हम क्या बनाने आये थे और क्या बना बैठे!!!

  
पिछले एक वर्ष में दिल्ली में रहने का अगर कोई सबसे बड़ा फ़ायदा मुझे हुआ है तो वो है महान कलाकारों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होना.  गत वर्ष उस्ताद राहत फ़तेह अली ख़ान, श्री जगजीत सिंह, फ़रीदा ख़ानम, उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, पंडित शिव कुमार शर्मा(संतूर), बिक्रम घोष(तबला), तौफ़ीक़ क़ुरैशी(पर्कशन), पंडित रोनू मौजुमदार(बाँसुरी), अतुल रानिंगा(की-बोर्ड), गुंडेचा बंधु(ठुमरी गायन), शुभेन्द्र राव और सस्किया राव-दे-हास (सितार और सेलो). इसी क्रम में इस सप्ताहांत हमें वडाली बंधु, साबरी बंधु, गाज़ी ख़ान बरना (माँगनेयार - जैसलमेर) और कैलाश खेर तथा उनके ग्रुप कैलासा को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ.

बड़ों के मुख से अक्सर एक उक्ति सुना करते थे कि वृक्ष जितना फल से लदा होता है उतना झुका होता है. ये कलाकार उस उक्ति को अक्षरष: चरितार्थ करते हैं.  इतनी मधुर वाणी, इतना ओज, अपनी कला में इतनी महारत और उसके बाद भी इतना विनम्र स्वभाव. मैं सच कहूँ तो इतनी श्रद्धा मुझे मंदिर में जा कर नहीं आती जितनी मैनें इन लोगों के प्रति महसूस की.  इन्हें देख कर ऐसा प्रतीत होता है मानों भगवान के साक्षात दर्शन कर लियें हों.  शिक्षा-अशिक्षा की सीमाओं से परे इनके विचारों की महानता के आगे बरबस नतमस्तक हो जाने को जी करता है.  इनकी कला और ज्ञान के आगे धर्म, जाति  और देश की सीमाओं के मसले इतने छोटे हो जाते हैं कि क्या कहना. अहसास होता है कि हम हिंदु - मुस्लिम से पहले एक इंसान हैं.

एक ओर हमारे राजनेता हैं जो लोगों को धर्म और प्रांत के आधार पर बाँट कर झगड़े करवा रहे हैं और एक ओर ऐसे महान लोग जिनके लिये ईश्वर एक है, कला ही ईश्वर है. यहाँ सम्मान ज्ञान का होता है धर्म का नहीं.  एक ओर जहाँ छोटे वडाली बंधु ने साबरी जी के चरण स्पर्श किये वहीं ग़ाज़ी खान बरना ने अपने कार्यक्रम का प्रारंभ ‘गणपति वंदना’ से किया. सच मानिये पूरे कार्यक्रम में मेरा सर श्रद्धा से झुका रहा. हाँलाकि मैं कभी भी बहुत धार्मिक नहीं रही हूँ किंतु अब ऐसे लोगों के दर्शन होने के बाद, यह जानने के बाद कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति क्या है तो मैं अपने आपको सभी धर्मों और सीमाओं से बिल्कुल परे पाती हूँ.  और क्या ही अच्छा हो कि हमारी पीढ़ी नेताओं के अतिवादी विचारों का अंधाधुंध अनुसरण करने के बजाय अपना आदर्श ऐसे लोगों को चुनें जो सचमुच अनुसरणीय हैं. वडाली बंधुओं ने अपनी प्रस्तुति के बीच चार लाइनें कही थीं, उन्हीं के साथ और इस आशा के साथ कि हम एकता की महत्ता को समझेंगे, अपनी बात समाप्त करती हूँ -

  ”हम क्या बनाने आये थे और क्या बना बैठे
  कहीँ मंदिर, कहीँ मस्जिद, गुरुद्वारे औ गिरिजा बना बैठे,
  अरे, हमसे अच्छी तो परिंदो की ज़ात है,
  कभी मंदिर पे जा बैठे, कभी मस्जिद पे जा बैठे”

Published in: on February 19, 2008 at 6:23 am Comments (5)

‘आजा लिख ले’

ई हौ मेरी ‘कम-बैक पोस्ट’. सबसे पहले तो सभी भाई-बंधुओं, चिट्ठा-जगत के सदस्यों व पाठकों को मेरी ओर से नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें. गत एक वर्ष से मैनें चिंतन पर कुछ नहीं लिखा. ये बात और है कि जितना चिंतन मैने साल २००७ में किया है उतना शायद ही कभी किया हो. इस बीच बहुत से ई-मेल मुझे मिले, टिप्पणियाँ भी आती रहीं. सभी उत्साहवर्धक. बहुत से लोगों ने कहा कि लिखना पुनः शुरू करें. मैं इस पोस्ट के ज़रिये उन सभी को धन्यवाद कहती हूँ जिनके प्रोत्साहन की वजह से लिखने कि चाह मन मे सदा बनी रही, यद्यपि मैनें कुछ लिखा नहीं. साल २००६, दिसंबर में मैने अपनी अंतिम पोस्ट लिखी थी. एक साल बाद पुनः लिख रही हूँ तो ‘आमिर खान’ टाइप भी फ़ील कर रही हूँ.  एक साल में एक पिक्चर, एक साल मे एक पोस्ट.  वर्ष २००७ मेरे लिये इतना उथल-पुथल भरा रहा कि मुझे फ़ुर्सत ही नहीं मिली कि कभी कुछ लिखूँ.  या फिर शायद फ़ुर्सत मिली हो, किंतु शब्द नहीं मिले.

अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ शुरू हुआ था सन् २००७. मैनें सोचा था कि नियमित लिखूँगी. कोशिश करूँगी कि लिखने के विषयों का दायरा विस्तृत हो सके इत्यादि इत्यादि. अमित का रोग गंभीर था किंतु असाध्य नहीं था, चिकित्सकों ने आखिरकार जड़ ढूँढ ही ली थी. अब चिंता को था ही क्या. ४ या ५ जनवरी २००७ (तारीख़ तो अब ठीक से याद नहीं)- अमित को फिर से अस्पताल जान पड़ा. कारण इस बार नया था. डॉक्टरों ने कहा कि शायद अब पेट का ऑपरेशन करना पड़े. अमित के दो ऑपरेशन वर्ष २००६ में हो चुके थे. इस बार मैनें पहली बार कुछ टूटते हुए मह्सूस किया. एक के बाद एक घिरती हुई समस्यायें, बढ़ती अपेक्षायें. मैं ऊपर से जितना मज़बूत होने की कोशिश कर रही थी, उतना बिखर रही थी. खै़र, अमित के पेट का ऑपरेशन नहीं हुआ.  १ हफ़्ते वह अस्पताल में रहे, पर चिकित्सकों की कुशलता से ऑपरेशन के बिना ही उनकी सम्स्या का समाधान हो गया. किंतु यह अंत नहीं था. समस्यायों का ताँता ज्यों का त्यों रहा. सारे साल मैं यही सोचती रही कि भैया भगवान जी आप चाह क्या रहे हो.

यहाँ उन मानसिक और शारीरिक समस्यायों का ज़िक्र करना निरर्थक लगता है जिनसे यह साल भरा रहा. अब तो रात गयी और बात गयी. जनवरी से दिसंबर तक का समय चाहे जैसे निकाला हो किंतु अब अंत में आ के देखती हूँ तो लगता है कि कुछ भी बेवजह नहीं हुआ. २००७ जाते जाते मुझसे मेरी आने वाली संतान को भी ले गया और मैं ऐसे बनी रही जैसे कोई चलचित्र देख रही हूँ. ये नहीं कहूँगी कि कोई फ़र्क नहीं पड़ा, पड़ा था, लेकिन इतना नहीं कि मैं सँभल ना पाऊँ. ये आघात शायद मुझे पूरी तरह हिला देता अगर साल भर छोटे छोटे कष्ट झिला झिला के भगवान ने बाई गॉड इतना पक्का न कर दिया होता. पता नही इस घटना का ज़िक्र करना चाहिये था या नहीं. पर अब मैं इतनी निर्लिप्त हो चुकी हूँ कि कहना न कहना सब एक बराबर है.

जीवन के उलझावों को सुलझाते सुलझाते मैं एक इंसान के रूप मे इतना सुलझ जाऊँगी पता नहीं था.  मज़ेदार साल था अगर अनुभवों के मद्देनज़र देखा जाये तो. कितना कुछ खो के भी मैनें कितना कुछ पा लिया. धैर्य,  साहस, सूझ-बूझ, जीवन के प्रति एक सर्वथा नया दृष्टिकोण, पुराने रिश्तों मे नये आयाम और ढेर सारे लोगों का बहुत ढेर सारा प्यार. अमित अब क़रीब क़रीब ठीक हो चुके हैं. पति से अधिक अब वे मेरे मित्र है. बीच में कुछ पल ऐसे थे कि लगा हमने शायद एक दूसरे को ही खो दिया है. एक दूसरे को फिर से ढूँढते-ढूँढते हमने कब एक दूसरे  गुम हुआ दोस्त पा लिया, पता नहीं चला. जो हो, जीवन पुनः मधुर प्रतीत होता है. बल्कि यूँ कहूँ कि मेरे लिये ये एक नया जीवन है तो अधिक बेहतर होगा. बस ईश्वर से यही कामना है कि मुझमें यही शक्ति, यही धीरज सदैव बनाये रखे.

ईश्वर से यह भी प्रार्थना है कि यह नया साल सभी के लिये ढेरों खुशियाँ ले के आया हो, सभी के लिये मंगलमय रहे. अब और क्या लिखूँ. अधिक कुछ है नहीं इस पोस्ट में लिखने को. बस यूँ ही लिख दी. आप भी बस यूँ ही पढ़ लीजियेगा.

Published in: on January 15, 2008 at 12:48 pm Comments (7)

बचाओ!!!!!!!!!!!!!!!

अभी मैं काफ़ी क्रुद्ध हूँ, क्षुब्ध हूँ. आजकल गुस्सा निकालने का कोई रास्ता नहीं सूझता. अमित की लाइफ़ में तो एक तरह से ‘हैप्पी आर्ज़’ चल रहे हैं…चुँकि वह अस्वस्थ हैं तो मेरे कोप का भाजन आजकल वह कतई नहीं बनते. अपने बाल नोचना या दीवार पे सर फोड़ना जैसी पगलैट हरकतें हम अब करते नहीं. तो इसलिये रास्ते के अभाव में लिख रहे हैं. उम्मीद हैं कि आप लोग हमारी तकलीफ़ समझेंगे.

सुबह से तीन फोन आ चुके हैं. फ़लाना-फ़लाना और टमाका-टमाका बैंकों से. हमारा अपना फ़ोन खराब है इसलिये अमित अपना फ़ोन घर छोड़ के जाते हैं. जिससे काम पड़ने पर बात हो सके. ये और बात है कि ऑफ़िस पहुँचने के बाद अमित का फ़ोन मुश्किल से ही आता है पर पीछे से झिलाऊ कॉल्ज़ की कतार लग जाती है. वो भी हम झेल लेते हैं पर आज हद्द हो चुकी है. आज पहली बार जब मैनें फ़ोन उठाया एक लड़की बोली-’हैलो’….हमने भी कहा-’हैलो’…लड़की फिर बोली-’हैलो…दिस इस सिमरन फ़्रॉम — बैंक’. बैंक सुनते ही मेरा मुँह बन गया…फिर भी हमने तहज़ीब के दायरे में रहते हुए कहा-’हाय सिमरन’. और फिर उधर से एक बेहद इंटैलिजेंट सवाल आया-’हाय…..एम आई टॉकिंग टु मिस्टर अमित?’. एक तो बैंक की फ़ालतू योजना का फ़ोन उस पर से इतने टाइम-पास लोग. दिमाग को दिन मे धूप सेकने भेज दो फिर लोगों को फ़ोन घुमाते रहो. एक मिल गयी स्क्रिप्ट…उसमे लिखा है कि ऐसा सवाल पूछना है…तो फिर पूछना ही है…कोई लॉजिक भूल के भी न लग जाये कहीं. शाम को भी ऐसे ही एक महान भैया जी से बात हुई… भैया जी एकदम देसी टोन में बोले-’हैऽऽलो’…हम भी बोले-’हैलो, हाँ जी भैया कहिये’. ‘हाँ, अमित जी बोल रहे हैं? मैं —बैंक से’. अबकी बार तो रहा नहीं गया..अरे कैसी आवाज़ हो पर आदमी के जैसी तो नहीं ही है….आवाज़ पर दिन में दूसरी बार बट्टा बर्दाश्त नहीं हुआ..बोले -’नहीं…अमित जी ऑफ़िस में हैं और ९ बजे से पहले नहीं बोल पायेंगे, उनकी पत्नी बोल रही हूँ ..कहिये!’. बेचारे सकपका गये होंगे. पर असल में अति हो चुकी है. सोते-फ़ोन, जगते-फ़ोन, खाते-फ़ोन, नहाते-फ़ोन….और हर बार निरर्थक फ़ोन…

शुरू शुरू में मोबाइल क्या ही बढ़िया चीज़ लगता था और अब…क्या कहूँ. वही हाल है जैसे शुरू शुरू में प्रेमी तो बढ़िया लगते हैं पर जैसे ही पति बने आपकी नाक में दम कर देंगे. मैं यह नहीं कह रही कि मोबाइल कि उपियोगिता नहीं है किंतु समस्या यह है कि दिन भर घंटी बजती ही रहेगी. उस पर फ़ोन की लगतार गिरती दरें…मतलब और फ़ोन. अभी हाल में तो मैनें ‘ओम नमः शिवाय’ की धुन की रिंगटोन लगा दी थी. कुछ और नहीं तो शायद एक माला ही हो जाय. अभी रिलायंस ने पैसे कम क्या किये लोगों के वारे न्यारे हो गये. सुबह सुबह नाश्ता बना रहे हैं…दिमाग़ में चिंता कि अभी क्या क्या काम निपटाने हैं…एक हाथ में बेलन, एक में कलछी…तभी फ़ोन…’और..क्या हो रहा है….अच्छा नाश्ता…क्या बन रहा है?…गोभी के पराँठे…अच्छा गोभी कच्ची डालती हो या भून के…’ अब गर्दन टेढ़ी कर के कंधे और कान के बीच फ़ोन और संभालो…मज़े की बात ये कि पूरी वार्ता में मेरे मुँह से ‘हाँ’, ‘ह्म्म्म’ जैसे शब्द ही निकलेंगे और फिर थोड़ी देर में सामने वाला कहेगा…और बताओ..! दिन में दो बार दूर की मौसी जी का फ़ोन आता है. उनके फ़ोन से किसी भी रिलायंस पर फ़्री कॉल की सुविधा है…क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ, मौसम का हाल, मिस हुए सीरियल की कहानी…और अभी कुछ दिन से जब अमित की तबियत खराब थी तो टेंशन डबल. ‘क्या करें आ नहीं सकते …सोचा फ़ोन पर हाल ले लें’. हर फ़ोन पर पूरी कहानी बताओ…कुछ लोग सुबह हाल पूछते, फिर दोपहर में और फिर शाम को…’अरे! ठीक नहीं हुए…क्यों ठीक नहीं हो रहे!’ …जैसे गोली को अंदर जाते ही घिसी हुई हड्डी की जगह चिपक जाना चाहिये था और अमित को ‘छू’ से ठीक हो जाना था. ये एक फ़ोन न हुआ …जान की आफ़त हो गया. उस पर से ये मोबाइल डेड भी नहीं होते. इसलिये कई बार तो मैं फ़ोन गद्दे की नीचे दबा देती और खुश होती रहती.

आज भी मुझे फ़ालतू कॉल्ज़ से बचने की राह ही नहीं सूझ पाती. और इसी वजह से फ़ोन के प्रति वैराग्य उत्पन्न होता जा रहा है. मेरे फ़ोन को खराब हुए १ महीना हो चुका है. और मैं बेहद खुश हूँ. चाहती हूँ और थोडा़ समय लटका रहे. हाँलाकि मैं नये साल की संध्या पर अपने दोस्तों से बात नहीं कर पाऊँगी….पर फिर भी! अच्छा ही है… इसबार मैं सबको पत्र लिखूँगी…पुराने दिनों की तरह. फिर इंतज़ार करूँगी कि डाकिया बैंक के स्टेटमेंट और फ़ोन के बिल की जगह कभी मेरे लिये कोई चिट्ठी भी ले के आये…जिसे सहेज कर रख सकूँ…बार बार पढ़ सकूँ.

Published in: on December 29, 2006 at 6:14 pm Comments (14)

मेरे दिन कुछ यूँ बीते…

आज बहुत दिनों बाद जब पुनः लिखने बैठी हूँ तो सोचा सबसे पहले वह लिखूँ जो गये दिनों मे लिखने का मन तो किया किंतु शब्दों ने साथ नहीं दिया. बीते तीन महीने मेरे लिये एक परीक्षा की तरह बीते हैं. मुझे लगा जैसे मैं १९९९ को पुन: जी रही हूँ. एक के बाद एक परेशानी और बिखरता हुआ मनोबल. इस सब के बीच लिख पाने की क्षमता मुझमें थी नहीं. मैं कुछ दु:खद लिखना नहीं चाहती थी पर अब लगता है कि उस दु:ख, निराशा और आक्रोश का बह जाना ही अच्छा है. और फिर अंत भला तो सब भला. इसलिये जो जैसा है या था- लिख रही हूँ.

९९ में जब पापा का देहांत हुआ तो सब इतना अकस्मात हुआ कि कुछ सोचने या समझने का समय ही नहीं मिला. १० मिनट और सब खत्म. और उन १० मिनटों में मैनें क्या महसूस किया था यह मैं आज तक नहीं समझ पाती. २८ दिन बाद नानी भी चली गयीं, अचानक. मैं जैसे किसी और लोक में थी. कुछ प्रतिक्रिया नहीं, कोई दर्द नहीं, दु:ख नहीं. दिमाग़ इतना सुन्न था कि समझ ही नहीं आया हो क्या रहा है. और शायद यही अच्छा था. नाना जी के जाने के लिये मानसिक रूप से मैं कहीं तैयार थी, किंतु मृत्यु को इतने निकट से देखूँगी यह नहीं जानती थी. दशहरे वाले दिन जब हम कानपुर पहुँचे तो नाना अस्पताल में थे. डॉक्टरों को कोई उम्मीद नहीं थी. उनके अंग काम करना बंद कर रहे थे और आंशिक पक्षाघात हो चुका था. मैं शायद इसके लिये तैयार नहीं थी. नाना सारी रात पानी माँगते रहे, छटपटाते रहे और मैं असहाय खड़ी थी. मैं इसके लिये तैयार नहीं थी. ‘मर्सी किलिंग’ - मैं हमेशा जिसकी पक्षधर रही हूँ, पहली बार जाना कि यह उतना आसान नहीं जितना मुझे प्रतीत होता था. आपमें बहुत साहस होना चाहिये जो आप इतना बड़ा कदम उठा सकें. यह साहस किसी में नहीं था. मैनें पहली बार उस छटपटाहट को महसूस किया जिसमें आप यह नहीं जानते कि आप ईश्वर से अपने प्रिय का जीवन माँगे या मृत्यु. ४ दिन के पीड़ादायक संघर्ष के बाद नाना अंतत: चले गये और मैनें पहली बार इतने निकट से प्राणों को मुक्त होते देखा….एक एक कर अंगो का फ़ड़क कर शिथिल होना….मानो दिये की लौ बुझने से पहले एक आखिरी बार तेज़ हो रही हो. महसूस कर सकती थी सब. मैं इस सब के लिये तैयार नहीं थी.

यह सब जैसे कम था. रही बची कसर पूरी करने के लिये हमारे कर्मकांड और समाज होते ही हैं. झूठा ढोंग…दिखावा और झूठी सहानुभूति. लोग मृत्यु जैसी घटना को भी एक व्यवसायिक रूप दे देते हैं. जो चला गया उसके गुण दोषों का विश्लेषण होगा, एक ही कहानी इतनी बार इतनी तरह से सुनायी जायेगी मानो किसी फ़िल्म की कहानी हो. और जो सुनायेगा वह नायक बन जायेगा…भले ही जीते जी उसने दिवंगत की खैर भी न ली हो कभी. मैं चीखना चाहती थी…भगा देना चाहती थी ऐसे लोगों को या खुद भाग जाना चाहती थी इस सब से दूर, पर कुछ संभव नहीं था. दबा आक्रोश कब अवसाद बन गया पता नहीं चला. अजीब अजीब सपने, हर पल आशंकाओं से ग्रस्त…अजीब अनुभव…..

इन सब से निकल पाती कि उससे पहले ही अमित (मेरे पति) का स्वास्थ्य अचानक तेज़ी से गिरने लगा. वैसे तो मार्च में हुए ऑपरेशन के बाद से थोड़ा बहुत कुछ लगा ही था पर डॉक्टर कह रहे थे कि सब धीरे धीरे ठीक हो जायेगा…लेकिन लगा कि कुछ गंभीर है जो छुपा हुआ है. इधर अमित अपने सामान्य कार्य करने में असमर्थ हो रहे थे उधर बीमारियों के सभी टेस्ट ‘नेगेटिव’. बीमारी का कोई पता नहीं. एक के बाद एक महँगे और बडे़ टेस्ट से भी कुछ पता नहीं लग पा रह था. दो महीने तक पता ही नहीं लगा कि समस्या है क्या…. अचानक लिवर की जाँच के लिये किये गये कैट-स्कैन से पता चला कि रीढ़ की हड्डी में गलाव है. हम लोगों ने दूर दूर तक यह तो कल्पना भी नहीं की थी. डॉक्टर कह चुके थे कि अमित को बहुत सावधान रहना होगा और तीन महीने तक बेड-रेस्ट…अन्यथा कुछ भी हो सकता है. साथ ही पूरा मामला सर्जन से न्यूरो-सर्जन के हाथ में चला गया. मैं पूरी तरह निराश हो चुकी थी. ईश्वर के सिवा कोई रास्ता नहीं दिख रहा था. अंतत: मैंने सब उनके हाथ में छोड़ दिया और प्रार्थना की शक्ति को शायद पहली बार देखा. हाल में यहाँ जब हम कुछ एडवांस टेस्ट की रिपोर्ट ले कर न्यूरो-सर्जन से मिले तो उन्होंने कहा मरीज़ को बुलाइये. अमित ने कहा कि मैं ही तो हूँ. डॉक्टर हतप्रभ थे कि अमित अपने पैरों पर खड़े हैं, चल-फिर रहे हैं. यह देख उन्होंने ऑपरेशन की संभावनाओं को नकार दिया. थोडे़ दिन के लिये बेड-रेस्ट कहा और ये भी कि लंबे समय तक सावधान रहना होगा किंतु दवाओं से ही सब ठीक हो जायेगा यह हमारे लिये खुशी की बात थी. अमित की सेहत में सुधार हो रहा है. वह अपने काम खुद कर पा रहे हैं. उनके चेहरे पर हँसी लौट आयी है और मेरे मन में शांति.

कहते हैं हर बात का एक धनात्मक पहलू होता है. यह कठिन समय न आता तो मैं जान भी नहीं पाती कि मेरे मित्र मुझे ईश्वर का आशीर्वाद हैं. यहाँ इस कठिन घड़ी में उन्होंने मुझे इतना प्यार और सहयोग दिया है कि मुझे परिवार की कमी महसूस नहीं हुई. कभी लगा नहीं कि इतने बड़े शहर में हम अकेले हैं. अँकुर, दीप्ति, आलोक और नवीन…मैं इन्हें धन्यवाद तो नहीं कहूँगी क्यूँकि यह शब्द प्रति आभार प्रकट करने के लिये बहुत छोटा है पर बस इतना कहना चाहूँगी कि इन सबके बिना मेरा इस कठिन समय को पार करना लगभग असंभव था. अँकुर को तो मैं शायद तीन या चार महीने पहले मिली हूँ….बल्कि मिली तो दो महीने पहले पर हाँ चार महीने से जानती हूँ. इतने छोटे अरसे में बने संबंध में इतना प्यार, विश्वास और अपनापन हो सकता है यक़ीं नहीं होता. ईश्वर नें मानों जीवन में छोटे भाई की कमी को पूरा कर दिया है . नवीन…..पुने में नौकरी करता है. दो महीने पहले जब मेरी उससे बात हुई तो उसे लगा की शायद मैं बहुत परेशान हूँ. इस माह वह हृषिकेश गया सिर्फ़ इसलिये क्यूँकि उसे विश्वास है कि वहाँ एक मंदिर में अगर किसी के नाम से पूजा कराओ तो उसके सब रोग ठीक होते हैं. अभी दो दिन पहले उस से बात हुई तब उसने बताया कि उसने अमित के नाम से पूजा करायी है. और मुझसे इसलिये नहीं पूछा कि मैं पहले ही परेशान हूँ और फिर पता नहीं मेरा इस सब में विश्वास हो या न हो. भावातिरेक से मैं नि:शब्द रह गयी. अपने इन मित्रों के अतिरिक्त मैं उन सभी लोगों और चिट्ठा-परिवार की भी आभारी हूँ जो इस कठिन घड़ी में मेरा मनोबल बढ़ाते रहे. मुझे नहीं पता था कि अनजाने में बने कुछ रिश्तों कि डोर इतनी मज़बूत है. बहुत अच्छा लगा जान कर. शायद भगवान बताना चाहते थे कि ज़िंदगी अब भी ख़ूबसूरत है. अब फिलहाल तो नये साल का बेसब्री से इंतज़ार है क्यूँकि- ‘एक बरहमन ने कहा है कि वो साल अच्छा है’. उम्मीद है कि नया साल आप सब के जीवन में भी खुशियों की ढेरों सौगा़त ले के आयेगा. आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें. ……चलिये फिर अगले साल मिलते हैं :) .

Published in: on December 28, 2006 at 10:00 am Comments (24)

बिलेटड हैप्पी टीचर्ज़ डे :)

यूँ तो शिक्षक दिवस आया और चला गया। हमने मन ही मन अपने शिक्षकों को याद किया। पर लिखा कुछ नहीं। ‘फिर कभी’ वाला मूड हम पर हावी था। और ऐसे में हम मलूका दास जी के श्री चरणों में गिर अकर्मण्यता को प्राप्त हो जाते हैं। स्वयं को समझाया कि क्या लिखें, कितना लिखें….और ख़ुद को तसल्ली दे ली कि ठीक ही है, मन में याद कर लिया, लिखना क्या! पर अभी गत सप्ताहांत पर किसी कार्यवश अपने विश्वविद्यालय जाना हुआ। अब ऐसे तो जीवन को आकार देने में स्कूल के शिक्षकों का भी कम योगदान नहीं रहा, किन्तु विश्वविद्यालय में जो अध्यापक मिले उनकी अमिट छाप आजीवन मन पर अंकित रहेगी। खै़र विश्वविद्यालय जा कर सभी शिक्षकों से भेंट हुई। सोया विद्यार्थी जाग उठा और हमें लगा कि हम भी बतायें कि कैसे थे हमारे ‘वह गुरू’ जिनसे मैनें मात्र शिक्षा नहीं अपितु जीने का सलीका़ भी पाया है।

मैनें स्नातक तथा परास्नातक दोनों ही ‘दयालबाग़ विश्व्विद्यालय, आगरा’ से किया। यह आगरा का सर्वाधिक अनुशासित कॉलेज हुआ करता था बल्कि शायद आज भी है। प्रोफ़ेसर वी. जी. दास भौतिकी के विभागाध्यक्ष हो कर नये नये आये थे। गोरा रंग, ऊँचा कद, दुबला-पतला शरीर और चेहरे पर चिरस्थायी हँसी। स्नातक में बस इतना पता था कि वह अब नये विभागाध्यक्ष हैं और साइकिल से आते हैं। यह साइकिल से आने वाली बात हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण थी। जब अधिकांश अध्यापक कार से या फिर कम से कम स्कूटर, मोपेड से आते थे तब विभागाध्यक्ष का साइकिल से आना हमें उनके ‘स्टेटस’ के अनुकूल नहीं लगता था। हमारी कोई भी कक्षा वह नहीं लेते थे अत: एक अध्यापक के तौर पर उन्हें जानने का मौका हमें नहीं मिला था। यद्यपि यह पता था कि वह ‘इलेक्ट्रॉनिक्स’ के क्षेत्र से संबद्ध हैं। एक बार की बात– हमारी ‘क्वांटम मेकैनिक्स’ की कक्षा चल रही थी। कुछ विषय उबाऊ और कुछ पढ़ाने वाले अध्यापक उदासीन…कुल मिला कर कुछे बच्चे खिड़कियों से बाहर झाँक रहे थे, पीछे की बेंच वाले पर्ची-पर्ची खेल रहे थे और अगली कतार के लोग सर हिलाते हुए समझने का अभिनय कर रहे थे। कक्षा की अवधि समाप्त होने की घंटी से पहले अध्यापक की पढ़ाने की इच्छा बोल गयी और वह अपनी किताब उठा बाहर निकल गये। और जैसा कि नींद से जागे बालक करते हैं ठीक वैसे छात्र लगे शोर मचाने। यह शोर जा पहुँचा बाहर से ग़ुज़रते दास सर के कानों तक और उसके बाद सर सीधे कक्षा में। बोले-
‘आप लोगों की क्लास छूट गयी?’
‘जी सर।’
‘क्यूँ? अभी तो २० मिनट बाकी हैं।’
‘सर ने छोड़ दिया आज जल्दी।’
‘ह्म्म्म क्या पढ़ रहे थे आप लोग….’
‘क्वांटम मेकैनिक्स की क्लास थी सर।’
‘तो आज का लेक्चर कौन समझाएगा मुझे….।’
इस अप्रत्याशित प्रश्न से हम सभी अवाक थे। वैसे भी समझ कुछ आया नहीं था। सारे छात्रों को बगलें झाँकते देख सर ने स्वयं वह क्लास दुबारा ली। और जब आगे चलकर भी जब सर ने हमारी कक्षायें ली तब भी बोर्ड पर पिछली क्लास के लेक्चर को देख अक्सर सवाल पूछ बैठते थे। और अगर जवाब नहीं मिला तो फिर उस विषय पर लेक्चर मिलना तय होता था। प्रत्येक विषय पर उनका समान अधिकार हतप्रभ करने वाला था।

सर हमेशा समय की महत्ता पर बल देते थे। एक बार शिक्षक दिवस मनाने के लिये सभी बच्चों ने २०-२० रुपये इकट्ठे करने का सोचा। किसी तरह इस बात की भनक सर को लग गयी। और उस दिन हम सभी को बहुत झाड़ पड़ी। उनका कहना था कि माँ-बाप की मेहनत की कमाई को व्यर्थ खर्च करना उचित नहीं है। इस बात पर हम सबने निर्णय लिया कि हाथों से बना के कार्ड दिये जायें। अन्तत: जब कार्ड बन के तैयार हुए और हमने सभी अध्यापकों को दिये तो सभी ने तारीफ़ करी। दास सर ने भी कहा-
वाह। बड़े सुन्दर कार्ड हैं,  पर हाथ के बने कार्ड कहाँ मिले?
हम सब खुश हो गये सुन के। फ़ूल के बोले - ‘सर हम सब ने बनाये हैं’।
‘अच्छा, कितना समय लगा?’
‘सर दो घंटे’
‘बेटा इतने में तो कम से कम दस न्यूमेरिकल हल कर लेते तुम लोग।’ सर हँसते हुये बोले।
फिर सब के उतरे चेहरे देख सर ने गंभीर हो आगे कहा-’ बेटा, मेरी बात को समझो। तुम लोगों ने बहुत मेहनत करी। पर तुम लोग जो सम्मान हम सबको देते हो वही काफ़ी है।  और रही बात उपहार की तो एक शिक्षक के लिये सबसे बड़ा उपहार यही है कि उसके छात्र एक सफ़ल और ज़िम्मेदार नागरिक बनें। इस समय तुम्हारा ध्यान सिर्फ़ पढ़ाई पर होना चाहिये।’ यह बात हम लोगों के दिल को छू गयी। और हमने मन ही मन उनके आदर्शों को अपनाने का निश्चय किया। पर ऐसा नहीं कि सर ने सिर्फ़ पढ़ाई पर ज़ोर दिया हो। जब ‘सांस्कृतिक सप्ताह’ मनाया जाता तो वह हमें सभी प्रतियोगितायों में बढ़-चढ़ के हिस्सा लेने को कहते।

अपने कार्य के प्रति उनके जैसी लगन और समर्पण मैनें कहीं नहीं देखा। सुबह सबसे पहले विभाग में पहुँच जाना, देर शाम तक काम करते रहना। कभी बीमारी की वजह से किसी छात्र की पढ़ाई का हर्ज़ा हो जाता तो सर स्वयं समय निकाल कर उसे अलग से पढ़ाते। विद्यार्थियों की हर प्रकार से मदद के लिये मैनें उन्हें हमेशा तत्पर देखा। एक दिन काम की वजह से मैं उनसे मिलने गयी। उस समय वह अपने कमरे में नहीं थे। उनकी मेज पर एक आकर्षक किताब रखी थी-माइक्रोप्रोसेसर से संबंधित, एकदम नयी। किताब हमारे पाठ्यक्रम से संबंधित नहीं थी। हम अभी निचले स्तर के प्रोसेसर्ज़ के बारे में पढ़ रहे थे जबकि यह किताब अन्य विकसित प्रोसेसर से संबंधित थी।  किंतु मैं अपनी उत्सुकता रोक न सकी और किताब के पन्ने पलट कर देखने लगी।  यह वैसे भी मेरा प्रिय विषय था । इस बीच सर कब आये मुझे पता भी नहीं चला। मुझे किताब देखते हुए देख सर ने कहा- ‘यह मैनें कल ही मंगवाई है, यहाँ मिलती नहीं। बहुत अच्छी किताब है। तुम्हारे पाठ्यक्रम में नहीं है पर क्या तुम पढ़ना चाहोगी?’ मेरे यह पूछने पर कि उन्हें यह किताब कब तक वापस चाहिये होगी वह बोले-’बेटा इस तुम ही रख लो। मैं और मँगा लूँगा। और भी बच्चों से कहना अगर उन्हें किसी तरह की किताब चाहिये तो मुझे बतायें मैं खरीद के दूँगा। बस तुम लोग खूब पढ़ो।’ और यह सिर्फ़ कहने की बात नहीं थी। कितनी ही किताबें जिनका मूल्य छात्र वहन नहीं कर सकते थे, उन्होंने अपने पैसों से खरीद के दीं।

मुझे याद आता है जब मैनें उनसे पूछा था कि आई.आई.टी. और नोएडा में मिली नौकरी में से क्या चुनूँ तो उन्होनें कहा था कि वह चाहेंगे कि अभी मैं और पढ़ाई करूँ, कम से कम एम.टेक. तो करूँ ही। पर ‘पियर प्रेशर’ नाम का कल्पित भूत था या शीघ्रातिशीघ्र आत्मनिर्भर होने की लालसा, मैनें उनकी सलाह पर अमल नहीं किया। और जब आज मुड़ के देखती हूँ तो पाती हूँ कि मैं कितनी ग़लत थी। शायद मैनें उस समय अपनी क्षमताओं और उनकी दूरदर्शिता का सही आँकलन नहीं किया था।

सर अब ‘निदेशक’ हो गये हैं। पर अभी जब मैं कॉलेज गयी तो वह अपनी अति-व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर हमसे मिले। औरों को चाहे मिलने की लिये कितनी मेहनत करनी पड़ती हो पर वह विद्यार्थियों के लिये हमेशा उपलब्ध रहे हैं। छ: साल बाद भी उन्हें मुझे पहचानने में क्षण नहीं लगा। वैसे ही हँसमुख, वैसे ही ऊर्जावान, सर बिल्कुल नहीं बदले। पति के बारे में पूछा। जब सुना कि उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं तो पूछ बैठे कि तुम लोग एक्सर्साइज़ करते हो? मैनें कहा कि सुबह ७-७:३० बजे दफ़्तर जाना होता है तो नहीं हो पाती। इस बात पर बोले-बेटा मेरी घड़ी में ढाई बजे का अलार्म लगा होता है, पर आलस……क्या करूँ तीन बजे से पहले उठ ही नहीं पाता। लेकिन फिर जो उठता हूँ तो थकता नहीं। सुबह खेतों में जा के पाटे चलाता हूँ और अभी कहो तो रेस लगा लूँ। कसरत बहुत ज़रूरी है बेटा। अच्छा बुलाओ लड़के को, डाँट लगाऊँ, कुछ भला काम करूँ आज’। फिर अमित को बुला व्यक्तिगत तौर पर फ़ायदे-नुकसान बताये। 

उनकी इस आत्मीयता से हृदय मानों भीग गया। चलते चलते पूछा-क्या कर रही हो तुम आजकल। मैं जानती हूँ मेरे पास इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं था। कम से कम उस हिसाब से संतोषजनक तो बिल्कुल नहीं जिस हिसाब से उन्हें मुझसे अपेक्षायें थीं। किंतु फिर भी जो भी मेरी छोटी-छोटी उपलब्धियाँ हैं उन्हें सर ने सराहा। कहा कोई मदद चाहिये हो तो उनसे कभी भी संपर्क करूँ। उनसे मिलने के बाद मैं एक नयी ऊर्जा, नये उत्साह से सराबोर हूँ। अपने लक्ष्य को पाने की एक लगन है अब। सोचती हूँ तो पाती हूँ कि  प्रोफ़ेसर दास बिल्कुल उस दीप की तरह हैं जो स्वयं जल कर औरों का पथ प्रकाशित करता है। ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि उन्हें लंबी आयु दे और मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं उनकी अपेक्षाओं पर खरी उतर पाऊँ।

Published in: on September 14, 2006 at 8:36 pm Comments (11)

मेरा भारत और एक छोटा सा प्रश्न

बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं. बस जी नहीं किया. इस बीच बड़ी बड़ी घटनायें हो गयीं भारत में. मैं कुछ लिखने के बजाय बस यह सोचती रह गयी कि क्या हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने इसी भारत का सपना देखा था. अगर नहीं तो कहाँ चूक गये हम.  आज अन्तर्जाल पर ऐसे ही विचरते हुए श्री ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के एक लेख ने ध्यान आकर्षित किया, शीर्षक था–’भारतीय होने पर गर्व करें’. आज के समय में यदि राजनीति से जुड़े किसी व्यक्ति ने मेरे मानसपटल पर छाप छोड़ी है तो वे हैं हमारे माननीय राष्ट्रपति महोदय. अत्यंत ज्ञानी, विद्वान तथा अनुभवी श्री कलाम अपने ज्ञान, सकारात्मक एवं वैज्ञानिक सोच तथा विनम्र व्यवहार के कारण सदा ही मेरे लिये श्रद्धेय रहे हैं. उनके शब्दों ने मन में हमेशा एक आशा तथा ऊर्जा का संचार किया है. अत: उनके लेखन के प्रति मेरा सहज आकर्षण स्वाभाविक है. मुझे नहीं पता कि इस लेख को कितने लोगों ने पढ़ा है पर इस लेख को पढ़ कर मुझे ये अवश्य लगा कि  हर भारतीय को इसे पढ़ना चाहिये. अत: उनके इस लेख के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ जिन्होंने मुझे न सिर्फ़ अत्यधिक प्रभावित किया अपितु मेरी सोच को एक नयी दिशा दी.

” भारत को लेकर मेरे तीन दृष्टव्य हैं. हमारे इतिहास के तीन हज़ार सालों में दुनिया भर के लोगों ने हम पर आक्रमण किये हैं, हमारी ज़मीनें हथियायी हैं, हमारे दिमाग़ों पर विजय पायी है. सिकंदर के बाद से  ग्रीक, तुर्क, मुसलमान, पुर्तगाली, बर्तानी, फ़्रांसीसी तथा डच सभी आये, हमें लूटा और जो हमारा था वह ले के चले गये. किंतु इसके बाद भी हमने किसी राष्ट्र के साथ ऐसा नहीं किया. हमने कभी किसी पर विजय पाने की कोशिश नहीं की, उनकी ज़मीन, सभ्यता तथा इतिहास पर आधिपत्य स्थापित करने की चेष्टा नहीं की. अपना जीने का ढंग किसी पर नहीं थोपा. क्यों? क्योंकि हम दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं.

इसीलिये भारत को लेकर मेरा पहला दृष्टव्य स्वतंत्रता से संबधित है. मुझे लगता है कि भारत को यह द्रष्टव्य १८५७ में मिला जब स्वतंत्रता की लड़ाई की शुरुआत हुई. हमें अपनी इस स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिये, इसका सम्मान करना चाहिये. यदि हम स्वतंत्र नहीं है तो कोई हमारा सम्मान नहीं करेगा.

भारत को लेकर मेरा दूसरा दृष्टव्य प्रगति को लेकर है. ५० सालों से हम एक विकासशील देश हैं. अब समय आ चुका है कि हमें स्वयं को विकसित देश के रूप में देखना होगा. जी.डी.पी. की दृष्टि से हम विश्व के प्रथम पाँच राष्ट्रों में से हैं. अधिकांश क्षेत्रों में हमारी विकास दर १० % के लगभग है. हमारा गरीबी का स्तर गिरा है. हमारी उपलब्धियाँ विश्व स्तर पर पहचान पा रही हैं. इसके बाद भी हम में आत्म-विश्वास की कमी  है जो हम खुद को एक विकसित, आत्म निर्भर तथा आश्वस्त देश के रूप में नहीं देख पाते. क्या यह उचित है?

मेरा तीसरा द्रष्टव्य है कि भारत को विश्व के सामने खड़ा होना होगा. शक्तिशाली शक्ति का ही सम्मान करते हैं. हमें न सिर्फ़ सैन्य दृष्टि से अपितु आर्थिक दृष्टि से भी सुदृढ़ होना होगा. ये दोनों साथ-साथ चलते हैं.
 

……..

आण्विक ऊर्जा विभाग तथा डी.आर.डी.ओ. की हाल ही में ११ तथा १३ मई को हुए नाभिकीय परीक्षणों में महत्वपूर्ण भागीदारी रही. अपनी टीम के साथ इन परीक्षणों मे भाग लेने तथा विश्व को यह दिखा पाने कि भारत यह कर सकता है एवं अब हम एक विकासशील देश नहीं अपितु विकसित देशों में एक हैं, की खुशी मेरे लिये अतुलनीय है. इससे मुझे भारतीय होने पर बेहद गर्व हुआ. हमने ‘अग्नि’ के पुनरागमन के लिये भी एक अन्य ढाँचा तैयार किया है जिसके लिये हमने एक अत्यंत हलके पदार्थ का विकास किया है. बहुत ही हलका पदार्थ जिसे कार्बन-कार्बन कहते हैं.

एक दिन ‘निज़ाम इन्स्टिट्यूट ऑव़ मेडिकल साइंसज़’ के एक हड्डी रोग विशेषज्ञ मेरी प्रयोगशाला में आये. उन्होंने वह पदार्थ उठाया और पाया कि वह बहुत हल्का था. उसके बाद वह मुझे अपने अस्पताल ले गये, मरीज़ों से मिलवाने के लिये. वहाँ छोटे-छोटे लड़के और लड़कियाँ भारी भारी धात्विक कैलीपर पहने हुए थे. लगभग तीन-तीन किलो वज़न वाले कैलीपर पहन कर ये बच्चे किसी प्रकार अपने पैरों को घसीट रहे थे. डॉक्टर ने मुझसे कहा - ‘मेरे मरीज़ों का कष्ट दूर कर दीजिये’. मात्र तीन हफ़्ते में हमने ३०० ग्राम के वज़न वाले कैलीपर का निर्माण कर लिया. जब हम उन्हें लेकर अस्पताल गये तो बच्चे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पाये. अब वे घिसटने की बजाय आराम से चल सकते थे. उनके माता-पिता के नेत्र हर्षातिरेक से भर आये. इस कार्य से मुझे स्वर्गीय-सुख मिला.

हम अपने देश में अपनी ही क्षमताओं और उपलब्धियों को पहचानने में क्यों हिचकिचाते हैं? हम एक अत्यंत गौरवशाली राष्ट्र हैं. हमारी सफलता की कितनी ही अद्भुत कहानियाँ हैं जिन्हें हम अनदेखा कर देते हैं. क्यों? हम विश्व में गेहूँ के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं. हम चावल के भी दूसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं. दुग्ध-उत्पादन में हम प्रथम स्थान पर हैं. ‘रिमोट सेन्सिंग सैटेलाइट’ के क्षेत्र में भी हम प्रथम हैं.

डॉ. सुदर्शन को देखिये. उन्होंने एक आदिवासी गाँव को स्व-पोषित आत्म-निर्भर इकाई में बदल दिया. ऐसे लाखों उदाहरण हैं किंतु हमारे मीडिया को मुख्यत: बुरी खबरों, असफलताओं तथा आपदाओं की धुन लगी रहती है. एक बार मैं तेल अवीव में था और इज़राइली समाचार पत्र पढ़ रहा था. यह दिन उस दिन के बाद का था जब बहुत से हमले और बमबारी हो के चुकी थी. बहुत से लोग काल का ग्रास बन चुके थे. हमस ने हमला किया था. किंतु समाचार पत्र के पहले पन्ने पर एक ज्यूइश सज्जन का चित्र था जिन्होंने पाँच साल में अपनी बंजर रेगिस्तान ज़मीन को हरे-भरे बाग़ मे बदल दिया. हर इंसान ने उठते ही ऐसी प्रेरणाप्रद तस्वीर देखी. हत्या, बमबारी तथा मृत्यु के भयावह समाचार भीतर के पन्नों में अन्य समाचारों के बीच दफ़्न थे.

भारत में हम सिर्फ़ मृत्यु, बीमारी, आतंकवाद तथा अपराध से संबंधित समाचार ही क्यों पढ़ते हैं? हम क्यों इतने नकारात्मक हैं? एक और प्रश्न- एक राष्ट्र के तौर पर हम विदेशी वस्तुओं से इतना प्रभावित क्यों हैं? हमें विदेशी टी.वी. चाहिये, विदेशी कपड़े चाहिये, विदेशी तकनीक चाहिये. हर आयात की गई वस्तु से इतना लगाव क्यों? क्या हमें इस बात का अहसास है कि आत्म-सम्मान आत्म-निर्भरता के साथ ही आता है. मैं हैदराबाद में एक भाषण दे रहा था जब एक १४ वर्ष की लड़की मेरा ऑटोग्राफ़ लेने आयी. मैनें उससे पूछा उसके जीवन का उद्देश्य क्या है : उसने कहा - ‘मैं विकसित भारत में रहना चाहती हूँ’. मुझे और आपको, उसके लिये, ये विकसित भारत बनाना  ही होगा.”

यह पूरा लेख आप यहाँ  पढ़ सकते हैं. इस लेख यदि हमें कोई प्रेरणा मिली तो उसे हमें हृदय तक सीमित नहीं रखना है, हमें कर्म करना होगा, राष्ट्र-सेवा के मौके ढूँढने होंगे. समय आ गया है कि आज की युवा पीढ़ी परिवर्तन लाने का बीड़ा उठाये. और यह हमारा विश्वास है कि जब हमारे देश कि लाखों-करोड़ों प्रतिभायें हाथ से हाथ मिला आगे बढ़ेंगी तो कोई शक्ति, कोई आपदा हमारे विकास का मार्ग नहीं रोक पायेगी.

इस के साथ आप सब से एक और प्रश्न करना चाहूँगी. एक बात को लेकर दुविधा में हूँ. कई बार अन्तर्जाल पर ऐसा कुछ दिख जाता है जो बहुत प्रेरणाप्रद लगता है. ऐसे में यह सोचती हूँ कि उसे चिट्ठे पर डालूँ य न डालूँ, क्योंकि वह मौलिक नहीं है. वैसे यह निजी सोच हो सकती है पर आप क्या कहते हैं? क्या नवीनता और मौलिकता को वरीयता दूँ या अगर कुछ अच्छा मिले तो सिर्फ़ बाँटने तथा औरों को भी वह दिशा दिखाने के उद्देश्य से यहाँ डालूँ, यह जानते हुए भी कि वह सामग्री और भी कहीं उपलब्ध है. आप अन्तत: क्या ढूँढते हैं किसी चिट्ठे पर?

Published in: on September 8, 2006 at 11:41 pm Comments (9)

सुधारों का शिकार

[ लीजिये प्रस्तुत है श्री अन्नपूर्णानन्द वर्मा कृत बहुप्रतीक्षित कहानी जो लाला मल्लूमल की सुधार-गाथा के क्रम में पहली है। ]

आजकल मैं सुधारा जा रहा हूँ। मेरे दिल और दिमाग को वह सुधारों के झाँवाँ से रगड़-रगड़ कर साफ़ कर रही है। जिस प्रकार अड़ियल टट्टू की पीठ पर कोड़े बरसते हैं उसी प्रकार मेरे सिर पर सुधारों के ओले बरस रहे हैं। उसे यह कौन समझाये कि बिगड़े दूध को मथने से मक्खन नहीं निकलता।

एक रोज़ उसने अचानक मुझसे कहा–’प्यारे! मैं आपको सुधारना चाहती हूँ।’

उस वक्त दोपहर के बारह बजे थे। मैं खाना खाकर लेटा हुआ पान कचर रहा था और झपकी लेने की तैयारी कर रहा था। इस बात नें मेरे हृदय में हलका-सा तहलका पैदा कर दिया। मेरे कान खड़े हो गये और मैं सहम कर उठ बैठा। मैनें पूछा–’क्या कहा, फिर तो कहना?’
‘मैं आपको सुधारना चाहती हूँ।’
‘मुझे?’
‘हाँ, आपको।’
‘सुधारना चाहती हो?’
‘हाँ, सुधारना चाहती हूँ।’
‘भला ऐसी कौन सी बुराइयाँ मेरे में हैं?’
‘उनकी संख्या एकाई-दहाई में न हो सकेगी, नहीं तो गिना देती। अभी देखिये, आप अपनी पीठ जनेऊ से खुजला रहे हैं। जनेऊ इसीलिये है?’
‘नहीं जनेऊ तो कुंजी बाँधने और दँतखोदनी लटकाने के लिये है।’
‘कितनी बार सिखाया आपको कि जम्हाई आये तो मुँह के आगे हाथ कर लेना चाहिये पर ऐसा आप कभी नहीं करते।’
‘यह बतलाओ कि परमात्मा ने लाखों गह्वर और गुफ़ायेँ बनायीं हैं पर किसको-किसको उन्होनें ढाँकने की कोशिश की है?’
‘हँसी न समझिये, मैं इस समय seriously बातें कर रही हूँ।’
‘अच्छा लाओ, एक गिलास पानी दो, मेरा गला सूख रहा है।’
‘आपने अच्छा याद दिलाया। कई बार सोचा था कि कहूँ पर भूल जाती हूँ। आप पानी पीते हैं तो ऐसा जान पड़ता है कि पास में कहीं पुरवट चल रहा है।’
‘पुरवट?’
‘हाँ, पुरवट! पानी पीते समय आपके गले से घटर-घट-घट-घट का शब्द क्यूँ होता है?’
‘घट-घट-व्यापी जानें, मैं क्या जानूँ!’
‘ख़ैर जाने दीजिये। लेकिन खाते वक्त आप कम-से-कम एक बात का ख़याल तो ज़रूर ही रखा करिये कि भात शब्द गँवारू है। ‘थोड़ा भात दो’ न कह कर ‘थोड़ा चावल दो’ कहना चाहिये।’
‘अच्छी बात है, अब से भात को चावल पुकारूँगा। इसी प्रकार रोटी को आटा कहा करूँ तो कोई हर्ज़ तो नहीं है?’
‘मज़ाक न करिये। अभी दो शब्द आपकी शिखा या चुन्दी के संबन्ध में कहने हैं।’
‘ज़रूर कहो। दो शब्द क्यूँ कहती हो, पूरी कविता कह डालो। कविता या लेख को मेरी चुन्दी से अच्छा विषय कौन मिलेगा!’
‘आपकी चुन्दी ज़रूरत से ज़्यादा मोटी है।’
‘मेरे मित्र पं. बिलवासी मिश्र नें इसकी तुलना भैंसिया जोंक से दी है।’
‘और लंबी भी ज़्यादा है।’
‘मेरे मित्र लाला झाऊलाल इसे पगहा पुकारते हैं।’
‘इसे छोटी करा दीजिये।’
‘मैं तो इसे जड़ से उखाड़ देता पर क्या करूँ, अपने पिताजी की यादगार है, इसी से छोड़े देता हूँ।’
‘आपकी शिखा पिताजी की यादगार है?’
‘हाँ, तुम जानती हो कि मेरे पिताजी बड़े ग़रीब थे। मरते समय वे मेरे बदन पर दो हाथ की लुँगी और सर पर एक हाथ की चुन्दी–यही दो चीज़ छोड़ गये थे।’
‘ख़ैर जाने दीजिये, मत छोटी कराइये। पर यह बताइये कि महादेवजी के दर्शन से लौटते समय आप उसमें बेलपत्र क्यों बाँध लेते हैं?’
‘साहित्यिक दृष्टि से देखो तो समझ जाओगी। चुन्दी कहाँ उगती है? खोपड़ी पर। खोपड़ी क्या है? एक प्रकार का बेल है। बेल-सी खोपड़ी पर चुन्दी– और चुन्दी में बेलपत्र! फल के साथ पत्ते का होना कैसा स्वाभाविक है।’
‘आपने शिखासूत्र तो धारण किया है पर कभी संध्योपासना तो करते नहीं।
‘संध्योपासना के लिये चौथेपन का इंतज़ार कर रहा हूँ।’
‘अधिक नहीं तो सुबह ईश्वर का नाम ले लिया करिये और रात में सोते वक्त अपने गुनाहों की माफ़ी उससे माँग लिया करिये।’
‘सोते वक्त अपने गुनाहों को याद करूँ कि रात भर अच्छी नींद भी न आये। तुम भी अच्छी शिक्षा देती हो!’

यह मेरे जीवन के एक दिन के सुधारों का आभासमात्र है। मैं जिधर देखता था उधर ही सुधार के दैत्य को मुँह फैलाये खड़ा पाता था। मुझे गढ़-छील कर आदमी बनाना ही उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य हो गया था। अनाड़ी, फूहड़ और अघोरी तो मैं कभी का साबित हो चुका था। सोलहो आने पशु साबित होने में थोड़ी ही क़सर रह गयी थी।

Published in: on August 27, 2006 at 9:20 pm Comments (11)

विश्व कुँवारा मंच द्वारा जारी सम्मन का जवाब

मेरी मुवक्किला ‘निधि देवी’ के पास समय पर कोई वकील उपलब्ध न होने के कारण मैं लाला मल्लूमल speechless-smiley-008.gif अपने आप को उनका वकील घोषित करता हूँ। ये रहे मेरे वक़ालत की शिक्षा के प्रमाण-पत्र…clipart_office_papers_020.gif

मेरी मुवक्किला पर विश्व कुँवारा परिषद के अध्यक्ष speechless-smiley-003.gif ने आरोप लगाया है कि उन्होनें कुँवारों की ‘बेइज़्ज़ती’ ख़राब की।

माई लॉर्ड, मेरी मुवक्किला मासूम है, निर्दोष है। उस पर जो भी आरोप लगाये गये वे निराधार हैं। अब इस किस्से के बारे में क्या कहूँ। हे भगवान! बात का बतंगड़, तिल का ताड़ और राई का पहाड़ सब बना डाला मेरी मुवक्किला की बात का। अब कुँवारा मंच के लोग कहेंगे कैसा तिल? कौन सी राई? क्योंकि ये लोग बात का सिर्फ़ शाब्दिक अर्थ देख पाते हैं। भाव समझने की बूझ विधाता शायद शादी के बाद ही दे इन्हें। ‘इन्सान‘ से लेखिका का मतलब ‘सुघड़ इन्सान‘ से था, पर कौन समझाये। वैसे कहा तो ये भी गया है कि मनुष्य सामाजिक पशु है, तो फिर वादी पक्ष ने इसके लेखक को ढूँढा अब तक कि नहीं? या फिर यह बात सबके लिये कही गयी है इसलिये स्वीकार कर लिया! मजे की बात यह कि ई-छाया जी को छोड़ किसी शादीशुदा पुरुष नें लेखिका का विरोध नहीं किया :) । सबको मज़ा आया पढ़ के। अनूप जी ने तो ‘कैसे कैसे सुधार किये गये’ इसके बारे में लेखिका को अपना व्यक्तिगत अनुभव लिख डालने को भी उकसा डाला। सागर भाई नें कहा है कि ‘हम भी लिखने लगें तो’। जी शौक़ से लिखिये। हमने कब रोका? अपनी मेहनत का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना चाहते हैं, अवश्य करिये। लेखिका नें नहीं कहा कि पत्नियाँ सर्व-गुण-संपन्न होती हैं।

माई लॉर्ड, शादीशुदा पुरुष दफ़्तर से सीधे घर को निकल लेता है, पत्नी और बाल-बच्चों के साथ समय जो बिताना होता है। किंतु कुँवारा मंच के लोग अपने खाली समय को व्यतीत करने के लिये मेरी मुवक्किला जैसे सीधे-सादे लोगों पर ऊल-जुलूल आरोप लगाते रहते हैं। उनसे उलझते रहते हैं…ऊट-पटाँग मुकदमे चलाते हैं। 

लेकिन अब मुद्दे की बात यह है कि मेरी मुवक्किला निधि देवी किसी भी सज़ा को मानने से इनकार करती हैं। हर्जाने के तौर पर प्रस्तावित वैवाहिक विज्ञापनों का स्वागत है। इससे मेरी मुवक्किला को दो फ़ायदे हैं- एक, लड़कियाँ भी चिट्ठा पढ़ने में रुझान दिखायेंगी। हो सकता है कि कुँवारी कन्याओं के माता-पिता, नाते-रिश्तेदार भी चिट्ठे में रुचि लें। टी.आर.पी. बढ़ने की ९९.९९% संभावनाओं के मद्देनज़र यह विकल्प लेखिका के मन को भा गया है। दूसरा फ़ायदा यह कि अगर ऐसे विज्ञापनों के चलते इस कुँवारा परिषद के दो-चार सदस्यों की भी शादी हो जाये तो ‘सुघड़ इन्सानों’ की संख्या में वृद्धि हो जायेगी और लेखिका के क्रांतिकारी विचारों के पीछे लट्ठ ले के घूमने वालों की संख्या में कमी। कुल मिला कर लेखिका की पौ बारह है। अत: ‘शुभस्य शीघ्रम’ की तर्ज पर कुँवारा मंच के सदस्य फटाफट विज्ञापन तैयार करवा लें। :D

वैसे मैं आखिर में मैं लेखिका की ओर से कहना चाहता हूँ कि नारी जीवन को एक सलीका़ देती है। इस बात के बारे में आप उनसे पूछिये जो शादीशुदा हैं। ऊपर ऊपर कहते होंगे कि जी हम तो फँस गये पर कभी अनुरोध कीजियेगा कि सच सच दिल की बात कहें।

बाकी रहा मैं, जिसकी कहानी सुनाते सुनाते मेरी मुवक्किला इस मुकदमेबाज़ी के पचड़े में पड़ गयी, उसकी आगे की कहानी सुन के आप को खुद अंदाज़ा हो जायेगा की मेरी मुवक्किला कहीं भी दोषी नहीं थी। मेरी मुवक्किला, मेरी कहानी के साथ शीघ्र ही उपस्थित होगी। धन्यवाद।

निर्णय: clipart_office_papers_006.gif ये अदालत निधि देवी को बाइज़्ज़त बरी करती है और कुँवारा मंच के लोगों को आदेश देती है कि एक साल के भीतर-भीतर शादी योग्य सभी सदस्य शादी कर सद्गति को प्राप्त हों, घर-गृहस्थी में दिमाग़ लगावें। cool-smiley-0211.gif aktion033.gif

Published in: on August 25, 2006 at 9:27 pm Comments (6)

गोरी का पति गोरिल्ला

[ अन्नपूर्णा नंद जी के कहानियों के एक मुख्य पात्र 'लाला जी' की आखिर शादी हो ही गयी। हाँलाकि लड़की-दिखाई से ले कर एक रूपसी कन्या से विवाह तक की कथा तीन-चार भागों मे बँटी है पर वे भाग फिर कभी बाँटूँगी। फिलहाल सोचती हूँ कि शादी के बाद हर पति को छील-छाल, गढ़-तराश के इन्सान बनाने की जो उठापटक पत्नियोँ को करनी पड़ती है उसका विवरण प्रस्तुत किया जाय। इसी क्रम में इस बार लाला जी की पत्नी का एक छोटा सा परिचय प्रस्तुत है। आगे आयेगी -- लाला जी की सुधार-गाथा]

    अकेले ब्रह्मा में इतनी बुद्धि कहाँ! त्रिदेवों ने मिल कर उसकी रचना की होगी। सौन्दर्य की एक नयी सीमा उसने का़यम कर दी है। छटाक-भर वजन, बुलबुल की चहक, प्यारी आँखे और चाँद सा मुखड़ा! मैनं उसे देखा और देखते ही आदमी से लट्टू हो गया। जैसा मेरा घर बसा ईश्वर करे सबका बसे।

    पाँच मिनट के अंदर वह दो बार मेरी ओर देख के हँसी और दोनों बार मैनें एक-एक चीज़ उसके हवाले कर दी–पहली बार अपना हृदय और दूसरी बार अपने सेफ़बकस की कुंजी। उसमे भी प्रसन्न होकर मुझे तुरन्त अपने प्रधान अर्दली के पद पर नियुक्त कर दिया।

    आज दिन में तीन बार वह मुझे चौक भेज चुकी थी–सुबह हाथी-दाँत की कंघी लाने, दोपहर में कमीज़ सिलवाने और इस वक्त एक पेटेंट इत्र ख़रीदने। मैं मुँह लटकाये चौक से लौटा, क्योंकि जो इत्र उसने माँगा था वह लाख तलाश करने पर भी नहीं मिला।

    उसने पूछा–’कहिये,ले आये।’
    ‘अजी, सारा चौक छान डाला, कहीं नहीं मिल रहा है!’
    ‘इतने बड़े शहर में ओटो-दिलबहार नहीं मिल रहा है!’

    ‘ओटो-दिलबहार? राम-राम!! मैं तो ओटो-सिरकपार का नाम पूछता फिरता था। अब इस तरह की कोई चीज़ लाने को कहोगी तो पर्चे पर नाम लिख लिया करूँगा!’

    ‘देखती हूँ कि आपकी स्मरणशक्ति लोप होती जा रही है।’

    ‘नहीं यह बात तो नहीं है। कहो तो आँखें मूँदकर बता दूँ कि तुम्हारे बायें गाल पर कितने तिल हैं।’

    ‘मैं एक बात पूछ सकती हूँ?’

    ‘एक नहीं, सौ बातें पूछो लेकिन पहले समीप बैठा लो।’
    ‘आप अँग्रेज़ी कुछ जानते हैं?’
    ‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं।’
    ‘कहाँ तक?’

    ‘अधिक नहीं जानता। केवल ‘डैमफ़ूल’ तक मैनें अंग्रेज़ी पढ़ी है। मैनें निश्चय कर लिया है कि अपने बच्चों को मैं डैमफ़ूल पुकारूँगा गो मेरे पिता जी मुझे सूअर-गधा पुकारते थे।’

    ‘हूँ! अच्छा हिन्दी तो आपने काफ़ी पढ़ी होगी?’

    ‘इसमें क्या शक़। सिंहासन बत्तीसी, बैताल पचीसी, किस्सा तोता मैना आदि मैनें सब पढ़े हैं। योगवशिष्ठ और किस्सा-साढ़े-तीन-यार तो मैनें एक जिल्द में बँधवा कर रख छोड़ा है। हिन्दी काव्य में भी मेरी अच्छी घुसपैठ है; बिहारी के बिरहे, केशो के कँहरवे, कहाँ तक गिनाऊँ! साहित्य सेवा भी मैनें कम नहीं की है; सच पूछो तो साहित्य सेवा करते-करते मुझे दाढ़ी-मूँछ निकल आयी है।’

    ‘जब हिन्दी-अँग्रेज़ी का यह हाल है तो संस्कृत के बारे में तो पूछना ही व्यर्थ है।’

    ‘नहीं, ऐसा मत सोचो। संसकृत में भी मैनें मनुस्मृति आदि व्याकरण की अनेक पुस्तकें पढ़ी हैं।’
    ‘कुछ समझ नहीं आता कि आपकी इन बातों पर रोऊँ या हँसूँ!
    ‘मुझे तुम दोनो दशा में सुंदर लगती हो।’

    ‘जब आप चार पढ़े-लिखे आदमियों के बीच में बैठते होंगे तो वे आपको क्या समझते होंगे?’
    ‘वे मुझे बेवकूफ़ समझते हैं मैं उन्हें बेवकूफ़ समझता हूँ।’
    ‘आखिर इस अविद्या की दशा में आपका कैसे काम चलेगा?’

    ‘काम क्या चलना है? ईश्वर करे मेरे स्वर्गीय चचाजी कल्पवृक्ष की छाँह में बैठ कर कामधेनु का दूध पियें। वे मुझे आजीवन मसनद तोड़ने के लिये स्वतंत्र कर गये हैं।’ [चाचा जी ने कोई संतान न होने के कारण अपनी अकूत संपत्ति लाला जी के नाम कर दी थी। यह किस्सा फिर कभी बताऊँगी--निधि]

    मेरी बातों पर उसे हँसी आ गयी। यदि शरद् ऋतु की चाँदनी रात में आपने कुंद कली को खिलते देखा होगा तो उसकी मुसकान की सुंदरता और सरसता का कुछ अनुमान आप कर सकेंगे। हँसी क्या थी सुधा का स्रोत था। ओठों के लाल पटल को हटाकर कुन्दन-से दाँत चमकने लगे।

    मैं आँखो द्वारा इस रूप-मदिरा को पीने लगा। अकसर ऐसा ही होता है कि जब मैं उसकी ओर देखने लगता हूँ तब राजा निमि मेरी पलकों की ड्योढ़ीदारी से अवकाश ग्र्हण कर भाग खड़े होते हैं। इस समय भी ऐसा ही हुआ! पीठ पर लटकती हुई उसकी चोटी मेरे हृदय पर नागफाँस का काम कर रही थी। उसके अंग-अंग में सौन्दर्य की छटा थी।

    सब बातों में वह मुझसे बढ़ कर है। जिसने अमा और पूर्णिमा एक साथ न देखी हो वह मुझे और उसे एक साथ देख ले। वह विदुषी है और मैं गँवार। वह सुंदरी है और मैं? क्या कहूँ!! जो कुछ कसर थी वह शीतला देवी ने बचपन ही में चेहरे पर मसूर की दालमोंठ छिड़क कर पूरी कर दी। आश्चर्य है कि इतने पर भी वह मुझे प्यार करती है–शायद उसी तरह जैसे कमल को कीचड़ प्यारा है।

  अपने हृदय पर उसका आधिपत्य मैनें बिला किसी चीं-चपड़ के स्वीकार कर लिया था। उसकी रीझ और खीझ के अनुसार मैं कभी लोटन कबूतर और कभी भींगी बिलली बना रहता था। मेरे हृदय की डोर अपने हाथ में करके वह पतंग की तरह मुझे उड़ाया करती–कभी ढील देती थी और कभी खीँच लेती थी।

    खेद है कि मैं कवि नहीं हूँ–यदि कवि होता तो उसके रूपलावण्य की प्रशंसा में कोटियों कवितायें लिख डालता, छपा डालता, और कोई न खरीदता तो मुफ़्त बाँट डालता। तब भी पं. बिलवासी मिश्र की मदद से मैनें कुछ लिखा है, सुनिये–

                   छलकि  छवापै  बजैं छागल छमाछम जो
                          सोनछरी - सी   वह  डोलैरी  मंद   कदम।
                   काकुल  संवारे  हेरि व्याकुल करत मैन
                          आनन निहारे चारु चंद्रमा को होत भ्रम॥
                   गात की गोराई पै सुवरन की खान वारौं
                          अधर  सुधारस  पै  वारौं   कोटि  चमचम।
                   रूप-मद छाके   बाँके नैनन बला के  जाके
                         ऐसी तिरिया के–हाँ! पिता के हैं दमाद हम॥

– अन्नपूर्णानंद वर्मा

Published in: on August 24, 2006 at 12:55 pm Comments (15)

पं. बिलवासी मिश्र

[यूँ तो हिन्दी साहित्य में कुल नौ रस माने गये हैं  और प्रत्येक रस का एक विशिष्ट स्थान है। पर मुझसे पूछें तो मेरी दृष्टि मे हास्यरस सर्वोपरि है। जो पढ़े सो हँसे, फिर पढे, मुँह की माँसेपेशियों की कसरत हो, ज्ञान बढे़, ख़ून बढ़े। और क्या चाहिये। अब हास्य-साहित्य मैनें बहुत तो पढ़ा नहीं पर जो पढ़ा उनमें श्री अन्नपूर्णानंद वर्मा विशेष प्रिय हैं। कहने को वे मेरे बड़े नाना होते हैं... नाना जी के छोटे ताऊ जी। पर उनसे मिलने का सौभाग्य विधाता ने मुझे नहीं दिया। २१ सितंबर, १८९५ में जन्मे श्री अन्नपूर्णानंद जी तीन भाइयों में बीच के थे। वर्ष १९६४ में जब उनका निधन हुआ तब वे अपने बड़े भाई सम्पूर्णानंद जी जो कि उस समय राजस्थान के राज्यपाल थे, के साथ जयपुर में रहते थे। जीवन में आये उतार-चढा़व के कारण स्वभाव से अति-गंभीर नाना जी की कलम से हास्यरस का ऐसा वेग फूटता था, ये बात मुझे चकित कर जाती है। उन्होनें बहुत तो नहीं लिखा पर जो भी लिखा, पठनीय है। इसलिये ये श्रंखला शुरू कर रही हूँ जिससे आप तक भी उनकी रचनायें पहुँच पायें। इस बीच उनके जीवन के बारे में जो भी थोड़ा बहुत जानती हूँ वह भी थोड़ा-थोड़ा कर आप तक पहुँचाती रहूँगी।]

 जम्बू नामक द्वीप के भारतवर्ष नामक खण्ड में- अवध के ऊपर और तराई के नीचे-हिंदुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है जिसका नाम है बहराइच। यहाँ गाज़ीमियाँ नाम के एक सिद्ध महापुरुष हो गये हैं जिनके दर्शन-पूजन का बड़ा माहात्म्य माना जाता है। हर साल हज़ारों हिन्दू आ कर यहाँ परमार्थ-चिन्तन का लाभ  उठाते हैं। एक अर्थशास्त्री ने पता लगाया है कि जितना फूल यहाँ गाज़ीमियाँ की दरग़ाह में प्रतिवर्ष हिन्दू स्त्रियाँ चढ़ाती हैं उन्हें बटोर कर यदि शहद निकाला जाय तो इतना शहद तैयार हो सकता है कि हिन्दू महासभा उसे अपने प्रस्तावों में लगाकर सदियों तक आनन्द्पूर्वक चाट सकती है।
  
 यहीं बहराइच में मेरी शादी तय हो रही थी और देन-लेन की चर्चा छिड़ गयी थी। लड़की के पिता के पस अकूत धन था। अभी तक इतना तय हो पाया था कि शादी में मुझे १ बीबी, २ इलाके, ३ मोटर, ४ मकान, ५ घोड़े, ६० हज़ार नक़द और ७० हज़ार के ज़ेवर मिलेंगे।

    यह सब बहुत ठीक था, सिर्फ़ एक बात गड़बड़ थी। किसी मत्स्य-भोजी से पूछिये कि उसके प्रिय खाद्य में काँटों का प्राचुर्य क्यों है। इस संसार मे मिसरी में फाँस वाली बात हर जगह पायी जाती है। मुझे उड़ती हुई खबर लगी कि लड़की रूप-रँग में त्रिजटा की सगी-सगोतिन है।

    मैंने तो समझा था सोने की चिड़िया हाथ लगी पर इस समाचार ने तो मेरी सारी आशाओं पर पानी फेर दिया। इस बात का पूरा विश्वास कर लेने से पहले अब यह ज़रूरी हो गया कि इसकी काफ़ी छानबीन की जाय। अपने किसी ख़ास आदमी को भेज कर इसका अनुसन्धान कराना उचित जान पड़ा। मैनें इस सम्बन्ध में अपने मित्र पं. बिलवासी मिश्र से मदद लेने का निश्चय किया।

    लड़कपन में बिलवासी जी से मेरा धौल-धप्पड़ का रिश्ता रहा और अब वे मेरे ख़ास दोस्तों में से एक हैं। मेरी तरह वे भी अपने घर में पड़े-पड़े सिर्फ़ भोजन और डासन से काम रखते हैं। भेद इतना है कि वे एक लेखक और कवि हैं और मैं एक भला आदमी। उन्होने अपनी लेखनी के बूते पर साहित्य-वन-विहङ्ग और साहित्यानन्द-सन्दोह आदि की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। ये लाखों में एक आदमी हैं। जिस समय इनका पूरा परिचय संसार को प्राप्त हो जायेगा उस समय लोग गली-गली इनकी जय बोला करेंगे। कुछ काम इनके ऐसे हैं जिन्हें अगर इतिहास की अमर सामग्री कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। उदाहरण के लिये ये लालटेन की बत्ती अपने अस्तुरे से काटते हैं। कोबरा पालिश और झाड़ू की सीँक से इन्होने दवात और क़लम का काम लिया है। ठाकुर जी की आरती इन्होनें कई बार मोमबत्ती से की है। पान में सुपारी नहीं रहती तो छुहारे का बीज काट कर डाल लेते हैं।

    मैं दोपहर के समय इनके मकान पर पहुँचा। वे खाना खा चुके थे। और मुँह में पान भर कर बाहर बैठक में लेटे हुए जुगाली कर रहे थे।
    मैनें कहा–’नमस्कार बिलवासी जी!’
    उन्होनें उत्तर दिया–’ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    ‘कुशल समाचार कहिये।’
    ‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    ‘इस समय आप क्या कर रहे हैं? आपसे एक राय करनी है।’
    ‘ऊँ-ऊँ-ऊँ।’
    मैं झल्ला गया; मैनें कहा–’आप की जान मे सिवा ऊँ के और भी कोई ऐसा शब्द है जिससे आप मेरा उत्तर दे सकें? आपको जानना चाहिये कि मैं पशुओं की बोली नहीं समझता।’

    वे थोडी़ देर मेरी ओर इस प्रकार देखते रहे जैसे मुझे वे कोई बरसाती कीड़ा समझते हों जो व्यर्थ उनके कानों के पस भनभन कर रहा था। फिर पान घोंट कर उन्होने अपना मुँह खाली किया और बोले–’लाला-जी! आप किसी भले आदमी से ऐसी आशा क्यों करते हैं कि जब वह भोजन के उपरांत मुँह में पान भर के लेटा हुआ पेट पर हाथ फेर रहा है उस समय वह आपकी बातों का उत्तर सिवाय ऊँ के अन्य किसी प्रकार से देगा।’
   ‘खैर जाने दीजिये। मैनें समझा था कि आप की जीभ ऐंठ गयी है। मैं इस वक्त इसलिये आया कि मुझे आपसे एक ज़रूरी काम है।’
   ‘काम के नाम से मैं घबराता हूँ। कोई राय देनी हो तो लेटे-लेटे दे सकता हूँ।’
   ‘मैं चाहता हूँ कि आप मेरी भावी पत्नी को देख कर उसकी सूरत-शकल के बारे में अपनी राय दें।’
   ‘बुला लाइये उन्हें। वे आप की बीबी होने वाली हैं — इसलिये उनके साथ सहानुभूति भी प्रकट करूँगा और साथ ही अपनी राय भी ज़ाहिर कर दूँगा। कहाँ हैं — क्या बाहर खड़ी हैं?’
   ‘आप भी पूरे अहमक हैं। वह बहराइच में रहती हैं, वहीं जाकर आपको किसी प्रकार उन्हें देख कर आना है।’
 
    पाँचवें दिन मुझे दो पत्र मिले, एक बिलवासी जी का, दूसरा लड़की के पिता का। बिलवासी जी का पत्र मैं ज्यों का त्यों उतारे देता हूँ। उन्होनें लड़की के संबन्ध मे केवल इतना लिखा था जो मेरे ख़याल से बहुत काफ़ी था –
                       तावा-सी तमाल-सी  तमाखू-सी तिलकुट-सी
                                पावस अमावस की   रैन अन्धकार-सी।
                       कागा-सी करइत-सी   काजल-सी कालिका-सी
                               कोइल-सी  कोयला-सी  खासी कोलतार-सी॥
                                                                     - बिलवासी

लड़की के पिता का पत्र पढ़ के मैं दंग रह गया। उसमें लिखा था — ‘आज एक ब्राह्मण देवता कहीं से घूमते-फिरते मेरे यहाँ आ गये थे। वे सामुद्रिक शास्त्र के अद्वितीय विद्व