बचपन - भाग २ , सबक सँख्या ३

पिछले अंक से आगे…

अपनी पिछली पोस्ट पढ़ कर लगा कि सात सालों के अनुभव को दो किस्सों मे समेट देना न्यायसंगत नहीं है । इसलिये वापस जा रही हूँ नाना - नानी के पास ।

अब जब पलट के देखती हूँ तो लगता है कि बड़ा मीठा युग देखा मैने भी । पता नहीं जगह छोटी थी या सच मे तब ज़माना इतना पुराना था । मेरा मतलब ???? अभी पता लगेगा भाई…रुकिये तो । मैनें स्कूल मे दाखिला लिया सन् १९८३ में । तब ये प्लेग्रुप जैसा झमेला तो होता नहीं था । और स्कूल था हिन्दी माध्यम  सो नर्सरी, फिर के.जी., फिर सीधे कक्षा १ । नर्सरी मे, ऐलुमिनियम की छोटी से बकसिया मे एक तख्ती, सरकन्डे की कलम और खड़िया का घोल लिये पहुँच जाते थे स्कूल । अरे ! सच मानिये (ये इसलिये कहा कि मुझे कोई अन्दाज़ा नहीं कि उस समय आप सब में से जिन लोगों ने पढना शुरू किया, क्या उन्हे भी लिखने के लिये पेन्सिल न मिली होगी ) । और कभी किसी विद्यार्थी के हाथ ब्लेड लग जाया करता तो मजे ही आ जाते । लिखते कम, कलम की छिलाई ज़्यादा होती । जब मौका हाथ लगता स्कूल के पीछे आम के पेड़ से बौर या छोटी अमिया तोड़ने की उठा-पटक में लगे रहते ।

 घर आ कर शाम को जब खेलने जाने का समय होता, तो पूरी मन्डली परिसर मे बने नाना जी के दफ़्तर के तालाब के किनारे इकट्ठी होती । कुछ नाम याद हैं अभी भी - सोनी, गुड़िया, धन्नो (असली नाम तो याद नहीं पर घर का नाम यही था), नवीन, माला, मिनी, गुड्डन दीदी, विवेक भैया , सीता, रीता और गीता  । आखिर के तीन नामों को पढ़ के आपने ज़रूर सोचा होगा कि ये क्या बहनें थी ? हाँ जी , यह बहनें थी । हर बहन माता - पिता की लड़के की बुझी हुई आस । मुझे याद नहीं कि  उनके कोई भाई हुआ कि नहीं  । अच्छा हो कि हो ही गया हो नहीं तो हुई होंगी नीता, मीता…। तालाब के किनारे बैठ बादलों के हनुमान जी, रथ, धनुष, फूल न जाने क्या क्या बनाते । अमलताश के फूलों के बीच की डन्डी से राजाओं का युद्ध होता ।  कच्चे हरे फालसे बटोरते …याद नहीं कि खाते भी थे क्या ।

मनोरन्जन के साधन भी हम बच्चों के जैसे मासूम थे । टी.वी., ट्राँज़िस्टर इतने प्रचिलित जो नहीं हुए थे ।  नानी नत्थू बाबा की छोटी लड़की को बुलवा लेतीं । नाम था लल्ला, मेरी हमउम्र या शायद एकाध साल बड़ी रही होगी । फिर लल्ला देवी देशज गानों पर ठुमक ठुमक के नाचती थीं । कुछ गानों की पहली लाइनें याद हैं — बन्सी वाले ने टेर लयी, अकेली राधा पनिया भरन को गयी, इक्के वाले ने अठन्नी जादा ले लयी लाँगुरिया, पढ़ी लिखी अंग्रेज़ी मेरी कदर बिगड़ गयी मम्मी जी । मेरे लिये तो वो जीवन की पहली सरोज खान से कम नहीं है । कैसेट तो जीवन मे बड़ी बाद मे आयी । पहले तो नानी गाती और हम इन्ही गानों पर लल्ला देवी की कॉपी करते । सिनेमा देखना हो तो या तो वी.सी.आर. और एक टी.वी. लगा कर बनाये एक कमरे के हॉल मे देखो या फिर पास के बडे़ शहर जाओ । और तो कुछ याद नहीं सिनेमा से जुडा़, बस कुत्ते वाली पिक्चर याद है । बडे़ चाव से देखी थी मैने । लोग जैकी श्रॉफ़ को छोड़ के कुत्ता देखने जाते थे । बडा़ चर्चा हुआ था कुत्ते के अभिनय का । अरे, 'तेरी मेहरबानियाँ' याद है ना ??? फिर एक दिन घर मे टी.वी. भी आ गया । दादा दादी की कहानियाँ, विक्रम वेताल का समय ना हो तो दूरदर्शन पर बारिश देख के खुश हो जाते। नहीं समझे ? अरे जब रिले ना आये तब की स्क्रीन देखी है ना….वही ।

रात में जब सोने जाते तो नानी बड़े प्यार से थपकती हुई गातीं 'तुझे सूरज कहूँ या चन्दा, तुझे फूल कहूँ या तारा….' । सच मानिये ये गीत आज भी गूँजता है कानों में । क्यूँ, इसका कारण फिर कभी बताउँगी । ख़ैर, समय बीत रहा था और माँ के घराने की ओर से मिलने वाले गुणों की नीँव पड़ चुकी थी ।  जाने का वक्त पास था और मैं यह समझ ही नहीं पा रही थी कि मम्मी और नानी दोनो एक साथ क्युँ नहीं मिल सकते मुझे । इस दुविधा का तो कोई हल था नहीं । तो अन्तत: जैसे मैने बताया था - मैं आगरा आ गयी मम्मी के पास ।

यहाँ का माहौल नानी के घर से बिल्कुल अलग । किताबों मे किसी को रुचि न थी । घर की स्त्रियाँ घरेलू कामों मे लगी रहतीं और पुरुष काम पर चले जाते । हाँ एक चीज़ यत्र तत्र बिखरी पडी़ दिखती थी - इलेक्टरॉनिक्स के सामान । बड़ा अजीब लगा शुरू में । मम्मी पूरे घर का काम करने मे लगी रह्तीं तो लगता कि क्या यहाँ नत्थू बाबा नहीं होते ! थोडा़ वक्त लगा पर घर मे छोटे भाई बहनों के साथ मैं जल्दी ही रम गयी । शहर के एक मिशनरी स्कूल मे दाखिला करा दिया गया । पर यहाँ न वैसे दोस्त मिले ना वातावरण । मैं कब अन्तर्मुखी होती गयी पता ही न चला । अपनी किताबों के पीछे ही गोल रहती हमेशा । हाँ कभी कभी उल्टी सीधी कोशिश करती कि घर मे साख जमा सकूँ । बचपन से एकाधिपत्य रहा था नाना के घर । यहाँ — पटर पटर बोलने वाली छोटी बहन के चलते मेरा सिक्का जमने का नाम ही न लेता था । इससे जुडा़ एक किस्सा कहती हूँ । उस समय शायद मैगी कम्पनी नयी नयी आयी होगी । सन् ८६-८७ की बात है । तो कम्पनी ने अपने प्रचार के तहत स्कूलों में मैगी बाँटे । किया ये गया कि हर स्कूल में जा सभी बच्चों को एक-एक मैगी का पैकेट दिया गया । एक छोटी सी सामन्य ज्ञान प्रतियोगिता भी रखी गयी । जिस बच्चे ने सही जवाब दिया उसे तीन पैकेट मिले । अब इस बात को घर आ कर, हेर-फेर कर मैने कुछ यूँ सुनाया - "मम्मी आज स्कूल मे मैगी वाले आये थे । उन्होने सबसे जी.के. के सवाल किये, जिसने जवाब दिया उसे एक पैकेट मैगी मिला ।" एक सुना हुआ सवाल भी बता दिया। माँ निहाल हो गयीं । कैसी होनहार लड़की दी है भगवान ने । शाम को पिता जी जब दफ़्तर से लौटे तो वह भी बड़े खुश हुए । और हम तो प्लान की सफ़लता पर खुश थे ही । अगले दिन पिता जी के एक मित्र घर आये । पिता जी ने मेरे सामने उन्हे किस्सा बताया । सुन के वह बडी़ देर तक मुस्कुराते रहे । पिता जी के बचपन के मित्र थे । और हुआ यूँ था कि उनकी पत्नी भी एक स्कूल मे अध्यापिका थीं । और जैसे कि मैगी का यह अभियान सभी स्कूलों के लिये था, उन्हे इस प्रचार का पता था । दफ़्तर मे उन्होने इसका पिता जी से ऐसे ही ज़िक्र किया और पिता जी असलियत जान गये । शाम को जो मेरे सामने जो ये सब  बातें दुहरायी गयीं वह मुझे अपने किये  का बोध कराने कि लिये थीं । मम्मी बडी़ मायूस हुई । मुझे समझाया कि ऐसे झूठ नहीं बोलते । उनके सिखाने का असर था या उस समय हुई शर्मिन्दगी का, पता नहीं । पर ज़िन्दगी का तीसरा सबक ये लिया कि कभी शेखी़ न बघारो । और दूसरे के किये काम का श्रेय खुद लूटने की कोशिश बिल्कुल ही न करो ।

इस कड़ी के अगले अंक मे आपको अपने कुछ और अनुभवों और विज्ञान के प्रयोगों के बारे में बताऊँगी । घर मे बिजली का फ़्यूज़ कैसे उडा़यें, इस विषय पर भी आसान जानकारी दी जायेगी…..क्रमश:

Published in: on May 25, 2006 at 10:42 am Comments (9)

बचपन में जो सीखा…

यूँ तो मैं उन लोगों मे से हूँ जिनके लिये बीता हुआ समय हमेशा आज से बेहतर होता है, यानि जो आज है वह भी खू़बसूरत हो जायेगा…कल ।  कम से कम अब तक तो ऐसा ही लगता आया है । आगे की कौन जाने । इस बीते हुए कल से बहुत ही मधुर स्मृतियाँ जुडी़ हैं मेरी, लेकिन सबसे मधुर हैं यादें बचपन की । भोला बचपन , प्यारा बचपन और थोड़ा थोडा़ बुद्धू  बचपन ।

पिता जी दिल्ली मे कार्यरत थे जब मेरा जन्म हुआ । दिल्ली मे रहते कुछ एकाध साल ही हुए होंगे । दमे की बीमारी यूँ तो उन्हे बचपन से थी पर अब जाने दिल्ली की आबो-हवा उन्हे रास नहीं आयी या फिर पता नहीँ क्या हुआ, उनकी बीमारी ने अचानक ज़ोर पकड़ लिया । बाकी का परिवार आगरा मे था, इसलिये छुट्टी ले पिता जी आगरा आ गये । वापस तो जाना ही था, सो एक महीने के बाद वापस दिल्ली भी आ गये । ये सिलसिला जो शुरू हुआ तो थमने का नाम ही न लेता था । मैं तीन साल की होने को आयी तो माँ को पढाई की चिन्ता सताने लगी । पिता जी की तबियत की वजह से जब तब आगरा जाना पड़ता । ऐसे मे कहाँ के स्कूल मे डालेँ, माँ इसी पसोपेश मे रहती । अन्तत: उन्होने मुझे मेरे नाना - नानी के पास छोड़ देने का निर्णय लिया । मुझे याद नहीं कि उस उम्र मे माँ से दूर होने पर मैने कैसे प्रतिक्रिया की थी । और जब से होश सम्भाला, नानी की ममतामयी गोद ही याद आती है ।

कहते हैं कि जैसे इन्सान को सूद, मूल से प्यारा होता है, वैसे ही नाती-पोतों को लोग अपने बच्चों से भी ज़्यादा प्यार करते हैं । नाना - नानी ने बड़े लाड़ से पाला । बचपन मे खुद को किसी राजकुमारी से कम नहीं समझा मैने । नाना जी उस समय वर्ग - १ के अफ़सर थे । बड़ा सा सरकारी बँगला जिसके चारों ओर या कहें गोलाई मे दूर तक फ़ैले खेत । मुझे नहीँ याद कि वो खेत किसके थे पर थे बँगले के ही परिसर मे, एक नीली जीप थी, एक नत्थू बाबा थे, एक काशीराम था । उस पर साहब की नातिन समझो मुहल्ले कि नातिन । इतना सब होने पर भी नानी ने अनुशासन  में ढील कभी न होने दी । सुबह सुबह तो भाई स्कूल का समय होता था । दोपहर मे एक अर्दली खाना ले कर (चार डब्बों वाला स्टील का टिफ़िन) स्कूल आता था…हाथ से खिला के जाता था । क्या ही दिन थे । आज भी याद है कि स्कूल मे आगे मिट्टी के ढेर में, मैं और मेरे साथी तारे ढूँढा करते थे । और ये तारे गिरा करते थे पुष्पा मैडम की साड़ी से । एक अबोध होड़ लगी रहती थी इसी बात पर ।

कैसा होता है ना….कितनी छोटी सी बात भी याद रह जाती है कभी । तब के ज़माने मे गणतन्त्र दिवस और स्वाधीनता दिवस तो त्योहार होते थे । उन दिनों उपस्थिति तो अनिवार्य होती पर युनिफ़ार्म की छुट्टी होती । गुलाबी लहँगा पहन छमर छमर पहुँच जाते थे स्कूल । लौटते में रास्ते में खडे़ ताँगो में जुते घोड़ों के सर पर लगी कलँगी से चिड़ियों के रंग बिरंगे पँख नोच कर कॉपी-किताबों में छुपाते । क्यूँ ?? अरे विद्या होती थी ना वो । अब घर आ के क्या करें । भाई-बहन हों तो खेल-कूद के, लड़-झगड़ के वक्त निकाल लो । पर यहाँ नाना जी चले जाते थे दफ़्तर और नानी अचार, आम पापड़, लड्डू, मठरी और न जाने किस किस काम मे लगीँ रह्ती । गृहस्थी का मतलब मुझे क्या पता था । नाना जी ने बढ़िया हल निकाला । मुझे जोड़ दिया किताबों से । नाना जी खुद एक लेखक भी रहे हैं । स्वर्गीय श्री सम्पूर्णानन्द वर्मा जी के समय में, जो कि नाना जी के ताऊ जी थे, घर से दो किताबें निकलती थीं । शेर-बच्चा और तितली । नाना जी बनारस के पैतृक घर से वह किताबें ले आये और मेरी पढ़ने की आदत का जन्म हुआ । फ़िर लोटपोट, चंपक, टिंकल….और भी जाने क्या - क्या । और ये आदत आज भी जस की तस है । और जब किताबों से फ़ुर्सत मिलती तो नाना जी के साथ दूसरा खेल - नाना एक पन्क्ति देते और अगली पन्क्ति मुझे बनानी होती । तो ऐसे आदत पड़ी लिखने की ।

किताबी कीड़ा होने की वजह से और अपने आसपास वातावरण मे भारी विविधता होने से जिज्ञासा और कौतूहल मेरे स्वभाव मे रच बस गया । कुछ भी काम हो, खुद कर के देखना है । इससे जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा याद आता है - एक मोटे चूहे ने घर मे भारी उपद्रव मचा रखा था । नानी की शिकायत पर नाना ने लगायी चूहेदानी और महाशय अगले ही दिन पकडे़ गये । नाना ने सोचा लाओ थोड़ी देर लॉन मे रखे देते हैं फिर फ़िकँवा देंगे जब नौकर आ जाये । मेरे मन मे तो औत्सुक्य की सीमा न थी । चूहेदानी मे मोटा चूहा । क्या ही मज़ा आयेगा देखने में । शायद ४-५ साल की रही हूँगी तब । नाना ने सख्त हिदायत दी कि चूहेदानी को हाथ न लगाऊँ । भैया, आ गये बाहर मूषक राजा के दर्शन को । देखा तो बेचारे की पूँछ चूहेदानी के दरवाज़े मे फ़ँसी हुई थी । और वह हरसम्भव कोशिश कर रहा था कि पूँछ निकल जाये । देख कर बाल-सुलभ मन को बड़ा कष्ट पहुँचा । हमने सोचा लाओ दरवाज़ा थोडा़ खोल दें, चूहा पूँछ अन्दर कर लेगा फिर उसको दर्द नहीँ होगा । और नाना को पता ही नही चलेगा, ये काम तो फ़ट से हो जायेगा । और फिर आव देखा न ताव, दरवाज़ा चट से खोल दिया । दुष्ट चूहा, पूँछ अन्दर करने की बजाय पूरा का पूरा बाहर आ गया और नाली के रस्ते रसोई मे ये जा कि वो जा ।  नाना जी से झूठ बोल कर जान बचायी । सबक मिला - नेकी का फल हमेशा मीठा नहीं होता ।

एक वाकया और स्कूल के दिनों का । कक्षा १ मे रही हूँगी तब । कान मे तिनका डालने की बुरी आदत लगी । एक दिन छुट्टी के समय कान मे तिनका डाले कक्षा के दरवाज़े पे खडी थी । छुट्टी की घन्टी बजी और जनता दौडती हुई निकली । एक लड़का था - प्रशान्त । नाम आज तक नहीं भूली । तो हुआ यूँ कि  बेचारे से गलती से धक्का लगा और तिनके ने कान मे कर दिया घाव | ख़ून बहने लगा । दर्द तो भूल गयी क्युँकि चिन्ता इस बात की थी कि बेटा गलती तुम्हारी थी तो अब डाँट भी तुम्हे ही पड़ने वाली है । मुझे लगा कि सहानुभूति कैसे बटोरूँ । तो किया क्या- मैडम, प्रशान्त हाथ मे लकडी़ ले कर भाग रहा था जो मेरे लग गयी । पता नहीँ अध्यापिकाओं ने इस बेकार बात पर कैसे विश्वास किया पर बेचारे की बड़ी डाँट पडी़ । उसकी एक ना सुनी गयी । भई खून मेरे निकला तो बात भी मेरी मानी गयी । उस समय तो बड़ी खुशी हुई कि झूठ चल गया । पर अगले दिन उस लड़के का सामना करने की हिम्मत नहीँ हुई । थी तो छोटी पर ये समझ थी कि मैने गलत किया । मन ही मन खराब सा लगता रहा । आखिर नानी को बता ही दिया कि मैने डर के मारे झूठ कहा था । नानी से उस दिन दूसरा मुख्य सबक मिला - अपनी गलती स्वीकार करने की हिम्मत रखो । कोशिश करो कि गलती हो ही ना, और अगर हो जाये तो उसे मानो । अपनी गलती से सीख लो और फिर वह गलती कभी मत दुहराओ । अपना दोष दूसरों पर मढ़ने से हममें सुधार की सम्भावनायें खत्म हो जाती हैं । नानी ने यह गूढ़ बात उस समय बडे़ सुलभ ढँग से कही जो मैने आज भी दामन मे बाँध रखी है । ऐसे हँसते-खेलते-सीखते समय कब उड़ गया पता ही न चला । तब तक इतनी समझ भी आ गयी थी कि मम्मी को कोई परेशानी है जो मुझे साथ नहीं ले जातीं । इसलिये मम्मी के पास जाने जैसी भी कोई ज़िद न करती थी ।

करीब सात साल का होने पर जब नानी को लगा कि पिता जी अब स्वस्थ है, साथ ही उनका आगरा स्थानान्तरण भी हो चुका है, तो उन्होने मुझे मम्मी-पापा को सौँपने का निर्णय किया ।  अब तक मन मे मम्मी के पास जाने कि चाह थी । सब दोस्त मम्मी-पापा के साथ रह्ते थे ना । पर जब जाने का समय आया तो नाना- नानी को ना छोड़ा जाय । पर आना तो था ही इसलिये रोती धोती , मम्मी-पापा और छोटी बहन के पास आ गयी ………………………क्रमश:

Published in: on May 24, 2006 at 10:22 pm Comments (11)

आरक्षण - divide and rule???

आज 'हिन्दुस्तान टाइम्स' के सम्पादकीय प्रष्ठ पर छपे एक लेख का छोटा सा अंश उध्र्त कर रही हूँ :-

"A hundred and fifty years ago, when the british government tried to give education to Shudras(OBCs) and Atishudras(SCs), there was violent opposition to that move. The british government was forced to withdraw its move to prvide education to the shudras even in elementary schools. Jyoti Rao Phule, after managing to provide education for himself, educated his wife Savitri Bai. When both of them started educating Shudras, Atishudras and women they faced violent opposition from the elite class. The phule family could not cope with the pressure against them and Jyoti Rao and Savitri were forced to leave their home. Jyoti Rao was forced to make his school his abode. Then Dhondi ba, Pune's most notorious criminal was hired to kill the Phule family. Dhondi ba himself was a Kumhar, a shudra from the potter class. Coming face to face with Dhondi Ba, Phule wanted to know why he was killing him. Dhondi Ba was aware that people who hired him were against Phule's mission to educate Shudras, Atishudras and Women. This awareness turned into realization and he fell at Phule's feet to ultimately become his student and a guard of the Phule Couple.

When at last the british government took small steps to extend elementary education to the children of untouchables, there was violence and protests. The Indian Education(Hunter) Commission of 1882 gives instances of such violence in Madras Presidency, the Central Provinces and the Bombay Presidency. The administration was in collusion with theh preparators of this violence as it was manned entirely by people from one of the few communities that had a monopoly over jobs and education. These elements did not want the so-called lower castes to get educated and break the monpoly. The manner in which reservations to OBCs in higher educational institutions of the central government is being opposed proves that even after 150 years, the mindset of Indian elite has not changed. They are not ready to accept any logic or see any reason in reservations. Simply put, they are suffering - whether they know or not - from mindset thaht 'Shudras' are not fit for higher education and that they should not be given opportunity"    

 इसे पढ़ने के बाद समझ नहीं आया कि इस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ. एक पल रोष का अनुभव हुआ पर उसका स्थान शीघ्र ही दया ने ले लिया. दया, लेखक की बुद्धि पर. मैं बता दूँ कि लेखक एक प्रतिष्ठित दल के 'अध्यक्ष' हैं तथा पूर्व केन्द्र मन्त्री भी रह चुके हैं. मैं स्वीकार करती हूँ कि पुराने समय मे निचली जाति तथा जनजातियों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यव्हार होता था. इसी के चलते देश ने एक हिन्सा का दौर देखा जैसा कि लेखक ने कहा. पर मैं माननीय लेखक जी से यह पूछना चाहूँगी कि क्या आज के समाज में उन्हे कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता. आज सभी जातियों को समान अधिकार प्राप्त हैं, चाहे शिक्षा हो या रोज़गार. बल्कि सत्य तो यह् है कि इन समुदायों को बेहतर अधिकार दिये गये हैं. अब चाहे वह शिक्षा शुल्क मे छूट हो, रोज़गार का अवसर हो या फिर कि कोई छात्रव्रत्ति हो. आज अल्प समुदाय के लोग वरिष्ठ पदों पर् हैं, शिक्षित हैं तथा आर्थिक रूप से भी कमज़ोर नहीं हैं. तब यह् आरक्षण क्युं ? य़दि इस आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति होती तब भी समझ आता कि जिन लोगों को शिक्षा के उतने अच्छे अवसर नहीं मिले जितने धनाढ्य वर्ग को मिलते हैं उन्हे प्राथमिकता दी जानी चहिये. मगर हमारे देश के नेता अपना वोट बैंक भरने और अपना उल्लू सीधा करने के लिये आज की युवा पीढी़ को जाति के आधार पर बान्ट रहे हैं, उनमें फूट डाल रहे हैं. योग्यता का तो जैसे कोई मूल्य रहा ही नहीं. जाति हर चीज़ का आधार है. नेता जी ने दुहाई दी कि १५० साल् पहले बडी़ हिन्सा हुई जब पिछ्ड़ी जातियों को ऊपर उठाने के प्रयास हुआ. और आज क्या हो रहा है यह उन्हे दिखाई नही देता. कल बात पिछ्ड़ी जातियों की थी, आज सामान्य वर्ग की है. मुद्दा वहीं का वहीं. पर नेता जी समझें क्युं, पहली बात यहां उनकी अपनी जाति कि चर्चा हो रही है और मुख्य बात यह कि उन्हे वोट वहीं से मिलने हैं. अपना घर भरो भैया देश की काहे सोचो. सब बातें सुन तो ऐसा प्रतीत होता है मानो सामन्य वर्ग के लोग तो विपन्न होते ही नहीं, उन्हे हर तरह् कि सुविधा है, और हर अल्प समुदाय का परिवार सामाज से तिरस्क्रत्, अपनी जिजीविषा के लिये जूझ रहा है.

सुनने मे आया कि मध्य प्रदेश मे एक पिछ्ड़ी जाति के छात्र को 'इंजीनियरिंग' मे दाखिला मिल गया. अब बूझिये कि प्रतियोगी परीक्षा मे कितने अंक मिले थे इस छात्र को — सिर्फ़ १. अब इसके चलते एक योग्य छात्र को दाखिला इसलिये नही. मिला क्युँकि वह् सामन्य वर्ग का छात्र था. और ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं. नेता जी ज़रा बतायें कि भेद भाव किसके साथ किया जा रहा है. अगर ये कहा जाये कि जाति कि जगह योग्यता सूचि को किसी सन्स्थान में दाखिले का अधार माना जाये तो यह एक वर्ग विशेष के साथ अन्याय हो गया?? इससे ये साबित हुआ कि सामान्य या कहें कि 'elite' वर्ग की मानसिकता सन्कीर्ण है ?? नेता जी की बात का अर्थ तो ये निकला कि वर्ग विशेष योग्यता सूचि के आधार पर दाखिला पाने योग्य नहीं है इसलिये एक वैकल्पिक रास्ता होना चहिये. मेरी या फिर आरक्षण का विरोध कर रहे लोगों का किसी जाति विशेष से कोई बैर नहीं है. बहुत से छात्र ऐसे हैं जो इन समुदायों से सम्बन्ध रखते हैं, किन्तु योग्यता सूचि मे अपनी मेहनत व लगन से स्थान पाते हैं. ऐसे छात्रों का स्वागत है. किन्तु सिर्फ़ जाति के आधार पर अयोग्य छात्रों का भी दाखिला क्या उचित है ?? आयोग्य छात्र यदि इस प्रकार मिली 'डिग्री' ले अगर उच्च पदों पर आसीन हो भी जायें तो क्या वह अपने पद के साथ न्याय कर पायेंगे ?? या फिर इन सब बातों से, देश की तरक्की से, नेता जी का लेना देना ही नहीं है. यदि ऐसे में योग्य छात्र कुंठित हो विदेश का रुख करते हैं तो यही नेता जी 'Brain Drain' को देश के तरक्की ना कर पाने का कारण बता देन्गे. क्या जतिवाद के दानव की जकड़ से भारत कभी आज़ाद नहीं होगा? हम कब सीखेंगे अपने अतीत की गलतियों से शिक्षा लेना ? कब समझेंगे कि भारत कि तरक्की एक वर्ग की नहीं, हर समुदाय की तरक्की मे है. मेरा मानना है कि गाँव गाँव स्कूल खुलने से, देश के प्रमुख सन्स्थानों मे सीटों के बढा़ये जाने से, आर्थिक रूप से विपन्न परिवारों (चाहे वह किसी भी जाति के हों) के सदस्यों को नि:शुल्क शिक्षा देने से शायद इस समस्या का एक हद तक निदान सम्भव हो. किन्तु आरक्षण इसका हल न था, न होगा. आज बात OBCs की है, कल मुस्लिम, ईसाई, पार्सी समुदाय या स्त्री वर्ग की होगी. फिर ? कहाँ तक आरक्षण करेंगे नेता जी???

Published in: on May 22, 2006 at 3:27 pm Comments (10)

‘डा विन्ची कोड’

कल चर्चित पुस्तक 'डा विन्ची कोड' पढी़. यूँ तो इस किताब को आये हुए लगभग ३ साल होने को आये हैं पर चुँकि मुझे उपन्यास पढ़ने का कोई अधिक शौक़ नहीं है इसलिये मैने इसके 'बेस्ट् सेलर' होने के बावजूद इसे पढ़ने की कोई चेष्टा नहीं की थी.  कुछ दिनों पहले जैसे ही 'सोनी पिक्चर्स' की इस उपन्यास पर आधरित तथा रॉन हावर्ड निर्देशित, समान नाम वाली पिक्चर के रिलीज़ होने की घोषणा हुई,  यह् पुस्तक अचानक फिर से चरचा मे आ गयी. और जितनी चर्चा मे यह् आजकल रही उतनी शायद तब भी नहीं रही थी जब इसे प्रकाशित किया गया था. मेरे जिग्यासु मन मे भी उत्सुकता जाग उठी कि  इतना शोर शराबा आखिर है किस बात पर ! अब कौतूहल बड़ी बुरी चीज़ होति है, जब तक शान्त न हो मन उसी कए इर्द गिर्द भटकता रहता है. तो परिणाम ये, की इन्टरनेट से पुस्तक प्राप्त कर के, सारी रात कुर्सी पर बैठे - बैठे  बाँची गयी. गर्दन, कंधे, कमर और आँखों ने 'डैन ब्राउन' को जी भर के कोसा. पर दिमाग को बड़ा सुख मिला. कौतूहल शान्त हुआ.      

   अब कहने को ये उपन्यास 'काल्पनिक' है, किन्तु अधिकान्श् हिस्सा तथ्यों पर् अधारित है. जिन अभ्यासों (Cult and other secret rituals), धार्मिक् सन्स्थानो, दस्तावेज़ों, कला पर आधरित तथ्यों और Architecture का लेखक ने ज़िक्र किया है वह सब वास्तविक है. यानी सिर्फ़ पात्र काल्पनिक हैं. अब प्रश्न यह उठता है कि क्या यह् पुस्तक सच मे एक संप्रदाय के लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती है? मेरे विचार से यह् एक व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है . यह पुस्तक प्रभु यीशु के जीवन को एक दूसरे रूप मे प्रस्तुत करती है. इसके अनुसार प्रभु यीशु ने साधारण  मानवों की तरह् विवाह् किया था तथा उनकी सन्तान भी थी, एक पुत्री. और उसी से उन्का वंश आगे चलता रहा. इसके सबूत 'डा विन्ची' की रहस्यमयी पेन्टिंग्स मे मिलते हैं. लेखक एक अच्छे इतिहासकार हैं और यह उनके लेखन मे साफ़ झलका. पुस्तक पढ़ने के बाद मैने, इन्टरनेट पर खोजा तो पाया की ऐसी किवदन्तियाँ इस पुस्तक के प्रकाशन से बहुत पहले से प्रचलित हैं. यह पुस्तक सिर्फ़ उन्हे प्रकाश मे ले आयी है. पर मुझे समझ ये नहीं आया कि माना कि अगर इस पुस्तक के अनुसार देखा जाये तो बाइबिल का आधार थोडा़ कमज़ोर पड़  जाता है पर यह पुस्तक कहीं भी प्रभु यीशु कि छवि को धूमिल नहीं करती. क्या विवाह करने से और परिवार के होने से उनकी महानता मे कहीं कोई कमी आ जाती है? यदि नहीं तो फिर इतना हो हल्ला क्युं?       

अभी कुछ दिन पहले मैने यह् भी सुना कि विभीषण, श्री राम के भाई हैं. विस्तार ये कि रावण को पता था कि राजा दशरथ कि प्रथम सन्तान उसके विनाश का कारण बनेगी. उसने हल यह निकाला कि कौशल्या और राजा दशरथ क विवाह् हि ना होने दिया जाये. इसलिये उसने राजकुमारी कौशल्या का अपहरण किया और उन्हे धरती मे गाड़ दिया. इधर कौशल्या के गायब हो जाने के बाद उनके पिता ने भारी मन से अपनी दूसरी कन्या सुमित्रा का विवाह राजा से कर दिया. इसी बीच ऋषि वाल्मिकी उस स्थान से गुज़रे जहाँ कौशल्या जी गड़ी हुई थीं. ऋषि को मानव गन्ध आयी और उन्होने शीघ्र ही राजकुमारी को बाहर निकाल लिया. जब कौशल्या मिल गयीं तो उनका विवाह भी राजा दशरथ के साथ् सम्पन्न हुआ. रावण के इरादों पर पानी फिर गया. उसने अब राजा दशरथ की सन्तानोत्पादक शक्ति को निकाल, एक लोटे मे ला अपने घर मे छुपा दिया और घर मे कहा कि इसमे घातक विष है अतः कोई इसे न छुए. एक बार रावण की माता केकसी अपने पति से अत्यधिक रुष्ट हो गयीं और प्राण तजने का विचार बना बैठीं. उन्होने सोचा लाओ ये घातक विष ही पी लूं और उन्होने ऐसा ही किया. और यह विभीषण कि उत्पत्ति का कारण बना. ये बात मुझे बडी़ विचित्र लगी. पहले कभी सुनी भी नहीं थी. पर इस बात ने कहीं भी मेरी धार्मिक भावना को कोई चोट नहीं पहुँचाई. मैने बहुत ढूँढने की कोशिश करी पर इस संबन्ध मे कोई जानकारी नहीं मिली. यह् सब लिखने का पर्याय यह कि हर धर्म को ले कर तरह तरह कि किव्दन्तियाँ प्रचिलित होती हैं. कुछ के वैग्यनिक आधार हैं तो कुछ मनगढ़ंत् प्रतीत होती हैं. जब तक ऐसी कोई किवदन्ती धर्म का अपमान न कर रही हो तब तक इस फ़िज़ूल  के दिखावे भरे हंगामे का क्या अर्थ है???

Published in: on May 19, 2006 at 3:03 pm Comments (6)

शुभारंभ

अन्तत: हमने भी अपने विचारों को शाब्दिक आवरण पहना कर प्रस्तुत करने का निर्णय ले ही लिया । कल ही विदित् हुअ कि हिन्दी मे भी ब्लॉग लिखा जा सकता है । ऐसा नहीं कि  अंग्रेज़ी से कोई ग़ुरेज़ हो, किन्तु हिन्दी मे जो मिठास है या ये कहें कि कठिन से कठिन भावों की अभिव्यक्ति की जो सरलता है वह् अंग्रेज़ी मे नहीं मिलती | हो सकता है कि भारतीय होना और हिन्दी पर अंग्रेज़ी की अपेक्षा बेह्तर अधिकार होना भी इसका एक कारण हो । अमित कुलश्रेष्ठ जी को धन्यवाद - उन्होने हमे समझाया कि हिन्दी मे कैसे लिखा जाये। और परेश भैया को धन्यवाद कि उन्होने हमारा परिचय अमित जी के हिन्दी ब्लॉग से कराया जिसे देख हमे भी हिन्दी मे ब्लॉग शुरू करने की हुड़क लगी ।

Published in: on May 18, 2006 at 11:21 am Comments (8)