाने दिल्ली की आबो-हवा उन्हे रास नहीं आयी या फिर पता नहीँ क्या हुआ, उनकी बीमारी ने अचानक ज़ोर पकड़ लिया । बाकी का परिवार आगरा मे था, इसलिये छुट्टी ले पिता जी आगरा आ गये । वापस तो जाना ही था, सो एक महीने के बाद वापस दिल्ली भी आ गये । ये सिलसिला जो शुरू हुआ तो थमने का नाम ही न लेता था । मैं तीन साल की होने को आयी तो माँ को पढाई की चिन्ता सताने लगी । पिता जी की तबियत की वजह से जब तब आगरा जाना पड़ता । ऐसे मे कहाँ के स्कूल मे डालेँ, माँ इसी पसोपेश मे रहती । अन्तत: उन्होने मुझे मेरे नाना - नानी के पास छोड़ देने का निर्णय लिया । मुझे याद नहीं कि उस उम्र मे माँ से दूर होने पर मैने कैसे प्रतिक्रिया की थी । और जब से होश सम्भाला, नानी की ममतामयी गोद ही याद आती है ।
कहते हैं कि जैसे इन्सान को सूद, मूल से प्यारा होता है, वैसे ही नाती-पोतों को लोग अपने बच्चों से भी ज़्यादा प्यार करते हैं । नाना - नानी ने बड़े लाड़ से पाला । बचपन मे खुद को किसी राजकुमारी से कम नहीं समझा मैने । नाना जी उस समय वर्ग - १ के अफ़सर थे । बड़ा सा सरकारी बँगला जिसके चारों ओर या कहें गोलाई मे दूर तक फ़ैले खेत । मुझे नहीँ याद कि वो खेत किसके थे पर थे बँगले के ही परिसर मे, एक नीली जीप थी, एक नत्थू बाबा थे, एक काशीराम था । उस पर साहब की नातिन समझो मुहल्ले कि नातिन । इतना सब होने पर भी नानी ने अनुशासन में ढील कभी न होने दी । सुबह सुबह तो भाई स्कूल का समय होता था । दोपहर मे एक अर्दली खाना ले कर (चार डब्बों वाला स्टील का टिफ़िन) स्कूल आता था…हाथ से खिला के जाता था । क्या ही दिन थे । आज भी याद है कि स्कूल मे आगे मिट्टी के ढेर में, मैं और मेरे साथी तारे ढूँढा करते थे । और ये तारे गिरा करते थे पुष्पा मैडम की साड़ी से । एक अबोध होड़ लगी रहती थी इसी बात पर ।
कैसा होता है ना….कितनी छोटी सी बात भी याद रह जाती है कभी । तब के ज़माने मे गणतन्त्र दिवस और स्वाधीनता दिवस तो त्योहार होते थे । उन दिनों उपस्थिति तो अनिवार्य होती पर युनिफ़ार्म की छुट्टी होती । गुलाबी लहँगा पहन छमर छमर पहुँच जाते थे स्कूल । लौटते में रास्ते में खडे़ ताँगो में जुते घोड़ों के सर पर लगी कलँगी से चिड़ियों के रंग बिरंगे पँख नोच कर कॉपी-किताबों में छुपाते । क्यूँ ?? अरे विद्या होती थी ना वो । अब घर आ के क्या करें । भाई-बहन हों तो खेल-कूद के, लड़-झगड़ के वक्त निकाल लो । पर यहाँ नाना जी चले जाते थे दफ़्तर और नानी अचार, आम पापड़, लड्डू, मठरी और न जाने किस किस काम मे लगीँ रह्ती । गृहस्थी का मतलब मुझे क्या पता था । नाना जी ने बढ़िया हल निकाला । मुझे जोड़ दिया किताबों से । नाना जी खुद एक लेखक भी रहे हैं । स्वर्गीय श्री सम्पूर्णानन्द वर्मा जी के समय में, जो कि नाना जी के ताऊ जी थे, घर से दो किताबें निकलती थीं । शेर-बच्चा और तितली । नाना जी बनारस के पैतृक घर से वह किताबें ले आये और मेरी पढ़ने की आदत का जन्म हुआ । फ़िर लोटपोट, चंपक, टिंकल….और भी जाने क्या - क्या । और ये आदत आज भी जस की तस है । और जब किताबों से फ़ुर्सत मिलती तो नाना जी के साथ दूसरा खेल - नाना एक पन्क्ति देते और अगली पन्क्ति मुझे बनानी होती । तो ऐसे आदत पड़ी लिखने की ।
किताबी कीड़ा होने की वजह से और अपने आसपास वातावरण मे भारी विविधता होने से जिज्ञासा और कौतूहल मेरे स्वभाव मे रच बस गया । कुछ भी काम हो, खुद कर के देखना है । इससे जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा याद आता है - एक मोटे चूहे ने घर मे भारी उपद्रव मचा रखा था । नानी की शिकायत पर नाना ने लगायी चूहेदानी और महाशय अगले ही दिन पकडे़ गये । नाना ने सोचा लाओ थोड़ी देर लॉन मे रखे देते हैं फिर फ़िकँवा देंगे जब नौकर आ जाये । मेरे मन मे तो औत्सुक्य की सीमा न थी । चूहेदानी मे मोटा चूहा । क्या ही मज़ा आयेगा देखने में । शायद ४-५ साल की रही हूँगी तब । नाना ने सख्त हिदायत दी कि चूहेदानी को हाथ न लगाऊँ । भैया, आ गये बाहर मूषक राजा के दर्शन को । देखा तो बेचारे की पूँछ चूहेदानी के दरवाज़े मे फ़ँसी हुई थी । और वह हरसम्भव कोशिश कर रहा था कि पूँछ निकल जाये । देख कर बाल-सुलभ मन को बड़ा कष्ट पहुँचा । हमने सोचा लाओ दरवाज़ा थोडा़ खोल दें, चूहा पूँछ अन्दर कर लेगा फिर उसको दर्द नहीँ होगा । और नाना को पता ही नही चलेगा, ये काम तो फ़ट से हो जायेगा । और फिर आव देखा न ताव, दरवाज़ा चट से खोल दिया । दुष्ट चूहा, पूँछ अन्दर करने की बजाय पूरा का पूरा बाहर आ गया और नाली के रस्ते रसोई मे ये जा कि वो जा । नाना जी से झूठ बोल कर जान बचायी । सबक मिला - नेकी का फल हमेशा मीठा नहीं होता ।
एक वाकया और स्कूल के दिनों का । कक्षा १ मे रही हूँगी तब । कान मे तिनका डालने की बुरी आदत लगी । एक दिन छुट्टी के समय कान मे तिनका डाले कक्षा के दरवाज़े पे खडी थी । छुट्टी की घन्टी बजी और जनता दौडती हुई निकली । एक लड़का था - प्रशान्त । नाम आज तक नहीं भूली । तो हुआ यूँ कि बेचारे से गलती से धक्का लगा और तिनके ने कान मे कर दिया घाव | ख़ून बहने लगा । दर्द तो भूल गयी क्युँकि चिन्ता इस बात की थी कि बेटा गलती तुम्हारी थी तो अब डाँट भी तुम्हे ही पड़ने वाली है । मुझे लगा कि सहानुभूति कैसे बटोरूँ । तो किया क्या- मैडम, प्रशान्त हाथ मे लकडी़ ले कर भाग रहा था जो मेरे लग गयी । पता नहीँ अध्यापिकाओं ने इस बेकार बात पर कैसे विश्वास किया पर बेचारे की बड़ी डाँट पडी़ । उसकी एक ना सुनी गयी । भई खून मेरे निकला तो बात भी मेरी मानी गयी । उस समय तो बड़ी खुशी हुई कि झूठ चल गया । पर अगले दिन उस लड़के का सामना करने की हिम्मत नहीँ हुई । थी तो छोटी पर ये समझ थी कि मैने गलत किया । मन ही मन खराब सा लगता रहा । आखिर नानी को बता ही दिया कि मैने डर के मारे झूठ कहा था । नानी से उस दिन दूसरा मुख्य सबक मिला - अपनी गलती स्वीकार करने की हिम्मत रखो । कोशिश करो कि गलती हो ही ना, और अगर हो जाये तो उसे मानो । अपनी गलती से सीख लो और फिर वह गलती कभी मत दुहराओ । अपना दोष दूसरों पर मढ़ने से हममें सुधार की सम्भावनायें खत्म हो जाती हैं । नानी ने यह गूढ़ बात उस समय बडे़ सुलभ ढँग से कही जो मैने आज भी दामन मे बाँध रखी है । ऐसे हँसते-खेलते-सीखते समय कब उड़ गया पता ही न चला । तब तक इतनी समझ भी आ गयी थी कि मम्मी को कोई परेशानी है जो मुझे साथ नहीं ले जातीं । इसलिये मम्मी के पास जाने जैसी भी कोई ज़िद न करती थी ।
करीब सात साल का होने पर जब नानी को लगा कि पिता जी अब स्वस्थ है, साथ ही उनका आगरा स्थानान्तरण भी हो चुका है, तो उन्होने मुझे मम्मी-पापा को सौँपने का निर्णय किया । अब तक मन मे मम्मी के पास जाने कि चाह थी । सब दोस्त मम्मी-पापा के साथ रह्ते थे ना । पर जब जाने का समय आया तो नाना- नानी को ना छोड़ा जाय । पर आना तो था ही इसलिये रोती धोती , मम्मी-पापा और छोटी बहन के पास आ गयी ………………………क्रमश:
The URI to TrackBack this entry is: http://abhivyakta.wordpress.com/2006/05/24/%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%aa%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%96%e0%a4%be/trackback/

बहुत अच्छा लगा पढ़कर. सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता याद आ गयी:
बार-बार आती है मुझको, मधुर याद बचपन तेरी
गया, ले गया तू जीवन की, सबसे मस्त खुशी मेरी
………….
मैं रोई, मां काम छोड़कर आई, मुझको उठा लिया
झाड़-पोंछ कर, चूम-चूम, गीले गालों को सुखा दिया
दादा ने चन्दा दिखलाया, नेत्र नीर युत-दमक उठे
धुली हुई मुस्कान देखकर, सबके चेहरे दमक उठे
……………
मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी
नन्दन-वन सी फूल उठी यह, छोटी सी कुटिया मेरी
“मां ओ”, कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी
कुछ मुंह में, कुछ लिये हाथ में, मुझे खिलाने लायी थी
पुलक रहे थे अंग, दृगों में, कौतूहल सा छलक रहा
मुंह पर थी आह्लाद-लालिमा, विजय-गर्व था झलक रहा
मैंने पूछा यह क्या लायी?, बोल उठी वह, मां काओ
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से, मैंने कहा - तुम्हीं खाओ
पाया मैंने बचपन फिर से, बचपन बेटी बन आया
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझमें नवजीवन आया
मैं भी उसके साथ खेलती, खाती हूं, तुतलाती हूं
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूं
जिसे खोजती थी बरसों से, अब जाकर उसको पाया
भाग गया था मुझे छोड़कर, वह बचपन फिर से आया
लेख बहुत बढियां और अमित भाई ने तो सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता याद करा कर…बचपन याद करा दिया…बहुत बढिया,
बचपन की बड़ी सारी यादें याद हैं क्या बात है, बड़ी खट्टी मिट्ठी यादें हैं। और अमित गुरू सुभद्रा कुमारी तो लगता है जुबानी रटी है।
बचपन की यादें बडी सुहानी.
अमित ये कविता मुझे भी बहुत प्रिय है
बहुत खूब, आपको अपना बचपन याद है, आपका ये लेख पढ कर मुझे भी अपना बचपन कुछ कुछ याद आने लगा।
बचपन की बातें पढ़ कर ये गीत याद आ गया
बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के…
बेहद सरसता के साथ यादें ताजा की हैं आपने अपने बचपन की !
आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद - उत्साह्वर्धन के लिये । बचपन के किस्से हमेशा से ही मज़ेदार होते आयें हैं । इतनी मूर्खतायें भी की हैं, कि कोई हिसाब ही न होगा । हाँ, पर उन सब से कुछ न कुछ सीख ज़रूर ली ।
दूसरे अंक के साथ शीघ्र ही लौटूँगी ।
चार डब्बों वाला स्टील का टिफ़िन !
अईयो !
आशीष भाई चार डब्बों वाला टिफ़िन चार तरह की चीज़ों के लिये, खाने की मात्रा एक बच्चे के लायक ही होती थी।
निधि जी,
आपने हमें भी ” वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी” याद दिला दिया।
धन्यवाद
बहुत सुंदर निधि जी, आपने कितनों को ही बचपन की यादें याद दिला दीं।
अमित, बहुत प्यारी कवितायें उद्धृत करने के लिये धन्यवाद, कहीं पढीं थीं बचपन में, खो गईं थीं।