‘डा विन्ची कोड’
कल चर्चित पुस्तक 'डा विन्ची कोड' पढी़. यूँ तो इस किताब को आये हुए लगभग ३ साल होने को आये हैं पर चुँकि मुझे उपन्यास पढ़ने का कोई अधिक शौक़ नहीं है इसलिये मैने इसके 'बेस्ट् सेलर' होने के बावजूद इसे पढ़ने की कोई चेष्टा नहीं की थी. कुछ दिनों पहले जैसे ही 'सोनी पिक्चर्स' की इस उपन्यास पर आधरित तथा रॉन हावर्ड निर्देशित, समान नाम वाली पिक्चर के रिलीज़ होने की घोषणा हुई, यह् पुस्तक अचानक फिर से चरचा मे आ गयी. और जितनी चर्चा मे यह् आजकल रही उतनी शायद तब भी नहीं रही थी जब इसे प्रकाशित किया गया था. मेरे जिग्यासु मन मे भी उत्सुकता जाग उठी कि इतना शोर शराबा आखिर है किस बात पर ! अब कौतूहल बड़ी बुरी चीज़ होति है, जब तक शान्त न हो मन उसी कए इर्द गिर्द भटकता रहता है. तो परिणाम ये, की इन्टरनेट से पुस्तक प्राप्त कर के, सारी रात कुर्सी पर बैठे - बैठे बाँची गयी. गर्दन, कंधे, कमर और आँखों ने 'डैन ब्राउन' को जी भर के कोसा. पर दिमाग को बड़ा सुख मिला. कौतूहल शान्त हुआ.
अब कहने को ये उपन्यास 'काल्पनिक' है, किन्तु अधिकान्श् हिस्सा तथ्यों पर् अधारित है. जिन अभ्यासों (Cult and other secret rituals), धार्मिक् सन्स्थानो, दस्तावेज़ों, कला पर आधरित तथ्यों और Architecture का लेखक ने ज़िक्र किया है वह सब वास्तविक है. यानी सिर्फ़ पात्र काल्पनिक हैं. अब प्रश्न यह उठता है कि क्या यह् पुस्तक सच मे एक संप्रदाय के लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती है? मेरे विचार से यह् एक व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है . यह पुस्तक प्रभु यीशु के जीवन को एक दूसरे रूप मे प्रस्तुत करती है. इसके अनुसार प्रभु यीशु ने साधारण मानवों की तरह् विवाह् किया था तथा उनकी सन्तान भी थी, एक पुत्री. और उसी से उन्का वंश आगे चलता रहा. इसके सबूत 'डा विन्ची' की रहस्यमयी पेन्टिंग्स मे मिलते हैं. लेखक एक अच्छे इतिहासकार हैं और यह उनके लेखन मे साफ़ झलका. पुस्तक पढ़ने के बाद मैने, इन्टरनेट पर खोजा तो पाया की ऐसी किवदन्तियाँ इस पुस्तक के प्रकाशन से बहुत पहले से प्रचलित हैं. यह पुस्तक सिर्फ़ उन्हे प्रकाश मे ले आयी है. पर मुझे समझ ये नहीं आया कि माना कि अगर इस पुस्तक के अनुसार देखा जाये तो बाइबिल का आधार थोडा़ कमज़ोर पड़ जाता है पर यह पुस्तक कहीं भी प्रभु यीशु कि छवि को धूमिल नहीं करती. क्या विवाह करने से और परिवार के होने से उनकी महानता मे कहीं कोई कमी आ जाती है? यदि नहीं तो फिर इतना हो हल्ला क्युं?
अभी कुछ दिन पहले मैने यह् भी सुना कि विभीषण, श्री राम के भाई हैं. विस्तार ये कि रावण को पता था कि राजा दशरथ कि प्रथम सन्तान उसके विनाश का कारण बनेगी. उसने हल यह निकाला कि कौशल्या और राजा दशरथ क विवाह् हि ना होने दिया जाये. इसलिये उसने राजकुमारी कौशल्या का अपहरण किया और उन्हे धरती मे गाड़ दिया. इधर कौशल्या के गायब हो जाने के बाद उनके पिता ने भारी मन से अपनी दूसरी कन्या सुमित्रा का विवाह राजा से कर दिया. इसी बीच ऋषि वाल्मिकी उस स्थान से गुज़रे जहाँ कौशल्या जी गड़ी हुई थीं. ऋषि को मानव गन्ध आयी और उन्होने शीघ्र ही राजकुमारी को बाहर निकाल लिया. जब कौशल्या मिल गयीं तो उनका विवाह भी राजा दशरथ के साथ् सम्पन्न हुआ. रावण के इरादों पर पानी फिर गया. उसने अब राजा दशरथ की सन्तानोत्पादक शक्ति को निकाल, एक लोटे मे ला अपने घर मे छुपा दिया और घर मे कहा कि इसमे घातक विष है अतः कोई इसे न छुए. एक बार रावण की माता केकसी अपने पति से अत्यधिक रुष्ट हो गयीं और प्राण तजने का विचार बना बैठीं. उन्होने सोचा लाओ ये घातक विष ही पी लूं और उन्होने ऐसा ही किया. और यह विभीषण कि उत्पत्ति का कारण बना. ये बात मुझे बडी़ विचित्र लगी. पहले कभी सुनी भी नहीं थी. पर इस बात ने कहीं भी मेरी धार्मिक भावना को कोई चोट नहीं पहुँचाई. मैने बहुत ढूँढने की कोशिश करी पर इस संबन्ध मे कोई जानकारी नहीं मिली. यह् सब लिखने का पर्याय यह कि हर धर्म को ले कर तरह तरह कि किव्दन्तियाँ प्रचिलित होती हैं. कुछ के वैग्यनिक आधार हैं तो कुछ मनगढ़ंत् प्रतीत होती हैं. जब तक ऐसी कोई किवदन्ती धर्म का अपमान न कर रही हो तब तक इस फ़िज़ूल के दिखावे भरे हंगामे का क्या अर्थ है???
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हिन्दी ब्लॉग जगत् में आपका हार्दिक स्वागत् है। उम्मीद है आप ऐसे ही निरन्तर हिन्दी में लेखन करते रहेंगे। कया नए हिन्दी चिट्ठाकारों के लिए स्वागत् पष्ठ ज़रूर देखें। वैसे, आपने अपने इस ब्लॉग पर परिचय तो कहीं दिया ही नहीं।
Pratik, your comment is not legible. Some problem with the font it seems.
Regards,
Nidhi
नीधी जी, "दा विंची कोड" एक काल्पनिक उपन्यास है, यह हो सकता है कि लेखक ने "एतिहासिक तथ्यो" का उपयोग(दूरूपयोग
किया हो । आजकल किसी भी सफल लेखन या फिल्म की सफलता की गारंटी उसका विवादित होना है। दा विची कोड ऐसा ही उपन्यास है । रही बात सीता कसल्या की कहानी की ऐसे कई मिथक प्रचलित है । प्राचिन समय मे अधिकांश ग्रन्थ संस्कत मे थे, बाद मे भाषा जनसामान्य लोगो की भाषा नही रही। हर कोई संस्कत का पंडित नही था। लोक एक दूसरे को कथा सुनाया करते थे। अब जिसने जैसा चाहा वैसा बदलाव कर अगली पिढी को सुना दिया, कुछ अपनी तरफ से जोड दिया। र अनेको क्षेपक, मिथक, किंवदंतिया मूल कहानी मे जुडती गयी। यह एक सामान्य प्रक्रिया है ।
swagat hai nidhi ji hindi chiththakari ke jagat me apakaa, chuki apa ka blog font me gadabadi ki vajah se apadha nahi ja raha hai so is ke liye roman me likhana pad raha hai aur me apaki madad to nahi kar pa raha hu parantu is ko padhane ke liye filahal aap
http://lang.ojnk.net/hindi/unifix.html
ki madad le sakate hai aap tippaniyo ya chiththe ko copy kar ukt page par pest karem fir aap asani se padh payengi ki yaha kya likha hai
आशीष जी, धन्यवाद आपकी टिप्पणी का. किन्तु एक बात, मेरे कहने का पर्याय ये था कि किवदन्तियां बहुत सी प्रचलित होती हैं, पर यदि आपका विश्वास द्रढ़ है तो उनसे आपके विश्वास को ठेस नहीँ पँहुचनी चाहिये. और रही बात इस् उपन्यास की, मुझे नहीं पता कि क्या सत्य है पर Mormon नामक एक चर्च ऐसा भी है जो इस किताब की theory को सही ठहराता है. और यह चर्च किताब के लिखे जाने से बहुत पहले से स्थापित है.
सागर जी, धन्यावाद, आपके सुझाव से मैं ये प्रतिक्रियायें पढ़ सकी व इन्हे ठीक प्रकार से एडिट कर सकी.
मै अपनी टिप्पणी मे एक और चिज जोडना चाहुंगा :
इतिहास हमेशा विजेता द्वारा लिखा जाता है।
विजेता सही रहा हो या गलत, इतिहासकार हमेशा उसे महान बनाकर लिखता है।
दा विंची कोड मे भी किसी जगह यह बात किसी पात्र ने कही है, और कमलेश्वर जी ने ‘कितने पाकिस्तान’ मे भी यही बात दोहराई है ।
इतिहास या किसी भी कहानी को आंख मुंदकर सच मानने की बजाये तार्किक बुद्धी से एक बार विचार जरूर करना चाहिये !
लेकिन ये सुनता कौन है !