बचपन - भाग २ , सबक सँख्या ३
पिछले अंक से आगे…
अपनी पिछली पोस्ट पढ़ कर लगा कि सात सालों के अनुभव को दो किस्सों मे समेट देना न्यायसंगत नहीं है । इसलिये वापस जा रही हूँ नाना - नानी के पास ।
अब जब पलट के देखती हूँ तो लगता है कि बड़ा मीठा युग देखा मैने भी । पता नहीं जगह छोटी थी या सच मे तब ज़माना इतना पुराना था । मेरा मतलब ???? अभी पता लगेगा भाई…रुकिये तो । मैनें स्कूल मे दाखिला लिया सन् १९८३ में । तब ये प्लेग्रुप जैसा झमेला तो होता नहीं था । और स्कूल था हिन्दी माध्यम सो नर्सरी, फिर के.जी., फिर सीधे कक्षा १ । नर्सरी मे, ऐलुमिनियम की छोटी से बकसिया मे एक तख्ती, सरकन्डे की कलम और खड़िया का घोल लिये पहुँच जाते थे स्कूल । अरे ! सच मानिये (ये इसलिये कहा कि मुझे कोई अन्दाज़ा नहीं कि उस समय आप सब में से जिन लोगों ने पढना शुरू किया, क्या उन्हे भी लिखने के लिये पेन्सिल न मिली होगी ) । और कभी किसी विद्यार्थी के हाथ ब्लेड लग जाया करता तो मजे ही आ जाते । लिखते कम, कलम की छिलाई ज़्यादा होती । जब मौका हाथ लगता स्कूल के पीछे आम के पेड़ से बौर या छोटी अमिया तोड़ने की उठा-पटक में लगे रहते ।
घर आ कर शाम को जब खेलने जाने का समय होता, तो पूरी मन्डली परिसर मे बने नाना जी के दफ़्तर के तालाब के किनारे इकट्ठी होती । कुछ नाम याद हैं अभी भी - सोनी, गुड़िया, धन्नो (असली नाम तो याद नहीं पर घर का नाम यही था), नवीन, माला, मिनी, गुड्डन दीदी, विवेक भैया , सीता, रीता और गीता । आखिर के तीन नामों को पढ़ के आपने ज़रूर सोचा होगा कि ये क्या बहनें थी ? हाँ जी , यह बहनें थी । हर बहन माता - पिता की लड़के की बुझी हुई आस । मुझे याद नहीं कि उनके कोई भाई हुआ कि नहीं । अच्छा हो कि हो ही गया हो नहीं तो हुई होंगी नीता, मीता…। तालाब के किनारे बैठ बादलों के हनुमान जी, रथ, धनुष, फूल न जाने क्या क्या बनाते । अमलताश के फूलों के बीच की डन्डी से राजाओं का युद्ध होता । कच्चे हरे फालसे बटोरते …याद नहीं कि खाते भी थे क्या ।
मनोरन्जन के साधन भी हम बच्चों के जैसे मासूम थे । टी.वी., ट्राँज़िस्टर इतने प्रचिलित जो नहीं हुए थे । नानी नत्थू बाबा की छोटी लड़की को बुलवा लेतीं । नाम था लल्ला, मेरी हमउम्र या शायद एकाध साल बड़ी रही होगी । फिर लल्ला देवी देशज गानों पर ठुमक ठुमक के नाचती थीं । कुछ गानों की पहली लाइनें याद हैं — बन्सी वाले ने टेर लयी, अकेली राधा पनिया भरन को गयी, इक्के वाले ने अठन्नी जादा ले लयी लाँगुरिया, पढ़ी लिखी अंग्रेज़ी मेरी कदर बिगड़ गयी मम्मी जी । मेरे लिये तो वो जीवन की पहली सरोज खान से कम नहीं है । कैसेट तो जीवन मे बड़ी बाद मे आयी । पहले तो नानी गाती और हम इन्ही गानों पर लल्ला देवी की कॉपी करते । सिनेमा देखना हो तो या तो वी.सी.आर. और एक टी.वी. लगा कर बनाये एक कमरे के हॉल मे देखो या फिर पास के बडे़ शहर जाओ । और तो कुछ याद नहीं सिनेमा से जुडा़, बस कुत्ते वाली पिक्चर याद है । बडे़ चाव से देखी थी मैने । लोग जैकी श्रॉफ़ को छोड़ के कुत्ता देखने जाते थे । बडा़ चर्चा हुआ था कुत्ते के अभिनय का । अरे, 'तेरी मेहरबानियाँ' याद है ना ??? फिर एक दिन घर मे टी.वी. भी आ गया । दादा दादी की कहानियाँ, विक्रम वेताल का समय ना हो तो दूरदर्शन पर बारिश देख के खुश हो जाते। नहीं समझे ? अरे जब रिले ना आये तब की स्क्रीन देखी है ना….वही ।
रात में जब सोने जाते तो नानी बड़े प्यार से थपकती हुई गातीं 'तुझे सूरज कहूँ या चन्दा, तुझे फूल कहूँ या तारा….' । सच मानिये ये गीत आज भी गूँजता है कानों में । क्यूँ, इसका कारण फिर कभी बताउँगी । ख़ैर, समय बीत रहा था और माँ के घराने की ओर से मिलने वाले गुणों की नीँव पड़ चुकी थी । जाने का वक्त पास था और मैं यह समझ ही नहीं पा रही थी कि मम्मी और नानी दोनो एक साथ क्युँ नहीं मिल सकते मुझे । इस दुविधा का तो कोई हल था नहीं । तो अन्तत: जैसे मैने बताया था - मैं आगरा आ गयी मम्मी के पास ।
यहाँ का माहौल नानी के घर से बिल्कुल अलग । किताबों मे किसी को रुचि न थी । घर की स्त्रियाँ घरेलू कामों मे लगी रहतीं और पुरुष काम पर चले जाते । हाँ एक चीज़ यत्र तत्र बिखरी पडी़ दिखती थी - इलेक्टरॉनिक्स के सामान । बड़ा अजीब लगा शुरू में । मम्मी पूरे घर का काम करने मे लगी रह्तीं तो लगता कि क्या यहाँ नत्थू बाबा नहीं होते ! थोडा़ वक्त लगा पर घर मे छोटे भाई बहनों के साथ मैं जल्दी ही रम गयी । शहर के एक मिशनरी स्कूल मे दाखिला करा दिया गया । पर यहाँ न वैसे दोस्त मिले ना वातावरण । मैं कब अन्तर्मुखी होती गयी पता ही न चला । अपनी किताबों के पीछे ही गोल रहती हमेशा । हाँ कभी कभी उल्टी सीधी कोशिश करती कि घर मे साख जमा सकूँ । बचपन से एकाधिपत्य रहा था नाना के घर । यहाँ — पटर पटर बोलने वाली छोटी बहन के चलते मेरा सिक्का जमने का नाम ही न लेता था । इससे जुडा़ एक किस्सा कहती हूँ । उस समय शायद मैगी कम्पनी नयी नयी आयी होगी । सन् ८६-८७ की बात है । तो कम्पनी ने अपने प्रचार के तहत स्कूलों में मैगी बाँटे । किया ये गया कि हर स्कूल में जा सभी बच्चों को एक-एक मैगी का पैकेट दिया गया । एक छोटी सी सामन्य ज्ञान प्रतियोगिता भी रखी गयी । जिस बच्चे ने सही जवाब दिया उसे तीन पैकेट मिले । अब इस बात को घर आ कर, हेर-फेर कर मैने कुछ यूँ सुनाया - "मम्मी आज स्कूल मे मैगी वाले आये थे । उन्होने सबसे जी.के. के सवाल किये, जिसने जवाब दिया उसे एक पैकेट मैगी मिला ।" एक सुना हुआ सवाल भी बता दिया। माँ निहाल हो गयीं । कैसी होनहार लड़की दी है भगवान ने । शाम को पिता जी जब दफ़्तर से लौटे तो वह भी बड़े खुश हुए । और हम तो प्लान की सफ़लता पर खुश थे ही । अगले दिन पिता जी के एक मित्र घर आये । पिता जी ने मेरे सामने उन्हे किस्सा बताया । सुन के वह बडी़ देर तक मुस्कुराते रहे । पिता जी के बचपन के मित्र थे । और हुआ यूँ था कि उनकी पत्नी भी एक स्कूल मे अध्यापिका थीं । और जैसे कि मैगी का यह अभियान सभी स्कूलों के लिये था, उन्हे इस प्रचार का पता था । दफ़्तर मे उन्होने इसका पिता जी से ऐसे ही ज़िक्र किया और पिता जी असलियत जान गये । शाम को जो मेरे सामने जो ये सब बातें दुहरायी गयीं वह मुझे अपने किये का बोध कराने कि लिये थीं । मम्मी बडी़ मायूस हुई । मुझे समझाया कि ऐसे झूठ नहीं बोलते । उनके सिखाने का असर था या उस समय हुई शर्मिन्दगी का, पता नहीं । पर ज़िन्दगी का तीसरा सबक ये लिया कि कभी शेखी़ न बघारो । और दूसरे के किये काम का श्रेय खुद लूटने की कोशिश बिल्कुल ही न करो ।
इस कड़ी के अगले अंक मे आपको अपने कुछ और अनुभवों और विज्ञान के प्रयोगों के बारे में बताऊँगी । घर मे बिजली का फ़्यूज़ कैसे उडा़यें, इस विषय पर भी आसान जानकारी दी जायेगी…..क्रमश:
